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भारत की हरित हाइड्रोजन महत्वाकांक्षा: ऊर्जा संक्रमण के लिए 06 मार्च 202

06-मार्च-2026 का अनिवार्य लक्ष्य: भारत की हरित हाइड्रोजन यात्रा को गति देना

06-मार्च-2026 की तारीख भारत के महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन (NGHM) के लिए एक महत्वपूर्ण अंतरिम समय-सीमा है। यह विशेष रूप से स्ट्रेटेजिक इंटरवेंशन्स फॉर ग्रीन हाइड्रोजन ट्रांजिशन (SIGHT) कार्यक्रम के चरण-II के तहत 1.5 मिलियन टन (MT) हरित हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता को चालू करने और कम से कम दो प्रमुख हरित हाइड्रोजन हब स्थापित करने का लक्ष्य रखती है। यह मील का पत्थर केवल एक परिचालन लक्ष्य नहीं है, बल्कि भारत के ऊर्जा परिवर्तन में एक रणनीतिक मोड़ है, जिसका उद्देश्य देश को हरित हाइड्रोजन उत्पादन और निर्यात के लिए एक वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित करना है। इस तात्कालिक चरण की सफलता बड़े निवेशों के जोखिम को कम करने, तकनीकी मार्गों को मान्य करने और इलेक्ट्रोलाइज़र के लिए घरेलू विनिर्माण क्षमताओं का निर्माण करने के लिए महत्वपूर्ण है, जिससे भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा और डीकार्बोनाइजेशन लक्ष्यों को बल मिलेगा।

इस 2026 के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए मजबूत नीति कार्यान्वयन, महत्वपूर्ण निजी क्षेत्र के निवेश और मंत्रालयों के बीच निर्बाध समन्वय की आवश्यकता है। यह चुनौती केवल क्षमता वृद्धि तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन और जल इलेक्ट्रोलिसिस से लेकर भंडारण, परिवहन और अंतिम-उपयोग अनुप्रयोगों तक की पूरी मूल्य श्रृंखला शामिल है। भारत की इस समय-सीमा के प्रति प्रतिबद्धता ऊर्जा में रणनीतिक स्वायत्तता प्राप्त करने और अपनी नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता का लाभ उठाकर एक नए ‘हरित अर्थव्यवस्था’ प्रतिमान को चलाने की व्यापक वैचारिक रूपरेखा को दर्शाती है, जिससे यह वैश्विक जलवायु कार्रवाई परिदृश्य में अपनी प्रमुख स्थिति बना सके।

UPSC प्रासंगिकता

  • GS-III: भारतीय अर्थव्यवस्था (बुनियादी ढाँचा, ऊर्जा सुरक्षा, औद्योगिक नीति), पर्यावरण (जलवायु परिवर्तन, डीकार्बोनाइजेशन), विज्ञान और प्रौद्योगिकी (नवीकरणीय ऊर्जा, हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था)।
  • GS-II: शासन (नीति कार्यान्वयन, ऊर्जा में संघवाद), अंतर्राष्ट्रीय संबंध (जलवायु कूटनीति, ऊर्जा गठबंधन)।
  • निबंध: सतत विकास लक्ष्य और भारत की प्रतिबद्धताएँ; ऊर्जा सुरक्षा बनाम पर्यावरणीय स्थिरता; आर्थिक परिवर्तन में प्रौद्योगिकी की भूमिका।

हरित हाइड्रोजन को नियंत्रित करने वाला संस्थागत और कानूनी ढाँचा

भारत की हरित हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था की दिशा में यह प्रयास एक बहुआयामी संस्थागत और कानूनी संरचना पर आधारित है, जिसे उत्पादन को सुगम बनाने, अपनाने को बढ़ावा देने और उभरते क्षेत्र को विनियमित करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। NGHM एक व्यापक ढाँचे के रूप में कार्य करता है, जो 06-मार्च-2026 और उसके बाद के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए विभिन्न मंत्रालयों और एजेंसियों के प्रयासों का समन्वय करता है।

मुख्य जनादेश और दृष्टिकोण: राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन (NGHM)

