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भारत में आवासीय पृथक्करण और सार्वजनिक स्वास्थ्य तक पहुंच: संरचनात्मक बाधाएं और नीतिगत कमियां

भारत में आवासीय पृथक्करण मुख्य रूप से शहरी वंचित वर्गों को सीमित संसाधनों वाले इलाकों में सीमित कर देता है, जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं तक समान पहुंच बाधित होती है। संविधान के अनुच्छेद 21 और राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 जैसे प्रयासों के बावजूद, स्वास्थ्य असमानताएं बनी हुई हैं, जो झुग्गी-झोपड़ी इलाकों में उच्च शिशु मृत्यु दर और खराब स्वच्छता से स्पष्ट होती हैं। संस्थागत विखंडन और कम स्वास्थ्य व्यय इन चुनौतियों को और बढ़ाते हैं।
01 May 2026 2 min read UPSC, JPSC, BPSC
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भारत में आवासीय पृथक्करण और सार्वजनिक स्वास्थ्य तक पहुंच: एक परिचय

भारत में आवासीय पृथक्करण मुख्य रूप से शहरी गरीब और सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों को सीमित और अविकसित इलाकों, विशेषकर झुग्गी-झोपड़ी और अनौपचारिक बस्तियों में केंद्रित करता है। 2011 की जनगणना के अनुसार, लगभग 65 मिलियन लोग, जो शहरी आबादी का 17% हैं, झुग्गी-झोपड़ी में रहते हैं। इस तरह की भौगोलिक सीमाबद्धता सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं तक समान पहुंच को रोकती है, जिससे उच्च शिशु मृत्यु दर और खराब स्वच्छता जैसी स्वास्थ्य असमानताएं और गहराती हैं। यह स्थिति भारत के सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज के लक्ष्यों के लिए चुनौती है, जबकि संविधान के अनुच्छेद 21 और राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 जैसी नीतिगत प्रतिबद्धताएं मौजूद हैं।

UPSC प्रासंगिकता

  • GS पेपर 2: स्वास्थ्य, सामाजिक न्याय, शहरी विकास
  • निबंध: स्वास्थ्य के सामाजिक निर्धारक और संवैधानिक अधिकार
  • राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति और शहरी स्वास्थ्य मिशन का संबंध

स्वास्थ्य तक पहुंच को नियंत्रित करने वाला संवैधानिक और कानूनी ढांचा

संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन के अधिकार की गारंटी देता है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने स्वास्थ्य के अधिकार के रूप में भी व्याख्यायित किया है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 सभी क्षेत्रों और सामाजिक समूहों के लिए गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं तक समान पहुंच पर जोर देती है। भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनःस्थापन अधिनियम, 2013 (धारा 3 और 4) भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास को नियंत्रित कर आवासीय पैटर्न को प्रभावित करता है, जो अप्रत्यक्ष रूप से पृथक्करण को प्रभावित करता है।

महामारी रोग अधिनियम, 1897 और आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थितियों के लिए नियम बनाते हैं, लेकिन स्वास्थ्य अवसंरचना में भौगोलिक असमानताओं को संबोधित नहीं करते। सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले जैसे पश्चिम बंगाल खेत मजदूर समिति बनाम राज्य पश्चिम बंगाल (1996) राज्य की जिम्मेदारी को स्पष्ट करते हैं कि वह स्वास्थ्य तक पहुंच सुनिश्चित करे, जो आवासीय पृथक्करण के प्रभावों से निपटने की कानूनी आवश्यकता को पुष्ट करता है।

आवासीय पृथक्करण और स्वास्थ्य तक पहुंच के आर्थिक पहलू

भारत का सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय GDP का केवल लगभग 1.3% है (आर्थिक सर्वेक्षण 2023-24), जो वैश्विक औसत 6% से काफी कम है। पृथक शहरी गरीब आबादी की जेब से स्वास्थ्य खर्च कुल स्वास्थ्य खर्च का 60% से अधिक है (राष्ट्रीय स्वास्थ्य खातें 2019-20), जो सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की अपर्याप्तता को दर्शाता है।

