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2028 में COP33 की मेजबानी से भारत का इनकार: संदर्भ और निहितार्थ

भारत ने संयुक्त राष्ट्र के फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (UNFCCC) के 33वें पार्टियों के सम्मेलन (COP33) की मेजबानी करने से हिचकिचाहट जताई है, जो 2028 में आयोजित होना है। यह निर्णय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) के भीतर चल रही विचार-विमर्श के बीच आया है और घरेलू विकास प्राथमिकताओं, वित्तीय सीमाओं और बदलती जलवायु कूटनीति के लक्ष्यों के बीच सामंजस्य स्थापित करने की रणनीतिक पुनर्समीक्षा को दर्शाता है। भारत ने पहले COP26 की तैयारी से जुड़े कार्यक्रमों की मेजबानी की है, लेकिन अब पूर्ण COP आयोजन की वित्तीय और प्रशासनिक जिम्मेदारियों को लेकर सतर्क है, जिसकी लागत भारत के COP26 तैयारी चरण के अनुसार 50-70 मिलियन अमेरिकी डॉलर के बीच होती है।

UPSC प्रासंगिकता

  • GS पेपर 3: पर्यावरण और पारिस्थितिकी – जलवायु परिवर्तन, अंतरराष्ट्रीय समझौते
  • GS पेपर 2: अंतरराष्ट्रीय संबंध – भारत की जलवायु कूटनीति
  • निबंध: भारत में विकास और जलवायु प्रतिबद्धताओं का संतुलन

भारत की जलवायु प्रतिबद्धताओं के लिए कानूनी और संवैधानिक ढांचा

भारत की पर्यावरण शासन व्यवस्था मुख्य रूप से Environment Protection Act, 1986 के अंतर्गत है, विशेषकर सेक्शन 3, जो केंद्र सरकार को पर्यावरण संरक्षण के लिए कदम उठाने का अधिकार देता है। National Action Plan on Climate Change (NAPCC) 2008 घरेलू स्तर पर जलवायु शमन और अनुकूलन को लागू करता है। संविधान के अनुच्छेद 48A के तहत राज्य को पर्यावरण की रक्षा और सुधार करने का निर्देश दिया गया है। COP आयोजनों की मेजबानी कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है, लेकिन Paris Agreement 2015 (UNFCCC के तहत) के तहत भारत की प्रतिबद्धताएँ वैश्विक जलवायु शासन में सक्रिय भागीदारी की मांग करती हैं, जिसमें COP मेजबानी एक कूटनीतिक विकल्प है न कि कानूनी दायित्व।

  • Environment Protection Act, 1986: सेक्शन 3 केंद्र सरकार को पर्यावरण संरक्षण के लिए कार्रवाई का अधिकार देता है।
  • NAPCC 2008: आठ राष्ट्रीय मिशनों का ढांचा, जो नवीकरणीय ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता और सतत कृषि पर केंद्रित हैं।
  • Paris Agreement 2015: भारत की राष्ट्रीय निर्धारित योगदान (NDCs) उत्सर्जन तीव्रता में कमी और नवीकरणीय क्षमता विस्तार पर ध्यान देती हैं।

आर्थिक पहलू: लागत, बजट और अवसर लागत

COP33 की मेजबानी के लिए अनुमानित खर्च 50-70 मिलियन अमेरिकी डॉलर है, जो भारत के जलवायु वित्त पोषण आवंटन के लिए महत्वपूर्ण है। केंद्रीय बजट 2023-24 में जलवायु संबंधित पहलों के लिए लगभग 20,000 करोड़ रुपये (~2.4 बिलियन अमेरिकी डॉलर) का प्रावधान किया गया है, जो मुख्य रूप से नवीकरणीय ऊर्जा विस्तार और जलवायु अनुकूलन प्रयासों पर केंद्रित है। COP मेजबानी के लिए धन का स्थानांतरण सामाजिक और बुनियादी ढांचा क्षेत्रों को प्रभावित कर सकता है। वहीं, भारत का नवीकरणीय ऊर्जा बाजार 2030 तक 250 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है (IEA 2023), जो हरित निवेश और तकनीकी हस्तांतरण के माध्यम से आर्थिक अवसर प्रदान करता है, जिन्हें अन्य कूटनीतिक माध्यमों से बेहतर तरीके से उपयोग किया जा सकता है।

