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दुनिया और भारत में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी का परिचय

2026 तक, Commission on the Status of Women (CSW70) की रिपोर्ट के अनुसार, विश्वभर में संसद की सीटों में महिलाओं का हिस्सा 27.5% है और कैबिनेट में 22.4% पद महिलाएं संभालती हैं। हालांकि प्रगति हुई है, फिर भी केवल 28 देशों में महिला राष्ट्राध्यक्ष या प्रधानमंत्री हैं, जबकि 101 देशों में कभी नहीं रही। भारत में स्थिति काफी कम है: 18वीं लोकसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 14% और राज्य विधानसभाओं में लगभग 9% है (Election Commission of India, 2024)। यह लगातार कम प्रतिनिधित्व सामाजिक, सांस्कृतिक और संस्थागत बाधाओं को दर्शाता है जो महिलाओं के राजनीतिक नेतृत्व में रुकावट डालती हैं।

UPSC प्रासंगिकता

  • GS पेपर 2: राजनीति – महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व के संवैधानिक प्रावधान, चुनाव सुधार
  • GS पेपर 1: सामाजिक न्याय – लैंगिक समानता और सशक्तिकरण
  • निबंध: शासन में लैंगिक समानता और उसका लोकतंत्र तथा विकास पर प्रभाव

भारत में संवैधानिक और कानूनी ढांचा

भारतीय संविधान के Article 15(3) के तहत राज्य को महिलाओं के लिए विशेष प्रावधान करने की अनुमति है, जिससे सकारात्मक भेदभाव संभव होता है। 73वें और 74वें संविधान संशोधनों ने पंचायत राज संस्थाओं और शहरी स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण अनिवार्य किया है (Articles 243D और 243T)। लेकिन Representation of the People Act, 1951 में संसद और राज्य विधानसभाओं के लिए कोई लिंग आधारित आरक्षण नहीं है, जिससे उच्च स्तर के राजनीतिक नेतृत्व में महिलाओं की भागीदारी सीमित होती है। सुप्रीम कोर्ट के विशाखा बनाम राजस्थान राज्य (1997) मामले में लैंगिक समानता के सिद्धांत मजबूत हुए, लेकिन राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए आरक्षण पर कोई स्पष्ट निर्देश नहीं दिए गए।

  • Article 15(3): महिलाओं के लिए सकारात्मक भेदभाव की अनुमति।
  • Article 243D और 243T: पंचायत और नगरपालिका निकायों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित।
  • Representation of the People Act, 1951: चुनावों को नियंत्रित करता है, लेकिन संसद और राज्य विधानसभाओं के लिए लिंग आधारित आरक्षण नहीं।
  • विशाखा निर्णय (1997): कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के लिए दिशानिर्देश; लैंगिक समानता को स्वीकार करता है पर आरक्षण का उल्लेख नहीं।

महिलाओं के राजनीतिक नेतृत्व के आर्थिक प्रभाव

भारत की महिला एवं बाल विकास मंत्रालय (MWCD) ने 2023-24 में ₹3,500 करोड़ का बजट लैंगिक सशक्तिकरण योजनाओं के लिए आवंटित किया है, जो कुल सरकारी खर्च के मुकाबले सीमित है। शोध बताते हैं कि महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ने से स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक कल्याण जैसे क्षेत्रों में बेहतर नीतियां बनती हैं, जो मानव पूंजी विकास के लिए जरूरी हैं। विश्व बैंक (2022) की रिपोर्ट के अनुसार, जिन देशों में महिलाओं की राजनीतिक हिस्सेदारी अधिक है, वहां GDP विकास दर 15% तक अधिक होती है क्योंकि समावेशी नीतियां व्यापक सामाजिक जरूरतों को पूरा करती हैं।

  • MWCD बजट (2023-24): ₹3,500 करोड़ महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए।
  • महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बेहतर स्वास्थ्य और शिक्षा नीतियों से जुड़ी है।
  • विश्व बैंक (2022): महिलाओं की अधिक राजनीतिक हिस्सेदारी वाले देशों में GDP विकास दर 15% तक अधिक।

महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण में संस्थागत भूमिका

कई संस्थाएं महिलाओं के राजनीतिक नेतृत्व को प्रभावित करती हैं। Commission on the Status of Women (CSW) वैश्विक लैंगिक समानता की निगरानी करता है। भारत में MWCD सशक्तिकरण नीतियां लागू करता है। Election Commission of India (ECI) चुनाव प्रक्रिया को नियंत्रित करता है, लेकिन उच्च विधायी निकायों में लिंग आधारित आरक्षण लागू नहीं किया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, UN Women शासन में लैंगिक समानता की वकालत करता है। लोकसभा में महिलाओं का वर्तमान प्रतिनिधित्व राष्ट्रीय स्तर पर स्थिति दर्शाता है।

  • CSW: वैश्विक लैंगिक समानता की निगरानी।
  • MWCD: भारत में महिलाओं के सशक्तिकरण की नीतियां लागू करता है।
  • ECI: चुनाव नियंत्रित करता है; संसद/राज्य विधानसभाओं में आरक्षण नहीं।
  • UN Women: वैश्विक स्तर पर लैंगिक समानता का समर्थन।
  • लोकसभा: राष्ट्रीय विधायी निकाय, जिसमें 14% महिलाएं हैं।

