Announcements
UPSC Foundation 2026 Prime Batch - Admissions Open JPSC 14th CCE Complete Course 2025 - Enroll Now Mains Practice Questions Programme - Limited Seats Daily Current Affairs - Free Access UPSC Prelims Test Series 2026 - 5000+ MCQs
+91 91025 57680
learnpro Civil Services Get app
LearnPro Menu
Home Current Affairs Download Notes All Articles
UPSC
UPSC NOTES
STATE PSC
OPTIONAL SUBJECTS
CURRENT AFFAIRS
DAILY EDITORIAL
COURSES
UPSC PYQ Solutions Mains Practice Questions WhatsApp Counselling Call +91 91025 57680 Online Courses

Governance · Exam Notes

वन हेल्थ दृष्टिकोण: मानव, पशु और पर्यावरण स्वास्थ्य का समन्वय ज़ूनोटिक रोग और एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस प्रबंधन के लिए

1 min read GS Paper II

वन हेल्थ दृष्टिकोण का परिचय

वन हेल्थ दृष्टिकोण एक समन्वित और बहु-क्षेत्रीय रणनीति है, जो मानव, पशु और पर्यावरण स्वास्थ्य को जोड़कर जटिल स्वास्थ्य खतरों का सामना करती है। इसका विचार मूल रूप से 2003-04 के SARS प्रकोप से उत्पन्न हुआ, जिसने दिखाया कि उभरती संक्रामक बीमारियों में ये तीनों क्षेत्र कितने परस्पर जुड़े हुए हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, दुनिया भर में उभरती संक्रामक बीमारियों का करीब 60% से अधिक हिस्सा ज़ूनोटिक होता है, जो इस समेकित दृष्टिकोण की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

भारत को ज़ूनोसिस और एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस (AMR) से गंभीर चुनौतियों का सामना है, जहां 2015-2022 के बीच 1,200 से अधिक ज़ूनोटिक प्रकोप दर्ज हुए (NCDC, 2023) और वार्षिक लगभग 58,000 नवजात शिशु मौतें AMR की वजह से होती हैं (ICMR, 2022)। इसलिए, वन हेल्थ दृष्टिकोण भारत की स्वास्थ्य सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के लिए अनिवार्य है।

UPSC से प्रासंगिकता

  • GS पेपर 2: स्वास्थ्य – ज़ूनोटिक रोग, एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस, संस्थागत ढांचे
  • GS पेपर 3: पर्यावरण – पारिस्थितिकी तंत्र स्वास्थ्य, जैव विविधता संरक्षण
  • निबंध विषय: स्वास्थ्य प्रणालियों का आपसी संबंध, उभरती संक्रामक बीमारियों का प्रबंधन

भारत में वन हेल्थ के लिए कानूनी और संवैधानिक ढांचा

भारत का कानूनी ढांचा कई कानूनों के माध्यम से वन हेल्थ दृष्टिकोण को समर्थन देता है, लेकिन अभी तक कोई एकीकृत कानूनी प्रावधान मौजूद नहीं है।

  • एपिडेमिक डिज़ीज़ एक्ट, 1897 (धारा 2) राज्य सरकारों को महामारी नियंत्रण के लिए अधिकार देता है, जो ज़ूनोटिक प्रकोपों में अहम होता है।
  • पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 (धारा 3) केंद्र सरकार को पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा का अधिकार देता है, जो वन हेल्थ के पर्यावरणीय स्वास्थ्य का हिस्सा है।
  • संक्रामक और संक्रामक पशु रोग नियंत्रण अधिनियम, 2009 पशु रोग नियंत्रण के लिए आवश्यक है, जो ज़ूनोटिक रोग प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  • राष्ट्रीय जैव विविधता अधिनियम, 2002 (धारा 36) जैव विविधता संरक्षण को अनिवार्य करता है, जो पारिस्थितिकी तंत्र की मजबूती में सहायक है।
  • भारतीय पशु चिकित्सा परिषद अधिनियम, 1984 पशु चिकित्सा शिक्षा और प्रैक्टिस को नियंत्रित करता है, जिससे पशु स्वास्थ्य निगरानी सक्षम होती है।
  • एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस पर राष्ट्रीय कार्य योजना (NAP-AMR) 2017-2021 स्वास्थ्य, कृषि और पर्यावरण मंत्रालयों के सहयोग से AMR को रोकने की नीति है।