आयुष्मान भारत योजना 50 करोड़ से अधिक लाभार्थियों को कवर करती है, लेकिन पृथक शहरी झुग्गी इलाकों में इसकी पहुंच सीमित है, मुख्यतः पहुंच और जागरूकता की कमी के कारण (नीति आयोग 2023)। इन इलाकों में निजी स्वास्थ्य सेवा बाजार 12% की वार्षिक वृद्धि दर से बढ़ रहा है, जो सार्वजनिक क्षेत्र की कमियों को दर्शाता है (FICCI हेल्थ रिपोर्ट 2023)। हालांकि राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन (NUHM) का बजट 2023-24 में 15% बढ़कर 1200 करोड़ रुपये हुआ है, यह झुग्गी स्वास्थ्य अवसंरचना के उन्नयन के लिए अभी भी अपर्याप्त है।

आवासीय पृथक्करण और स्वास्थ्य में संस्थागत भूमिका

  • स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय (MoHFW): स्वास्थ्य नीतियां बनाता है और राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों की निगरानी करता है।
  • राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM): ग्रामीण और शहरी स्वास्थ्य पहलों को लागू करता है, जिसमें NUHM शहरी गरीबों पर केंद्रित है।
  • नीति आयोग: स्वास्थ्य नीतिगत सुझाव देता है और योजनाओं के क्रियान्वयन की निगरानी करता है।
  • नगर निगम: शहरी स्वास्थ्य अवसंरचना, स्वच्छता और स्थानीय स्वास्थ्य सेवा वितरण के लिए जिम्मेदार हैं।
  • भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR): स्वास्थ्य के सामाजिक निर्धारकों और महामारी विज्ञान पर शोध करता है।
  • आवास और शहरी मामलों का मंत्रालय (MoHUA): शहरी योजना और आवास नीतियों का संचालन करता है जो आवासीय पृथक्करण को प्रभावित करती हैं।

पृथक शहरी इलाकों में स्वास्थ्य असमानताओं के आंकड़े

  • झुग्गी परिवारों में केवल 45% के पास बेहतर स्वच्छता है, जबकि गैर-झुग्गी इलाकों में यह 72% है (NFHS-5, 2019-21)।
  • झुग्गी इलाकों में शिशु मृत्यु दर 34 प्रति 1000 जीवित जन्म है, जो गैर-झुग्गी शहरी क्षेत्रों के 23 प्रति 1000 से अधिक है (NFHS-5)।
  • झुग्गी निवासियों के लिए 2 किमी के भीतर सरकारी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंच 30% है, जबकि गैर-पृथक शहरी क्षेत्रों में यह 78% है (MoHFW 2022)।
  • कोविड-19 महामारी की 2020 लहर में घनी आबादी वाले पृथक इलाकों में संक्रमण दर 1.5 गुना अधिक थी (ICMR 2021)।
  • शहरी झुग्गी इलाकों में प्रति परिवार औसत जेब से स्वास्थ्य खर्च 4,500 रुपये प्रति वर्ष है, जो गैर-झुग्गी परिवारों से 35% अधिक है (NSSO 2018)।

तुलनात्मक अध्ययन: ब्राजील के फावेला स्वास्थ्य समेकन मॉडल

ब्राजील के फावेलाओं का अनुभव शिक्षाप्रद है। लक्षित सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता कार्यक्रमों और विकेंद्रीकृत प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों ने आवासीय पृथक्करण वाले समुदायों को जोड़ा, जिससे 2000 से 2015 के बीच शिशु मृत्यु दर में 40% की कमी आई (WHO ब्राजील रिपोर्ट 2018)। यह मॉडल दिखाता है कि कैसे भौगोलिक रूप से लक्षित स्वास्थ्य हस्तक्षेप पृथक्करण की बाधाओं को पार कर सकते हैं।

