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Economy · Exam Notes

RBI के संशोधित खराब कर्ज नियम: एक बार खर्च का प्रभाव और दीर्घकालिक वित्तीय स्थिरता

RBI ने जून 2024 में खराब कर्ज की पहचान और प्रावधान नियमों में कड़ाई की है, जिसके तहत FY2024-25 में बैंकों को ₹50,000 करोड़ का एक बार प्रावधान करना होगा। इससे अल्पकालिक लाभप्रदता प्रभावित होगी, लेकिन इससे संपत्ति गुणवत्ता में पारदर्शिता बढ़ेगी और बैंकिंग क्षेत्र की वित्तीय स्थिरता मजबूत होगी। ये नियम Banking Regulation Act, 1949 के तहत लागू हैं और Insolvency and Bankruptcy Code, 2016 के साथ पूरक हैं।
02 May 2026 2 min read GS Paper III
Economy
Exam relevance
GS Paper III

Economy, environment, science, security and applied policy

परिचय: RBI के संशोधित खराब कर्ज नियम और उनका तत्काल प्रभाव

जून 2024 में Reserve Bank of India (RBI) ने खराब कर्ज के वर्गीकरण और प्रावधान के लिए नए दिशा-निर्देश जारी किए, जो FY2024-25 से लागू होंगे। इन नियमों के तहत गैर-निष्पादित संपत्तियों (NPAs) की पहचान और प्रावधान की शर्तें कड़ी कर दी गई हैं। इसका तुरंत प्रभाव यह होगा कि अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों (SCBs) को लगभग ₹50,000 करोड़ का एक बार प्रावधान करना पड़ेगा, जिससे उनकी अल्पकालिक लाभप्रदता पर असर पड़ेगा। हालांकि, इस कड़े नियमन का उद्देश्य संपत्ति की गुणवत्ता में पारदर्शिता बढ़ाना और बैंकिंग क्षेत्र की दीर्घकालिक मजबूती को सुनिश्चित करना है।

UPSC प्रासंगिकता

  • GS पेपर 3: भारतीय अर्थव्यवस्था – बैंकिंग सुधार, वित्तीय स्थिरता और गैर-निष्पादित संपत्तियाँ
  • GS पेपर 2: Banking Regulation Act, 1949 के तहत RBI की भूमिका
  • निबंध: वित्तीय क्षेत्र सुधार और आर्थिक विकास

RBI के नियमों का कानूनी और नियामक ढांचा

RBI को खराब कर्ज के वर्गीकरण और प्रावधान निर्धारित करने का अधिकार Banking Regulation Act, 1949 की धारा 35A और 35AA से प्राप्त है। ये प्रावधान केंद्रीय बैंक को सुरक्षित बैंकिंग प्रथाओं के लिए कड़े मानक तय करने का अधिकार देते हैं। Insolvency and Bankruptcy Code (IBC), 2016 इन नियमों को पूरक करता है, जो संकटग्रस्त संपत्तियों के समाधान के लिए एक व्यवस्थित प्रक्रिया प्रदान करता है। साथ ही, Companies Act, 2013 की धारा 129 वित्तीय विवरणों में NPAs की जानकारी खुलासा करने को अनिवार्य बनाती है, जिससे पारदर्शिता बढ़ती है। सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में RBI बनाम Yes Bank मामले में RBI को संपत्ति वर्गीकरण नियम लागू करने का अधिकार दिया, जो न्यायपालिका के नियामक नियंत्रण के समर्थन को दर्शाता है।

  • Banking Regulation Act, 1949: धारा 35A और 35AA RBI को प्रावधान और वर्गीकरण नियम बनाने का अधिकार देती हैं।
  • IBC, 2016: समयबद्ध दिवालियापन प्रक्रिया के जरिए संकटग्रस्त संपत्तियों का समाधान सुनिश्चित करता है।
  • Companies Act, 2013: धारा 129 वित्तीय विवरणों में NPAs की जानकारी अनिवार्य करती है।
  • सुप्रीम कोर्ट के निर्णय: RBI के संपत्ति वर्गीकरण अधिकार को पुष्ट करते हैं (जैसे 2019 RBI बनाम Yes Bank)।

