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Economy · Exam Notes

कार्यस्थल की भलाई को सार्वजनिक स्वास्थ्य की प्राथमिकता बनाना: कानूनी, आर्थिक और संस्थागत दृष्टिकोण

दुनिया भर में विषाक्त कार्यस्थलों के कारण हर साल 8.4 लाख से अधिक मौतें होती हैं, जबकि मनो-सामाजिक जोखिमों से वैश्विक GDP का 1.37% नुकसान होता है। भारत का कानूनी ढांचा, जिसमें Occupational Safety, Health and Working Conditions Code, 2020 शामिल है, इन जोखिमों को आंशिक रूप से संबोधित करता है, लेकिन समर्पित वैधानिक प्रावधानों का अभाव है। फिनलैंड के साथ तुलना से पता चलता है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और उत्पादकता सुधारने के लिए व्यापक मनो-सामाजिक जोखिम प्रबंधन की आवश्यकता है।
23 Apr 2026 1 min read GS Paper III
Economy
Exam relevance
GS Paper III

Economy, environment, science, security and applied policy

परिचय: कार्यस्थल की भलाई और सार्वजनिक स्वास्थ्य

International Labour Organization (ILO) की 2024 की रिपोर्ट “The Psychosocial Working Environment: Global Developments and Pathways for Action” के अनुसार, विषाक्त कार्यस्थल विश्वभर में हर साल 8,40,000 से अधिक मौतों के लिए जिम्मेदार हैं। नौकरी के स्वरूप, प्रबंधन और कार्य संस्कृति से उत्पन्न मनो-सामाजिक जोखिमों के कारण वैश्विक GDP का 1.37% और लगभग 45 मिलियन विकलांगता-समायोजित जीवन वर्ष (DALYs) का नुकसान होता है। भारत में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के कारण कार्यक्षमता में लगभग $1.03 ट्रिलियन का नुकसान होता है (World Economic Forum, 2020)। यह आंकड़ा कार्यस्थल की भलाई को सार्वजनिक स्वास्थ्य की प्राथमिकता बनाने की आवश्यकता को दर्शाता है।

UPSC प्रासंगिकता

  • GS पेपर 2: शासन – व्यावसायिक स्वास्थ्य कानून, मानसिक स्वास्थ्य नीतियां
  • GS पेपर 3: अर्थव्यवस्था – कार्यस्थल की भलाई का उत्पादकता और GDP पर प्रभाव
  • निबंध: सार्वजनिक स्वास्थ्य और श्रम सुधार

मनो-सामाजिक जोखिम: परिभाषा और दायरा

मनो-सामाजिक जोखिम वे हानिकारक परिस्थितियां हैं जो नौकरी की मांग, प्रयास-इनाम असंतुलन, नौकरी की असुरक्षा, लंबे कार्य घंटे और कार्यस्थल पर उत्पीड़न से उत्पन्न होती हैं। ये मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं, जिससे हृदय रोग, अवसाद और समयपूर्व मृत्यु का खतरा बढ़ जाता है। ILO के अनुसार, मनोवैज्ञानिक उत्पीड़न सबसे आम रूप है, जो विश्वभर में 18% कर्मचारियों को प्रभावित करता है, जबकि 23% ने कम से कम एक बार कार्यस्थल पर हिंसा या उत्पीड़न का अनुभव किया है।

  • उच्च नौकरी की मांग और काम पर नियंत्रण की कमी तनावजनित स्वास्थ्य समस्याओं को बढ़ाती है।
  • विश्व स्तर पर 35% कर्मचारी सप्ताह में 48 घंटे से अधिक काम करते हैं, जो स्ट्रोक और हृदय रोग के जोखिम को बढ़ाता है।
  • कार्यस्थल पर हिंसा और उत्पीड़न से अनुपस्थिति, कर्मचारी पलायन और उत्पादकता में कमी होती है।

