परिचय: भारत की कार्बन क्रेडिट योजना और उसकी अस्पष्टताएं
संसदीय बजट 2026-27 में केंद्र सरकार ने ₹20,000 करोड़ पांच वर्षों में कार्बन क्रेडिट कार्यक्रम के लिए आवंटित किए हैं, जो मुख्य रूप से कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण (CCUS) तकनीकों पर केंद्रित है। यह पहल बिजली, स्टील, सीमेंट, रिफाइनरी और रसायन जैसे पांच प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों में कार्बन उत्सर्जन को कम करने का लक्ष्य रखती है। हालांकि, सार्वजनिक चर्चा और आधिकारिक संवाद में इस औद्योगिक CCUS योजना को कृषि आधारित कार्बन क्रेडिट से जोड़ने की वजह से हितधारकों में असमंजस पैदा हो गया है और नीति के क्रियान्वयन में जटिलता आ रही है।
यह भ्रम नियामक ढांचे, फंड आवंटन और बाजार तंत्रों की स्पष्टता को कमजोर करता है, जिससे भारत की पेरिस समझौता (2015) के तहत जलवायु लक्ष्यों और राष्ट्रीय निर्धारित योगदानों (NDCs) को पूरा करने में जोखिम उत्पन्न होता है।
UPSC से प्रासंगिकता
- GS पेपर 3: पर्यावरण और पारिस्थितिकी – जलवायु परिवर्तन शमन, कार्बन बाजार, औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण
- GS पेपर 3: आर्थिक विकास – संसदीय बजट, ऊर्जा क्षेत्र सुधार
- निबंध: भारत की जलवायु नीति और सतत विकास
₹20,000 करोड़ की कार्बन क्रेडिट योजना का दायरा और उद्देश्य
बजट 2026-27 में घोषित यह योजना CCUS तकनीकों को लागू करने पर केंद्रित है, जिससे औद्योगिक CO2 उत्सर्जन को स्रोत पर ही पकड़कर उसका उपयोग या सुरक्षित रूप से भूमिगत भंडारण किया जा सके। लक्षित क्षेत्र भारत के कुल CO2 उत्सर्जन का लगभग 40% हिस्सा देते हैं (MoEFCC, 2023), इसलिए ये उत्सर्जन कम करने के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।
- बजट आवंटन: CCUS अनुसंधान, पायलट प्रोजेक्ट और तैनाती के लिए पांच वर्षों में ₹20,000 करोड़।
- लक्षित क्षेत्र: बिजली उत्पादन, स्टील निर्माण, सीमेंट उत्पादन, पेट्रोलियम रिफाइनरी, और रसायन उद्योग।
- लक्ष्य: पेरिस समझौता के तहत 2030 तक उत्सर्जन तीव्रता में 45% कमी का समर्थन।
कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण (CCUS) क्या है?
CCUS तकनीकें औद्योगिक प्रक्रियाओं या पावर प्लांट से निकलने वाले CO2 को वायुमंडल में जाने से पहले पकड़ती हैं। पकड़ा गया कार्बन या तो औद्योगिक उपयोग में आता है या भू-गर्भीय संरचनाओं में सुरक्षित रूप से संग्रहित किया जाता है।
- कैप्चर: उत्सर्जन स्रोतों से CO2 को पकड़ने वाली तकनीकें।
- परिवहन: पाइपलाइन या अन्य माध्यम से CO2 को उपयोग या भंडारण स्थल तक पहुंचाना।
- उपयोग: CO2 का तेल पुनर्प्राप्ति, रासायनिक उत्पादन या सामग्री संश्लेषण में उपयोग।
- भंडारण: गहरे खारे जल भंडार या तेल-गैस भंडारों में CO2 का स्थायी रूप से संग्रह।
भारत में कार्बन क्रेडिट के लिए कानूनी और संस्थागत ढांचा
भारत में कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग के लिए कोई समर्पित कानून मौजूद नहीं है। यह प्रणाली मौजूदा पर्यावरण कानूनों और विभिन्न मंत्रालयों के समन्वय पर आधारित है:
- Environment Protection Act, 1986 (Section 3): केंद्र सरकार को पर्यावरण संरक्षण के लिए कदम उठाने का अधिकार देता है।
- Energy Conservation Act, 2001 (Section 14): ऊर्जा संरक्षण के उपायों को अनिवार्य करता है, जो अप्रत्यक्ष रूप से उत्सर्जन में कमी में सहायक है।
- The Air (Prevention and Control of Pollution) Act, 1981: औद्योगिक वायु प्रदूषण को नियंत्रित करता है।
- MoEFCC: पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी नीतियां बनाता है।
- MNRE: नवीकरणीय ऊर्जा और सतत तकनीकों को बढ़ावा देता है।