संशोधित नियमों के आर्थिक प्रभाव

संशोधित प्रावधान नियमों के कारण FY2024-25 में बैंकों के प्रावधान खर्च में ₹50,000 करोड़ की वृद्धि होने का अनुमान है, जिससे उनकी लाभप्रदता प्रभावित होगी। मार्च 2024 तक SCBs का सकल NPA अनुपात 5.9% था, जो संपत्ति गुणवत्ता की चुनौतियों को दर्शाता है (RBI वार्षिक रिपोर्ट 2023-24)। साथ ही, अप्रैल 2024 तक क्रेडिट ग्रोथ 15.9% रही, जो उधार देने की गति को कायम रखती है। बैंकिंग क्षेत्र भारत के GDP में लगभग 7.5% का योगदान देता है, इसलिए इसकी स्थिरता समग्र आर्थिक स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है। IBC के तहत संकटग्रस्त संपत्तियों की वसूली मार्च 2024 तक ₹2.5 लाख करोड़ पहुंच चुकी है, जो दिवालियापन प्रक्रिया की प्रभावशीलता दिखाती है। इसके अलावा, Basel III मानकों के तहत बैंकों का औसत Capital Adequacy Ratio (CAR) 15.2% है, जो प्रावधान के झटकों को सहने की क्षमता प्रदान करता है।

  • एक बार का प्रावधान खर्च: ₹50,000 करोड़ (RBI Financial Stability Report, जून 2024)।
  • सकल NPA अनुपात: मार्च 2024 तक 5.9% (RBI वार्षिक रिपोर्ट 2023-24)।
  • क्रेडिट ग्रोथ: अप्रैल 2024 तक 15.9% YoY (RBI डेटाबेस)।
  • बैंकिंग क्षेत्र का GDP योगदान: लगभग 7.5% (Economic Survey 2023-24)।
  • IBC वसूली: मार्च 2024 तक ₹2.5 लाख करोड़ (IBC Quarterly Report Q4 2023-24)।
  • Capital Adequacy Ratio: Basel III के तहत औसत 15.2% (RBI Financial Stability Report)।

कार्यान्वयन और निरीक्षण में शामिल प्रमुख संस्थान

RBI प्रमुख नियामक है जो खराब कर्ज के वर्गीकरण और प्रावधान नियम लागू करता है। Insolvency and Bankruptcy Board of India (IBBI) IBC के तहत दिवालियापन समाधान प्रक्रिया की निगरानी करता है। अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक (SCBs) ये नियम लागू करते हैं और वित्तीय प्रभाव सहते हैं। वित्त मंत्रालय नीति निर्धारण करता है और यदि प्रणालीगत जोखिम बढ़े तो वित्तीय उपायों के जरिए हस्तक्षेप कर सकता है। Credit Information Companies (CICs) संपत्ति गुणवत्ता के आकलन और प्रारंभिक चेतावनी संकेतों के लिए आवश्यक क्रेडिट डेटा प्रदान करती हैं।

  • RBI: खराब कर्ज नियम लागू करने वाला नियामक।
  • IBBI: IBC के तहत दिवालियापन समाधान की निगरानी।
  • SCBs: नियमों के कार्यान्वयनकर्ता और प्रभावित पक्ष।
  • वित्त मंत्रालय: नीति निर्धारण और वित्तीय समर्थन।
  • CICs: संपत्ति गुणवत्ता निगरानी के लिए क्रेडिट डेटा उपलब्ध कराती हैं।

तुलनात्मक विश्लेषण: भारत और अमेरिका के बैंकिंग संपत्ति गुणवत्ता नियम

पहलूभारतसंयुक्त राज्य अमेरिका
नियामक प्राधिकरणReserve Bank of IndiaFederal Reserve, FDIC
संपत्ति गुणवत्ता मानकRBI द्वारा निर्धारित प्रावधान और वर्गीकरण2008 के संकट के बाद कड़े स्ट्रेस टेस्ट और Prompt Corrective Action (PCA)
सकल NPA/NPL अनुपातमार्च 2024 तक 5.9%2023 में 2% से कम (FDIC डेटा)
समाधान तंत्रIBC के तहत समयबद्ध दिवालियापन प्रक्रियाBankruptcy Code और FDIC रिसीवरशिप
पूंजी पर्याप्तताBasel III के तहत औसत 15.2%आमतौर पर 12% से ऊपर, अतिरिक्त बफर के साथ

