परिचय: भारत में खनन और सततता
भारत में खनन मुख्य रूप से Mines and Minerals (Development and Regulation) Act, 1957 (MMDR अधिनियम) के तहत संचालित होता है, जो 2023 में राष्ट्रीय GDP का लगभग 2.5% हिस्सा है (Ministry of Mines Annual Report 2023)। भारत कोयले के उत्पादन में विश्व में तीसरे स्थान पर है, 2023 में 716 मिलियन टन का उत्पादन हुआ (Coal India Ltd. Report 2023)। आर्थिक महत्व के बावजूद, खनन पर्यावरण के लिए गंभीर चुनौतियां लेकर आता है, जिससे सवाल उठता है: क्या खनन वास्तव में सतत हो सकता है? संविधान के अनुच्छेद 48-A के तहत राज्य को पर्यावरण की रक्षा और सुधार की जिम्मेदारी दी गई है, जबकि Environment Protection Act, 1986 और Forest Conservation Act, 1980 जैसे कानून खनन गतिविधियों पर पर्यावरणीय सुरक्षा के नियम लागू करते हैं।
UPSC प्रासंगिकता
- GS पेपर 3: पर्यावरण और पारिस्थितिकी – खनन और पर्यावरणीय सुरक्षा
- GS पेपर 3: आर्थिक विकास – खनिज क्षेत्र का योगदान और नियमन
- GS पेपर 1: भारतीय राजनीति – पर्यावरण पर संवैधानिक प्रावधान (अनुच्छेद 48-A)
- निबंध: आर्थिक विकास और पर्यावरणीय सततता के बीच संतुलन
सतत खनन के लिए कानूनी और संवैधानिक ढांचा
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 48-A पर्यावरण संरक्षण का आदेश देता है, जो खनन कार्यों पर भी लागू होता है। MMDR अधिनियम की धारा 9A और 15 में सतत खनन और पर्यावरणीय सुरक्षा के नियम निर्धारित हैं। Environment Protection Act, 1986 (धारा 3 और 5) पर्यावरणीय मानकों को नियंत्रित करता है, जबकि Forest Conservation Act, 1980 खनन के लिए वन भूमि के उपयोग पर रोक लगाता है। National Green Tribunal Act, 2010 के तहत NGT को खनन से जुड़े पर्यावरणीय विवादों का निपटारा करने का अधिकार मिला है। सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले जैसे T.N. Godavarman Thirumulpad बनाम भारत संघ (1996) ने खनन में सख्त पर्यावरणीय अनुपालन पर जोर दिया है।
- MMDR अधिनियम की धारा 9A वैज्ञानिक खदान बंद करने और प्रगतिशील पुनर्वास को अनिवार्य करती है।
- पर्यावरणीय मंजूरी के लिए MoEFCC के तहत EIA Notification, 2006 का पालन जरूरी है।
- वन भूमि के उपयोग के लिए Forest Conservation Act, 1980 के तहत पूर्व अनुमति आवश्यक है।
- NGT को खनन से जुड़े पर्यावरणीय मामलों में जुर्माना लगाने और सुधार निर्देशित करने का अधिकार है।
खनन का आर्थिक महत्व और पर्यावरणीय चुनौतियां
खनन का भारत की GDP में योगदान 2.5% (2023) है, और FY 2022-23 में खनिज निर्यात का मूल्य USD 13 बिलियन रहा (Indian Bureau of Mines)। यह क्षेत्र लगभग 12 लाख लोगों को रोजगार देता है (Ministry of Labour and Employment, 2023) और 2018-23 के बीच 5.5% की CAGR से बढ़ा है (Economic Survey 2024)। हालांकि, पर्यावरणीय लागतें भी बड़ी हैं: केवल 15% खनन पट्टों में वैज्ञानिक खदान बंद करने की योजना लागू है (IBM Annual Report 2023), और 70% परियोजनाएं पर्यावरण मंजूरी में देरी के कारण प्रभावित होती हैं (MoEFCC, 2023)। खनन में जल उपयोग औद्योगिक जल खपत का 3% है (Central Water Commission, 2023), जबकि परित्यक्त खदानें भूमि क्षरण और प्रदूषण का कारण बनती हैं।
- पुनर्वास और पुनर्स्थापन पर खर्च 2022-23 में 25% बढ़कर INR 1,500 करोड़ हुआ (Ministry of Mines)।
- खनन निगरानी में रिमोट सेंसिंग और GIS तकनीक का उपयोग 2018-2023 के बीच 40% बढ़ा (ISRO रिपोर्ट)।