तुलनात्मक अध्ययन: भारत बनाम रवांडा

मापदंडभारतरवांडा
निचली सदन में महिलाओं का हिस्सा14% (18वीं लोकसभा, 2024)61.3% (Inter-Parliamentary Union, 2024)
महिलाओं के लिए कानूनी आरक्षणसंसद/राज्य विधानसभाओं में कोई आरक्षण नहीं; स्थानीय निकायों में 33%संवैधानिक रूप से न्यूनतम 30% आरक्षण और सक्रिय पार्टी नीतियां
शासन पर प्रभावमहिलाओं का सीमित नीति प्रभाव; सामाजिक कल्याण पर मध्यम फोकससामाजिक कल्याण में सुधार; समावेशी शासन मॉडल
वैश्विक रैंकिंग (महिलाएं संसद में)143वां (IPU, 2024)विश्व में शीर्ष स्थान

महिलाओं के राजनीतिक नेतृत्व में संरचनात्मक और सांस्कृतिक बाधाएं

महिलाओं को कई तरह की बाधाओं का सामना करना पड़ता है, जिनमें पितृसत्तात्मक सामाजिक नियम, राजनीतिक नेटवर्क तक सीमित पहुंच, आर्थिक कठिनाइयां और राजनीतिक दलों में लिंग भेदभाव शामिल हैं। राष्ट्रीय और राज्य विधानसभाओं में अनिवार्य आरक्षण न होने से पुरुष प्रधान राजनीतिक नेतृत्व बना रहता है। इसके अलावा, महिलाएं अक्सर सामाजिक नीति मंत्रालयों तक ही सीमित रहती हैं, जबकि रक्षा, गृह और आर्थिक मंत्रालय पुरुषों के नियंत्रण में होते हैं (CSW70, 2026)। ये सभी कारण महिलाओं की समान राजनीतिक भागीदारी में बाधा डालते हैं।

  • पितृसत्तात्मक सामाजिक नियम महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को रोकते हैं।
  • आर्थिक और नेटवर्क संबंधी कमियां उम्मीदवार बनने में बाधक।
  • राजनीतिक दल पुरुष उम्मीदवारों को प्राथमिकता देते हैं।
  • महिलाएं सामाजिक मंत्रालयों में सीमित; पुरुष मुख्य शक्ति मंत्रालयों में।

भारत के राजनीतिक प्रतिनिधित्व ढांचे में कानूनी और नीति संबंधी कमी

हालांकि 73वें और 74वें संशोधनों ने स्थानीय शासन में महिलाओं के आरक्षण को संस्थागत किया, संसद और राज्य विधानसभाओं के लिए समान प्रावधान का अभाव गंभीर कमी है। महिलाओं के आरक्षण बिल (संसद और राज्य विधानसभाओं में 33% आरक्षण) संसद में कई बार अटका हुआ है। यह कानूनी खामी महिलाओं की राजनीतिक उन्नति को रोकती है, जबकि प्रमाणित है कि आरक्षण प्रतिनिधित्व और शासन दोनों में सुधार करता है।

  • 73वें और 74वें संशोधन: केवल स्थानीय निकायों में 33% आरक्षण।
  • महिलाओं के आरक्षण बिल: दशकों से लंबित, पारित नहीं।
  • संसद/राज्य विधानसभाओं में आरक्षण न होने से महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी सीमित।
  • स्थानीय शासन में आरक्षण सफल, लेकिन उच्च स्तर तक नहीं बढ़ाया गया।

महत्व और आगे का रास्ता

महिलाओं के राजनीतिक नेतृत्व को बढ़ाना प्रतिनिधि लोकतंत्र और समावेशी नीति निर्माण के लिए जरूरी है। भारत को रवांडा जैसे देशों से सीख लेकर संसद और राज्य विधानसभाओं में लैंगिक आरक्षण लागू करना चाहिए। महिलाओं के लिए वित्तीय सहायता बढ़ाना, राजनीतिक दलों को संवेदनशील बनाना और सामाजिक-सांस्कृतिक बाधाओं को दूर करना भी आवश्यक है। महिलाओं का बेहतर राजनीतिक प्रतिनिधित्व सामाजिक कल्याण, आर्थिक विकास और शासन की गुणवत्ता में सुधार से जुड़ा है।

