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Governance · Exam Notes

कलपक्कम में भारत का प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर पहुंचा क्रिटिकलिटी की स्थिति तक

भारत का कलपक्कम स्थित प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) अगस्त 2024 में क्रिटिकलिटी हासिल कर देश के तीन-स्तरीय परमाणु कार्यक्रम में एक महत्वपूर्ण मुकाम हासिल कर चुका है। यह स्वदेशी तकनीक यूरेनियम ईंधन की दक्षता बढ़ाती है, थोरियम उपयोग को बढ़ावा देती है और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करते हुए आयात निर्भरता कम करती है।
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Governance
Exam Notes
GS Paper II

Constitution, governance, social justice and institutional analysis

In brief

भारत का कलपक्कम स्थित प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) अगस्त 2024 में क्रिटिकलिटी हासिल कर देश के तीन-स्तरीय परमाणु कार्यक्रम में एक महत्वपूर्ण मुकाम हासिल कर चुका है। यह स्वदेशी तकनीक यूरेनियम ईंधन की दक्षता बढ़ाती है, थोरियम उपयोग को बढ़ावा देती है और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करते हुए आयात निर्भरता कम करती है।

भारत का प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर हुआ क्रिटिकल

अगस्त 2024 में भारत के स्वदेशी रूप से विकसित प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) ने कलपक्कम में क्रिटिकलिटी हासिल की, जो देश के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम में ऐतिहासिक उपलब्धि है। भारतीय नाभिकीय विद्युत निगम लिमिटेड (BHAVINI) द्वारा संचालित और भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) द्वारा विकसित यह भारत का पहला वाणिज्यिक फास्ट ब्रीडर रिएक्टर है। इस सफलता से भारत के तीन-स्तरीय परमाणु कार्यक्रम को गति मिली है, जो यूरेनियम संसाधनों के कुशल उपयोग के साथ थोरियम आधारित रिएक्टरों के लिए आधार तैयार करता है।

UPSC प्रासंगिकता

  • GS पेपर 3: विज्ञान और प्रौद्योगिकी – परमाणु ऊर्जा, ऊर्जा सुरक्षा, तकनीकी प्रगति
  • GS पेपर 2: शासन – परमाणु ऊर्जा अधिनियम, नियामक ढांचा, पर्यावरणीय सुरक्षा
  • निबंध: भारत में ऊर्जा सुरक्षा और सतत विकास

PFBR की तकनीकी विशेषताएँ और संचालन के सिद्धांत

PFBR 500 मेगावाट थर्मल पावर क्षमता वाला रिएक्टर है, जिसकी विद्युत उत्पादन क्षमता 250 मेगावाट है, जिसे निरंतर 40 वर्षों तक चलाने के लिए डिजाइन किया गया है (BHAVINI वार्षिक रिपोर्ट, 2023)। यह यूरेनियम-प्लूटोनियम मिक्स्ड ऑक्साइड (MOX) ईंधन का उपयोग करता है, जो उपजाऊ यूरेनियम-238 से विखंडनीय प्लूटोनियम-239 का उत्पादन करता है। थर्मल रिएक्टरों के विपरीत जो धीमे (थर्मल) न्यूट्रॉन पर निर्भर होते हैं, PFBR तेज न्यूट्रॉन का इस्तेमाल करता है जिससे विखंडन प्रक्रिया चलती रहती है और यह 1 से अधिक प्रजनन अनुपात हासिल करता है, यानी यह जितना विखंडनीय पदार्थ खर्च करता है उससे अधिक उत्पन्न करता है (BARC तकनीकी रिपोर्ट, 2023)।

  • क्रिटिकलिटी का मतलब है कि रिएक्टर बाहरी न्यूट्रॉन स्रोत के बिना आत्मनिर्भर नाभिकीय श्रृंखला प्रतिक्रिया बनाए रखता है।
  • फास्ट ब्रीडर तकनीक यूरेनियम संसाधनों का पारंपरिक थर्मल रिएक्टरों से 60-70 गुना अधिक कुशल उपयोग संभव बनाती है (IAEA, 2022)।
  • PFBR के डिजाइन में परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB) द्वारा नियंत्रित उन्नत सुरक्षा उपाय शामिल हैं।