- 2030 तक लिथियम, कोबाल्ट जैसे महत्वपूर्ण खनिजों की वैश्विक मांग 8% CAGR से बढ़ रही है (IEA रिपोर्ट), जो सतत निष्कर्षण पर दबाव बढ़ाती है।
भारत में सतत खनन के लिए प्रमुख संस्थान
Indian Bureau of Mines (IBM) खनन पट्टों का नियमन करता है और सतत खनन मानकों का पालन सुनिश्चित करता है। Ministry of Environment, Forest and Climate Change (MoEFCC) पर्यावरण मंजूरी प्रदान करता है। National Green Tribunal (NGT) खनन से जुड़े पर्यावरणीय विवादों का निपटारा करता है। Central Mine Planning and Design Institute (CMPDI) सतत खनन के लिए तकनीकी सहायता देता है। Coal India Limited (CIL) सतत खनन के अभ्यास लागू करता है। NITI Aayog सतत खनन विकास के लिए नीतिगत पहल करता है।
- IBM खदान बंद करने और पर्यावरणीय नियमों के अनुपालन की निगरानी करता है।
- MoEFCC पर्यावरण मंजूरी और वन भूमि उपयोग की अनुमति लागू करता है।
- NGT खनन-पर्यावरण विवादों के लिए न्यायिक मंच है।
- CMPDI वैज्ञानिक खनन और पुनर्वास तकनीकों पर सलाह देता है।
तुलनात्मक अध्ययन: भारत बनाम ऑस्ट्रेलिया सतत खनन में
| पैरामीटर | भारत | ऑस्ट्रेलिया |
|---|---|---|
| कानूनी ढांचा | MMDR अधिनियम, Environment Protection Act, Forest Conservation Act | Environmental Protection and Biodiversity Conservation Act, 1999 |
| खनदान बंद करने का क्रियान्वयन | 15% पट्टों में वैज्ञानिक बंद योजना (IBM 2023) | 90% खदानें पोस्ट-खनन भूमि उपयोग लक्ष्य प्राप्त करती हैं (Australian Govt. 2022) |
| वित्तीय आश्वासन तंत्र | अनिवार्य पुनर्वास बांड नहीं | अनिवार्य पुनर्वास बांड और वित्तीय गारंटी |
| समुदाय की भागीदारी | सीमित औपचारिक लाभ-साझाकरण मॉडल | संरचित समुदाय लाभ-साझाकरण और परामर्श |
| पर्यावरण मंजूरी में देरी | 70% परियोजनाएं मंजूरी में देरी के कारण प्रभावित | समेकित मूल्यांकन के साथ मंजूरी प्रक्रिया सुव्यवस्थित |
भारत में सतत खनन अभ्यास में प्रमुख कमियां
भारत में अनिवार्य वित्तीय आश्वासन तंत्र जैसे पुनर्वास बांड का अभाव है, जिससे परित्यक्त खदानें और पर्यावरणीय क्षरण होता है। खदान बंद करने की योजना का प्रवर्तन कमजोर है, केवल 15% अनुपालन होता है। पर्यावरण मंजूरी में देरी परियोजना की समयसीमा और लागत बढ़ाती है। समुदाय की भागीदारी और लाभ-साझाकरण मॉडल वैश्विक मानकों से पीछे हैं। जल उपयोग दक्षता और प्रदूषण नियंत्रण के लिए कड़ी निगरानी आवश्यक है।
- अनिवार्य वित्तीय गारंटी न होने से खनन के बाद भूमि पुनर्स्थापन कमजोर होता है।
- रिमोट सेंसिंग और GIS के अलावा उन्नत पर्यावरण निगरानी तकनीकों का सीमित उपयोग।
- स्थानीय समुदायों को निर्णय प्रक्रिया में पर्याप्त रूप से शामिल न करना।
आगे का रास्ता: खनन को सतत बनाना
भारत को अनिवार्य पुनर्वास बांड को संस्थागत बनाना चाहिए ताकि खनन के बाद भूमि पुनर्स्थापन के लिए वित्तीय जवाबदेही सुनिश्चित हो सके। IBM और MoEFCC के बीच समन्वय से वैज्ञानिक खदान बंद योजना का प्रवर्तन मजबूत करना जरूरी है। पर्यावरण मंजूरी प्रक्रिया को मानकों से समझौता किए बिना सरल बनाना परियोजनाओं में देरी कम करेगा। समुदाय लाभ-साझाकरण को बढ़ावा देने से सामाजिक स्वीकृति बढ़ेगी। रियल-टाइम प्रदूषण सेंसर और स्वचालित पुनर्वास जैसी नवीन तकनीकों को अपनाने से पर्यावरणीय अनुपालन बेहतर होगा।
