अपडेट

वर्ल्ड इनइक्वालिटी लैब (WIL) ने 2024 में प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में बताया है कि भारत के शीर्ष 10% ग्रामीण परिवारों के पास कुल कृषि भूमि का 44% हिस्सा है। यह आंकड़ा ग्रामीण भारत में भूमि के अत्यधिक केंद्रीकरण को दर्शाता है, जहां 85% से अधिक किसान छोटे और सीमांत हैं, जिनके पास 2 हेक्टेयर से कम भूमि है (कृषि जनगणना 2015-16)। स्वतंत्रता के बाद से लागू कई भूमि सुधार कानूनों के बावजूद यह असमानता बनी हुई है, जो कार्यान्वयन और निगरानी में चुनौतियों को दर्शाता है। इस भूमि केंद्रीकरण से ग्रामीण असमानता बढ़ती है, अधिकांश किसानों के लिए उत्पादक संसाधनों की पहुंच सीमित होती है और कृषि विकास बाधित होता है।

UPSC प्रासंगिकता

  • GS पेपर 3: भारतीय अर्थव्यवस्था – कृषि, भूमि सुधार, ग्रामीण विकास
  • GS पेपर 1: सामाजिक मुद्दे – ग्रामीण समाज, असमानता
  • निबंध: भूमि सुधार और समावेशी विकास

भूमि स्वामित्व पर संवैधानिक और कानूनी ढांचा

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 39(b) और 39(c) राज्य नीति के निर्देशात्मक सिद्धांत हैं, जो राज्य को भौतिक संसाधनों के समान वितरण और धन के केंद्रीकरण को रोकने का निर्देश देते हैं। स्वतंत्रता के बाद कई राज्यों ने भूमि सुधार कानून बनाए जैसे कि उत्तर प्रदेश ज़मींदारी उन्मूलन अधिनियम, 1950 और भूमि सीमा अधिनियम जैसे बिहार भूमि सुधार अधिनियम, 1950, जिनका उद्देश्य अधिकतम भूमि स्वामित्व को सीमित कर अधिशेष भूमि का पुनर्वितरण करना था।

  • अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वनवासियों (वन अधिकार मान्यता) अधिनियम, 2006 (FRA) वनवासी समुदायों के भूमि अधिकारों को मान्यता देता है।
  • सुप्रीम कोर्ट के फैसले, जैसे ओल्गा टेलिस बनाम बॉम्बे नगर निगम (1985), भूमि से जुड़े आजीविका अधिकारों को पुष्ट करते हैं।
  • इन प्रावधानों के बावजूद, कानूनी अस्पष्टता, पुराने भूमि अभिलेख और राजनीतिक विरोध पुनर्वितरण को रोकते हैं।

ग्रामीण भारत पर भूमि केंद्रीकरण का आर्थिक प्रभाव

कृषि भारत की GDP में लगभग 18.6% का योगदान देती है (आर्थिक सर्वे 2023-24)। शीर्ष 10% ग्रामीण परिवारों के पास 44% भूमि होने से छोटे और सीमांत किसानों, जो कुल किसानों का 85% हैं और लगभग 40% अन्न उत्पादन करते हैं (NITI आयोग, 2022), की भूमि तक पहुंच सीमित हो जाती है। इस असमान स्वामित्व का संबंध ग्रामीण गरीबी दर 25.7% (NSSO 2011-12) और कृषि उत्पादकता की 3.5% वार्षिक वृद्धि दर से है, जो अन्य क्षेत्रों के 6.5% की तुलना में कम है।

  • छोटे किसानों के बीच भूमि खंडित होने से उत्पादन की अर्थव्यवस्थाओं और यांत्रिकीकरण को अपनाने में बाधा आती है।
  • ग्रामीण विकास और भूमि सुधार के लिए 2023-24 में बजट आवंटन ₹1.23 लाख करोड़ था (संघीय बजट 2023-24), फिर भी संरचनात्मक सुधार सीमित हैं।
  • भूमि वितरण की असमानता आय में अंतर बनाए रखती है और ग्रामीण ऋण की पहुंच को रोकती है।

