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परिचय: विधायी संदर्भ और महत्व

मजदूरी संहिता, 2019 को भारतीय संसद द्वारा पारित किया गया है, जो मिनिमम वेजेस एक्ट, 1948 समेत चार श्रम कानूनों को समेकित करता है। इसका उद्देश्य लगभग 50 करोड़ श्रमिकों के लिए विभिन्न क्षेत्रों में वेतन निर्धारण और भुगतान को नियंत्रित करना है। लेकिन यह संहिता राष्ट्रीय स्तर पर कोई कानूनी न्यूनतम वेतन या लागू जीवनयापन वेतन स्थापित करने में विफल है। इस विधायी कमी के कारण आय असमानता बनी रहती है और भारत के 90% से अधिक अनौपचारिक श्रमिक वेतन शोषण के प्रति असुरक्षित रहते हैं, जो संविधान के अनुच्छेद 43 के निर्देशात्मक सिद्धांतों के तहत राज्य की जिम्मेदारी के खिलाफ है।

UPSC प्रासंगिकता

  • GS पेपर 2: शासन – श्रम कानून, सामाजिक न्याय और अधिकार-आधारित कानून
  • GS पेपर 3: अर्थव्यवस्था – श्रम बाजार सुधार, अनौपचारिक क्षेत्र की चुनौतियां
  • निबंध: श्रम सुधार और उनका सामाजिक-आर्थिक प्रभाव

न्यूनतम वेतन से संबंधित संवैधानिक और कानूनी ढांचा

अनुच्छेद 43 राज्य को निर्देश देता है कि वह श्रमिकों के लिए जीवनयापन योग्य वेतन सुनिश्चित करे, जो केवल न्यूनतम वेतन से परे एक संवैधानिक प्रतिबद्धता है। मिनिमम वेजेस एक्ट, 1948 केंद्र और राज्य सरकारों को अनुसूचित रोजगारों के लिए न्यूनतम वेतन निर्धारित करने और संशोधित करने का अधिकार देता है (धारा 3 और 6)। मजदूरी संहिता, 2019 (धारा 5 और 6) इस विकेन्द्रीकृत वेतन निर्धारण प्रणाली को बरकरार रखता है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर एक समान न्यूनतम वेतन या मुद्रास्फीति एवं जीवनयापन लागत से जुड़ी अनिवार्य पुनः समीक्षा का प्रावधान नहीं करता।

न्यायिक निर्णय, विशेष रूप से ओल्गा टेलिस बनाम बॉम्बे नगरपालिका निगम (1985), ने जीवन के अधिकार के अंतर्गत आजीविका के अधिकार को रेखांकित किया है, जो वेतन सुरक्षा की आवश्यकता को मजबूत करता है। फिर भी, संहिता द्वारा राज्यों को व्यापक अधिकार दिए जाने के कारण वेतन में अंतर-राज्य असमानताएं और प्रवर्तन में असंगतता बनी रहती है।

आर्थिक वास्तविकताएं और श्रम बाजार की चुनौतियां

  • पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) 2019-20 के अनुसार, भारत के 90% से अधिक श्रमिक अनौपचारिक क्षेत्र में हैं, जिनके पास सामाजिक सुरक्षा नहीं है और जो वेतन शोषण के शिकार होते हैं।
  • इकोनॉमिक सर्वे 2023-24 में दिखाया गया है कि 2010 से 2020 के बीच निम्न आय वर्ग के श्रमिकों की वास्तविक मजदूरी में 2% की गिरावट आई है, जो क्रय शक्ति में कमी दर्शाता है।
  • इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन (ILO) का अनुमान है कि कानूनी न्यूनतम वेतन को जीवनयापन वेतन के स्तर तक बढ़ाने से गरीबी में 5-7% की कमी आ सकती है, जो वेतन स्तरों के प्रभावी निर्धारण की महत्ता को दर्शाता है।
  • अनौपचारिक क्षेत्र में वेतन बकाया 2022 में लगभग 1.5 लाख करोड़ रुपये आंका गया है, जो सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) की रिपोर्ट में बताया गया है और प्रवर्तन की कमजोरी को उजागर करता है।
  • श्रम और रोजगार मंत्रालय (MoLE) के लिए 2023-24 का बजट आवंटन 2,200 करोड़ रुपये है, जो व्यापक प्रवर्तन और निगरानी के लिए अपर्याप्त है।