  • शुभारंभ: केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा जनवरी 2023 में ₹19,744 करोड़ के प्रारंभिक परिव्यय के साथ अनुमोदित।
  • प्राथमिक उद्देश्य: भारत को हरित हाइड्रोजन उत्पादन, उपयोग और निर्यात के लिए एक वैश्विक केंद्र बनाना, जो भारत के दीर्घकालिक जलवायु लक्ष्यों के अनुरूप हो।
  • प्रमुख स्तंभ: मांग सृजन को सुगम बनाना, इलेक्ट्रोलाइज़र और घटकों के स्वदेशी विनिर्माण का समर्थन करना, नए अनुप्रयोगों का परीक्षण करना और अनुसंधान एवं विकास को बढ़ावा देना।
  • लक्ष्य (2030): प्रति वर्ष 5 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) की उत्पादन क्षमता प्राप्त करना, जिसमें लगभग 125 GW की संबद्ध नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता वृद्धि शामिल है।
  • अपेक्षित परिणाम (2030): ₹1 लाख करोड़ से अधिक के जीवाश्म ईंधन आयात में कमी, लगभग 50 MMT वार्षिक GHG उत्सर्जन का शमन, और 6 लाख से अधिक नौकरियों का सृजन।

प्रमुख कार्यान्वयन और नियामक निकाय

  • नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE): NGHM के लिए नोडल मंत्रालय, जो समग्र नीति निर्माण, योजना डिजाइन और निगरानी के लिए जिम्मेदार है।
  • भारतीय सौर ऊर्जा निगम (SECI): स्ट्रेटेजिक इंटरवेंशन्स फॉर ग्रीन हाइड्रोजन ट्रांजिशन (SIGHT) कार्यक्रम के लिए नामित कार्यान्वयन एजेंसी, जो इलेक्ट्रोलाइज़र विनिर्माण और हरित हाइड्रोजन उत्पादन के लिए वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान करती है।
  • नीति आयोग: मिशन के दीर्घकालिक दृष्टिकोण के लिए रणनीतिक योजना, नीतिगत सिफारिशों और अंतर-मंत्रालयी प्रयासों के समन्वय में शामिल।
  • ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (BEE): मानकों को विकसित करने, हाइड्रोजन उत्पादन और उपयोग में ऊर्जा दक्षता को बढ़ावा देने और संभवतः प्रमाणन तंत्र पर ध्यान केंद्रित करता है।
  • केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA): हरित हाइड्रोजन उत्पादन के लिए बड़े पैमाने पर नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं को राष्ट्रीय ग्रिड में एकीकृत करने में भूमिका निभाता है।

वित्तपोषण तंत्र और प्रोत्साहन

  • SIGHT कार्यक्रम (घटक I): इलेक्ट्रोलाइज़र के विनिर्माण के लिए प्रोत्साहन (जैसे, PLI योजना जैसी संरचना), जिसका उद्देश्य पूंजीगत लागत को कम करना और घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना है।
  • SIGHT कार्यक्रम (घटक II): हरित हाइड्रोजन उत्पादन के लिए प्रोत्साहन (जैसे, प्रति किलोग्राम उत्पादित प्रत्यक्ष सब्सिडी) हाइड्रोजन की समेकित लागत को कम करने के लिए।
  • वायबिलिटी गैप फंडिंग (VGF): पायलट परियोजनाओं और प्रारंभिक चरण के बुनियादी ढाँचे के विकास के लिए संभावित उपयोग, जहाँ वाणिज्यिक व्यवहार्यता अभी तक स्थापित नहीं हुई है।
  • हरित हाइड्रोजन कोष (प्रस्तावित): हरित हाइड्रोजन परियोजनाओं में घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय पूंजी को लगाने के लिए एक समर्पित कोष स्थापित करने पर चर्चा।

प्रासंगिक कानूनी और नीतिगत ढाँचे

  • ऊर्जा संरक्षण अधिनियम, 2001 (यथासंशोधित 2022): केंद्र सरकार को नामित संस्थाओं द्वारा उपभोग के लिए नवीकरणीय ऊर्जा या गैर-जीवाश्म स्रोतों की न्यूनतम हिस्सेदारी निर्दिष्ट करने का अधिकार देता है, जिसमें हरित हाइड्रोजन भी शामिल हो सकता है।
  • विद्युत अधिनियम, 2003: बिजली के उत्पादन, पारेषण, वितरण और व्यापार के लिए नियामक ढाँचा प्रदान करता है, जो हरित हाइड्रोजन के नवीकरणीय ऊर्जा घटक के लिए महत्वपूर्ण है।
  • राष्ट्रीय ऊर्जा नीति (2017): ऊर्जा सुरक्षा, पहुँच और स्थिरता के लिए व्यापक नीतिगत उद्देश्यों को रेखांकित करती है, जिसके भीतर हरित हाइड्रोजन अपनी रणनीतिक जगह पाता है।