भारत के तीन-स्तरीय परमाणु कार्यक्रम में PFBR की भूमिका

होमी भाभा द्वारा संकल्पित भारत का तीन-स्तरीय परमाणु कार्यक्रम देश के सीमित यूरेनियम और प्रचुर थोरियम भंडार का प्रभावी उपयोग करने का लक्ष्य रखता है। PFBR इस कार्यक्रम के दूसरे चरण का केंद्र है, जो उपजाऊ यूरेनियम-238 को विखंडनीय प्लूटोनियम-239 में बदलता है। यह प्लूटोनियम तीसरे चरण के लिए ईंधन का काम करता है, जिसमें थोरियम-232 को यूरेनियम-233 में बदला जाता है, जिससे थोरियम आधारित रिएक्टरों का विकास संभव होता है।

  • चरण 1: प्राकृतिक यूरेनियम से चलने वाले प्रेसराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर (PHWR)।
  • चरण 2: PFBR जैसे फास्ट ब्रीडर रिएक्टर जो प्लूटोनियम पैदा करते हैं।
  • चरण 3: थोरियम से उत्पन्न यूरेनियम-233 पर आधारित उन्नत थोरियम रिएक्टर।

PFBR की सफलता से भारत के 2050 तक 275 GW परमाणु ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य तेजी से पूरा होगा (NPCIL, 2023) और 2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता के लक्ष्य को भी समर्थन मिलेगा (नीति आयोग)।

PFBR के लिए कानूनी और नियामक ढांचा

भारत में परमाणु ऊर्जा विकास मुख्य रूप से परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962 के तहत नियंत्रित होता है, जो परमाणु ऊर्जा उत्पादन पर केंद्र सरकार का नियंत्रण सुनिश्चित करता है (धारा 3)। PFBR परियोजना परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) के अधीन आती है, जैसा कि भारत सरकार (कारोबार आवंटन) नियम, 1961 में निर्धारित है। पर्यावरणीय सुरक्षा के लिए पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 (धारा 3) लागू होता है, जो पर्यावरणीय मानकों के पालन को सुनिश्चित करता है।

  • परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB) PFBR के संचालन के लिए सुरक्षा और लाइसेंसिंग की निगरानी करता है।
  • PFBR पर सीधे सुप्रीम कोर्ट के फैसले नहीं हैं, लेकिन BARC की गतिविधियों को राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण अधिनियम, 2010 के तहत पर्यावरण मंजूरी प्राप्त है।
  • नियामक पारदर्शिता और जनस्वीकृति अभी भी चुनौतियां हैं, हालांकि कानूनी ढांचा मजबूत है।

PFBR के आर्थिक पहलू

PFBR परियोजना की लागत लगभग ₹13,000 करोड़ है (DAE वार्षिक रिपोर्ट 2023-24)। यह यूरेनियम संसाधनों के उपयोग को 60-70 साल तक बढ़ाकर भारत की यूरेनियम आयात निर्भरता कम करता है, जो 2022 में 85% थी और लगभग 500 मिलियन डॉलर प्रति वर्ष की लागत पर थी (World Nuclear Association, 2023)। वर्तमान में परमाणु ऊर्जा भारत की कुल बिजली उत्पादन में लगभग 3% योगदान देती है (CEA रिपोर्ट, 2023); PFBR के चलते यह हिस्सा 2035 तक 6-7% तक बढ़ने की उम्मीद है, जिससे ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु प्रतिबद्धताओं को बल मिलेगा।

  • फास्ट ब्रीडर रिएक्टर ईंधन दक्षता बढ़ाते हैं, परमाणु कचरे की मात्रा कम करते हैं और स्थिरता को बढ़ावा देते हैं।
  • PFBR की स्वदेशी तकनीक महत्वपूर्ण परमाणु घटकों के लिए विदेशी निर्भरता घटाती है।
  • 40 वर्षों की लंबी परिचालन अवधि स्थिर बिजली आपूर्ति और पूंजी लागत की भरपाई सुनिश्चित करती है।

