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झारखंड के जल संसाधनों का परिचय झारखंड

2000 में बिहार से अलग हुआ झारखंड लगभग 79,710 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है, जहाँ ज्यादातर पहाड़ी इलाका और घना वन आवरण है। राज्य में 32 प्रमुख नदियाँ और 2,000 से अधिक छोटी नदियाँ व नाले हैं, जिनमें दामोदर और सुवर्णरेखा प्रमुख हैं, जो कृषि और उद्योग के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं (झारखंड वाटर रिसोर्सेज एटलस, 2021)। सतही जल प्रचुर होने के बावजूद, केवल 18% क्षेत्र की सिंचाई होती है, जो राष्ट्रीय औसत 47% से काफी कम है (इकोनॉमिक सर्वे झारखंड, 2023)। यह असमानता जल संसाधन प्रबंधन की आवश्यकता को दर्शाती है ताकि पारिस्थितिक समस्याओं को सुलझाकर आर्थिक विकास को टिकाऊ बनाया जा सके।

JPSC परीक्षा के लिए प्रासंगिकता

  • पेपर 1: पर्यावरण और पारिस्थितिकी — झारखंड की जल नीति और पारिस्थितिक चुनौतियां
  • पेपर 2: आर्थिक विकास — कृषि और खनन में जल की भूमिका
  • पेपर 3: शासन और सार्वजनिक नीति — जल प्रबंधन के लिए संस्थागत ढांचा और कानूनी प्रावधान

झारखंड में जल से जुड़ा कानूनी और संवैधानिक ढांचा

झारखंड में जल प्रबंधन एक बहु-स्तरीय कानूनी प्रणाली के तहत संचालित होता है, जिसमें संविधान के प्रावधान, केंद्र सरकार के कानून और राज्य के विशेष अधिनियम शामिल हैं। संविधान के अनुच्छेद 48A के तहत पर्यावरण संरक्षण का दायित्व है, जिसमें जल संसाधनों की सुरक्षा भी शामिल है। जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974 राष्ट्रीय स्तर पर जल प्रदूषण नियंत्रण करता है, जबकि झारखंड ने बढ़ती भूजल कमी को देखते हुए भूजल (विकास और प्रबंधन का विनियमन) अधिनियम, 2013 बनाया है।

  • झारखंड राज्य जल नीति, 2019 स्थानीय पारिस्थितिक और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार टिकाऊ जल उपयोग की रणनीतियां बताती है।
  • राष्ट्रीय जल फ्रेमवर्क अधिनियम, 2005 प्रस्तावित कानून है, लेकिन यह राज्य के जल प्रबंधन पर विचारों को प्रभावित करता है।
  • न्यायिक निर्णय जैसे सुप्रीम कोर्ट के नर्मदा बचाओ आंदोलन (2000) मामले में दिए गए निर्देश सहभागी जल प्रबंधन को बढ़ावा देते हैं और नीति क्रियान्वयन को दिशा देते हैं।

जल संसाधन प्रबंधन के आर्थिक पहलू

झारखंड की अर्थव्यवस्था जल पर काफी निर्भर है, जहां कृषि में 70% से अधिक आबादी जुड़ी है, लेकिन केवल 23% नेट सींचे गए क्षेत्र में सिंचाई सुनिश्चित है (जनगणना 2011; झारखंड आर्थिक सर्वे, 2023)। खनन क्षेत्र, जो राज्य के सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 40% योगदान देता है, जल की भारी मांग करता है और संसाधनों पर दबाव बढ़ाता है। पिछले दस वर्षों में भूजल निकासी 15% बढ़ी है, जो दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता के लिए खतरा है (CGWB रिपोर्ट, 2022)।

  • राज्य के 2023-24 बजट में जल संसाधन विकास और सिंचाई बुनियादी ढांचे के लिए करीब 1,200 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं।
  • जल संरक्षण से जुड़ी वाटरशेड प्रबंधन पहलों ने पायलट जिलों में कृषि उत्पादन में 12% की वृद्धि की है, जो संरक्षण के आर्थिक लाभ दिखाता है (JWDM, 2022)।
  • जनसंख्या वृद्धि और शहरीकरण के कारण 2030 तक औद्योगिक और घरेलू जल मांग में 35% की वृद्धि होने का अनुमान है (झारखंड राज्य जल नीति, 2019)।

जल प्रबंधन के लिए संस्थागत व्यवस्था

झारखंड में जल प्रबंधन कई संस्थाओं के बीच जिम्मेदारियां बंटी हुई हैं, जिससे समन्वय की चुनौतियां सामने आती हैं। झारखंड राज्य जल संसाधन विभाग (JSWRD) जल परियोजनाओं की योजना और क्रियान्वयन करता है, जबकि केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) भूजल की स्थिति पर नजर रखता है। प्रदूषण नियंत्रण का काम झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (JSPCB) देखता है, और वाटरशेड कार्यक्रम झारखंड वाटरशेड डेवलपमेंट मिशन (JWDM) संचालित करता है। ग्रामीण जल आपूर्ति एवं स्वच्छता विभाग (JRWSSD) ग्रामीण जल योजनाओं का प्रबंधन करता है, जिसे तकनीकी सहायता राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान (NIH) प्रदान करता है।