06-मार्च-2026 के लक्ष्य की ओर प्रमुख मुद्दे और चुनौतियाँ

जबकि NGHM एक महत्वाकांक्षी मार्ग निर्धारित करता है, अंतरिम 06-मार्च-2026 की समय-सीमा को कई महत्वपूर्ण बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है, जिनके लिए ठोस नीतिगत हस्तक्षेप और तकनीकी सफलताओं की आवश्यकता है। ये चुनौतियाँ आर्थिक व्यवहार्यता, बुनियादी ढाँचे और नियामक स्पष्टता तक फैली हुई हैं।

तकनीकी और लागत संबंधी बाधाएँ

  • उच्च उत्पादन लागत: हरित हाइड्रोजन वर्तमान में ग्रे हाइड्रोजन (जीवाश्म ईंधन से उत्पादित) की तुलना में काफी अधिक महंगा है, मुख्य रूप से इलेक्ट्रोलाइज़र की उच्च पूंजीगत लागत और नवीकरणीय बिजली की लागत के कारण। वर्तमान लागत ग्रे हाइड्रोजन के लिए $1-2/किग्रा की तुलना में $3-5/किग्रा तक है।
  • इलेक्ट्रोलाइज़र विनिर्माण का पैमाना: भारत में इलेक्ट्रोलाइज़र विनिर्माण क्षमताएँ अभी प्रारंभिक अवस्था में हैं। 2026 तक 1.5 MT के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए घरेलू विनिर्माण के तीव्र विस्तार या महत्वपूर्ण आयात की आवश्यकता होगी, जिससे निर्भरता पैदा होगी।
  • अनुसंधान एवं विकास (R&D) अंतराल: उन्नत इलेक्ट्रोलाइज़र प्रौद्योगिकियों (जैसे, सॉलिड ऑक्साइड इलेक्ट्रोलाइज़र, आयन एक्सचेंज मेम्ब्रेन इलेक्ट्रोलाइज़र) और कुशल हाइड्रोजन भंडारण समाधानों में वैश्विक नेताओं की तुलना में अपर्याप्त घरेलू अनुसंधान एवं विकास।

बुनियादी ढाँचे के विकास में कमियाँ

  • नवीकरणीय ऊर्जा एकीकरण: इलेक्ट्रोलाइज़र को बिजली देने के लिए समर्पित नवीकरणीय ऊर्जा (सौर, पवन) परियोजनाओं के बड़े पैमाने पर विस्तार की आवश्यकता है, जिसके लिए महत्वपूर्ण भूमि अधिग्रहण, ग्रिड स्थिरता में वृद्धि और पारेषण बुनियादी ढाँचे की आवश्यकता होगी।
  • भंडारण और परिवहन: हाइड्रोजन के अंतिम-उपयोग अनुप्रयोगों (जैसे, गतिशीलता, औद्योगिक फीडस्टॉक) के लिए स्थापित हाइड्रोजन पाइपलाइन नेटवर्क, बड़े पैमाने पर भंडारण सुविधाओं और ईंधन भरने के बुनियादी ढाँचे का अभाव।
  • जल उपलब्धता: हरित हाइड्रोजन उत्पादन (इलेक्ट्रोलिसिस) के लिए बड़ी मात्रा में विखनिजित जल की आवश्यकता होती है, जो जल-संकट वाले क्षेत्रों में एक चुनौती पेश करता है। 1 किलोग्राम हाइड्रोजन के उत्पादन के लिए लगभग 9 लीटर पानी की आवश्यकता होती है।

