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परिचय: ट्रंप का भारत-पाक संबंधों में संतुलन बनाने का प्रयास

डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति कार्यकाल (2017-2021) के दौरान अमेरिका ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान (कभी-कभी मुनिर के नाम से संदर्भित) और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच कूटनीतिक संतुलन बनाने की नीति अपनाई। इसका मकसद दोनों देशों के बीच तनाव को कम करना और अंतरराष्ट्रीय विमर्श में भारत-पाक के बीच बने जटिल संबंधों को सुलझाना था। हालांकि उच्चस्तरीय बैठकों और कूटनीतिक बयानबाजी के बावजूद, यह संतुलन वास्तविक संघर्ष समाधान या द्विपक्षीय संबंधों के सामान्यीकरण में नहीं बदल पाया। ऐतिहासिक कटुता, संवैधानिक विवाद और रणनीतिक अविश्वास के कारण भारत-पाक के बीच यह जटिलता बनी रही।

UPSC प्रासंगिकता

  • GS पेपर 2: भारत और उसके पड़ोसी - संबंध, कश्मीर विवाद, विदेश नीति की चुनौतियां
  • GS पेपर 3: सुरक्षा चुनौतियां, रक्षा, पड़ोसी देशों के साथ आर्थिक संबंध
  • निबंध: भारत-पाक संबंध, संघर्ष समाधान में अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता की भूमिका

भारत-पाक संबंधों का संवैधानिक और कानूनी ढांचा

भारत-पाक तनाव की जड़ कश्मीर विवाद है, जो संवैधानिक प्रावधानों और द्विपक्षीय समझौतों पर आधारित है। Article 1 भारत के संविधान में देश को राज्यों का संघ बताता है, जबकि Article 370 (2019 में निरस्त किया गया) जम्मू-कश्मीर को विशेष स्वायत्तता प्रदान करता था। अगस्त 2019 में राष्ट्रपति आदेश के माध्यम से इस धारा को निरस्त करने से क्षेत्र पर भारत के प्रशासनिक नियंत्रण में बड़ा बदलाव आया, जिससे पाकिस्तान की आपत्तियां और तेज हो गईं।

  • सिमला समझौता (1972) कश्मीर विवाद का द्विपक्षीय समाधान सुनिश्चित करता है और तीसरे पक्ष की मध्यस्थता को अस्वीकार करता है।
  • लाहौर घोषणा (1999) शांति पूर्ण समाधान की पुष्टि करती है, लेकिन बाद में हुए संघर्षों को रोक नहीं सकी।
  • संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 47 (1948) और 122 (1957) कश्मीर के मुद्दे को संबोधित करते हैं, पर भारत द्विपक्षीय समाधान पर जोर देने के कारण इन्हें नजरअंदाज करता रहा है।
  • फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट (FEMA), 1999 की धारा 3 सीमा पार व्यापार और रेमिटेंस पर प्रतिबंध लगाती है, जिससे आर्थिक संपर्क सीमित हैं।
  • पाकिस्तान प्रोटेक्शन ऑर्डिनेंस, 1958 पाकिस्तान की विदेश नीति के लिए आधार है, खासकर कश्मीर और भारत के संबंध में।

भारत-पाक आर्थिक संबंधों के आयाम

राजनीतिक और सुरक्षा तनाव के चलते भारत और पाकिस्तान के बीच आर्थिक संबंध सीमित और घटते हुए नजर आते हैं। द्विपक्षीय व्यापार वित्तीय वर्ष 2011-12 में लगभग 3.2 अरब डॉलर से घटकर 2020-21 में 2 अरब डॉलर रह गया (भारत सरकार वाणिज्य मंत्रालय)। SAFTA के तहत सीमा पार व्यापार भारत के कुल व्यापार का 5% से भी कम है, जो क्षेत्रीय आर्थिक समेकन की कमी दर्शाता है।

  • 2023-24 में जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के लिए भारत का रक्षा बजट 15% बढ़कर 1.2 लाख करोड़ रुपये हुआ, जो सैन्यीकरण में वृद्धि का संकेत है (संघीय बजट 2023-24)।
  • FEMA प्रतिबंधों के कारण भारत से पाकिस्तान औपचारिक चैनलों से रेमिटेंस नगण्य है।
  • 2023 में पाकिस्तान का सैन्य खर्च GDP का 4% था, जबकि भारत का 2.9%, जो सुरक्षा प्राथमिकताओं में अंतर दर्शाता है (SIPRI 2023)।

द्विपक्षीय संबंधों में संस्थागत भूमिका

कई संस्थाएं भारत-पाक संबंधों को प्रभावित करती हैं, जो अक्सर स्थिति को बनाए रखने में मदद करती हैं बजाय किसी ठोस बदलाव के।