  • संस्थागत भूमिकाओं का विखंडन समेकित जल संसाधन प्रबंधन में बाधा पहुंचाता है, खासकर भूजल नियंत्रण और प्रदूषण नियंत्रण में।
  • एजेंसियों के बीच वास्तविक समय की निगरानी और सूचना साझा करने की कमी के कारण डेटा आधारित निर्णय लेने की प्रक्रिया कमजोर है।
  • संस्थानिक क्षमता निर्माण और अंतः-एजेंसी समन्वय के तंत्र मजबूत करने की जरूरत है ताकि संसाधनों का बेहतर उपयोग और नीतियों का प्रभावी क्रियान्वयन हो सके।

पारिस्थितिक चुनौतियां और संरक्षण प्रयास

झारखंड में जल उपलब्धता और गुणवत्ता को प्रभावित करने वाले गंभीर पारिस्थितिक दबाव हैं। 2010 से 2020 के बीच 60% निगरानी वाले ब्लॉकों में भूजल स्तर औसतन 2 मीटर गिरा है (CGWB रिपोर्ट, 2022)। राज्य का 29.6% क्षेत्र वन आवृत है (वन सर्वे ऑफ इंडिया, 2023), जो वाटरशेड संरक्षण में अहम भूमिका निभाता है, लेकिन खनन और वनों की कटाई से खतरे में है।

  • खनन के अपशिष्ट और औद्योगिक निकासी से जल प्रदूषण सतही और भूजल दोनों की गुणवत्ता को प्रभावित करता है।
  • इंटीग्रेटेड वाटरशेड मैनेजमेंट प्रोग्राम (IWMP) के तहत 1,500 परियोजनाएं 12 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में लागू की गई हैं, जिससे मिट्टी की नमी और जल पुनर्भरण में सुधार हुआ है (JWDM वार्षिक रिपोर्ट, 2023)।
  • जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा के अनियमित पैटर्न और सूखे की बढ़ती आवृत्ति से जल तनाव और बढ़ रहा है।

तुलनात्मक अध्ययन: झारखंड बनाम इजरायल का जल प्रबंधन

पहलूझारखंडइजरायल
सिंचाई क्षेत्रभौगोलिक क्षेत्र का 18%कृषि भूमि का 85% से अधिक ड्रिप सिंचाई के तहत
जल पुन: उपयोगसीमित सीवेज पुनर्चक्रण85% से अधिक सीवेज कृषि में पुन: उपयोग
डिसेलिनेशनअभी तक लागू नहींपीने के पानी का मुख्य स्रोत
संस्थागत समेकनविभाजित एजेंसियां, समन्वय की कमीजल प्राधिकरण अत्यंत समेकित (Water Authority of Israel)
तकनीकी अपनानाजल संरक्षण तकनीकों का कम उपयोगजल संरक्षण तकनीक और नवाचार में विश्व अग्रणी

यह तुलना झारखंड में तकनीकी एकीकरण और संस्थागत समन्वय की कमी को उजागर करती है, जो जल संसाधनों के सतत प्रबंधन में बाधक हैं।

झारखंड के जल संसाधन प्रबंधन के लिए आगे का रास्ता

  • संस्थागत समन्वय बढ़ाने के लिए एक एकीकृत राज्य जल प्राधिकरण की स्थापना करें, जो सतही जल, भूजल, प्रदूषण नियंत्रण और संरक्षण प्रयासों को जोड़ सके।
  • माइक्रो-सिंचाई जैसी जल-कुशल तकनीकों को अपनाएं और सीवेज पुनर्चक्रण को बढ़ावा दें ताकि ताजा पानी पर दबाव कम हो।
  • भूजल नियंत्रण के लिए वास्तविक समय निगरानी प्रणाली मजबूत करें और झारखंड भूजल अधिनियम के प्रावधानों को कड़ाई से लागू करें।
  • सामुदायिक भागीदारी के साथ वाटरशेड विकास कार्यक्रमों को बढ़ावा दें ताकि जल पुनर्भरण और मिट्टी संरक्षण बेहतर हो सके।
  • जल प्रबंधन योजना में जलवायु सहनशीलता को शामिल करें ताकि जलवायु अस्थिरता और चरम मौसम की घटनाओं का सामना किया जा सके।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
झारखंड के जल संसाधन प्रबंधन से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. झारखंड का भूजल अधिनियम 2013 में भूजल निकासी को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया था।
  2. दामोदर नदी झारखंड की प्रमुख नदियों में से एक है।
  3. झारखंड के 50% से अधिक भौगोलिक क्षेत्र में सिंचाई होती है।
  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2 और 3
  • cकेवल 1 और 3
  • d1, 2 और 3 सभी
उत्तर: (a)
कथन 1 सही है क्योंकि झारखंड ने 2013 में भूजल (विकास और प्रबंधन का विनियमन) अधिनियम बनाया था। कथन 2 भी सही है; दामोदर नदी प्रमुख नदी है। कथन 3 गलत है क्योंकि केवल 18% क्षेत्र की सिंचाई होती है।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
झारखंड के जल प्रबंधन के संस्थागत ढांचे से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. झारखंड वाटरशेड डेवलपमेंट मिशन वाटरशेड संरक्षण कार्यक्रम लागू करता है।
  2. केंद्रीय भूजल बोर्ड राज्य स्तर की संस्था है जो जल प्रदूषण नियंत्रण की जिम्मेदार है।
  3. झारखंड राज्य जल संसाधन विभाग जल परियोजनाओं की योजना बनाता है।

