परिचय: भारत में जल शासन का ढांचा
भारत विश्व की 18% आबादी का घर है, लेकिन विश्व के केवल 4% मीठे जल संसाधन यहीं उपलब्ध हैं (जल शक्ति मंत्रालय, 2023)। जल शासन मुख्यतः राज्य सूची (सप्तम अनुसूची) की प्रविष्टि 17 के तहत राज्य विषय है, जबकि केंद्र सरकार संघ सूची की प्रविष्टि 56 के तहत अंतर-राज्यीय नदी विवादों का कानून बनाती है। वर्ष 2019 में जल संबंधित मंत्रालयों के विलय से बने जल शक्ति मंत्रालय केंद्रीय जल नीतियों और केंद्रीय भूजल प्राधिकरण जैसे नियामक संस्थाओं का संचालन करता है। इन व्यवस्थाओं के बावजूद, भारत को जनसंख्या दबाव और जलवायु परिवर्तन के कारण गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ रहा है, जो समेकित, विकेंद्रीकृत और समुदाय आधारित जल प्रबंधन की दिशा में बदलाव की मांग करता है।
UPSC प्रासंगिकता
- GS पेपर 2: शासन – जल शासन, संवैधानिक प्रावधान, अंतर-राज्यीय नदी विवाद
- GS पेपर 3: पर्यावरण और पारिस्थितिकी – जल संरक्षण, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव, जल जीवन मिशन
- निबंध: सतत जल प्रबंधन और ग्रामीण विकास
जल पर संवैधानिक और कानूनी प्रावधान
जल को संवैधानिक रूप से राज्य सूची की प्रविष्टि 17 के तहत राज्य विषय माना गया है, जिससे राज्यों को जल संसाधनों पर प्राथमिक नियंत्रण मिलता है। केंद्र सरकार की विधायी अधिकारिता केवल अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों तक सीमित है, जो संघ सूची की प्रविष्टि 56 में निहित है। अनुच्छेद 262 संसद को ऐसे विवादों के निपटारे के लिए कानून बनाने का अधिकार देता है, जिसका उदाहरण इंटर-स्टेट रिवर वाटर डिस्प्यूट्स एक्ट, 1956 है। जल गुणवत्ता नियंत्रण के लिए जल (प्रदूषण रोकथाम और नियंत्रण) अधिनियम, 1974 (संशोधित 1988) और पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 लागू हैं। सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसलों जैसे एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ (1988) ने स्वच्छ जल को जीवन के मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 21) का हिस्सा माना है।
- राज्य सूची (प्रविष्टि 17): जल आपूर्ति, सिंचाई, नहरें, जल निकासी, बांध, जल भंडारण और जल विद्युत।
- संघ सूची (प्रविष्टि 56): अंतर-राज्यीय नदियों और नदी घाटियों का नियमन और विकास।
- अनुच्छेद 262: संसद को बिना या ट्रिब्यूनल के माध्यम से अंतर-राज्यीय जल विवादों का निपटारा करने का अधिकार।
जल शासन की संस्थागत संरचना
जल शक्ति मंत्रालय जल संसाधन प्रबंधन और स्वच्छता का सर्वोच्च निकाय है। इसके अंतर्गत प्रमुख संस्थाएं हैं:
- केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB): भूजल का मूल्यांकन, निगरानी और नियमन।
- केंद्रीय जल आयोग (CWC): नदी घाटी प्रबंधन, बाढ़ नियंत्रण और हाइड्रोलॉजिकल डेटा।
- राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी (NWDA): नदियों के इंटरलिंकिंग और जल संसाधन विकास की योजना।
- राज्य जल संसाधन विभाग: राज्य-विशिष्ट जल नीतियों और योजनाओं का क्रियान्वयन।
- केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB): जल गुणवत्ता मानकों की निगरानी और प्रवर्तन।
इन संस्थाओं के बावजूद, केंद्र और राज्य एजेंसियों के बीच overlapping भूमिकाओं और coordination की कमी के कारण जल प्रबंधन में विखंडन बना रहता है, जो प्रभावी शासन में बाधा डालता है।
जल संसाधनों की स्थिति और आर्थिक असर