नियामक और नीतिगत सामंजस्य

  • अंतर-मंत्रालयी समन्वय: हरित हाइड्रोजन पारिस्थितिकी तंत्र में कई मंत्रालय (MNRE, MoP, MoPNG, MoRTH, आदि) शामिल हैं, जिसके लिए खंडित नीतियों और नियामक अतिव्यापीकरण से बचने के लिए निर्बाध समन्वय की आवश्यकता है।
  • मानक और प्रमाणन: हरित हाइड्रोजन की शुद्धता, सुरक्षा, भंडारण और परिवहन के लिए व्यापक राष्ट्रीय मानकों का अभाव, जो बाजार के विकास और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए महत्वपूर्ण है।
  • मांग सृजन तंत्र: जबकि उत्पादन के लिए प्रोत्साहन मौजूद हैं, इस्पात, सीमेंट और उर्वरक जैसे कठिन-से-कम करने वाले क्षेत्रों में मजबूत घरेलू मांग बनाने के लिए मजबूत नीतिगत संकेतों और जनादेशों की आवश्यकता है।

वैश्विक प्रतिस्पर्धा और आपूर्ति श्रृंखला जोखिम

  • अंतर्राष्ट्रीय दौड़: जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया और EU जैसे देशों के पास पर्याप्त सब्सिडी और स्थापित अनुसंधान एवं विकास पारिस्थितिकी तंत्र के साथ उन्नत हरित हाइड्रोजन रणनीतियाँ हैं, जो महत्वपूर्ण प्रतिस्पर्धी दबाव पैदा करती हैं।
  • महत्वपूर्ण खनिज निर्भरता: इलेक्ट्रोलाइज़र विनिर्माण महत्वपूर्ण खनिजों (जैसे, इरिडियम, प्लेटिनम) पर निर्भर करता है, जहाँ वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएँ भू-राजनीतिक बाधाओं के प्रति संवेदनशील हो सकती हैं।

तुलनात्मक परिदृश्य: भारत की हरित हाइड्रोजन रणनीति बनाम वैश्विक अग्रणी

भारत की हरित हाइड्रोजन रणनीति, जो NGHM द्वारा संचालित है, उन्नत अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में अद्वितीय अवसर और चुनौतियाँ दोनों प्रस्तुत करती है। निम्नलिखित तालिका प्रमुख अंतरों और समानताओं को उजागर करती है।

विशेषता भारत की हरित हाइड्रोजन रणनीति (NGHM) यूरोपीय संघ (EU) हरित हाइड्रोजन रणनीति
प्राथमिक प्रेरक ऊर्जा सुरक्षा, डीकार्बोनाइजेशन, आर्थिक विकास, निर्यात क्षमता, मेक इन इंडिया। डीकार्बोनाइजेशन, औद्योगिक प्रतिस्पर्धात्मकता, ऊर्जा स्वतंत्रता, वैश्विक मानकीकरण में अग्रणी।
प्रमुख लक्ष्य (अंतरिम) 06-मार्च-2026 तक 1.5 MT उत्पादन (चरण-II SIGHT)। 2030 तक कुल 5 MMT। 2030 तक 10 MMT घरेलू उत्पादन + 10 MMT आयात।
वित्तीय सहायता तंत्र SIGHT कार्यक्रम (उत्पादन और विनिर्माण के लिए प्रोत्साहन), वायबिलिटी गैप फंडिंग, अनुसंधान एवं विकास सहायता। इनोवेशन फंड, हाइड्रोजन बैंक (नीलामी-आधारित सहायता), कॉमन यूरोपीय इंटरेस्ट के महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट (IPCEI)।
केंद्रित क्षेत्र स्वदेशी विनिर्माण (इलेक्ट्रोलाइज़र), कठिन-से-कम करने वाले क्षेत्र (रिफाइनरियाँ, उर्वरक, इस्पात), निर्यात। इलेक्ट्रोलाइज़र परिनियोजन, बुनियादी ढाँचे का विकास (पाइपलाइन), आयात के लिए अंतर्राष्ट्रीय भागीदारी।
नियामक ढाँचा मानकों का विकास, विविध अनुप्रयोगों के लिए अंतर-मंत्रालयी समन्वय। व्यापक कानूनी ढाँचा (जैसे, नवीकरणीय ऊर्जा निर्देश, गैस डीकार्बोनाइजेशन पैकेज), विस्तृत प्रमाणन।