भूमि डेटा और नीति में प्रमुख संस्थानों की भूमिका

वर्ल्ड इनइक्वालिटी लैब भारत और विश्व में भूमि और धन असमानता पर व्यापक आंकड़े प्रदान करता है। ग्रामीण विकास मंत्रालय (MoRD) भूमि सुधार और ग्रामीण कल्याण योजनाओं को लागू करता है, जबकि कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय की कृषि जनगणना इकाई भूमि स्वामित्व का विस्तृत डेटा इकट्ठा करती है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (NSSO) ग्रामीण गरीबी और भूमि उपयोग पर सामाजिक-आर्थिक आंकड़े उपलब्ध कराता है। निति आयोग कृषि सुधार और नीति सुझाव देता है।

  • इन संस्थानों के बीच समन्वय की कमी नीति में असंगति पैदा करती है।
  • भूमि अभिलेखों में विसंगतियां और अपडेट की कम आवृत्ति लक्षित हस्तक्षेपों को प्रभावित करती है।

भारत और ब्राजील के भूमि सुधार परिणामों की तुलना

पहलूभारतब्राजील
भूमि सुधार कानून1950 के बाद से कई राज्य कानून; भूमि सीमा अधिनियम; FRA 2006भूमि क़ानून (1964); राष्ट्रीय उपनिवेश और कृषि सुधार संस्थान (INCRA)
पुनर्वितरण की मात्रासीमित; शीर्ष 10% के पास 44% भूमि (2024)1990-2020 में बड़े मालिकों से 25% कृषि भूमि छोटे किसानों को पुनर्वितरित
ग्रामीण असमानता पर प्रभावलगातार उच्च; ग्रामीण गरीबी 25.7%असमानता में कमी; छोटे किसानों की आय में सुधार
कृषि उत्पादकता वृद्धि3.5% वार्षिक (आर्थिक सर्वे 2023)4.2% वार्षिक (FAO, 2022)

क्रियान्वयन की चुनौतियां और नीति में खामियां

भारत में भूमि सुधार कमजोर प्रवर्तन, पुराने और गलत भूमि अभिलेख, और ज़मींदारों के राजनीतिक विरोध के कारण प्रभावित हैं। इनपुट सब्सिडी पर अधिक ध्यान देने से संरचनात्मक पुनर्वितरण में बाधा आती है। किरायेदारी सुधार अधूरे हैं, जिससे कई उपजाऊ किसान स्वामित्व अधिकारों से वंचित हैं। इसके अलावा, भूमि के खंडित स्वरूप से उत्पादकता और निवेश की प्रेरणा कम होती है।

  • भूमि अभिलेखों का अधूरा डिजिटलीकरण और अपडेट पारदर्शिता में बाधा डालता है।
  • संपन्न हितधारकों का विरोध अधिशेष भूमि पुनर्वितरण में देरी करता है।
  • नीति में अल्पकालिक कल्याण योजनाओं पर अधिक जोर रहता है, जबकि दीर्घकालिक संरचनात्मक सुधार कम होते हैं।

महत्व और आगे का रास्ता

  • मौजूदा भूमि सीमा और किरायेदारी कानूनों के क्रियान्वयन को मजबूत करें और भूमि अभिलेखों का डिजिटलीकरण सुनिश्चित करें।
  • FRA और किरायेदारी अधिकारों के प्रभावी प्रवर्तन से हाशिए पर पड़े समुदायों को सशक्त बनाएं।
  • नीति को संरचनात्मक सुधारों की ओर मोड़ें जो भूमि केंद्रीकरण को कम करें और इनपुट सब्सिडी के साथ संतुलन बनाएं।
  • MoRD, निति आयोग और कृषि जनगणना विभाग के बीच बेहतर समन्वय से डेटा आधारित नीति निर्माण को बढ़ावा दें।
  • ब्राजील जैसे अंतरराष्ट्रीय उदाहरणों से सीख लेकर छोटे किसानों की उत्पादकता बढ़ाने वाले लक्षित पुनर्वितरण कार्यक्रम बनाएं।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
ग्रामीण भारत में भूमि स्वामित्व के केंद्रीकरण के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. शीर्ष 10% ग्रामीण परिवारों के पास लगभग आधी कृषि भूमि है।
  2. छोटे और सीमांत किसान कुल किसानों का 50% से कम हैं।
  3. भूमि सीमा अधिनियम सभी राज्यों में समान रूप से लागू होते हैं।
  • aकेवल 1
  • b1 और 3
  • c2 और 3
  • d1, 2 और 3
उत्तर: (a)
वर्ल्ड इनइक्वालिटी लैब (2024) के अनुसार कथन 1 सही है। कथन 2 गलत है क्योंकि छोटे और सीमांत किसान कुल किसानों का 85% से अधिक हैं (कृषि जनगणना 2015-16)। कथन 3 गलत है क्योंकि भूमि सीमा अधिनियम राज्यों के अनुसार भिन्न होते हैं और समान रूप से लागू नहीं होते।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
भारत में भूमि सुधार कानूनों के संदर्भ में निम्नलिखित पर विचार करें:
  1. अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वनवासियों (वन अधिकार मान्यता) अधिनियम, 2006 हाशिए पर पड़े समुदायों के भूमि अधिकारों को मान्यता देता है।
  2. संविधान के अनुच्छेद 39(b) और 39(c) भूमि स्वामित्व के समान वितरण का निर्देश देते हैं।
  3. किरायेदारी सुधार सभी राज्यों में समान रूप से सफल रहे हैं।
  • a1 और 2
  • b2 और 3
  • c1 और 3
  • d1, 2 और 3
उत्तर: (a)
कथन 1 सही है क्योंकि FRA 2006 वनवासियों के भूमि अधिकारों को मान्यता देता है। कथन 2 भी सही है क्योंकि अनुच्छेद 39(b) और 39(c) संसाधनों के समान वितरण का निर्देश देते हैं। कथन 3 गलत है क्योंकि किरायेदारी सुधार अधूरे और राज्यों में असमान रहे हैं।