- NITI Aayog: कार्बन बाजार विकास और जलवायु नीति पर सलाह देता है।
- CPCB: औद्योगिक उत्सर्जन की निगरानी करता है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत पेरिस समझौता (2015) के तहत UNFCCC के सदस्य के रूप में 2030 तक 2005 के स्तर से उत्सर्जन तीव्रता में 45% कमी का वचनबद्ध है।
आर्थिक पहलू और बाजार की संभावनाएं
भारत के औद्योगिक क्षेत्र से लगभग 40% CO2 उत्सर्जन होता है (MoEFCC, 2023)। ₹20,000 करोड़ का बजट उच्च उत्सर्जन वाले उद्योगों में CCUS तैनाती को तेज करने का प्रयास है।
- वैश्विक स्वैच्छिक कार्बन बाजार का आकार 2023 में $851 मिलियन था, जो 20% वार्षिक वृद्धि दर से बढ़ रहा है (Ecosystem Marketplace, 2024)।
- भारत का स्वैच्छिक कार्बन बाजार अभी प्रारंभिक चरण में है, लेकिन 2030 तक $10 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है (NITI Aayog, 2023)।
- CCUS तकनीक की लागत प्रति टन CO2 $50-$100 है (IEA, 2023), जो व्यापक अपनाने में बाधा है।
- कृषि आधारित कार्बन क्रेडिट क्षमता लगभग 100 मिलियन टन CO2 समतुल्य वार्षिक है (ICRISAT, 2022), लेकिन यह औद्योगिक CCUS से अलग है।
तुलनात्मक अध्ययन: भारत बनाम यूरोपीय संघ के कार्बन बाजार
| पहलू | भारत | यूरोपीय संघ (EU ETS) |
|---|---|---|
| बाजार लॉन्च | प्रारंभिक स्वैच्छिक बाजार; 2026 में ₹20,000 करोड़ CCUS योजना शुरू | 2005 से स्थापित; विश्व का सबसे बड़ा कार्बन बाजार |
| बाजार आकार (2023) | $851 मिलियन (वैश्विक स्वैच्छिक बाजार); भारत का बाजार 2030 तक $10 बिलियन | €90 बिलियन बाजार मूल्य |
| नियामक ढांचा | कोई समर्पित कार्बन क्रेडिट कानून नहीं; MoEFCC, MNRE, NITI Aayog द्वारा अलग-अलग निगरानी | कठोर नियामक नियंत्रण; एकीकृत प्रमाणन और सत्यापन प्रोटोकॉल |
| क्रेडिट का दायरा | औद्योगिक CCUS पर फोकस; कृषि आधारित क्रेडिट अलग और अस्पष्ट | CCUS और कृषि आधारित क्रेडिट दोनों को एकीकृत प्रणाली में शामिल |
| उत्सर्जन कमी प्रभाव | नीति अस्पष्टता और क्रियान्वयन में कमी के कारण अनिश्चित | शुरुआत से ही कवर किए गए क्षेत्रों में 35% उत्सर्जन कमी |
महत्वपूर्ण अंतराल और नीति चुनौतियां
भारत की कार्बन क्रेडिट प्रणाली में निम्न समस्याएं हैं:
- CCUS परियोजनाओं और कृषि आधारित कार्बन क्रेडिट को अलग करने वाला एक एकीकृत, पारदर्शी नियामक तंत्र का अभाव।
- हितधारकों के बीच पात्रता, प्रमाणन और ट्रेडिंग प्रक्रियाओं को लेकर भ्रम।
- डबल काउंटिंग के जोखिम, क्योंकि योजनाएं ओवरलैप हो रही हैं।
- फंड आवंटन और निगरानी तंत्र में स्पष्टता की कमी।
- EU ETS जैसे परिपक्व बाजारों की तुलना में मानकीकृत सत्यापन प्रोटोकॉल का अभाव।
महत्व और आगे का रास्ता
- कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग के लिए समर्पित विधायी ढांचा बनाकर कानूनी स्पष्टता और बाजार विश्वास प्रदान करना।
- औद्योगिक CCUS और कृषि आधारित कार्बन क्रेडिट के लिए अलग-अलग नियामक धाराओं का निर्माण कर भ्रम और डबल काउंटिंग से बचाव।
- अंतरराष्ट्रीय सर्वोत्तम प्रथाओं के अनुरूप प्रमाणन, निगरानी, रिपोर्टिंग और सत्यापन (MRV) प्रोटोकॉल विकसित करना।
- MoEFCC, MNRE, NITI Aayog और CPCB के बीच बेहतर अंतर-मंत्रालय समन्वय सुनिश्चित करना।
- सार्वजनिक-निजी भागीदारी को बढ़ावा देना और CCUS तकनीक अपनाने के लिए प्रोत्साहन देना ताकि लागत कम हो और तैनाती बढ़े।
प्रश्न अभ्यास
- ₹20,000 करोड़ का आवंटन केवल कृषि आधारित कार्बन क्रेडिट उत्पादन के लिए है।
- CCUS तकनीकें CO2 उत्सर्जन को पकड़कर भूमिगत संग्रहण करती हैं।
- भारत के पास वर्तमान में कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग के लिए समर्पित कानून है।
इनमें से कौन सा/से कथन सही हैं?