इनमें से कौन-से कथन सही हैं?

  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2 और 3
  • cकेवल 1 और 3
  • d1, 2 और 3 सभी
उत्तर: (c)
कथन 1 सही है; JWDM वाटरशेड कार्यक्रम संचालित करता है। कथन 3 भी सही है; JSWRD जल परियोजनाओं की योजना बनाता है। कथन 2 गलत है; CGWB एक केंद्रीय एजेंसी है जो भूजल की निगरानी करता है, जबकि जल प्रदूषण नियंत्रण JSPCB के अंतर्गत आता है।

मेन प्रश्न

झारखंड में जल संसाधन प्रबंधन की मुख्य चुनौतियों पर चर्चा करें और वर्तमान नीतियों तथा संस्थागत तंत्र की इन चुनौतियों को दूर करने में प्रभावशीलता का मूल्यांकन करें। राज्य में टिकाऊ जल प्रबंधन सुधार के लिए सुझाव दें।

झारखंड और JPSC से जुड़ाव

  • JPSC पेपर: पेपर 1 (पर्यावरण और पारिस्थितिकी), पेपर 2 (आर्थिक विकास), पेपर 3 (शासन और सार्वजनिक नीति)
  • झारखंड का दृष्टिकोण: झारखंड राज्य जल नीति 2019, 2013 का भूजल विनियमन अधिनियम, खनन और कृषि पर निर्भरता से जुड़ी चुनौतियां
  • मेन पॉइंटर: सिंचाई क्षेत्र, भूजल गिरावट, संस्थागत विखंडन के आंकड़ों के साथ उत्तर तैयार करें; नीतिगत और कानूनी ढांचे को वाटरशेड कार्यक्रमों के उदाहरणों के साथ जोड़ें।
झारखंड भूजल (विनियमन और नियंत्रण) अधिनियम, 2013 का महत्व क्या है?

यह अधिनियम भूजल के अत्यधिक दोहन को रोकने के लिए बनाया गया है। इसमें कुओं का पंजीकरण अनिवार्य है, सतत निकासी को बढ़ावा दिया गया है और अधिकारियों को भूजल उपयोग की निगरानी व नियंत्रण का अधिकार दिया गया है।

झारखंड के वन आवरण का जल संसाधन प्रबंधन में क्या योगदान है?

राज्य का 29.6% वन आवरण जलग्रहण क्षेत्र की सुरक्षा करता है, भूजल पुनर्भरण बढ़ाता है, मिट्टी के कटाव को रोकता है और नदियों के प्रवाह को बनाए रखता है, जिससे पारिस्थितिक संतुलन और जल उपलब्धता बनी रहती है।

झारखंड वाटरशेड डेवलपमेंट मिशन की भूमिका क्या है?

JWDM वाटरशेड प्रबंधन परियोजनाएं लागू करता है, जो मिट्टी की नमी बढ़ाते हैं, भूजल पुनर्भरण में सुधार करते हैं और कृषि उत्पादन को बढ़ाते हैं। यह इंटीग्रेटेड वाटरशेड मैनेजमेंट प्रोग्राम के तहत 12 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में काम करता है।

झारखंड के जल प्रबंधन में संस्थागत समन्वय क्यों चुनौती है?

कई एजेंसियों के बीच जिम्मेदारियों का बंटवारा और कमजोर डेटा साझा करने के कारण जल प्रबंधन विखंडित होता है, खासकर भूजल नियंत्रण और प्रदूषण नियंत्रण में, जिससे समेकित प्रबंधन संभव नहीं हो पाता।

झारखंड में जल की मांग के रुझान क्या हैं?

जनसंख्या वृद्धि, शहरीकरण और औद्योगिकीकरण के कारण 2030 तक जल की मांग में 35% तक वृद्धि होने का अनुमान है, जो पहले से ही दबाव में जल संसाधनों पर और तनाव डालेगा।

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