  • भारत का विदेश मंत्रालय (MEA): कूटनीतिक नीति बनाता है; MEA का पाकिस्तान डेस्क द्विपक्षीय मामलों को संभालता है।
  • संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC): कश्मीर से जुड़े प्रस्ताव पारित किए, लेकिन 1999 के बाद से कश्मीर पर औपचारिक बैठक नहीं हुई, जिससे अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता कमजोर हुई।
  • दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (SAARC): क्षेत्रीय मंच है लेकिन भारत-पाक आर्थिक या राजनीतिक सहयोग पर सीमित प्रभाव रखता है।
  • पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI): पाकिस्तान की विदेश नीति और सुरक्षा रणनीति में प्रभावशाली, कूटनीतिक पहलुओं पर संदेहपूर्ण।
  • भारत की रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (RAW): पाकिस्तान से जुड़े सुरक्षा खतरे पर केंद्रित बाह्य खुफिया एजेंसी।

तुलनात्मक दृष्टिकोण: अमेरिका-चीन बनाम भारत-पाकिस्तान संबंध

अमेरिका-चीन संबंध दिखाते हैं कि गहरी रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के बावजूद मजबूत आर्थिक निर्भरता संभव है। व्यापार युद्ध और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बावजूद द्विपक्षीय व्यापार 600 अरब डॉलर से अधिक है (US Census Bureau, 2023)। इसके विपरीत भारत-पाक के बीच व्यापार नगण्य और शत्रुता बनी हुई है, जो दर्शाता है कि राजनीतिक संघर्ष आर्थिक जुड़ाव को गंभीरता से सीमित करता है।

पहलूभारत-पाकअमेरिका-चीन
वार्षिक द्विपक्षीय व्यापार~2 अरब डॉलर (2020-21)~600 अरब डॉलर (2023)
सुरक्षा तनावउच्च, जिसमें कश्मीर विवाद और सीमा पार आतंकवाद शामिल हैंउच्च, जिसमें ताइवान और दक्षिणी चीन सागर विवाद शामिल हैं
कूटनीतिक संलग्नताअंतरालिक और अस्थायी, निरंतर संवाद प्रणाली नहींलगातार, संस्थागत संवाद और शिखर वार्ता
तीसरे पक्ष की मध्यस्थताभारत द्वारा अस्वीकार, UNSC की निष्क्रियताबहुपक्षीय मंचों के माध्यम से अप्रत्यक्ष संलग्नता

संघर्ष समाधान में नीतिगत कमियां

स्थिर और संस्थागत द्विपक्षीय संवाद की कमी, जो घरेलू राजनीतिक उतार-चढ़ाव से स्वतंत्र हो, सबसे बड़ी खामी है। दोनों देशों में राष्ट्रवादी रुख प्रमुख होने के कारण कूटनीतिक लचीलापन सीमित रहता है। सुरक्षा संस्थान, खासकर पाकिस्तान का सैन्य-ISI तंत्र और भारत की रक्षा व्यवस्था, कठोर रुख बनाए रखते हैं। ये कारक ट्रंप के संतुलन प्रयास जैसे अस्थायी कूटनीतिक पहलों को कमजोर करते हैं।

महत्व और आगे का रास्ता

  • निर्वाचन चक्र और घरेलू राजनीतिक दबाव से स्वतंत्र, निरंतर द्विपक्षीय संवाद को संस्थागत बनाना जरूरी है।
  • सिमला समझौता और लाहौर घोषणा जैसे द्विपक्षीय ढांचों की समीक्षा कर विश्वास निर्माण उपायों के साथ उन्हें पुनर्जीवित किया जा सकता है।
  • FEMA प्रतिबंधों में ढील और SAFTA के बेहतर क्रियान्वयन से आर्थिक जुड़ाव बढ़ाकर पारस्परिक निर्भरता मजबूत की जा सकती है।
  • अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता तब तक संभव नहीं जब तक दोनों देश सहमति न दें; भारत का द्विपक्षीय समाधान पर जोर और पाकिस्तान का तीसरे पक्ष के मंचों पर भरोसा इसे जटिल बनाता है।
  • जम्मू-कश्मीर में विश्वास निर्माण और सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ सहयोग से सुरक्षा चिंताओं का समाधान जरूरी है।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
धारा 370 और उसके निरस्तीकरण के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. धारा 370 ने जम्मू-कश्मीर को स्थायी विशेष दर्जा दिया था।
  2. धारा 370 का निरस्तीकरण 2019 में राष्ट्रपति आदेश के माध्यम से किया गया था।
  3. धारा 370 भारत के मूल संविधान का हिस्सा थी जो 1950 में अपनाया गया था।
  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2
  • cकेवल 2 और 3
  • d1, 2 और 3
उत्तर: (b)
कथन 1 गलत है क्योंकि धारा 370 ने अस्थायी विशेष दर्जा दिया था, स्थायी नहीं। कथन 2 सही है; निरस्तीकरण राष्ट्रपति आदेश से हुआ। कथन 3 गलत है; धारा 370 अस्थायी प्रावधान था जो संविधान के अंग के रूप में जोड़ा गया था।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
सिमला समझौता (1972) के बारे में निम्नलिखित पर विचार करें:
  1. यह 1971 के भारत-पाक युद्ध के बाद हुआ था।
  2. यह कश्मीर विवाद के समाधान में तीसरे पक्ष की मध्यस्थता की अनुमति देता है।
  3. यह भारत और पाकिस्तान के बीच सभी मुद्दों के द्विपक्षीय समाधान पर जोर देता है।
  • aकेवल 1 और 3
  • bकेवल 2
  • cकेवल 1 और 2
  • d1, 2 और 3
उत्तर: (a)
कथन 1 सही है; समझौता 1971 के युद्ध के बाद हुआ। कथन 2 गलत है; समझौता तीसरे पक्ष की मध्यस्थता को स्पष्ट रूप से अस्वीकार करता है। कथन 3 सही है; यह द्विपक्षीय समाधान पर जोर देता है।