अंतरराष्ट्रीय फास्ट ब्रीडर रिएक्टरों से तुलना

परिमाणभारत (PFBR)फ्रांस (Phénix/Superphénix)रूस (BN श्रृंखला)
संचालन स्थिति2024 में क्रिटिकलिटी हासिल, संचालन मेंडिकमीशन (Phénix 2009, Superphénix 1997)संचालित और विस्तारशील
प्रजनन अनुपात~1.1~0.9~1.2
ईंधन चक्रस्वदेशी MOX ईंधन, बंद ईंधन चक्र पर फोकसमिक्स्ड ऑक्साइड ईंधन, सीमित बंद चक्ररिप्रोसेसिंग के साथ बंद ईंधन चक्र
पावर आउटपुट250 मेगावाट विद्युतPhénix: 233 MW, Superphénix: 1,200 MWBN-800: 789 MW
सुरक्षा और जनस्वीकृतिबेहतर सुरक्षा प्रणाली, जारी जनचिंताएंसुरक्षा चिंताओं के कारण बंदमजबूत सुरक्षा रिकॉर्ड, जनस्वीकृति बढ़ रही

चुनौतियां और महत्वपूर्ण कमियां

PFBR की तकनीकी सफलता के बावजूद भारत को फास्ट ब्रीडर तकनीक के विस्तार में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। सुरक्षा और पर्यावरणीय चिंताओं के कारण जनस्वीकृति सीमित है। नियामक पारदर्शिता की कमी से परियोजना समय सीमा प्रभावित होती है। रूस की तरह भारत के पास पूरी तरह से वाणिज्यिक बंद ईंधन चक्र की सुविधा नहीं है, जिससे ब्रीडर रिएक्टरों के तेज विस्तार में बाधा आती है। ईंधन पुनःप्रक्रिया क्षमता की कमी भी ब्रीडर ईंधन उपलब्धता को सीमित करती है।

  • हितधारकों के साथ बेहतर संवाद और पर्यावरणीय जानकारी बढ़ाने की जरूरत।
  • ब्रीडर ईंधन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पुनःप्रक्रिया संयंत्रों का विस्तार।
  • तेजी से मंजूरी और सुरक्षा निगरानी के लिए नियामक ढांचे को मजबूत करना।

महत्व और आगे का रास्ता

  • PFBR की क्रिटिकलिटी यूरेनियम और थोरियम संसाधनों के बेहतर उपयोग से ऊर्जा स्वतंत्रता की दिशा में अहम कदम है।
  • सफल संचालन से भारत की स्वदेशी फास्ट ब्रीडर तकनीक की पुष्टि होगी, जो निर्यात क्षमता और रणनीतिक स्वायत्तता बढ़ाएगी।
  • तीन-स्तरीय कार्यक्रम को तेज करना भारत के जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने और जीवाश्म ईंधन निर्भरता घटाने में मदद करेगा।
  • नियामक और जनस्वीकृति की चुनौतियों को दूर करना ब्रीडर रिएक्टरों के विस्तार के लिए जरूरी है।
  • ईंधन चक्र अवसंरचना और थोरियम रिएक्टरों के लिए अनुसंधान में निवेश जारी रखना चाहिए ताकि पूरे कार्यक्रम के लाभ मिल सकें।

प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

  1. PFBR विखंडन प्रतिक्रियाओं को बनाए रखने के लिए थर्मल न्यूट्रॉन का उपयोग करता है।
  2. PFBR जितना विखंडनीय पदार्थ खर्च करता है उससे अधिक पैदा करता है।
  3. PFBR भारत के तीन-स्तरीय परमाणु कार्यक्रम का हिस्सा है।

उपरोक्त में से कौन-सा/से कथन सही हैं?

  • (a) केवल 1 और 2
  • (b) केवल 2 और 3
  • (c) केवल 1 और 3
  • (d) 1, 2 और 3 सभी

उत्तर: (b)

कथन 1 गलत है क्योंकि PFBR थर्मल न्यूट्रॉन की बजाय तेज न्यूट्रॉन का उपयोग करता है। कथन 2 और 3 सही हैं क्योंकि PFBR अधिक विखंडनीय पदार्थ पैदा करता है और यह भारत के तीन-स्तरीय परमाणु कार्यक्रम का अभिन्न हिस्सा है।

भारत के परमाणु ऊर्जा शासन के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

  1. परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962 परमाणु ऊर्जा उत्पादन का नियंत्रण केंद्र सरकार को देता है।
  2. पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 का परमाणु प्रतिष्ठानों के नियमन में कोई भूमिका नहीं है।
  3. परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB) परमाणु रिएक्टरों के लाइसेंसिंग के लिए जिम्मेदार है।

उपरोक्त में से कौन-सा/से कथन सही हैं?

