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दिसंबर 2023 के बाद तीव्र हुआ मौजूदा भू-राजनीतिक संघर्ष वैश्विक तेल आपूर्ति श्रृंखलाओं को बाधित कर चुका है, जिससे 1973 के तेल संकट के समान कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला है। यह संघर्ष मुख्य तेल उत्पादक क्षेत्रों को प्रभावित करता है और आपूर्ति में कमी के कारण ब्रेंट क्रूड की कीमतों में छह महीनों में 60% से अधिक की बढ़ोतरी हुई है। इस वृद्धि ने खासकर आयात पर निर्भर देशों जैसे भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा को लेकर वैश्विक चिंताएं फिर से जगा दी हैं, क्योंकि हमारी अर्थव्यवस्था ऐसे बाहरी झटकों के प्रति संवेदनशील है।

UPSC Relevance

  • GS Paper 2: अंतरराष्ट्रीय संबंध – ऊर्जा सुरक्षा, तेल की भू-राजनीति
  • GS Paper 3: आर्थिक विकास – ऊर्जा अर्थशास्त्र, मुद्रास्फीति का प्रभाव
  • निबंध: वैश्विक संघर्षों का भारत की ऊर्जा और आर्थिक सुरक्षा पर प्रभाव

ऐतिहासिक संदर्भ: 1973 का तेल संकट और उसका प्रभाव

1973 का तेल संकट तब शुरू हुआ जब OPEC ने योम किप्पुर युद्ध के दौरान इजरायल का समर्थन करने वाले देशों पर तेल का प्रतिबंध लगा दिया। इससे तेल की कीमतें $3 से $12 प्रति बैरल तक चार गुना बढ़ गईं। इस अचानक आए संकट ने तेल आयात करने वाले देशों की भू-राजनीतिक जोखिमों के प्रति संवेदनशीलता उजागर कर दी। इस संकट के बाद कई अर्थव्यवस्थाओं में मुद्रास्फीति और आर्थिक ठहराव (stagflation) देखने को मिला और ऊर्जा पर निर्भरता कम करने व विविधता लाने की रणनीति अपनाई गई।

  • 1973 में कीमतों का चार गुना बढ़ना अभूतपूर्व था और इसने वैश्विक आर्थिक मंदी को जन्म दिया (U.S. Energy Information Administration)।
  • OPEC ने एक समूह के रूप में तेल उत्पादक देशों की भू-राजनीतिक ताकत को दिखाया।
  • 1973 के बाद ऊर्जा सुरक्षा कई देशों की प्राथमिक रणनीति बन गई।

वर्तमान संघर्ष और वैश्विक तेल बाजार पर प्रभाव

हालिया संघर्ष में प्रमुख तेल उत्पादक देशों की आपूर्ति बाधित हुई है, जिससे बाजार में अस्थिरता बढ़ी है। छह महीनों में ब्रेंट क्रूड की कीमतें 60% से अधिक बढ़ी हैं, जो लंबी आपूर्ति रुकावट का डर दर्शाती हैं। 1973 के विपरीत, आज का वैश्विक बाजार अधिक जुड़ा हुआ है, फिर भी कमजोरियां बरकरार हैं।

  • IEA की 2024 की मासिक तेल बाजार रिपोर्ट में संघर्ष के बाद 60% कीमत वृद्धि दर्ज है।
  • आपूर्ति श्रृंखला में रुकावटों ने फ्रेट और बीमा लागत को बढ़ाया है, जिससे कीमतों पर दबाव बढ़ा है।
  • बाजार में सट्टेबाजी और भंडारण ने भी कीमतों की अस्थिरता को बढ़ावा दिया है।

भारत की ऊर्जा सुरक्षा व्यवस्था और कानूनी प्रावधान

भारत अपनी कच्चे तेल की लगभग 85% जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है, जो सालाना करीब 220 मिलियन टन है (MoPNG, 2023)। देश के रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR), जो पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस नियम, 1959 (Rule 54A) और ऊर्जा संरक्षण अधिनियम, 2001 (धारा 14-16) के तहत संचालित हैं, केवल लगभग 5.33 मिलियन मीट्रिक टन क्षमता रखते हैं, जो लगभग 9.5 दिनों की खपत को कवर करता है। संविधान के Article 253 के तहत केंद्र सरकार को ऊर्जा आयात और व्यापार से जुड़े अंतरराष्ट्रीय समझौतों में प्रवेश करने का अधिकार है, जो भारत की ऊर्जा कूटनीति की कानूनी आधारशिला है।

  • SPR की क्षमता दो सप्ताह से भी कम खपत को कवर करती है, जो लंबी अवधि के संकट के लिए अपर्याप्त है।
  • ऊर्जा संरक्षण अधिनियम के तहत ब्यूरो ऑफ एनर्जी एफिशिएंसी (BEE) मांग प्रबंधन को बढ़ावा देता है।
  • भारत की विदेश नीति Article 253 का उपयोग कर ऊर्जा आयात सुरक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय समझौतों का सहारा लेती है।