06-मार्च-2026 के लक्ष्य का गंभीर मूल्यांकन

1.5 MT हरित हाइड्रोजन क्षमता के लिए 06-मार्च-2026 की समय-सीमा, हालाँकि महत्वाकांक्षी है, भारत की हरित अर्थव्यवस्था को तेजी से बढ़ाने के इरादे को दर्शाती है। हालाँकि, एक संरचनात्मक आलोचना कार्यान्वयन में महत्वपूर्ण चुनौतियों को उजागर करती है। भारत की दोहरी नियामक संरचना—जहाँ केंद्रीय नीतियाँ व्यापक लक्ष्य निर्धारित करती हैं लेकिन कार्यान्वयन में अक्सर राज्य-स्तरीय अनुमतियाँ और बुनियादी ढाँचे का विकास शामिल होता है—परियोजना निष्पादन में समन्वय संबंधी चुनौतियाँ पैदा कर सकती है, विशेष रूप से हरित हाइड्रोजन के लिए आवश्यक बड़े पैमाने पर नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं के लिए। उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (PLI) पर वर्तमान जोर आपूर्ति को ‘धक्का’ देने के लिए आवश्यक है, लेकिन उर्वरक और रिफाइनरियों जैसे क्षेत्रों में मांग-पक्ष के जनादेशों से संबंधित ‘खींच’ ऑफ-टेक की गारंटी देने के लिए अपर्याप्त बनी हुई है, जिससे उत्पादकों के लिए बाजार में अनिश्चितता पैदा होती है। महत्वाकांक्षी आपूर्ति-पक्ष लक्ष्यों और विकसित होती मांग तंत्रों के बीच यह बेमेल एक प्रमुख तनाव को दर्शाता है जिसे संबोधित किया जाना चाहिए।

संरचित मूल्यांकन

  • नीति डिजाइन गुणवत्ता: NGHM रणनीतिक रूप से सुविचारित, दायरे में व्यापक और दूरंदेशी है, जो ऊर्जा सुरक्षा को जलवायु कार्रवाई के साथ एकीकृत करता है। स्वदेशी विनिर्माण (SIGHT कार्यक्रम) पर इसका ध्यान एक मजबूत घरेलू मूल्य श्रृंखला बनाने के उद्देश्य से एक मजबूत डिजाइन तत्व है। हालाँकि, मांग एकत्रीकरण और दीर्घकालिक मूल्य खोज के लिए सटीक तंत्र, विशेष रूप से विशिष्ट औद्योगिक अनुप्रयोगों के लिए, इसमें और सुधार की आवश्यकता है।
  • शासन/कार्यान्वयन क्षमता: जबकि MNRE और SECI मिशन को सक्रिय रूप से चला रहे हैं, हरित हाइड्रोजन की बहु-क्षेत्रीय प्रकृति के लिए अंतर-मंत्रालयी समन्वय (जैसे, MNRE, MoPNG, MoRTH, MoS के बीच) में वृद्धि की आवश्यकता है। परियोजना कार्यान्वयन क्षमता, विशेष रूप से भूमि अधिग्रहण और बिजली निकासी के लिए राज्य स्तर पर, एक बाधा बन सकती है। बाजार के विकास को सुगम बनाने के लिए मानकीकरण और प्रमाणन विकास की गति में तेजी लाने की आवश्यकता है।
  • व्यवहार संबंधी/संरचनात्मक कारक: जीवाश्म ईंधन से प्राप्त विकल्पों की तुलना में हरित हाइड्रोजन की उच्च प्रारंभिक लागत उद्योगों के लिए एक महत्वपूर्ण संरचनात्मक बाधा बनी हुई है। इसे दूर करने के लिए निरंतर वित्तीय प्रोत्साहन, कार्बन मूल्य निर्धारण तंत्र और औद्योगिक खरीद रणनीतियों में बदलाव की आवश्यकता है। गतिशीलता और अन्य अनुप्रयोगों में नई हाइड्रोजन-आधारित प्रौद्योगिकियों के लिए सार्वजनिक जागरूकता और स्वीकृति का निर्माण भी महत्वपूर्ण व्यवहारिक बदलाव होंगे।

परीक्षा अभ्यास

राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन (NGHM) के लक्ष्यों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

  1. NGHM का लक्ष्य 2030 तक प्रति वर्ष 5 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) हरित हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता प्राप्त करना है।
  2. 06-मार्च-2026 की समय-सीमा विशेष रूप से 10 प्रमुख हरित हाइड्रोजन हब की स्थापना का लक्ष्य रखती है।
  3. स्ट्रेटेजिक इंटरवेंशन्स फॉर ग्रीन हाइड्रोजन ट्रांजिशन (SIGHT) कार्यक्रम NGHM का एक घटक है जो विशेष रूप से अनुसंधान और विकास पर केंद्रित है।

उपरोक्त कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?