भारत में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता 1951 में 5177 घन मीटर से घटकर 2021 में 1452 घन मीटर हो गई है, जो जल संकट की सीमा 1500 घन मीटर के करीब है (केंद्रीय जल आयोग, 2023)। भूजल का दोहन औसतन 60.4% है, विशेषकर कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश जैसे दक्षिणी राज्यों में जल तनाव गंभीर है (CGWB, 2024)। कृषि क्षेत्र मीठे जल का लगभग 80% उपभोग करता है, लेकिन सिंचाई की अक्षमता के कारण जल की भारी बर्बादी होती है और अनुमानित 6% वार्षिक GDP की हानि होती है (नीति आयोग, 2023)।
- संघ बजट 2023-24 में जल अवसंरचना और ग्रामीण जल आपूर्ति के लिए लगभग ₹60,000 करोड़ (~USD 8 अरब) आवंटित किए गए हैं, जैसे जल जीवन मिशन।
- जल और अपशिष्ट जल उपचार बाजार 2023-2028 के बीच 12% से अधिक CAGR से बढ़ने की संभावना है, और 2028 तक USD 15 अरब तक पहुंचने का अनुमान है (Frost & Sullivan, 2023)।
- 2023 में ग्रामीण परिवारों में केवल 44% के पास नल कनेक्शन था, जबकि जल जीवन मिशन के लक्ष्य इससे अधिक हैं (जल शक्ति मंत्रालय, 2023)।
तुलनात्मक अध्ययन: भारत बनाम इज़राइल जल शासन
| पहलू | भारत | इज़राइल |
|---|---|---|
| शासन मॉडल | विखंडित, राज्य-केंद्रित, कई एजेंसियों के साथ | राष्ट्रीय जल प्राधिकरण के तहत केंद्रीकृत |
| शहरी जल आपूर्ति कवरेज | लगभग 135 लीटर प्रति व्यक्ति/दिन | लगभग 100% कवरेज, 180 लीटर प्रति व्यक्ति/दिन |
| प्रौद्योगिकी का उपयोग | उन्नत सिंचाई और अपशिष्ट जल पुनः उपयोग सीमित | ड्रिप इरिगेशन और अपशिष्ट जल पुनर्चक्रण का व्यापक उपयोग |
| जल संकट प्रबंधन | प्रतिक्रियाशील, विखंडित नीतियाँ | सक्रिय, समेकित जल संसाधन प्रबंधन |
इज़राइल का समेकित दृष्टिकोण केंद्रीकृत नीति, तकनीकी समावेशन और समुदाय की भागीदारी के लाभ दिखाता है, जो भारत के विखंडित शासन और तकनीकी कम उपयोग से अलग है।
भारत के जल शासन में प्रमुख कमियाँ
- संस्थागत विखंडन: कई मंत्रालय और राज्य एजेंसियों के अतिव्यापी कार्यक्षेत्र समन्वय में विफलता पैदा करते हैं।
- डेटा की कमी: वास्तविक समय, समेकित जल डेटा का अभाव साक्ष्य आधारित निर्णय लेने में बाधा है।
- भूजल प्रबंधन: समुदाय की कम भागीदारी और कमजोर प्रवर्तन से अस्थिर दोहन होता है।
- नीति कार्यान्वयन: इंजीनियरिंग-केंद्रित समाधान मांग प्रबंधन और संरक्षण को पीछे छोड़ देते हैं।
- अंतर-राज्यीय विवाद: राजनीतिक टकराव समाधान में देरी और न्यायसंगत जल वितरण को प्रभावित करते हैं।
आगे का रास्ता: भारत के जल शासन में सुधार
- समेकित जल संसाधन प्रबंधन (IWRM): नदी घाटी स्तर पर बहु-हितधारक भागीदारी के साथ नियोजन संस्थागत करें।
- विकेंद्रीकरण: स्थानीय निकायों को भूजल नियमन और जल गुणवत्ता निगरानी के लिए सशक्त बनाएं।
- प्रौद्योगिकी अपनाना: ड्रिप सिंचाई, वर्षा जल संचयन और अपशिष्ट जल पुनर्चक्रण का विस्तार करें।
- डेटा प्रणाली: केंद्रीय और राज्य डेटाबेस को जोड़ते हुए वास्तविक समय जल डेटा प्लेटफॉर्म विकसित करें।
- कानूनी सुधार: जल प्रदूषण कानूनों और भूजल दोहन नियमों के प्रवर्तन को मजबूत करें।
- विवाद समाधान: समयबद्ध विवाद निपटान के लिए स्वतंत्र ट्रिब्यूनल स्थापित करें।
अभ्यास प्रश्न
भारत में जल शासन के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
- जल संघ सूची की प्रविष्टि 17 के तहत संघ विषय है।
- केंद्रीय भूजल प्राधिकरण जल शक्ति मंत्रालय के अंतर्गत आता है।
- अनुच्छेद 262 संसद को अंतर-राज्यीय जल विवादों का निपटारा करने का अधिकार देता है।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही हैं?