  • COP मेजबानी की अनुमानित लागत: 50-70 मिलियन अमेरिकी डॉलर (भारत के COP26 तैयारी चरण के अनुमान)।
  • केंद्रीय बजट 2023-24 में जलवायु आवंटन: लगभग 19,500-20,000 करोड़ रुपये (~2.4 बिलियन अमेरिकी डॉलर)।
  • मार्च 2024 तक नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता: 175 GW (MNRE रिपोर्ट)।
  • 2030 तक भारत की जलवायु वित्त आवश्यकताएं: 2.5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर (Climate Policy Initiative 2023)।

भारत की जलवायु नीति और अंतरराष्ट्रीय सहभागिता में संस्थागत भूमिका

MoEFCC जलवायु नीति और अंतरराष्ट्रीय वार्ताओं के लिए मुख्य मंत्रालय है, जो National Institution for Transforming India (NITI Aayog) के साथ सतत विकास रणनीतियों के लिए समन्वय करता है। Central Pollution Control Board (CPCB) घरेलू स्तर पर पर्यावरण नियमों का पालन कराता है। वैश्विक स्तर पर UNFCCC COP आयोजनों का संचालन करता है और अंतरराष्ट्रीय जलवायु सहयोग के लिए ढांचा तैयार करता है। International Energy Agency (IEA) भारत की ऊर्जा संक्रमण नीतियों के लिए महत्वपूर्ण डेटा और विश्लेषण प्रदान करता है।

  • MoEFCC: भारत की जलवायु कूटनीति और नीति कार्यान्वयन का नेतृत्व करता है।
  • NITI Aayog: सतत विकास और जलवायु रणनीति समन्वय पर सलाह देता है।
  • CPCB: प्रदूषण नियंत्रण और पर्यावरण मानकों को लागू करता है।
  • UNFCCC: COP आयोजनों का संचालन करता है और वैश्विक जलवायु संधि दायित्वों की देखरेख करता है।
  • IEA: भारत के जलवायु लक्ष्यों से संबंधित ऊर्जा संक्रमण डेटा प्रदान करता है।

भारत का जलवायु प्रोफाइल और वैश्विक स्थिति

भारत की प्रति व्यक्ति CO2 उत्सर्जन 1.9 टन है (वर्ल्ड बैंक 2022), जो वैश्विक औसत 4.7 टन से काफी कम है। भारत वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में लगभग 7% योगदान देता है (Global Carbon Project 2023)। मार्च 2024 तक इसकी नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता 175 GW तक पहुंच चुकी है (MNRE), जो तेज वृद्धि को दर्शाती है। हालांकि, भारत का जलवायु वित्त अंतराल अभी भी बड़ा है, जिसकी 2030 तक अनुमानित आवश्यकता 2.5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर है (Climate Policy Initiative 2023)। ये आंकड़े भारत की COP33 की मेजबानी को लेकर सतर्क दृष्टिकोण को समझने में मदद करते हैं, जो अंतरराष्ट्रीय अपेक्षाओं और घरेलू वास्तविकताओं के बीच संतुलन स्थापित करता है।

परिमाणभारतयूनाइटेड किंगडम (COP26 मेजबान)
प्रति व्यक्ति CO2 उत्सर्जन (टन)1.9 (वर्ल्ड बैंक 2022)5.8 (वर्ल्ड बैंक 2022)
COP मेजबानी लागत50-70 मिलियन अमेरिकी डॉलर (अनुमान)20 मिलियन GBP (~25 मिलियन अमेरिकी डॉलर) (UK Govt 2021)
जलवायु वित्त आवंटन (वार्षिक)लगभग 20,000 करोड़ INR (~2.4 बिलियन अमेरिकी डॉलर) (केंद्रीय बजट 2023-24)COP26 के बाद नेट जीरो रणनीति के लिए 11 बिलियन GBP का वचन
नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता175 GW (MNRE 2024)~40 GW (UK BEIS 2022)
COP के बाद हरित निवेश वृद्धिCOP मेजबानी का सीमित उपयोगCOP26 के एक साल बाद 15% वृद्धि (UK BEIS 2022)