भारत के लिए आर्थिक असर

तेल की कीमतों में वृद्धि से भारत का आयात बिल वित्त वर्ष 2023-24 में $180 बिलियन तक पहुंच गया है, जिससे वित्तीय घाटा बढ़ा है और मुद्रास्फीति पर दबाव पड़ा है। अप्रैल 2024 में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) 7.1% तक पहुंच गया, जिसमें ईंधन की बढ़ती कीमतों का बड़ा योगदान रहा (Economic Survey 2024)। यह मुद्रास्फीति शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों के उपभोक्ताओं को प्रभावित कर रही है, जिसका असर परिवहन, विनिर्माण और कृषि पर भी पड़ रहा है।

  • 85% की उच्च आयात निर्भरता भारत को बाहरी कीमत झटकों के प्रति संवेदनशील बनाती है।
  • तेल की बढ़ती कीमतें सब्सिडी भार बढ़ाती हैं और वित्तीय घाटा बढ़ाने में योगदान देती हैं।
  • मुद्रास्फीति दबाव मौद्रिक नीति की लचीलापन को सीमित करता है।

ऊर्जा सुरक्षा प्रबंधन में मुख्य संस्थान

ऊर्जा सुरक्षा जोखिमों के प्रबंधन में कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थान शामिल हैं। International Energy Agency (IEA) वैश्विक ऊर्जा बाजारों की निगरानी करता है और आपातकालीन तेल भंडार जारी करने में सदस्य देशों का समन्वय करता है। OPEC उत्पादन कोटा के जरिए आपूर्ति और कीमतों को प्रभावित करता है। भारत का Ministry of Petroleum and Natural Gas (MoPNG) घरेलू नीति और रणनीतिक भंडार का प्रबंधन करता है, जबकि Bureau of Energy Efficiency (BEE) संरक्षण उपाय लागू करता है। International Monetary Fund (IMF) तेल कीमतों के झटकों और उनके आर्थिक प्रभावों का विश्लेषण करता है।

  • IEA की आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली भारत जैसे गैर-सदस्य देशों के लिए सीमित है।
  • OPEC के उत्पादन निर्णय वैश्विक तेल कीमतों के लिए निर्णायक हैं।
  • MoPNG के रणनीतिक भंडार और नीतिगत हस्तक्षेप आपूर्ति झटकों को कम करने का प्रयास करते हैं।

तुलनात्मक विश्लेषण: भारत और जापान का 1973 संकट पर प्रतिक्रिया

पहलूभारतजापान
तेल आयात निर्भरता85% (2023)99% (1973), 1990 के दशक तक 40% से कम
रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार5.33 मिलियन मीट्रिक टन (~9.5 दिन की खपत)1973 के बाद काफी बढ़ाया गया, महीनों की खपत कवर करता है
ऊर्जा विविधीकरणनवीकरणीय ऊर्जा का सीमित हिस्सा; धीमी विविधीकरणन्यूक्लियर, LNG, नवीकरणीय ऊर्जा में तेजी से विविधीकरण
ऊर्जा दक्षता नीतियांBEE के माध्यम से लागू, लेकिन सीमित पैमाने परकठोर ऊर्जा संरक्षण और दक्षता उपाय

संरचनात्मक कमजोरियां और महत्वपूर्ण अंतर

भारत की उच्च कच्चे तेल आयात निर्भरता और सीमित रणनीतिक भंडार वैश्विक आपूर्ति झटकों के प्रति इसकी संरचनात्मक कमजोरी को दर्शाते हैं। नवीकरणीय और जीवाश्म ईंधन विकल्पों में धीमी प्रगति इस जोखिम को बढ़ाती है। आपातकालीन प्रतिक्रिया तंत्र, जिसमें SPR क्षमता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग शामिल हैं, वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं की तुलना में अपर्याप्त हैं।

  • SPR की क्षमता लंबी आपूर्ति रुकावट के लिए कम है।
  • कुल ऊर्जा खपत में नवीकरणीय ऊर्जा का हिस्सा लक्ष्य से कम है।
  • IEA सदस्यता न होने के कारण आपातकालीन तेल रिलीज के लिए अंतरराष्ट्रीय समन्वय सीमित है।

महत्व और आगे का रास्ता

  • रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार को बढ़ाकर कम से कम 30 दिनों की खपत कवर करनी चाहिए ताकि आपूर्ति झटकों से बचाव हो सके।
  • ऊर्जा स्रोतों में विविधीकरण तेज करना होगा, नवीकरणीय ऊर्जा का हिस्सा बढ़ाना और तेल निर्भरता कम करनी होगी।
  • BEE के जरिये ऊर्जा दक्षता उपायों को कड़ाई से लागू किया जाए और प्रोत्साहन बढ़ाए जाएं।
  • रणनीतिक साझेदारियों और संभवतः IEA के साथ जुड़ाव के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय सहयोग मजबूत किया जाए।
  • विदेश नीति में ऊर्जा सुरक्षा को Article 253 के तहत शामिल कर सक्रिय कूटनीति को बढ़ावा दिया जाए।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
1973 के तेल संकट के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. यह संकट OPEC द्वारा इजरायल का समर्थन करने वाले देशों पर लगाए गए प्रतिबंध से शुरू हुआ था।
  2. संकट के दौरान तेल की कीमतें दोगुनी हो गई थीं।
  3. इस संकट के बाद International Energy Agency (IEA) की स्थापना हुई।

इनमें से कौन-से कथन सही हैं?