भारत में कानूनी और संवैधानिक ढांचा

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन के अधिकार की गारंटी देता है, जिसमें सुरक्षित और स्वस्थ कार्यस्थल का अधिकार भी निहित है। Factories Act, 1948 (धारा 11, 12, 23) कार्यस्थल की सुरक्षा और स्वास्थ्य मानकों को निर्धारित करता है, हालांकि यह मुख्यतः भौतिक खतरों पर केंद्रित है। Occupational Safety, Health and Working Conditions Code, 2020 ने मौजूदा कानूनों को एकीकृत करते हुए मनो-सामाजिक जोखिमों को स्पष्ट रूप से शामिल किया है, जो कानूनी मान्यता में प्रगति है।

  • Mental Healthcare Act, 2017 (धारा 18) मानसिक स्वास्थ्य देखभाल की उपलब्धता सुनिश्चित करता है, जो अप्रत्यक्ष रूप से कार्यस्थल की भलाई का समर्थन करता है।
  • सुप्रीम कोर्ट के M.C. Mehta v. Union of India (1987) जैसे फैसले नियोक्ता की जिम्मेदारी पर जोर देते हैं कि वे सुरक्षित कार्य वातावरण सुनिश्चित करें।
  • इन प्रावधानों के बावजूद, भारत में मनो-सामाजिक जोखिमों को लक्षित करने वाला कोई समर्पित वैधानिक ढांचा नहीं है, जिससे प्रवर्तन में खामियां हैं।

कार्यस्थल की भलाई का आर्थिक प्रभाव

मनो-सामाजिक जोखिम आर्थिक बोझ पैदा करते हैं। ILO के अनुसार, ये जोखिम वैश्विक GDP का 1.37% वार्षिक नुकसान करते हैं। केवल भारत में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं के कारण $1.03 ट्रिलियन की उत्पादकता हानि होती है (World Economic Forum, 2020)। कार्यस्थल पर उत्पीड़न और हिंसा, जो लगभग एक चौथाई कर्मचारियों को प्रभावित करती है, अनुपस्थिति और कर्मचारी पलायन के माध्यम से लागत बढ़ाती है।

  • भारत सरकार के श्रम और रोजगार मंत्रालय ने 2023-24 में व्यावसायिक स्वास्थ्य के लिए लगभग 150 करोड़ रुपये आवंटित किए, जो बजट प्राथमिकता की सीमितता दिखाता है।
  • लंबे कार्य घंटों से स्वास्थ्य देखभाल खर्च बढ़ता है और कार्यबल की दक्षता कम होती है।
  • मनो-सामाजिक जोखिम प्रबंधन में निवेश से विकलांगता कम हो सकती है और उत्पादकता बढ़ सकती है।

संस्थागत भूमिकाएं और जिम्मेदारियां

कार्यस्थल की भलाई पर कई संस्थाएं काम करती हैं:

  • International Labour Organization (ILO): वैश्विक श्रम मानक तय करती है और मनो-सामाजिक जोखिम रिपोर्ट प्रकाशित करती है।
  • भारत का श्रम और रोजगार मंत्रालय (MoLE): व्यावसायिक सुरक्षा कानूनों और संहिताओं को लागू करता है।
  • National Institute of Occupational Health (NIOH): भारत में कार्यस्थल स्वास्थ्य अनुसंधान करता है।
  • स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय (MoHFW): सार्वजनिक और मानसिक स्वास्थ्य नीतियों की देखरेख करता है।
  • World Health Organization (WHO): कार्यस्थल स्वास्थ्य समाकलन के लिए दिशा-निर्देश प्रदान करता है।
  • National Commission for Women (NCW): कार्यस्थल पर उत्पीड़न और हिंसा से संबंधित मामलों को देखता है।