मेन प्रश्न

भारत में शीर्ष 10% ग्रामीण परिवारों के बीच भूमि स्वामित्व के केंद्रीकरण का कृषि उत्पादकता और ग्रामीण असमानता पर क्या प्रभाव पड़ता है? मौजूदा भूमि सुधार कानूनों की प्रभावशीलता का मूल्यांकन करें और भूमि असमानता को दूर करने के लिए सुझाव दें।

झारखंड और JPSC प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: पेपर 2 – भूमि सुधार और ग्रामीण विकास
  • झारखंड का दृष्टिकोण: झारखंड में अनुसूचित जनजाति की संख्या अधिक है, जो FRA 2006 के तहत संरक्षित हैं; भूमि हड़पने और केंद्रीकरण से जनजातीय आजीविका प्रभावित होती है।
  • मेन पॉइंटर: झारखंड में FRA के क्रियान्वयन, भूमि अभिलेख डिजिटलीकरण की चुनौतियों, और भूमि केंद्रीकरण के जनजातीय गरीबी तथा कृषि पर प्रभाव को रेखांकित करें।
भूमि सुधार के संदर्भ में अनुच्छेद 39(b) और 39(c) का क्या महत्व है?

संविधान के अनुच्छेद 39(b) और 39(c) राज्य नीति के निर्देशात्मक सिद्धांत हैं, जो राज्य को संसाधनों के समान वितरण और धन के केंद्रीकरण को रोकने का निर्देश देते हैं। ये भूमि सुधार कानूनों के संवैधानिक आधार हैं।

भारत के कितने प्रतिशत किसान छोटे और सीमांत हैं?

कृषि जनगणना 2015-16 के अनुसार, भारत के 85% से अधिक किसान छोटे और सीमांत हैं, जिनके पास 2 हेक्टेयर से कम भूमि है।

भूमि केंद्रीकरण कृषि उत्पादकता को कैसे प्रभावित करता है?

भूमि के उच्च केंद्रीकरण से छोटे किसानों की भूमि तक पहुंच सीमित होती है, जिससे भूमि खंडित होती है और उसकी पूर्ण उपयोगिता कम होती है। इससे कृषि उत्पादकता की वृद्धि दर 3.5% रह जाती है, जो अन्य क्षेत्रों के 6.5% की तुलना में काफी कम है (आर्थिक सर्वे 2023)।

अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वनवासियों (वन अधिकार मान्यता) अधिनियम, 2006 की भूमिका क्या है?

FRA 2006 वनवासियों और अनुसूचित जनजातियों को वन भूमि पर अधिकार प्रदान करता है, जिससे उनकी भूमि हड़पने से सुरक्षा होती है।

ब्राजील के भूमि सुधार ने ग्रामीण असमानता पर क्या असर डाला है?

ब्राजील के भूमि क़ानून (1964) और INCRA ने 1990-2020 के बीच बड़े ज़मींदारों से 25% कृषि भूमि छोटे किसानों को पुनर्वितरित की, जिससे ग्रामीण असमानता कम हुई और कृषि उत्पादकता 4.2% वार्षिक बढ़ी (FAO, 2022)।

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