- यूरोपीय संघ का Emissions Trading System (EU ETS) CCUS और कृषि आधारित दोनों प्रकार के कार्बन क्रेडिट शामिल करता है।
- भारत के कार्बन क्रेडिट ढांचे में वर्तमान में स्पष्ट प्रमाणन और सत्यापन प्रोटोकॉल हैं।
- भारत की वर्तमान कार्बन क्रेडिट योजना में डबल काउंटिंग का जोखिम है।
इनमें से कौन सा/से कथन सही हैं?
मेन्स प्रश्न
संसदीय बजट 2026-27 में घोषित भारत की ₹20,000 करोड़ की कार्बन क्रेडिट योजना में नीतिगत अस्पष्टताओं से उत्पन्न चुनौतियों का समालोचनात्मक विश्लेषण करें। भारत किस प्रकार अपने कार्बन क्रेडिट ढांचे को मजबूत कर पेरिस समझौते के लक्ष्यों को पूरा कर सकता है? (250 शब्द)
झारखंड एवं JPSC से प्रासंगिकता
- JPSC पेपर: पेपर 3 – पर्यावरण और पारिस्थितिकी, औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण
- झारखंड का नजरिया: झारखंड के स्टील और सीमेंट उद्योग बड़े CO2 उत्सर्जक हैं; CCUS पहलों का स्थानीय प्रदूषण और रोजगार पर असर पड़ सकता है।
- मेन्स प्वाइंटर: राज्य के औद्योगिक उत्सर्जन, CCUS अपनाने की संभावनाएं और कार्बन बाजारों के बेहतर उपयोग के लिए स्पष्ट नीति ढांचे की जरूरत।
भारत की ₹20,000 करोड़ की कार्बन क्रेडिट योजना का मुख्य फोकस क्या है?
यह योजना मुख्य रूप से बिजली, स्टील, सीमेंट, रिफाइनरी और रसायन जैसे पांच औद्योगिक क्षेत्रों में CO2 उत्सर्जन को कम करने के लिए CCUS तकनीकों को लागू करने पर केंद्रित है।
क्या भारत के पास कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग के लिए समर्पित कानून है?
नहीं, भारत में कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग के लिए कोई समर्पित कानून नहीं है। मौजूदा पर्यावरण कानून और MoEFCC, MNRE जैसे मंत्रालय संबंधित नीतियों को देख रहे हैं।
भारत में औद्योगिक CCUS और कृषि आधारित कार्बन क्रेडिट को मिलाने से क्या जोखिम होते हैं?
इससे हितधारकों में भ्रम, उत्सर्जन कमी का दोहरा हिसाब, फंड आवंटन में असमंजस और नीति क्रियान्वयन में बाधाएं उत्पन्न होती हैं।
EU Emissions Trading System भारत के कार्बन क्रेडिट ढांचे से कैसे अलग है?
EU ETS एक परिपक्व, नियंत्रित बाजार है जो CCUS और कृषि दोनों क्रेडिट को एकीकृत करता है और कड़े सत्यापन प्रोटोकॉल के कारण उत्सर्जन में महत्वपूर्ण कमी करता है। भारत का ढांचा खंडित है और स्पष्ट नियामक तंत्र नहीं है।
स्रोत: LearnPro Editorial | सामान्य अध्ययन | प्रकाशित: 18 March 2026 | अंतिम अपडेट: 8 April 2026
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