पहलू भारत (शहरी झुग्गियां) ब्राजील (फावेला)
पृथक बस्तियों में आबादी 65 मिलियन (17% शहरी आबादी) लगभग 6 मिलियन (20% शहरी आबादी)
शिशु मृत्यु दर 34 प्रति 1000 जीवित जन्म 40% कमी (2000-2015)
2 किमी के भीतर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंच 30% लगभग 70% (हस्तक्षेप के बाद)
सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय (% GDP) 1.3% लगभग 4%
स्वास्थ्य कार्यकर्ता कार्यक्रम सीमित और विखंडित सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता समेकित

स्वास्थ्य असमानताओं को बढ़ावा देने वाली नीतिगत और संस्थागत खामियां

भारत में शहरी स्वास्थ्य नीतियां आवास और स्वास्थ्य योजना को समेकित रूप से जोड़ने में असफल हैं, जिससे आवासीय पृथक्करण की जड़ तक नहीं पहुंचा जा रहा। MoHFW, MoHUA और नगर निकायों के बीच अधिकार क्षेत्र के विखंडन से झुग्गी अवसंरचना और स्वास्थ्य सेवा वितरण में समन्वय की कमी होती है। महामारी रोग अधिनियम जैसे कानून भौगोलिक स्वास्थ्य असमानताओं को कम करने के प्रावधान नहीं रखते, और NUHM के तहत बजट आवंटन भी झुग्गी सुधार के लिए अपर्याप्त हैं।

आगे का रास्ता: स्वास्थ्य पहुंच के अंतर को पाटने के लिए लक्षित कदम

  • शहरी स्वास्थ्य और आवास नीतियों को एकीकृत कर आवासीय पृथक्करण की जड़ों को समग्र रूप से संबोधित करें।
  • सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय को वैश्विक औसत तक बढ़ाएं, खासकर शहरी गरीब बस्तियों को प्राथमिकता देते हुए।
  • ब्राजील के फावेला मॉडल की तरह सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता कार्यक्रमों का विस्तार करें ताकि विकेंद्रीकृत देखभाल संभव हो सके।
  • नगर निगम की क्षमता बढ़ाएं और MoHFW तथा MoHUA के साथ समन्वय सुधारें ताकि झुग्गी अवसंरचना और स्वच्छता बेहतर हो सके।
  • कानूनी ढांचे में संशोधन करें ताकि महामारी और आपदा प्रबंधन कानूनों में भौगोलिक समानता के प्रावधान जोड़े जा सकें।

भारत में आवासीय पृथक्करण और सार्वजनिक स्वास्थ्य के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

  1. आवासीय पृथक्करण मुख्य रूप से ग्रामीण आबादी को प्रभावित करता है, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच सीमित होती है।
  2. राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन विशेष रूप से पृथक शहरी गरीबों की स्वास्थ्य आवश्यकताओं को लक्षित करता है।
  3. संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन के अधिकार के अंतर्गत स्वास्थ्य के अधिकार की गारंटी देता है।

इनमें से कौन-से कथन सही हैं?

  • (a) केवल 1 और 2
  • (b) केवल 2 और 3
  • (c) केवल 1 और 3
  • (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b)

कथन 1 गलत है क्योंकि आवासीय पृथक्करण मुख्य रूप से शहरी आबादी, खासकर झुग्गी निवासियों को प्रभावित करता है। कथन 2 और 3 सही हैं क्योंकि NUHM शहरी गरीबों की स्वास्थ्य जरूरतों को लक्षित करता है और अनुच्छेद 21 में स्वास्थ्य का अधिकार शामिल है।

पृथक शहरी इलाकों में सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय और सेवा वितरण के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

  1. भारत का सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय GDP के 6% वैश्विक औसत से अधिक है।
  2. पृथक शहरी झुग्गी इलाकों में जेब से स्वास्थ्य खर्च गैर-झुग्गी इलाकों की तुलना में अधिक है।
  3. महामारी रोग अधिनियम, 1897 में भौगोलिक स्वास्थ्य असमानताओं को संबोधित करने के प्रावधान हैं।

इनमें से कौन-से कथन सही हैं?