  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2 और 3
  • cकेवल 1 और 3
  • d1, 2 और 3 सभी
उत्तर: (c)
कथन 1 सही है; OPEC ने इजरायल समर्थक देशों पर प्रतिबंध लगाया था। कथन 2 गलत है; कीमतें दोगुनी नहीं, चार गुना बढ़ीं। कथन 3 सही है; IEA की स्थापना 1973 संकट के बाद OECD देशों में ऊर्जा नीतियों के समन्वय के लिए हुई।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
भारत के रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. भारत के SPR की क्षमता लगभग 9.5 दिनों की कच्चे तेल खपत को कवर करती है।
  2. SPR ऊर्जा संरक्षण अधिनियम, 2001 के तहत संचालित है।
  3. SPR की क्षमता लंबी अवधि की वैश्विक आपूर्ति रुकावटों के लिए पर्याप्त है।

इनमें से कौन-से कथन सही हैं?

  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2 और 3
  • cकेवल 1 और 3
  • d1, 2 और 3 सभी
उत्तर: (a)
कथन 1 सही है; SPR लगभग 9.5 दिनों की खपत कवर करता है। कथन 2 सही है; SPR पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस नियम, 1959 तथा ऊर्जा संरक्षण अधिनियम, 2001 के अंतर्गत आता है। कथन 3 गलत है; SPR की क्षमता लंबी आपूर्ति रुकावट के लिए पर्याप्त नहीं है।

मुख्य प्रश्न

चालू संघर्ष से उत्पन्न तेल मूल्य झटकों और 1973 के तेल संकट के बीच समानताएं जांचें। भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता पर इसके प्रभावों का विश्लेषण करें और भविष्य में ऐसे जोखिमों को कम करने के उपाय सुझाएं।

झारखंड और JPSC प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: GS Paper 2 – अंतरराष्ट्रीय संबंध; GS Paper 3 – आर्थिक विकास
  • झारखंड का दृष्टिकोण: झारखंड के कोयला और खनिज संसाधन इसे ऊर्जा केंद्र बनाने की संभावना रखते हैं; तेल आपूर्ति में रुकावटें घरेलू ऊर्जा संसाधनों के विकास की महत्ता बढ़ाती हैं।
  • मुख्य बिंदु: वैश्विक ऊर्जा झटकों को राज्य स्तर की ऊर्जा सुरक्षा, उद्योगों पर आर्थिक प्रभाव और झारखंड में नवीकरणीय ऊर्जा के प्रचार से जोड़ें।
1973 के तेल संकट की वजह क्या थी?

1973 के तेल संकट की शुरुआत OPEC द्वारा योम किप्पुर युद्ध के दौरान इजरायल का समर्थन करने वाले देशों पर तेल प्रतिबंध लगाने से हुई, जिससे तेल की कीमतें चार गुना बढ़ गईं।

भारत सालाना कितना कच्चा तेल आयात करता है?

भारत सालाना लगभग 220 मिलियन टन कच्चा तेल आयात करता है, जो उसकी कुल कच्चे तेल खपत का करीब 85% है (MoPNG, 2023)।

भारत के रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार की क्षमता क्या है?

भारत के रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार की क्षमता लगभग 5.33 मिलियन मीट्रिक टन है, जो लगभग 9.5 दिनों की कच्चे तेल खपत को कवर करता है (MoPNG, 2023)।

भारत को ऊर्जा आयात प्रभावित करने वाले अंतरराष्ट्रीय समझौतों में प्रवेश की अनुमति कौन सा संवैधानिक प्रावधान देता है?

भारतीय संविधान का Article 253 केंद्र सरकार को ऐसे अंतरराष्ट्रीय समझौतों के लिए कानून बनाने और समझौते करने का अधिकार देता है।

जापान ने 1973 के तेल संकट पर भारत से अलग कैसे प्रतिक्रिया दी?

जापान ने तेजी से ऊर्जा स्रोतों में विविधीकरण किया और कड़े ऊर्जा दक्षता नीतियां लागू कीं, जिससे 1973 में 99% तेल निर्भरता को 1990 के दशक तक 40% से कम कर दिया, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था को भविष्य के झटकों से बचाव मिला (IEA, 2020)।

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