इन प्रावधानों के बावजूद, एक कानूनी रूप से बाध्यकारी, एकीकृत वन हेल्थ शासन मॉडल के अभाव में संस्थागत प्रतिक्रियाएं बिखरी हुई हैं और डेटा अलग-अलग संग्रहित हैं।

भारत में वन हेल्थ के आर्थिक पहलू

ज़ूनोटिक रोग और AMR भारत की अर्थव्यवस्था के लिए संवेदनशील हैं, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य और पशुपालन उत्पादकता को प्रभावित करते हैं।

  • राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (NCDC) का बजट 2023-24 में 15% बढ़ाकर ₹350 करोड़ किया गया, जो ज़ूनोटिक निगरानी पर बढ़ते ध्यान को दर्शाता है।
  • पशुपालन भारत की GDP का 4.11% योगदान देता है (आर्थिक सर्वेक्षण 2023), जिससे पशु स्वास्थ्य सीधे आर्थिक उत्पादन से जुड़ा है।
  • ज़ूनोटिक प्रकोपों से भारत को अनुमानित 3 बिलियन अमेरिकी डॉलर वार्षिक नुकसान होता है (NITI Aayog, 2023)।
  • वैश्विक वन हेल्थ डायग्नोस्टिक्स और थेरेप्यूटिक्स बाजार 2025 तक 10 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है, जिसमें 12% की वार्षिक वृद्धि दर है (WHO, 2023), जो भारत के बायोटेक सेक्टर के लिए अवसर है।
  • एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस यदि अनियंत्रित रहा तो 2050 तक भारत की GDP में 2-3.5% की कमी कर सकता है (ICMR, 2022)।
  • भारत के वन हेल्थ प्रयासों ने 2020 से अब तक 50 मिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक अंतरराष्ट्रीय फंडिंग आकर्षित की है (WHO India), जिससे शोध और क्षमता निर्माण को बढ़ावा मिला है।

भारत में वन हेल्थ को आगे बढ़ाने वाले प्रमुख संस्थान

कई संस्थान वन हेल्थ के विभिन्न पहलुओं को लागू करने में लगे हैं, लेकिन समन्वय अभी भी बेहतर किया जा सकता है।

  • राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (NCDC): ज़ूनोसिस की निगरानी और प्रकोप प्रबंधन।
  • भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR): ज़ूनोटिक रोग और AMR पर शोध।
  • पशुपालन और डेयरी विभाग (DAHD): पशु स्वास्थ्य और रोग नियंत्रण।
  • पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC): पारिस्थितिकी तंत्र और जैव विविधता संरक्षण।
  • भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI): वन हेल्थ से जुड़े खाद्य सुरक्षा मानकों का नियंत्रण।
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO): वैश्विक नीति मार्गदर्शन और तकनीकी सहायता।

वन हेल्थ कंसोर्टियम भारत में 50 से अधिक संस्थानों को जोड़ता है, लेकिन डेटा साझा करने और संयुक्त कार्रवाई के लिए कोई केंद्रीकृत शासन तंत्र नहीं है।