उत्तर: (b)
कथन 1 गलत है क्योंकि जल राज्य सूची की प्रविष्टि 17 के तहत राज्य विषय है, संघ सूची का नहीं। कथन 2 और 3 सही हैं क्योंकि केंद्रीय भूजल प्राधिकरण जल शक्ति मंत्रालय के अंतर्गत है और अनुच्छेद 262 संसद को अंतर-राज्यीय जल विवादों का निपटारा करने का अधिकार देता है।
जल जीवन मिशन के संबंध में निम्नलिखित पर विचार करें:
- यह 2024 तक सभी ग्रामीण परिवारों को नल कनेक्शन प्रदान करने का लक्ष्य रखता है।
- यह केवल जल आपूर्ति पर केंद्रित है और स्वच्छता को शामिल नहीं करता।
- यह योजना केवल केंद्र सरकार द्वारा लागू की जाती है, राज्य भागीदार नहीं हैं।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही हैं?
उत्तर: (a)
कथन 1 सही है क्योंकि जल जीवन मिशन का लक्ष्य 2024 तक सभी ग्रामीण परिवारों को नल कनेक्शन देना है। कथन 2 गलत है क्योंकि मिशन जल आपूर्ति पर केंद्रित है, लेकिन स्वच्छता के लिए स्वच्छ भारत मिशन जैसी अलग योजनाएँ हैं। कथन 3 भी गलत है क्योंकि यह योजना केंद्र और राज्यों की साझेदारी में लागू की जाती है।
मुख्य प्रश्न
भारत के जल शासन में संवैधानिक और संस्थागत चुनौतियों पर चर्चा करें और सतत जल प्रबंधन सुधार के लिए उपाय सुझाएं। (250 शब्द)
झारखंड और JPSC प्रासंगिकता
- JPSC पेपर: पेपर 2 – शासन और पर्यावरण; पेपर 3 – कृषि और जल संसाधन
- झारखंड परिप्रेक्ष्य: झारखंड में भूजल स्तर गिरावट और अनियमित वर्षा से कृषि प्रभावित; राज्य की जल नीतियों को केंद्र की योजनाओं के साथ बेहतर समन्वय की जरूरत।
- मेन पॉइंट: झारखंड के भूजल तनाव, समुदाय आधारित जल प्रबंधन की भूमिका और राज्य-केंद्र समन्वय पर जोर।
भारत में जल राज्य विषय क्यों है?
जल राज्य सूची की प्रविष्टि 17 के तहत राज्य विषय है क्योंकि जल संसाधन भौगोलिक रूप से सीमित होते हैं और राज्यों की जिम्मेदारी होती है कि वे सिंचाई, जल आपूर्ति और जल निकासी का प्रबंधन अपने क्षेत्र में करें। संविधान अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों को संघ सूची की प्रविष्टि 56 में केंद्र के अधिकार क्षेत्र में रखता है।
जल शक्ति मंत्रालय की भूमिका क्या है?
2019 में स्थापित जल शक्ति मंत्रालय जल संसाधन प्रबंधन और स्वच्छता को एकीकृत करता है। यह जल जीवन मिशन जैसी योजनाओं और केंद्रीय भूजल प्राधिकरण जैसे संस्थानों का संचालन करता है जो जल संरक्षण, आपूर्ति और गुणवत्ता नियंत्रण को समन्वित करते हैं।
भूजल दोहन भारत की जल सुरक्षा को कैसे प्रभावित करता है?
भारत में औसत भूजल दोहन 60.4% है, जिसके कारण जल स्तर गिर रहा है, खासकर दक्षिणी राज्यों में। अत्यधिक दोहन कृषि, पेयजल आपूर्ति और पारिस्थितिक संतुलन के लिए खतरा है।
संवैधानिक प्रावधान कौन सा है जो संसद को अंतर-राज्यीय जल विवाद सुलझाने का अधिकार देता है?
अनुच्छेद 262 संसद को अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों के निपटारे के लिए कानून बनाने का अधिकार देता है, जिससे विवादों के समाधान हेतु ट्रिब्यूनल भी बनाए जा सकते हैं।
भारत के वर्तमान जल शासन प्रणाली की सीमाएं क्या हैं?
सीमाओं में संस्थागत विखंडन, समेकित डेटा प्रणाली की कमी, कम समुदाय भागीदारी, जल गुणवत्ता कानूनों का कमजोर प्रवर्तन, और अनसुलझे अंतर-राज्यीय विवाद शामिल हैं, जो जल उपयोग को अप्रभावी और अस्थिर बनाते हैं।