  • (a) केवल 1
  • (b) केवल 1 और 2
  • (c) केवल 2 और 3
  • (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (a)

NGHM के तहत स्ट्रेटेजिक इंटरवेंशन्स फॉर ग्रीन हाइड्रोजन ट्रांजिशन (SIGHT) कार्यक्रम के लिए नामित कार्यान्वयन एजेंसी निम्नलिखित में से कौन सा निकाय है?

  1. नीति आयोग
  2. ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (BEE)
  3. भारतीय सौर ऊर्जा निगम (SECI)
  4. केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA)

सही विकल्प चुनें:

  • (a) केवल 1
  • (b) केवल 2 और 3
  • (c) केवल 3
  • (d) 1, 3 और 4

उत्तर: (c)

मुख्य परीक्षा प्रश्न: राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन के तहत हरित हाइड्रोजन क्षमता के लिए भारत के 06-मार्च-2026 के लक्ष्य को प्राप्त करने में आने वाली चुनौतियों का समालोचनात्मक मूल्यांकन करें। इन बाधाओं को दूर करने और भारत के हरित हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था की ओर संक्रमण को तेज करने के लिए नीतिगत उपायों का सुझाव दें। (250 शब्द)

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भारत के हरित हाइड्रोजन प्रयासों के लिए 06-मार्च-2026 की समय-सीमा का क्या महत्व है?

06-मार्च-2026 की समय-सीमा राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन (NGHM) के तहत एक अंतरिम लेकिन महत्वपूर्ण लक्ष्य का प्रतिनिधित्व करती है। इसका उद्देश्य 1.5 मिलियन टन हरित हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता को चालू करना और कम से कम दो प्रमुख हरित हाइड्रोजन हब स्थापित करना है, जिससे प्रारंभिक चरण के निवेश और प्रौद्योगिकी परिनियोजन को मान्य किया जा सके।

‘SIGHT’ कार्यक्रम क्या है, और NGHM में इसकी क्या भूमिका है?

SIGHT का अर्थ स्ट्रेटेजिक इंटरवेंशन्स फॉर ग्रीन हाइड्रोजन ट्रांजिशन है। यह NGHM का एक प्रमुख घटक है, जो इलेक्ट्रोलाइज़र के स्वदेशी विनिर्माण और हरित हाइड्रोजन उत्पादन के लिए वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान करता है। इसकी भूमिका लागत को कम करने और हरित हाइड्रोजन के लिए एक घरेलू आपूर्ति श्रृंखला को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण है।

हरित हाइड्रोजन उत्पादन बढ़ाने में भारत को किन प्राथमिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है?

प्रमुख चुनौतियों में इलेक्ट्रोलाइज़र और नवीकरणीय ऊर्जा की उच्च पूंजीगत लागत, अपर्याप्त घरेलू विनिर्माण पैमाना, समर्पित हाइड्रोजन बुनियादी ढाँचे (भंडारण, पाइपलाइन) की कमी और विभिन्न उद्योगों में मजबूत मांग सृजन तंत्र की आवश्यकता शामिल है। कुछ क्षेत्रों में इलेक्ट्रोलिसिस के लिए जल की उपलब्धता भी एक चिंता का विषय है।

भारत की हरित हाइड्रोजन रणनीति की तुलना EU के दृष्टिकोण से कैसे की जाती है?

भारत की रणनीति, ऊर्जा सुरक्षा और मेक इन इंडिया द्वारा संचालित, स्वदेशी विनिर्माण और निर्यात क्षमता पर केंद्रित है, जिसमें NGHM केंद्रीय ढाँचे के रूप में कार्य करता है। EU की रणनीति डीकार्बोनाइजेशन और औद्योगिक प्रतिस्पर्धात्मकता पर जोर देती है, जिसमें घरेलू उत्पादन और महत्वपूर्ण आयात दोनों के लिए लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं, जो इनोवेशन फंड और हाइड्रोजन बैंक जैसे व्यापक नियामक और वित्तीय उपकरणों द्वारा समर्थित हैं।

राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन के लिए कौन सा सरकारी मंत्रालय नोडल प्राधिकरण है?

नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन के लिए नोडल मंत्रालय है। यह मिशन की प्रगति और उद्देश्यों के समग्र नीति निर्माण, योजना डिजाइन और निगरानी के लिए जिम्मेदार है।

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