भारत और रवांडा में वन हेल्थ कार्यान्वयन का तुलनात्मक विश्लेषण

पहलूभारतरवांडा
कानूनी ढांचाकई अधिनियम, लेकिन कोई एकीकृत वन हेल्थ कानून नहीं2019-2024 के लिए वन हेल्थ रणनीतिक योजना, एकीकृत कानूनी प्रावधान के साथ
संस्थागत समन्वयविभिन्न मंत्रालयों में बिखरा हुआ; डेटा साझा करने का कोई बाध्यकारी प्रावधान नहींस्वास्थ्य और कृषि मंत्रालयों के अंतर्गत समन्वित
ज़ूनोटिक प्रकोप में कमी2015-22 में 1,200 प्रकोप; सीमित नियंत्रण गति5 वर्षों में ज़ूनोटिक प्रकोपों में 40% कमी
AMR प्रबंधनNAP-AMR के तहत 2025 तक पशुपालन में एंटीबायोटिक उपयोग में 50% कमी का लक्ष्यकठोर नियमों के साथ बेहतर एंटीमाइक्रोबियल प्रबंधन
वित्त पोषण और समर्थनNCDC के लिए ₹350 करोड़ बजट; 2020 से 50 मिलियन अमेरिकी डॉलर अंतरराष्ट्रीय फंडिंगवन हेल्थ योजना के अनुरूप समर्पित बजट और अंतरराष्ट्रीय साझेदारी

भारत में वन हेल्थ कार्यान्वयन में प्रमुख कमियां

  • कानूनी रूप से बाध्यकारी एकीकृत वन हेल्थ शासन ढांचे का अभाव, जिससे डेटा अलग-अलग और प्रकोप प्रतिक्रिया में देरी होती है।
  • स्वास्थ्य, पशु चिकित्सा और पर्यावरण एजेंसियों के बीच अंतर-क्षेत्रीय डेटा साझा करने के नियमों की कमी।
  • पर्यावरणीय स्वास्थ्य नीतियों का मानव और पशु स्वास्थ्य कार्यक्रमों से अपर्याप्त समन्वय।
  • राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर तत्काल निगरानी और संयुक्त प्रकोप प्रतिक्रिया की सीमित क्षमता।
  • वित्त पोषण और संसाधनों का बिखराव, जिससे कार्यकुशलता और नवाचार प्रभावित होता है।

महत्व और आगे का रास्ता

  • वन हेल्थ अधिनियम को संस्थागत रूप देना, जिससे समन्वय, डेटा साझा करना और संयुक्त कार्य योजनाएं कानूनी रूप से बाध्यकारी हों।
  • निगरानी ढांचे को मजबूत करना, जिसमें मानव, पशु और पर्यावरण स्वास्थ्य के डेटा को एकीकृत किया जाए।
  • पेशेवरों के लिए क्षमता निर्माण को बढ़ावा देना, विशेषकर विभिन्न क्षेत्रों के संयुक्त प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से।
  • अंतरराष्ट्रीय फंडिंग और साझेदारियों का उपयोग कर वन हेल्थ शोध और कार्यान्वयन को बढ़ाना।
  • ज़ूनोटिक रोगों की रोकथाम और AMR के प्रति सामुदायिक जागरूकता बढ़ाना, जिससे मानवजनित जोखिम घटे।
  • राज्य स्तर की स्वास्थ्य नीतियों में वन हेल्थ सिद्धांतों को स्पष्ट रूप से शामिल करना, ताकि स्थानीय प्रकोप प्रबंधन बेहतर हो सके।

प्रश्न अभ्यास

वन हेल्थ दृष्टिकोण के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

  1. वन हेल्थ केवल मानव स्वास्थ्य और पशु चिकित्सा विज्ञान पर केंद्रित है।
  2. एपिडेमिक डिज़ीज़ एक्ट, 1897, राज्य सरकारों को वन हेल्थ से संबंधित महामारी नियंत्रण के उपाय करने का अधिकार देता है।
  3. एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस पर राष्ट्रीय कार्य योजना में स्वास्थ्य, कृषि और पर्यावरण मंत्रालयों का सहयोग शामिल है।

इनमें से कौन-से कथन सही हैं?

  • (a) केवल 1 और 2
  • (b) केवल 2 और 3
  • (c) केवल 1 और 3
  • (d) 1, 2 और 3 सभी

उत्तर: (b)

कथन 1 गलत है क्योंकि वन हेल्थ मानव, पशु और पर्यावरण स्वास्थ्य को जोड़ता है, केवल मानव और पशु चिकित्सा तक सीमित नहीं। कथन 2 और 3 सही हैं, जैसा कि एपिडेमिक डिज़ीज़ एक्ट और NAP-AMR में उल्लेख है।

भारत में एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस (AMR) के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

  1. AMR के कारण भारत में लगभग 58,000 नवजात शिशु वार्षिक मृत्यु होती है।
  2. राष्ट्रीय जैव विविधता अधिनियम सीधे पशुपालन में एंटीबायोटिक उपयोग को नियंत्रित करता है।
  3. भारत का वन हेल्थ कंसोर्टियम 50 से अधिक संस्थानों को जोड़ता है।

इनमें से कौन-से कथन सही हैं?