  • (a) केवल 1 और 2
  • (b) केवल 2
  • (c) केवल 2 और 3
  • (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b)

कथन 1 गलत है क्योंकि भारत का सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय GDP का केवल 1.3% है, जो वैश्विक औसत से कम है। कथन 2 सही है। कथन 3 गलत है क्योंकि महामारी रोग अधिनियम में भौगोलिक असमानताओं को संबोधित करने वाले प्रावधान नहीं हैं।

मेन प्रश्न

शहरी भारत में आवासीय पृथक्करण किस प्रकार सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं तक समान पहुंच को सीमित करता है, इसका विश्लेषण करें। इस समस्या से निपटने के लिए संवैधानिक और नीतिगत ढांचे पर चर्चा करें और वंचित शहरी आबादी के स्वास्थ्य परिणाम सुधारने के लिए सुझाव दें। (250 शब्द)

झारखंड और JPSC प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: पेपर 2 – स्वास्थ्य और शहरी विकास
  • झारखंड का दृष्टिकोण: जमशेदपुर और रांची जैसे झारखंड के तेजी से शहरीकरण वाले केंद्रों में झुग्गी आबादी स्वास्थ्य पहुंच की चुनौतियों का सामना कर रही है, जो राष्ट्रीय रुझानों के समान हैं।
  • मेन पॉइंट: झारखंड के नगर निकायों की भूमिका पर जोर दें, राज्य विशेष स्वास्थ्य संकेतकों को आवासीय पृथक्करण से जोड़ें, और NUHM के राज्य स्तर पर कार्यान्वयन पर चर्चा करें।
भारत में स्वास्थ्य के अधिकार का संवैधानिक आधार क्या है?

भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 से स्वास्थ्य का अधिकार व्युत्पन्न होता है, जो जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार सुनिश्चित करता है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच के अधिकार के रूप में व्याख्यायित किया है।

शहरी भारत में आवासीय पृथक्करण शिशु मृत्यु दर को कैसे प्रभावित करता है?

पृथक शहरी झुग्गी इलाकों में शिशु मृत्यु दर 34 प्रति 1000 जीवित जन्म है, जो गैर-झुग्गी शहरी क्षेत्रों के 23 प्रति 1000 से अधिक है, इसके पीछे खराब स्वच्छता, सीमित स्वास्थ्य सेवा पहुंच और अधिक भीड़-भाड़ है (NFHS-5)।

राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन स्वास्थ्य असमानताओं को दूर करने में क्या भूमिका निभाता है?

NUHM शहरी गरीबों की स्वास्थ्य आवश्यकताओं को लक्षित करता है, विशेषकर झुग्गी आबादी के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल, स्वच्छता और मातृ-शिशु स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार करता है, लेकिन बजट सीमाओं के कारण इसका पूर्ण प्रभाव सीमित है।

महामारी रोग अधिनियम, 1897 भौगोलिक स्वास्थ्य असमानताओं को क्यों नहीं संभाल पाता?

यह अधिनियम महामारी नियंत्रण पर केंद्रित है, लेकिन पृथक बस्तियों में स्वास्थ्य अवसंरचना और सेवा वितरण की भौगोलिक असमानताओं को दूर करने के प्रावधान इसमें नहीं हैं।

भारत ब्राजील के फावेला स्वास्थ्य कार्यक्रमों से क्या सीख सकता है?

ब्राजील में सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का समेकन और विकेंद्रीकृत प्राथमिक देखभाल ने शिशु मृत्यु दर में 40% कमी की, जो दर्शाता है कि भौगोलिक रूप से लक्षित, समुदाय आधारित स्वास्थ्य हस्तक्षेप प्रभावी होते हैं।

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