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Governance · Exam Notes

सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग बलात्कार पीड़ितों के लिए गर्भपात की सीमा हटाई: कानूनी और नीतिगत प्रभाव

जनवरी 2024 में, भारत के सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग बलात्कार पीड़ितों के लिए गर्भपात की 20 सप्ताह की सीमा हटा दी। इस फैसले ने मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट, 1971 और प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्शुअल ऑफेन्सेज एक्ट, 2012 के बीच टकराव को सुलझाया। कोर्ट ने गर्भावस्था की पहचान में देरी को मान्यता दी, जो कि मानसिक आघात और अनिवार्य रिपोर्टिंग की वजह से होती है, ताकि नाबालिगों के प्रजनन अधिकार और स्वास्थ्य की रक्षा की जा सके।
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Governance
Exam Notes
GS Paper II

Constitution, governance, social justice and institutional analysis

In brief

जनवरी 2024 में, भारत के सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग बलात्कार पीड़ितों के लिए गर्भपात की 20 सप्ताह की सीमा हटा दी। इस फैसले ने मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट, 1971 और प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्शुअल ऑफेन्सेज एक्ट, 2012 के बीच टकराव को सुलझाया। कोर्ट ने गर्भावस्था की पहचान में देरी को मान्यता दी, जो कि मानसिक आघात और अनिवार्य रिपोर्टिंग की वजह से होती है, ताकि नाबालिगों के प्रजनन अधिकार और स्वास्थ्य की रक्षा की जा सके।

सुप्रीम कोर्ट का नाबालिग बलात्कार पीड़ितों के लिए गर्भपात की सीमा पर निर्देश

जनवरी 2024 में, भारत का सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक आदेश जारी कर नाबालिग बलात्कार पीड़ितों के मामलों में गर्भपात की 20 सप्ताह की सीमा को हटा दिया। यह निर्देश मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट, 1971 (MTP एक्ट) की उन धाराओं 3(2)(b) और 4(2) को चुनौती देता है, जो 20 सप्ताह से अधिक गर्भावस्था में गर्भपात को केवल राज्य चिकित्सा बोर्ड की मंजूरी पर ही संभव मानती हैं। कोर्ट ने माना कि प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्शुअल ऑफेन्सेज एक्ट, 2012 (POCSO) के तहत 18 वर्ष से कम आयु के नाबालिगों को मानसिक आघात और अनिवार्य रिपोर्टिंग की वजह से गर्भावस्था की जानकारी मिलने में देरी होती है, जिससे 20 सप्ताह की सीमा व्यावहारिक रूप से नुकसानदेह और अनुपयुक्त हो जाती है।

UPSC प्रासंगिकता

  • GS पेपर 2: शासन — स्वास्थ्य नीतियां, महिला अधिकार, बाल संरक्षण कानून
  • GS पेपर 1: सामाजिक मुद्दे — बाल अधिकार, लिंग आधारित हिंसा
  • निबंध: भारत में स्वास्थ्य, कानून और बाल अधिकारों का संगम

गर्भपात और बाल संरक्षण के लिए कानूनी ढांचा

MTP एक्ट, 1971 भारत में गर्भपात को नियंत्रित करता है, जो धारा 3(2)(b) के तहत 20 सप्ताह तक गर्भपात की अनुमति देता है। 20 सप्ताह से अधिक गर्भपात के लिए राज्य चिकित्सा बोर्ड की मंजूरी आवश्यक होती है, जैसा कि धारा 4(2) में उल्लेख है। यह एक्ट POCSO से पहले बना था, जो नाबालिगों के खिलाफ यौन अपराधों को दंडनीय बनाता है और रिपोर्टिंग व जांच के नियम निर्धारित करता है, जो गर्भावस्था की जानकारी में देरी का कारण बनते हैं।

  • संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने सुचिता श्रीवास्तव बनाम चंडीगढ़ प्रशासन (2009) में प्रजनन अधिकारों में भी शामिल माना है।
  • POCSO एक्ट, 2012 में नाबालिग की परिभाषा 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्ति के रूप में की गई है (धारा 2(1)(d)) और यौन अपराधों की अनिवार्य रिपोर्टिंग का प्रावधान है (धारा 6(1)), जो गर्भपात सेवाओं तक समय पर पहुंच को प्रभावित करता है।
  • राज्य चिकित्सा बोर्डों की क्षमता सीमित है; 20 सप्ताह से अधिक गर्भपात में केवल 2% मामलों को मंजूरी मिलती है (MoHFW 2023 डेटा), जिससे प्रक्रिया में बाधाएं उत्पन्न होती हैं।

गर्भपात की सीमाओं के स्वास्थ्य और आर्थिक प्रभाव

भारत में असुरक्षित गर्भपात मातृ मृत्यु का 8-9% हिस्सा है (WHO 2017)। नाबालिग बलात्कार पीड़ितों को गर्भपात की अनुमति न मिलने या देरी होने से असुरक्षित प्रक्रियाओं और मानसिक आघात का खतरा बढ़ जाता है, जिससे स्वास्थ्य खर्च बढ़ता है और परिवारों तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली पर बोझ पड़ता है।

  • राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन मातृ और बाल स्वास्थ्य के लिए सालाना ₹34,000 करोड़ (संघीय बजट 2023-24) आवंटित करता है; गर्भपात सेवाओं की बेहतर उपलब्धता से जटिलताओं और खर्च में कमी आ सकती है।
  • असुरक्षित गर्भपात के कारण अस्पताल में भर्ती बढ़ते हैं, दीर्घकालिक मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं होती हैं और उत्पादकता में गिरावट आती है।
  • गर्भपात में देरी से आघात गहरा होता है, जिसकी वजह से महंगे मानसिक और सामाजिक सहायता सेवाओं की जरूरत पड़ती है।

गर्भपात और बाल संरक्षण कानूनों के क्रियान्वयन में संस्थागत भूमिका

इस क्षेत्र में कई संस्थाएं जुड़ी हैं:

  • सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया संवैधानिक चुनौतियों का निपटारा करता है और प्रजनन अधिकारों का विस्तार करता है।
  • स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय (MoHFW) MTP पर दिशानिर्देश जारी करता है और राज्य चिकित्सा बोर्डों की निगरानी करता है।
  • राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) बाल अधिकारों के उल्लंघनों और यौन हिंसा की निगरानी करता है।
  • राज्य चिकित्सा बोर्ड 20 सप्ताह से अधिक गर्भपात की मंजूरी देता है, लेकिन प्रक्रियात्मक देरी का सामना करता है।
  • राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) ने 2022 में लगभग 44,000 नाबालिग बलात्कार के मामले दर्ज किए, जो समस्या की गंभीरता दर्शाते हैं।

गर्भपात की समय सीमा पर भारत और यूनाइटेड किंगडम की तुलना

पहलूभारतयूनाइटेड किंगडम
कानूनी गर्भपात सीमा20 सप्ताह (MTP एक्ट 1971), अपवादों के लिए मेडिकल बोर्ड की मंजूरी आवश्यक24 सप्ताह (Abortion Act 1967), 24 सप्ताह के बाद भ्रूण दोष या मातृ जोखिम पर अपवाद
नाबालिगों या बलात्कार पीड़ितों के लिए अपवादकठोर 20 सप्ताह सीमा; हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग बलात्कार पीड़ितों के लिए सीमा हटाईलचीला ढांचा, क्लीनिकल विवेक के साथ; अपवादों में नाबालिगों के लिए कोई निश्चित सीमा नहीं
असुरक्षित गर्भपात से मातृ मृत्यु8-9% (WHO 2017)सुरक्षित प्रक्रियाओं और पहुंच के कारण काफी कम
संस्थागत समर्थनराज्य चिकित्सा बोर्ड सीमित मंजूरी देते हैंNHS की व्यापक सेवाएं, परामर्श और देखभाल के साथ

भारत के कानूनी और स्वास्थ्य ढांचे में मुख्य कमी

MTP एक्ट की 20 सप्ताह की सीमा नाबालिग बलात्कार पीड़ितों में गर्भावस्था की देरी से पहचान को ध्यान में नहीं रखती, जो मानसिक आघात और POCSO की अनिवार्य प्रक्रियाओं के कारण होती है। इससे कानूनी अड़चन पैदा होती है, जो नाबालिगों को अपनी इच्छा के खिलाफ गर्भ को आगे बढ़ाने या असुरक्षित गर्भपात की ओर मजबूर करती है। सुप्रीम कोर्ट का 2024 का आदेश इस विरोधाभास को दूर करने का प्रयास करता है, लेकिन क्रियान्वयन में अभी भी चुनौतियां बनी हुई हैं।

आगे का रास्ता: कानून, स्वास्थ्य और बाल अधिकारों का समन्वय

  • MTP एक्ट में संशोधन कर नाबालिग बलात्कार पीड़ितों के लिए गर्भावस्था की सीमा बढ़ाई जाए, जिससे मेडिकल बोर्ड की मंजूरी पर निर्भरता कम हो।
  • राज्य चिकित्सा बोर्डों की क्षमता बढ़ाई जाए और प्रक्रियाओं को सरल बनाया जाए ताकि समय पर निर्णय हो सकें।
  • POCSO और MTP के प्रोटोकॉल को एकीकृत किया जाए ताकि गर्भावस्था की पहचान और गर्भपात की पहुंच में देरी न हो।
  • स्वास्थ्यकर्मियों को नाबालिग बलात्कार पीड़ितों के लिए आघात-सूचित देखभाल का प्रशिक्षण दिया जाए।
  • NCRB और NCPCR द्वारा डेटा संग्रह और निगरानी को मजबूत किया जाए ताकि नीति निर्धारण और संसाधन आवंटन बेहतर हो सके।

मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट, 1971 के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

  1. यह एक्ट बिना किसी शर्त के 20 सप्ताह तक गर्भपात की अनुमति देता है।
  2. 20 सप्ताह से अधिक गर्भपात के लिए राज्य चिकित्सा बोर्ड की मंजूरी जरूरी है।
  3. यह एक्ट नाबालिग बलात्कार पीड़ितों के लिए 20 सप्ताह से अधिक गर्भपात के विशेष प्रावधान रखता है।

उपरोक्त में से कौन-से कथन सही हैं?