  • (a) केवल 1 और 2
  • (b) केवल 2 और 3
  • (c) केवल 1 और 3
  • (d) 1, 2 और 3 सभी

उत्तर: (c)

कथन 2 गलत है क्योंकि पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 परमाणु प्रतिष्ठानों के पर्यावरणीय सुरक्षा मानकों के लिए लागू है। कथन 1 और 3 सही हैं।

मुख्य प्रश्न

भारत के तीन-स्तरीय परमाणु कार्यक्रम और ऊर्जा सुरक्षा के संदर्भ में प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) का महत्व चर्चा करें। भारत को ब्रीडर रिएक्टर तकनीक के विस्तार में किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है?

झारखंड और JPSC प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: पेपर 2 – विज्ञान और प्रौद्योगिकी, ऊर्जा क्षेत्र
  • झारखंड का संदर्भ: झारखंड में यूरेनियम खनन स्थल (जैसे जादुगुड़ा) हैं, जो परमाणु ईंधन चक्र विकास को राज्य की अर्थव्यवस्था और पर्यावरण से सीधे जोड़ते हैं।
  • मुख्य बिंदु: झारखंड के यूरेनियम संसाधन, पर्यावरणीय चिंताएं और स्वदेशी परमाणु तकनीक की क्षेत्रीय विकास में भूमिका पर उत्तर तैयार करें।
PFBR के क्रिटिकलिटी हासिल करने का क्या महत्व है?

क्रिटिकलिटी का मतलब है कि PFBR ने आत्मनिर्भर नाभिकीय विखंडन प्रतिक्रिया स्थापित कर ली है, जो फास्ट ब्रीडर रिएक्टर के रूप में इसके संचालन के लिए आवश्यक है। यह उपलब्धि भारत की स्वदेशी फास्ट ब्रीडर तकनीक को प्रमाणित करती है और तीन-स्तरीय परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ाती है।

PFBR भारत की ऊर्जा सुरक्षा में कैसे योगदान देता है?

PFBR यूरेनियम संसाधनों के उपयोग को बढ़ाता है क्योंकि यह अधिक विखंडनीय पदार्थ पैदा करता है, जिससे यूरेनियम आयात (2022 में 85%) पर निर्भरता कम होती है। साथ ही यह थोरियम ईंधन चक्र के विकास को सक्षम बनाता है, जिससे दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होती है।

भारत में परमाणु ऊर्जा और पर्यावरण सुरक्षा के लिए कौन-कौन से कानून लागू हैं?

परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962 परमाणु ऊर्जा विकास और नियंत्रण को नियंत्रित करता है। पर्यावरणीय सुरक्षा के लिए पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 लागू है। सुरक्षा और लाइसेंसिंग की जिम्मेदारी परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB) की है।

PFBR पारंपरिक थर्मल रिएक्टरों से कैसे अलग है?

PFBR तेज न्यूट्रॉन का इस्तेमाल करता है जो उपजाऊ यूरेनियम-238 से विखंडनीय प्लूटोनियम पैदा करता है, जबकि थर्मल रिएक्टर धीमे न्यूट्रॉन पर निर्भर होते हैं और विखंडनीय ईंधन का उपभोग करते हैं। PFBR का प्रजनन अनुपात 1 से अधिक होता है, जिससे ईंधन दक्षता बढ़ती है।

भारत में फास्ट ब्रीडर रिएक्टरों के विस्तार में मुख्य चुनौतियां क्या हैं?

चुनौतियों में सीमित जनस्वीकृति, नियामक पारदर्शिता की कमी, ईंधन पुनःप्रक्रिया क्षमता की कमी और पूरी तरह से वाणिज्यिक बंद ईंधन चक्र की अनुपस्थिति शामिल हैं।

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