मुख्य प्रश्न

पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के तहत पाकिस्तान के इमरान खान और भारत के नरेंद्र मोदी के बीच संबंधों को संतुलित करने के कूटनीतिक प्रयास क्यों असफल रहे? इस चुनौती को बनाए रखने वाले संवैधानिक, आर्थिक और संस्थागत कारणों का आलोचनात्मक विश्लेषण करें।

झारखंड और JPSC प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: पेपर 2 - अंतरराष्ट्रीय संबंध और भारतीय राजनीति
  • झारखंड का दृष्टिकोण: झारखंड की भारत के पूर्वी सीमाओं के निकट रणनीतिक स्थिति और इसकी जनजातीय आबादी की राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति संवेदनशीलता राज्य स्तर की सुरक्षा नीति के लिए भारत-पाक संबंधों की समझ को महत्वपूर्ण बनाती है।
  • मुख्य बिंदु: JPSC के उत्तरों में भारत-पाक तनाव को सीमा राज्यों जैसे झारखंड पर राष्ट्रीय सुरक्षा के व्यापक प्रभावों से जोड़कर प्रस्तुत करें।
कश्मीर विवाद में धारा 370 का क्या महत्व था?

धारा 370 जम्मू-कश्मीर को भारत के भीतर अस्थायी विशेष स्वायत्तता देती थी, जिससे उसके पास अलग संविधान और भारतीय संसद के कुछ कानूनों की सीमित लागूयिता थी। अगस्त 2019 में इसका निरस्तीकरण इस स्वायत्तता को समाप्त कर क्षेत्र की संवैधानिक स्थिति बदल गया, जिससे पाकिस्तान की आपत्तियां बढ़ीं।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने हाल ही में कश्मीर विवाद में सक्रिय मध्यस्थता क्यों नहीं की?

UNSC ने 1948 और 1957 में कश्मीर पर प्रस्ताव पारित किए, लेकिन 1999 के बाद से इस मुद्दे पर औपचारिक बैठक नहीं हुई। भारत का द्विपक्षीय समाधान पर जोर और पाकिस्तान की असहमति के कारण, साथ ही भू-राजनीतिक स्थितियों ने UNSC की सक्रिय मध्यस्थता भूमिका को कमजोर किया है।

भारत-पाक द्विपक्षीय व्यापार की तुलना अमेरिका-चीन व्यापार से कैसे है?

भारत-पाक द्विपक्षीय व्यापार 2020-21 में लगभग 2 अरब डॉलर था, जो राजनीतिक तनावों से सीमित है। इसके विपरीत अमेरिका-चीन व्यापार 600 अरब डॉलर से अधिक है, जो दर्शाता है कि आर्थिक निर्भरता रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के साथ भी संभव है, जबकि भारत-पाक के मामले में राजनीतिक संघर्ष आर्थिक जुड़ाव को रोकता है।

भारत-पाक संबंधों में घरेलू राजनीतिक कथानकों की क्या भूमिका है?

दोनों देशों में घरेलू राजनीतिक कथानक राष्ट्रवाद और सुरक्षा चिंताओं पर केंद्रित हैं, जो नेताओं की कूटनीतिक लचीलेपन को सीमित करते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि संवाद अस्थायी और कभी-कभी होता है, जिससे ट्रंप के प्रयास जैसे स्थायी समाधान कमजोर पड़ जाते हैं।

भारत-पाक संबंधों के प्रमुख द्विपक्षीय ढांचे कौन से हैं?

सिमला समझौता (1972) और लाहौर घोषणा (1999) प्रमुख द्विपक्षीय ढांचे हैं जो शांतिपूर्ण समाधान और द्विपक्षीयता पर जोर देते हैं। हालांकि, आपसी अविश्वास और सुरक्षा घटनाओं के कारण इनका क्रियान्वयन असंगत रहा है।

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