  • (a) केवल 1 और 2
  • (b) केवल 2 और 3
  • (c) केवल 1 और 3
  • (d) 1, 2 और 3 सभी

उत्तर: (a)

कथन 1 गलत है क्योंकि 20 सप्ताह तक गर्भपात कुछ शर्तों के तहत ही अनुमति है, बिना शर्त नहीं। कथन 2 सही है जो MTP एक्ट की धारा 3(2)(b) और 4(2) के अनुसार है। कथन 3 गलत है क्योंकि एक्ट में नाबालिग बलात्कार पीड़ितों के लिए विशेष अपवाद पहले से नहीं हैं; यह हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के आदेश से संबोधित हुआ है।

प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्शुअल ऑफेन्सेज (POCSO) एक्ट, 2012 के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

  1. POCSO एक्ट नाबालिग को 18 वर्ष से कम आयु वाला व्यक्ति मानता है।
  2. यह नाबालिगों के खिलाफ यौन अपराधों की अनिवार्य रिपोर्टिंग करता है।
  3. यह नाबालिगों को बिना माता-पिता या मेडिकल बोर्ड की मंजूरी के स्वतंत्र रूप से गर्भपात कराने की अनुमति देता है।

उपरोक्त में से कौन-से कथन सही हैं?

  • (a) केवल 1 और 2
  • (b) केवल 2 और 3
  • (c) केवल 1 और 3
  • (d) 1, 2 और 3 सभी

उत्तर: (a)

कथन 1 और 2 सही हैं जो POCSO की धारा 2(1)(d) और 6(1) के अनुसार हैं। कथन 3 गलत है; POCSO नाबालिगों को बिना माता-पिता या मेडिकल बोर्ड की मंजूरी के गर्भपात की स्वतंत्र अनुमति नहीं देता।

प्रश्न: मेन्स

भारत में नाबालिग बलात्कार पीड़ितों के लिए 20 सप्ताह की गर्भपात सीमा हटाने के सुप्रीम कोर्ट के 2024 के निर्देश की आलोचनात्मक समीक्षा करें। वर्तमान मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट, 1971 से उत्पन्न कानूनी, सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर चर्चा करें और कमजोर नाबालिगों के अधिकारों और जरूरतों के अनुरूप गर्भपात कानूनों को ढालने के उपाय सुझाएं।

झारखंड और JPSC प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: पेपर 2 – शासन और सामाजिक न्याय; पेपर 3 – स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण
  • झारखंड का परिप्रेक्ष्य: झारखंड में बाल यौन शोषण और प्रारंभिक गर्भधारण की दर अधिक है; सीमित स्वास्थ्य सुविधाएं 20 सप्ताह के बाद सुरक्षित गर्भपात की पहुंच को रोकती हैं।
  • मेन्स सुझाव: MTP और POCSO के क्रियान्वयन में राज्य विशेष चुनौतियों, राज्य चिकित्सा बोर्डों की भूमिका और जनजातीय व ग्रामीण आबादी के लिए नीति सुधारों की जरूरत पर आधारित उत्तर तैयार करें।
मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट, 1971 के तहत गर्भपात की गर्भावस्था सीमा क्या है?

MTP एक्ट के तहत गर्भपात 20 सप्ताह तक कुछ शर्तों के साथ संभव है। 20 सप्ताह से अधिक गर्भपात के लिए राज्य चिकित्सा बोर्ड की मंजूरी जरूरी होती है।

प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्शुअल ऑफेन्सेज एक्ट, 2012 नाबालिग की परिभाषा कैसे करता है?

POCSO एक्ट में नाबालिग को 18 वर्ष से कम आयु वाला व्यक्ति माना गया है (धारा 2(1)(d))।

सुप्रीम कोर्ट ने 2024 में नाबालिग बलात्कार पीड़ितों के लिए गर्भपात सीमा के संबंध में क्या आदेश दिया?

सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग बलात्कार पीड़ितों के लिए गर्भपात की 20 सप्ताह की सीमा हटा दी, यह मानते हुए कि आघात और POCSO की अनिवार्य रिपोर्टिंग के कारण गर्भावस्था की पहचान में देरी होती है।

भारत में असुरक्षित गर्भपात के कारण मातृ मृत्यु का प्रतिशत कितना है?

WHO 2017 के अनुसार, भारत में असुरक्षित गर्भपात मातृ मृत्यु का लगभग 8-9% कारण है।

2022 में भारत में नाबालिग बलात्कार के कितने मामले दर्ज हुए?

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) ने 2022 में लगभग 44,000 नाबालिग बलात्कार के मामले दर्ज किए।

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