तुलनात्मक विश्लेषण: भारत बनाम फिनलैंड मनो-सामाजिक जोखिम प्रबंधन

पहलूभारतफिनलैंड
कानूनी ढांचाOccupational Safety, Health and Working Conditions Code, 2020 (मनो-सामाजिक जोखिमों का प्रारंभिक समावेश)Occupational Safety and Health Act, 2002 (मनो-सामाजिक जोखिम आकलन अनिवार्य)
मनो-सामाजिक जोखिम प्रबंधनखंडित प्रवर्तन; समर्पित वैधानिक ढांचे का अभावकानूनी प्रवर्तन के साथ व्यापक कार्यस्थल भलाई कार्यक्रम
परिणाममानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी उत्पादकता हानि अधिक; कार्यस्थल मानसिक स्वास्थ्य दावों में सीमित कमीपिछले पांच वर्षों में मानसिक स्वास्थ्य दावों में 30% कमी (Finnish Institute of Occupational Health, 2023)
संस्थागत समन्वयकई मंत्रालयों के बीच भूमिकाओं का ओवरलैप; सीमित समाकलनश्रम, स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण क्षेत्रों का समेकित दृष्टिकोण

महत्वपूर्ण अंतर को भरना: समर्पित मनो-सामाजिक जोखिम ढांचे की ओर

  • भारत को कार्यस्थलों में मनो-सामाजिक जोखिम और मानसिक स्वास्थ्य को स्पष्ट रूप से संबोधित करने वाला वैधानिक ढांचा चाहिए, जिससे नियोक्ताओं की जवाबदेही सुनिश्चित हो।
  • मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य सेवाओं को व्यावसायिक स्वास्थ्य नीतियों में शामिल करना आवश्यक है, विशेष रूप से Mental Healthcare Act, 2017 का लाभ उठाकर।
  • MoLE, MoHFW, NIOH और NCW के बीच संस्थागत समन्वय को मजबूत करके प्रवर्तन और जागरूकता बढ़ाई जा सकती है।
  • आर्थिक नुकसान के मुकाबले कार्यस्थल भलाई कार्यक्रमों के लिए बजट बढ़ाना और क्षमता निर्माण जरूरी है।

महत्व और आगे का रास्ता

  • कार्यस्थल की भलाई को प्राथमिकता देने से समयपूर्व मृत्यु कम होती है, DALYs घटते हैं और कार्यबल की उत्पादकता बढ़ती है।
  • मजबूत मनो-सामाजिक जोखिम प्रबंधन संविधान के अनुच्छेद 21 और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप है।
  • फिनलैंड जैसे अंतरराष्ट्रीय सर्वोत्तम अभ्यास भारत के लिए मॉडल प्रदान करते हैं।
  • नीतिगत सुधारों का फोकस व्यापक कानूनी ढांचे, संस्थागत तालमेल और वित्तीय संसाधनों में वृद्धि पर होना चाहिए।

भारत में कार्यस्थल भलाई कानूनों के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

  1. Factories Act, 1948 कार्यस्थलों में मनो-सामाजिक जोखिमों को स्पष्ट रूप से कवर करता है।
  2. Occupational Safety, Health and Working Conditions Code, 2020 कार्यस्थल सुरक्षा से जुड़े कानूनों को समेकित करता है, जिसमें मनो-सामाजिक जोखिम शामिल हैं।
  3. Mental Healthcare Act, 2017 कार्यस्थलों में मानसिक स्वास्थ्य के लिए नियोक्ता की जिम्मेदारी निर्धारित करता है।

उपरोक्त में से कौन-सा/से कथन सही हैं?

  • (a) केवल 1 और 2
  • (b) केवल 2
  • (c) केवल 2 और 3
  • (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b)

कथन 1 गलत है क्योंकि Factories Act मुख्य रूप से भौतिक खतरों को संबोधित करता है, मनो-सामाजिक जोखिमों को नहीं। कथन 2 सही है क्योंकि 2020 का कोड मनो-सामाजिक जोखिमों को शामिल करता है। कथन 3 गलत है क्योंकि Mental Healthcare Act मानसिक स्वास्थ्य देखभाल की उपलब्धता सुनिश्चित करता है, लेकिन नियोक्ता की जिम्मेदारी निर्धारित नहीं करता।

कार्यस्थलों पर मनो-सामाजिक जोखिमों के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

  1. मनोवैज्ञानिक उत्पीड़न विश्वभर में लगभग 18% कर्मचारियों को प्रभावित करता है।
  2. विश्व स्तर पर 50% से अधिक कर्मचारी सप्ताह में 48 घंटे से अधिक काम करते हैं।
  3. कार्यस्थल पर हिंसा और उत्पीड़न अनुपस्थिति और कर्मचारी पलायन को बढ़ावा देते हैं।

उपरोक्त में से कौन-सा/से कथन सही हैं?