संस्थागत भूमिकाएं और प्रवर्तन तंत्र

श्रम और रोजगार मंत्रालय श्रम कानूनों का निर्माण करता है और प्रवर्तन की देखरेख करता है। सेंट्रल एडवाइजरी बोर्ड ऑन मिनिमम वेजेस (CABMW) वेतन निर्धारण पर सलाह देता है, लेकिन इसके पास प्रवर्तन का अधिकार नहीं है। राज्य सरकारें न्यूनतम वेतन निर्धारित करने और संशोधित करने की जिम्मेदारी संभालती हैं, जिससे वेतन स्तरों और प्रवर्तन में असमानता बनी रहती है।

श्रम न्यायालय और औद्योगिक न्यायाधिकरण वेतन विवादों का निपटारा करते हैं, लेकिन इनके पास लंबित मामलों की भरमार है और अनौपचारिक क्षेत्र में इनकी पहुंच सीमित है। ILO तकनीकी सहायता प्रदान करता है और वैश्विक मानक स्थापित करता है, लेकिन घरेलू स्तर पर पालन कराने में सक्षम नहीं है।

तुलनात्मक दृष्टिकोण: ब्राजील की राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन नीति

पैरामीटरभारत (मजदूरी संहिता, 2019)ब्राजील (राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन नीति)
कानूनी गारंटीकोई कानूनी राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन नहीं; राज्य के विवेकाधिकार पर निर्भरकानूनी रूप से निर्धारित राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन
पुनः समीक्षा तंत्रअनियमित और विवेकाधीन; मुद्रास्फीति से लिंक नहींवार्षिक आधार पर मुद्रास्फीति और उत्पादकता के अनुसार सूचकांकित
कवरेजलगभग 50 करोड़ श्रमिक, ज्यादातर अनौपचारिककानून द्वारा औपचारिक और अनौपचारिक दोनों क्षेत्रों को कवर
गरीबी पर प्रभावजीवनयापन वेतन लागू होने पर 5-7% गरीबी में कमी (ILO)2004-2014 के बीच लगभग 1 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकाला
प्रवर्तनकमजोर प्रवर्तन; वेतन बकाया 1.5 लाख करोड़ रुपये (CMIE 2022)मजबूत प्रवर्तन और सामाजिक संवाद तंत्र

मजदूरी संहिता, 2019 में प्रमुख कमजोरियां

  • कानूनी रूप से बाध्यकारी राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन का अभाव राज्यों के बीच वेतन असमानता और श्रमिक सुरक्षा की कमी को जन्म देता है।
  • मुद्रास्फीति या जीवनयापन लागत से न्यूनतम वेतन की अनिवार्य समीक्षा न होने से वास्तविक मजदूरी में गिरावट होती है।
  • प्रवर्तन तंत्र कमजोर हैं क्योंकि बजट और संस्थागत क्षमता सीमित है।
  • संहिता अनौपचारिक क्षेत्र की विशिष्ट कमजोरियों को स्पष्ट रूप से संबोधित नहीं करती, जहां 90% से अधिक श्रमिक असुरक्षित हैं।