अमेरिका ने 2008 के बाद बैंकिंग सुधारों से गैर-निष्पादित ऋण कम किए और स्ट्रेस टेस्ट व PCA से मजबूत स्थिरता हासिल की, जबकि भारत में NPA का स्तर अपेक्षाकृत अधिक है। यही वजह है कि RBI ने प्रावधान नियमों को कड़ा किया है।

वर्तमान ढांचे में चुनौतियाँ और कमियाँ

संशोधित नियमों के बावजूद, सभी बैंकों—विशेषकर निजी और विदेशी बैंकों—में एक समान संपत्ति गुणवत्ता समीक्षा तंत्र का अभाव है, जिससे NPA पहचान और प्रावधान में असंगतियां रहती हैं। यह RBI की नीति की प्रभावशीलता को कम करता है। इसके अलावा, प्रावधान और ऋण माफ़ी के बीच अंतर कई मामलों में अस्पष्ट है, जिससे बैंकों की वित्तीय स्थिति की गलत व्याख्या हो सकती है। IBC के तहत समाधान प्रक्रिया प्रभावी होते हुए भी देरी और कानूनी विवादों के कारण समय पर वसूली सीमित रहती है।

  • सभी बैंक वर्गों के लिए एक समान संपत्ति गुणवत्ता समीक्षा तंत्र का अभाव।
  • NPA पहचान और प्रावधान में असंगतियां।
  • प्रावधान और ऋण माफ़ी के बीच भ्रम से पारदर्शिता प्रभावित।
  • IBC समाधान में देरी और कानूनी अड़चनें।

महत्व और आगे का रास्ता

RBI के संशोधित खराब कर्ज नियम बैंकों पर एक बड़ा एक बार प्रावधान खर्च डालेंगे, लेकिन ये संपत्ति गुणवत्ता में पारदर्शिता और वित्तीय स्थिरता के लिए आवश्यक हैं। बेहतर प्रावधान से बैंकिंग प्रणाली को अचानक झटकों से बचाने और निवेशकों का भरोसा बढ़ाने में मदद मिलेगी। प्रभावशीलता बढ़ाने के लिए RBI को सभी बैंकों में एक समान संपत्ति गुणवत्ता समीक्षा तंत्र लागू करना चाहिए और IBBI के साथ समन्वय बढ़ाकर संकटग्रस्त संपत्ति समाधान को तेज करना चाहिए। क्रेडिट सूचना प्रणाली को मजबूत करना और Companies Act के तहत खुलासे बढ़ाना बाजार अनुशासन को और बेहतर करेगा।

  • सभी बैंकों में एक समान संपत्ति गुणवत्ता समीक्षा तंत्र लागू करें।
  • RBI और IBBI के बीच समन्वय बढ़ाएं ताकि समाधान प्रक्रिया तेज हो सके।
  • प्रारंभिक NPA पहचान के लिए क्रेडिट सूचना प्रणाली मजबूत करें।
  • Companies Act के तहत अनिवार्य खुलासे बढ़ाकर पारदर्शिता बढ़ाएं।

RBI के खराब कर्ज नियमों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

  1. RBI के नियमों के तहत प्रावधान ऋण माफ़ी के समान है।
  2. Banking Regulation Act, 1949 RBI को संपत्ति वर्गीकरण नियम बनाने का अधिकार देता है।
  3. IBC बैंकिंग नियामक ढांचे के बाहर संकटग्रस्त संपत्तियों के समाधान में मदद करता है।

उपर्युक्त में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?