  • (a) केवल 1 और 2
  • (b) केवल 2 और 3
  • (c) केवल 1 और 3
  • (d) 1, 2 और 3 सभी

उत्तर: (c)

कथन 2 गलत है क्योंकि राष्ट्रीय जैव विविधता अधिनियम जैव विविधता संरक्षण का प्रावधान करता है, लेकिन एंटीबायोटिक उपयोग को नियंत्रित नहीं करता। कथन 1 और 3 सही हैं।

मुख्य प्रश्न

भारत में उभरती ज़ूनोटिक बीमारियों और एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस के प्रबंधन में वन हेल्थ दृष्टिकोण के महत्व पर चर्चा करें। इस दृष्टिकोण को लागू करने में भारत को जिन संस्थागत और कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, उनका विश्लेषण करें और उन्हें दूर करने के उपाय सुझाएं। (250 शब्द)

झारखंड और JPSC से प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: पेपर 2 (स्वास्थ्य और पर्यावरण), पेपर 3 (कृषि और पशुपालन)
  • झारखंड का दृष्टिकोण: राज्य की बड़ी आदिवासी आबादी पशुपालन और वन पारिस्थितिकी तंत्र पर निर्भर है, जिससे ज़ूनोटिक रोग निगरानी और पारिस्थितिकी तंत्र स्वास्थ्य महत्वपूर्ण हैं।
  • मुख्य बिंदु: झारखंड में वन-मानव-पशु संपर्क के कारण ज़ूनोसिस की संवेदनशीलता और राज्य स्तर पर एकीकृत वन हेल्थ नीतियों की आवश्यकता।
वन हेल्थ दृष्टिकोण क्या है?

वन हेल्थ एक समेकित रणनीति है जो मानव, पशु और पर्यावरण स्वास्थ्य के आपसी संबंध को मानती है और ज़ूनोटिक रोग तथा एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस जैसे जटिल स्वास्थ्य खतरों से निपटने का प्रयास करती है।

भारत में वन हेल्थ दृष्टिकोण का समर्थन करने वाले कानून कौन-कौन से हैं?

प्रमुख कानूनों में एपिडेमिक डिज़ीज़ एक्ट, 1897; पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986; संक्रामक और संक्रामक पशु रोग नियंत्रण अधिनियम, 2009; राष्ट्रीय जैव विविधता अधिनियम, 2002; और भारतीय पशु चिकित्सा परिषद अधिनियम, 1984 शामिल हैं।

भारत में ज़ूनोटिक रोगों का आर्थिक प्रभाव क्या है?

ज़ूनोटिक प्रकोपों से भारत को वार्षिक लगभग 3 बिलियन अमेरिकी डॉलर का आर्थिक नुकसान होता है, जबकि पशुपालन GDP का 4.11% हिस्सा है, जो पशु स्वास्थ्य संकट के आर्थिक जोखिम को दर्शाता है।

एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस भारत के स्वास्थ्य तंत्र को कैसे प्रभावित करता है?

AMR के कारण भारत में प्रति वर्ष लगभग 58,000 नवजात शिशु की मौत होती है और यदि इसे नियंत्रित न किया गया तो 2050 तक यह भारत की GDP में 2-3.5% की गिरावट कर सकता है।

भारत में वन हेल्थ कार्यान्वयन में कौन-कौन सी संस्थागत चुनौतियां हैं?

चुनौतियों में बिखरा हुआ शासन, कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतर-क्षेत्रीय समन्वय का अभाव, डेटा साझा करने की कमी, और एकीकृत निगरानी क्षमता का सीमित होना शामिल है।

Sources and further reading

Tags:Governance