आगे का रास्ता: नीति और संस्थागत सुधार

  • कानूनी रूप से बाध्यकारी राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन लागू करें, जो जीवनयापन वेतन के मानकों के अनुरूप हो और मुद्रास्फीति तथा उत्पादकता के अनुसार सूचकांकित हो।
  • MoLE के बजट आवंटन बढ़ाकर और श्रम न्यायालयों व निरीक्षण एजेंसियों की क्षमता बढ़ाकर प्रवर्तन मजबूत करें।
  • न्यूनतम वेतन की नियमित समीक्षा को पारदर्शी मानदंड और हितधारकों की भागीदारी के साथ अनिवार्य बनाएं।
  • अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों को लक्षित योजनाओं और कानूनी मान्यता के माध्यम से सामाजिक सुरक्षा और वेतन सुरक्षा प्रदान करें।
  • ILO की तकनीकी सहायता का लाभ उठाकर घरेलू मानकों को अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों के अनुरूप बनाएं।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
मजदूरी संहिता, 2019 के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. यह सभी राज्यों में लागू एक समान राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन का प्रावधान करता है।
  2. यह मिनिमम वेजेस एक्ट, 1948 समेत चार श्रम कानूनों को समेकित करता है।
  3. संहिता न्यूनतम वेतन की मुद्रास्फीति से जुड़ी नियमित समीक्षा का प्रावधान करती है।
  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2
  • cकेवल 2 और 3
  • d1, 2 और 3
उत्तर: (b)
कथन 1 गलत है क्योंकि संहिता राष्ट्रीय स्तर पर समान न्यूनतम वेतन निर्धारित नहीं करती; यह राज्यों के विवेकाधिकार पर निर्भर है। कथन 2 सही है क्योंकि संहिता चार श्रम कानूनों को समेकित करती है। कथन 3 गलत है क्योंकि संहिता संशोधन की अनुमति देती है, लेकिन मुद्रास्फीति से जुड़ी अनिवार्यता नहीं है।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
राज्य नीति के निर्देशात्मक सिद्धांतों के अनुच्छेद 43 के बारे में निम्नलिखित पर विचार करें:
  1. यह राज्य को श्रमिकों के लिए जीवनयापन वेतन सुनिश्चित करने का निर्देश देता है।
  2. यह न्यायालयों में लागू और प्रवर्तनीय है।
  3. यह भारत में न्यूनतम वेतन कानूनों का संवैधानिक आधार है।
  • aकेवल 1
  • bकेवल 1 और 3
  • cकेवल 2 और 3
  • d1, 2 और 3
उत्तर: (b)
कथन 1 सही है; अनुच्छेद 43 राज्य को जीवनयापन वेतन सुनिश्चित करने का निर्देश देता है। कथन 2 गलत है; निर्देशात्मक सिद्धांत न्यायालयों में लागू नहीं होते। कथन 3 सही है; अनुच्छेद 43 न्यूनतम वेतन कानूनों का संवैधानिक आधार है।

मुख्य प्रश्न

आलोचनात्मक रूप से जांचें कि कैसे मजदूरी संहिता, 2019 भारत में सभी श्रमिकों के लिए जीवनयापन वेतन की गारंटी देने का मौका खो बैठी है। इस कमी के आर्थिक और संवैधानिक प्रभावों पर चर्चा करें और वेतन सुरक्षा को मजबूत करने के लिए सुधार सुझाएं।

न्यूनतम वेतन और जीवनयापन वेतन में क्या अंतर है?

न्यूनतम वेतन वह कानूनी न्यूनतम राशि है जो सरकार द्वारा निर्धारित की जाती है और श्रमिकों को दी जाती है। जीवनयापन वेतन इससे अधिक होता है, जो श्रमिकों को भोजन, आवास और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतें पूरी करने में सक्षम बनाता है। मजदूरी संहिता, 2019 न्यूनतम वेतन तय करती है लेकिन जीवनयापन वेतन की गारंटी नहीं देती।

मजदूरी संहिता, 2019 के तहत कौन से कानून समेकित किए गए हैं?

मजदूरी संहिता, 2019 में मिनिमम वेजेस एक्ट, 1948; पेमेंट ऑफ वेजेस एक्ट, 1936; पेमेंट ऑफ बोनस एक्ट, 1965; और इक्वल रिम्यूनरेशन एक्ट, 1976 को समेकित किया गया है।

सेंट्रल एडवाइजरी बोर्ड ऑन मिनिमम वेजेस (CABMW) की भूमिका क्या है?

CABMW केंद्र और राज्य सरकारों को न्यूनतम वेतन निर्धारण और संशोधन पर सलाह देता है, लेकिन इसके पास प्रवर्तन का अधिकार नहीं होता। इसके सुझाव बाध्यकारी नहीं होते।

मजदूरी संहिता, 2019 के तहत प्रवर्तन कमजोर क्यों है?

प्रवर्तन कमजोर है क्योंकि बजट आवंटन कम है (2023-24 में 2,200 करोड़ रुपये), संस्थागत क्षमता सीमित है, और अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों के पास औपचारिक अनुबंध तथा कानूनी जागरूकता की कमी है।

ब्राजील की न्यूनतम वेतन नीति ने गरीबी पर क्या प्रभाव डाला?

ब्राजील का राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन, जो वार्षिक रूप से मुद्रास्फीति और उत्पादकता के अनुसार सूचकांकित होता है, ने 2004 से 2014 के बीच लगभग 1 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकाला, जिससे वेतन वृद्धि और मजबूत प्रवर्तन सुनिश्चित हुआ।

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