तुलनात्मक विश्लेषण: भारत बनाम यूके COP मेजबानी और जलवायु कूटनीति

यूके ने 2021 में COP26 की मेजबानी का रणनीतिक उपयोग करते हुए अपनी नेट जीरो रणनीति को तेज किया, जिससे एक साल में हरित निवेश में 15% की बढ़ोतरी हुई (UK Department for Business, Energy & Industrial Strategy रिपोर्ट 2022)। यूके ने COP मंच के माध्यम से निजी क्षेत्र के वित्त और तकनीकी साझेदारियों को प्रभावी ढंग से जुटाया। इसके विपरीत, भारत की जलवायु कूटनीति ने COP मेजबानी को निजी हरित वित्त और तकनीकी हस्तांतरण को बढ़ावा देने के औजार के रूप में पूरी तरह से उपयोग नहीं किया, जो एक महत्वपूर्ण कमी है। भारत की COP33 की मेजबानी से हिचकिचाहट इसी कम उपयोग और उच्च अवसर लागत से जुड़ी हो सकती है।

  • यूके की COP26 मेजबानी ने निजी हरित निवेश और तकनीकी साझेदारी को बढ़ावा दिया।
  • भारत की जलवायु कूटनीति बहुपक्षीय संलग्नता पर जोर देती है, लेकिन COP मेजबानी को आर्थिक उपकरण के रूप में कम प्राथमिकता देती है।
  • वित्तीय और प्रशासनिक बोझ भारत के निर्णय को प्रभावित करते हैं।

महत्व और आगे का रास्ता

भारत की COP33 की मेजबानी से दूरी एक व्यावहारिक संसाधन आवंटन और कूटनीतिक रणनीति की पुनः समीक्षा को दर्शाती है। यह घरेलू जलवायु कार्रवाई को मजबूत करने और मौजूदा ढांचों जैसे NAPCC के तहत कार्य को बढ़ाने की जरूरत को रेखांकित करता है, साथ ही वित्तीय संसाधनों को अधिक खपाए बिना अंतरराष्ट्रीय जलवायु कूटनीति को भी मजबूत करता है। लाभ अधिकतम करने के लिए भारत निम्नलिखित पर ध्यान केंद्रित कर सकता है:

  • COP मेजबानी से स्वतंत्र निजी क्षेत्र के हरित वित्त जुटाने के तंत्र को मजबूत करना।
  • प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और क्षमता निर्माण के लिए अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों का लाभ उठाना।
  • जलवायु कूटनीति को भारत की विकास प्राथमिकताओं और वित्तीय यथार्थ के अनुरूप बनाना।
  • MoEFCC, NITI Aayog, और वित्त मंत्रालयों के बीच संस्थागत समन्वय को सुदृढ़ करना।