  • (a) केवल 1 और 3
  • (b) केवल 2
  • (c) केवल 1 और 2
  • (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (a)

कथन 1 सही है क्योंकि मनोवैज्ञानिक उत्पीड़न 18% कर्मचारियों को प्रभावित करता है। कथन 2 गलत है; केवल 35% कर्मचारी 48 घंटे से अधिक काम करते हैं। कथन 3 सही है क्योंकि कार्यस्थल पर हिंसा अनुपस्थिति और कर्मचारी पलायन को बढ़ाती है।

मुख्य प्रश्न

भारत में कार्यस्थलों पर मनो-सामाजिक जोखिम प्रबंधन को सार्वजनिक स्वास्थ्य की प्राथमिकता के रूप में क्यों माना जाना चाहिए, इस पर गंभीर समीक्षा करें। मौजूदा कानूनी ढांचे की चर्चा करें और कार्यस्थल की भलाई सुधारने के लिए सुझाव दें।

झारखंड और JPSC प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: पेपर 2 – शासन और सार्वजनिक स्वास्थ्य
  • झारखंड का दृष्टिकोण: झारखंड का बड़ा खनन और औद्योगिक कार्यबल व्यावसायिक स्वास्थ्य जोखिमों से जूझ रहा है, जिसमें खतरनाक कार्य परिस्थितियों और नौकरी की असुरक्षा के कारण मनो-सामाजिक तनाव शामिल है।
  • मुख्य बिंदु: राज्य स्तर पर व्यावसायिक सुरक्षा संहिताओं का क्रियान्वयन, मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का समावेशन और झारखंड के औद्योगिक क्षेत्रों के लिए जागरूकता अभियान आवश्यक हैं।
कार्यस्थल पर मनो-सामाजिक जोखिम क्या हैं?

मनो-सामाजिक जोखिम वे हानिकारक स्थितियां हैं जो नौकरी के स्वरूप, संगठन और प्रबंधन से उत्पन्न होती हैं, जैसे उच्च नौकरी की मांग, प्रयास-इनाम असंतुलन, नौकरी की असुरक्षा, लंबे कार्य घंटे और उत्पीड़न।

भारत में कौन सा कानून कार्यस्थल सुरक्षा को मनो-सामाजिक जोखिमों सहित समेकित करता है?

Occupational Safety, Health and Working Conditions Code, 2020 कार्यस्थल सुरक्षा से जुड़े कानूनों को समेकित करता है और मनो-सामाजिक जोखिमों को स्पष्ट रूप से शामिल करता है।

संविधान का अनुच्छेद 21 कार्यस्थल की भलाई से कैसे जुड़ा है?

अनुच्छेद 21 जीवन के अधिकार की गारंटी देता है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने सुरक्षित और स्वस्थ कार्यस्थल के अधिकार के रूप में व्याख्यायित किया है।

मनो-सामाजिक जोखिमों का वैश्विक आर्थिक प्रभाव क्या है?

मनो-सामाजिक जोखिमों के कारण वैश्विक GDP का लगभग 1.37% वार्षिक नुकसान और 45 मिलियन DALYs होता है, जो उत्पादकता और स्वास्थ्य पर भारी प्रभाव दर्शाता है।

फिनलैंड का कार्यस्थल भलाई के प्रति दृष्टिकोण क्या खास है?

फिनलैंड का Occupational Safety and Health Act (2002) मनो-सामाजिक जोखिम आकलन को अनिवार्य करता है, जिससे पिछले पांच वर्षों में कार्यस्थल मानसिक स्वास्थ्य दावों में 30% की कमी आई है।

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