  • (a) केवल 1 और 2
  • (b) केवल 2 और 3
  • (c) केवल 1 और 3
  • (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b)

कथन 1 गलत है क्योंकि प्रावधान संभावित नुकसान के लिए एक लेखांकन आरक्षित होता है, न कि ऋण माफ़ी। कथन 2 सही है क्योंकि Banking Regulation Act की धारा 35A और 35AA RBI को संपत्ति वर्गीकरण नियम बनाने का अधिकार देती हैं। कथन 3 भी सही है क्योंकि IBC बैंकिंग नियमन के बाहर संकटग्रस्त संपत्तियों के समाधान के लिए कानूनी ढांचा प्रदान करता है।

सकल गैर-निष्पादित संपत्ति (GNPA) के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

  1. GNPA अनुपात कुल ऋणों का वह प्रतिशत है जो 90 दिनों से अधिक समय से बकाया हैं।
  2. GNPA में ऋण का मूलधन और ब्याज दोनों शामिल होते हैं।
  3. मार्च 2024 तक भारतीय बैंकों का GNPA अनुपात 2% से कम था।

उपर्युक्त में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?

  • (a) केवल 1 और 2
  • (b) केवल 2 और 3
  • (c) केवल 1 और 3
  • (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (a)

कथन 1 सही है क्योंकि GNPA को 90 दिनों से अधिक बकाया ऋण के रूप में परिभाषित किया जाता है। कथन 2 भी सही है क्योंकि GNPA में मूलधन और ब्याज दोनों शामिल होते हैं। कथन 3 गलत है क्योंकि मार्च 2024 तक भारत का GNPA अनुपात 5.9% था, 2% से कम नहीं।

मुख्य प्रश्न

RBI के संशोधित खराब कर्ज पहचान और प्रावधान नियमों का भारतीय बैंकिंग क्षेत्र पर प्रभाव का समालोचनात्मक विश्लेषण करें। ये नियम वित्तीय स्थिरता और पारदर्शिता के उद्देश्यों के साथ कैसे मेल खाते हैं? इनके कार्यान्वयन में आने वाली चुनौतियों पर चर्चा करें और समाधान सुझाएं।

झारखंड और JPSC प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: पेपर 2 – अर्थव्यवस्था और बैंकिंग क्षेत्र
  • झारखंड का दृष्टिकोण: राज्य का बैंकिंग क्षेत्र, जिसमें क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक और सहकारी बैंक प्रमुख हैं, प्रावधानों से प्रभावित होगा, जिससे कृषि और MSMEs के लिए ऋण की उपलब्धता पर असर पड़ेगा।
  • मुख्य बिंदु: स्थानीय बैंकिंग चुनौतियों, ग्रामीण ऋण पर प्रभाव और झारखंड में वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करने में RBI के नियमों की भूमिका पर उत्तर तैयार करें।
बैंकिंग में प्रावधान और ऋण माफ़ी में क्या अंतर है?

प्रावधान संभावित ऋण हानि के लिए आरक्षित राशि है, जिसे खर्च के रूप में दर्ज किया जाता है लेकिन ऋण खाते में बना रहता है। ऋण माफ़ी तब होती है जब वसूली असंभव समझी जाती है और ऋण को बैंक की बैलेंस शीट से हटा दिया जाता है।

Banking Regulation Act की कौन सी धाराएँ RBI को NPA नियंत्रित करने का अधिकार देती हैं?

Banking Regulation Act, 1949 की धारा 35A और 35AA RBI को बैंकिंग संपत्तियों के वर्गीकरण और प्रावधान नियम निर्धारित करने का अधिकार देती हैं।

IBC RBI के खराब कर्ज नियमों को कैसे पूरक करता है?

IBC संकटग्रस्त संपत्तियों के समयबद्ध समाधान के लिए कानूनी ढांचा प्रदान करता है, जिससे वसूली होती है और NPAs कम होते हैं, जो RBI के प्रावधान और वर्गीकरण नियमों को समर्थन देता है।

FY2024-25 में RBI के संशोधित नियमों का अनुमानित प्रावधान लागत प्रभाव क्या था?

RBI ने FY2024-25 के लिए लगभग ₹50,000 करोड़ का एक बार प्रावधान बढ़ोतरी का अनुमान लगाया था, जो बैंकों की लाभप्रदता को प्रभावित करेगा (RBI Financial Stability Report, जून 2024)।

सभी बैंकों में एक समान संपत्ति गुणवत्ता समीक्षा क्यों जरूरी है?

समान संपत्ति गुणवत्ता समीक्षा से सभी बैंकों में NPA की पहचान और प्रावधान में एकरूपता आती है, जिससे नियामक छूट नहीं मिलती और पारदर्शिता व वित्तीय स्थिरता बढ़ती है।

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