प्रश्न अभ्यास

📝 प्रारंभिक अभ्यास
भारत की COP आयोजनों की मेजबानी के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. भारत पर Environment Protection Act, 1986 के तहत COP आयोजन की कानूनी बाध्यता है।
  2. COP आयोजन में भारी वित्तीय लागत शामिल होती है जो घरेलू जलवायु वित्त पोषण को प्रभावित कर सकती है।
  3. भारत की COP33 की मेजबानी से हिचकिचाहट विकास और जलवायु कूटनीति के बीच संतुलन का रणनीतिक निर्णय है।
  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2 और 3
  • cकेवल 1 और 3
  • d1, 2 और 3
उत्तर: (b)
कथन 1 गलत है क्योंकि Environment Protection Act या किसी अन्य कानून के तहत भारत पर COP आयोजनों की मेजबानी कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है। कथन 2 और 3 सही हैं क्योंकि COP की मेजबानी में बड़ी लागत शामिल होती है और भारत का निर्णय रणनीतिक पुनर्समीक्षा को दर्शाता है।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
भारत की जलवायु कूटनीति और COP मेजबानी के बारे में निम्नलिखित पर विचार करें:
  1. भारत ने निजी क्षेत्र के हरित वित्त जुटाने के लिए COP मेजबानी का पूर्ण उपयोग किया है।
  2. यूके की COP26 मेजबानी से हरित निवेश में मापनीय वृद्धि हुई।
  3. 2024 तक भारत की नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता 170 GW से अधिक है।
  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2 और 3
  • cकेवल 1 और 3
  • d1, 2 और 3
उत्तर: (b)
कथन 1 गलत है क्योंकि भारत ने निजी वित्त जुटाने के लिए COP मेजबानी का कम उपयोग किया है। कथन 2 और 3 UK BEIS रिपोर्ट और MNRE डेटा के आधार पर सही हैं।

मेन्स प्रश्न

भारत के घरेलू जलवायु प्राथमिकताओं, वित्तीय प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय जलवायु कूटनीति के संदर्भ में 2028 में COP33 की मेजबानी करने से इनकार के निर्णय का समालोचनात्मक विश्लेषण करें। (250 शब्द)

झारखंड और JPSC प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: पेपर 3 (पर्यावरण और पारिस्थितिकी), पेपर 2 (शासन और अंतरराष्ट्रीय संबंध)
  • झारखंड का दृष्टिकोण: झारखंड की कोयला-आधारित अर्थव्यवस्था जलवायु प्रतिबद्धताओं और विकास के बीच संतुलन बनाने में चुनौतियों का सामना करती है; भारत की COP मेजबानी नीति से राज्य स्तर पर सतत विकास पर नीति बहसों को दिशा मिलती है।
  • मेन्स के लिए संकेत: भारत की जलवायु कूटनीति को झारखंड के ऊर्जा संक्रमण और वित्तीय सीमाओं के साथ जोड़कर उत्तर तैयार करें।
भारत पर COP आयोजनों की मेजबानी कानूनी रूप से क्यों बाध्यकारी नहीं है?

भारत की COP आयोजनों की मेजबानी स्वैच्छिक और कूटनीतिक है, इसे कोई कानून बाध्य नहीं करता। Environment Protection Act, 1986 और Paris Agreement पर्यावरण संरक्षण और जलवायु कार्रवाई की मांग करते हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों की मेजबानी के लिए बाध्य नहीं करते।

भारत के लिए COP आयोजन की अनुमानित लागत क्या है?

भारत के COP26 तैयारी चरण के अनुसार, COP आयोजन की लागत 50-70 मिलियन अमेरिकी डॉलर के बीच है, जिसमें अवसंरचना, सुरक्षा और लॉजिस्टिक्स शामिल हैं। यह लागत घरेलू जलवायु वित्त पोषण के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।

भारत की प्रति व्यक्ति CO2 उत्सर्जन वैश्विक स्तर पर किस प्रकार है?

भारत की प्रति व्यक्ति CO2 उत्सर्जन 1.9 टन है, जो वैश्विक औसत 4.7 टन (वर्ल्ड बैंक 2022) से आधे से भी कम है, जो उसके कम ऐतिहासिक उत्सर्जन तीव्रता को दर्शाता है।

MoEFCC भारत की जलवायु कूटनीति में क्या भूमिका निभाता है?

पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) भारत की जलवायु नीति, अंतरराष्ट्रीय वार्ता और जलवायु कार्रवाई योजनाओं के कार्यान्वयन का समन्वय करता है।

यूके ने COP26 के माध्यम से हरित निवेश कैसे बढ़ाया?

यूके की COP26 मेजबानी ने निजी क्षेत्र के वित्त और तकनीकी साझेदारियों को जुटाकर नेट जीरो रणनीति के तहत एक साल में हरित निवेश में 15% की वृद्धि को प्रेरित किया (UK BEIS 2022)।

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