- खनन पुनर्वास के लिए अनिवार्य वित्तीय आश्वासन कानून बनाएं।
- IBM, MoEFCC और NGT के बीच प्रवर्तन के लिए बेहतर समन्वय करें।
- सतत खनन तकनीक विकास के लिए सार्वजनिक-निजी साझेदारी प्रोत्साहित करें।
- खनन अनुमोदन प्रक्रिया में समुदाय की भागीदारी को मुख्य घटक बनाएं।
- MMDR अधिनियम की धारा 9A वैज्ञानिक खदान बंद करने और पुनर्वास को अनिवार्य करती है।
- MMDR अधिनियम ऑस्ट्रेलिया की तरह अनिवार्य पुनर्वास बांड प्रदान करता है।
- MMDR अधिनियम खनन परियोजनाओं के पर्यावरण मंजूरी का प्रावधान करता है।
- NGT की स्थापना National Green Tribunal Act, 2010 के तहत हुई।
- NGT खनन से जुड़े पर्यावरणीय उल्लंघनों के विवादों का निपटारा कर सकता है।
- NGT के पास MMDR अधिनियम के तहत खनन पट्टे प्रदान करने का अधिकार है।
मेन प्रश्न
भारत में खनन सतत हो सकता है या नहीं, इस पर आलोचनात्मक विश्लेषण करें। वर्तमान कानूनी ढांचा और संस्थागत तंत्र पर चर्चा करें, प्रमुख कमियों की पहचान करें और खनन प्रथाओं में सततता सुधारने के उपाय सुझाएं। (250 शब्द)
झारखंड और JPSC प्रासंगिकता
- JPSC पेपर: पेपर 3 – पर्यावरण और पारिस्थितिकी; पेपर 4 – आर्थिक विकास और संसाधन प्रबंधन
- झारखंड का पहलू: झारखंड खनिजों से समृद्ध राज्य है, जहां कोयला और लौह अयस्क खनन व्यापक है, जो भूमि क्षरण, विस्थापन और प्रदूषण जैसी चुनौतियों का सामना करता है।
- मेन पॉइंटर: राज्य-विशिष्ट खनन प्रभाव, नियामक प्रवर्तन की वर्तमान समस्याएं और सतत खनन में राज्य एजेंसियों की भूमिका को उजागर करते हुए उत्तर तैयार करें।
MMDR अधिनियम की धारा 9A का सतत खनन में क्या महत्व है?
धारा 9A वैज्ञानिक खदान बंद करने और पुनर्वास योजनाओं की तैयारी एवं क्रियान्वयन को अनिवार्य करती है, ताकि खनन के बाद mined भूमि की पुनर्स्थापना हो सके और पर्यावरणीय नुकसान कम हो।
Environment Protection Act, 1986 खनन गतिविधियों को कैसे नियंत्रित करता है?
यह अधिनियम केंद्र सरकार को पर्यावरणीय मानक तय करने और EIA Notification, 2006 के तहत पर्यावरण मंजूरी प्रदान करने का अधिकार देता है, जिससे खनन परियोजनाएं प्रदूषण नियंत्रण और पारिस्थितिक सुरक्षा मानकों का पालन करें।
भारत में अनिवार्य खनन पुनर्वास बांड का अभाव क्यों महत्वपूर्ण कमी है?
अनिवार्य पुनर्वास बांड न होने से खनन कंपनियों के पास mined भूमि पुनर्स्थापित करने के लिए वित्तीय प्रोत्साहन नहीं होता, जिसके कारण परित्यक्त खदानें और पर्यावरणीय क्षरण बढ़ता है, जबकि ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में यह व्यवस्था सुनिश्चित करती है कि खनन के बाद भूमि पुनः उपयोग योग्य बनी रहे।
खनन विवादों में National Green Tribunal की क्या भूमिका है?
NGT खनन से जुड़े पर्यावरणीय विवादों का निपटारा करता है, पर्यावरण कानूनों के अनुपालन को लागू करता है, सुधारात्मक आदेश जारी करता है और उल्लंघनों पर जुर्माना लगाकर पारिस्थितिक संतुलन की रक्षा करता है।
समुदाय की भागीदारी सतत खनन को कैसे प्रभावित करती है?
समुदाय की भागीदारी स्थानीय लोगों को खनन से लाभान्वित करती है, परामर्श और लाभ-साझाकरण के माध्यम से संघर्ष कम करती है और सामाजिक सततता को बढ़ावा देती है, जो भारत में वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं की तुलना में कम विकसित है।
आधिकारिक स्रोत और आगे पढ़ाई
लर्नप्रो संपादकीय मानकों के बारे में
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