  • महिलाओं के आरक्षण बिल को पारित कर संसद और राज्य विधानसभाओं में 33% आरक्षण अनिवार्य करें।
  • MWCD के बजट में वृद्धि कर महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी और नेतृत्व प्रशिक्षण को बढ़ावा दें।
  • राजनीतिक दलों को आंतरिक लिंग आरक्षण और उम्मीदवार समर्थन प्रणाली अपनानी चाहिए।
  • पितृसत्तात्मक सोच को चुनौती देने और महिला नेताओं को बढ़ावा देने के लिए जनजागरूकता अभियान चलाएं।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
भारत में महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. संविधान का Article 15(3) संसद में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का प्रावधान करता है।
  2. 73वें और 74वें संविधान संशोधन स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करते हैं।
  3. Representation of the People Act, 1951 में राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के आरक्षण के प्रावधान हैं।
  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2
  • cकेवल 2 और 3
  • d1, 2 और 3
उत्तर: (b)
व्याख्या: कथन 1 गलत है क्योंकि Article 15(3) सकारात्मक भेदभाव की अनुमति देता है लेकिन संसद में आरक्षण का प्रावधान नहीं करता। कथन 2 सही है, 73वें और 74वें संशोधन स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करते हैं। कथन 3 गलत है, Representation of the People Act, 1951 में राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के आरक्षण का प्रावधान नहीं है।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
महिलाओं के राजनीतिक नेतृत्व में वैश्विक रुझानों के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. 2026 तक विश्व में महिलाओं के पास 50% से अधिक कैबिनेट पद हैं।
  2. वर्तमान में केवल 28 देशों में महिला राष्ट्राध्यक्ष या प्रधानमंत्री हैं।
  3. विश्व स्तर पर महिलाओं का रक्षा और आर्थिक मंत्रालयों में प्रभुत्व है।
  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2
  • cकेवल 1 और 3
  • dकेवल 2 और 3
उत्तर: (b)
व्याख्या: कथन 1 गलत है क्योंकि विश्व में महिलाओं के पास केवल 22.4% कैबिनेट पद हैं, 50% से अधिक नहीं। कथन 2 सही है कि केवल 28 देशों में महिला राष्ट्राध्यक्ष या प्रधानमंत्री हैं। कथन 3 गलत है, पुरुष रक्षा और आर्थिक मंत्रालयों में प्रभुत्व रखते हैं।

मेन्स प्रश्न

“महिलाओं के सशक्तिकरण के संवैधानिक प्रावधानों के बावजूद, भारत के उच्च राजनीतिक संस्थानों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व कम है। भारत में महिलाओं के राजनीतिक नेतृत्व के सामने संरचनात्मक और कानूनी बाधाओं की आलोचनात्मक समीक्षा करें और शासन में लैंगिक समानता बढ़ाने के लिए सुधार सुझाएं।”

झारखंड और JPSC प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: पेपर 2 – राजनीति और शासन, महिलाओं का आरक्षण और राजनीतिक भागीदारी
  • झारखंड का दृष्टिकोण: झारखंड की पंचायत राज संस्थाएं 33% महिलाओं के आरक्षण का पालन करती हैं; फिर भी झारखंड विधान सभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 10% से कम है (Election Commission of India, 2024)।
  • मेन्स पॉइंटर: झारखंड में स्थानीय निकायों के आरक्षण के प्रभावों को उजागर करें, राज्य विधानसभा प्रतिनिधित्व से तुलना करें और जनजातीय व ग्रामीण क्षेत्रों की सामाजिक-सांस्कृतिक चुनौतियों पर चर्चा करें।
भारत में महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का समर्थन करने वाले संवैधानिक प्रावधान कौन से हैं?

Article 15(3) महिलाओं के लिए विशेष प्रावधान करने की अनुमति देता है। 73वें और 74वें संशोधन पंचायत राज संस्थाओं और नगरपालिका निकायों में 33% आरक्षण अनिवार्य करते हैं (Articles 243D और 243T)। लेकिन संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए कोई संवैधानिक आरक्षण नहीं है।

महिलाओं के आरक्षण बिल का महत्व क्या है?

महिलाओं के आरक्षण बिल में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% सीटें आरक्षित करने का प्रस्ताव है। इसके लागू होने से उच्च विधायी स्तरों पर महिला प्रतिनिधित्व बढ़ेगा और उनकी राजनीतिक प्रभावशीलता में सुधार होगा।

महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी आर्थिक विकास पर कैसे प्रभाव डालती है?

विश्व बैंक (2022) सहित कई अध्ययनों से पता चलता है कि महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ने से स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक कल्याण में बेहतर नीतियां बनती हैं, जिससे मानव पूंजी में वृद्धि होती है और GDP विकास दर 15% तक बढ़ सकती है।

महिलाओं के राजनीतिक नेतृत्व में मुख्य बाधाएं क्या हैं?

बाधाओं में पितृसत्तात्मक सामाजिक मान्यताएं, आर्थिक सीमाएं, राजनीतिक नेटवर्क की कमी, दलों में लिंग भेदभाव और राष्ट्रीय व राज्य स्तर पर अनिवार्य आरक्षण का अभाव शामिल है, जो महिलाओं की उच्च राजनीतिक पदों तक पहुंच को रोकता है।

भारत की महिलाओं की प्रतिनिधित्व स्थिति की तुलना रवांडा से कैसे की जा सकती है?

भारत में लोकसभा में महिलाओं का हिस्सा 14% है, जबकि रवांडा में निचली सदन में यह 61.3% है। रवांडा में संवैधानिक आरक्षण और सक्रिय पार्टी नीतियों के कारण समावेशी शासन और बेहतर सामाजिक कल्याण परिणाम देखने को मिलते हैं।

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