सुप्रीम कोर्ट का अंधविश्वास प्रथाओं पर अधिकार क्षेत्र का दावा
साल 2024 में सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ ने अंधविश्वास से जुड़ी प्रथाओं पर फैसला सुनाने का अपना अधिकार संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत जताया, जो कोर्ट को पूर्ण न्याय के लिए आवश्यक कोई भी आदेश देने का अधिकार देता है। इसके विपरीत केंद्र ने इस न्यायिक सक्रियता से असहमति जताई और कहा कि ऐसे सामाजिक व्यवहारों को नियंत्रित करना विधायी और कार्यकारी शाखाओं का काम है, जो भारतीय दंड संहिता (IPC) और राज्यों के अलग-अलग अंधविश्वास विरोधी कानूनों के तहत आता है। यह न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच संवैधानिक तनाव को दर्शाता है, जहां सुप्रीम कोर्ट के व्यापक सुधारात्मक अधिकार केंद्र की कानून बनाने और लागू करने की प्राथमिकता से टकराते हैं।
UPSC प्रासंगिकता
- GS पेपर 2: शक्तियों का पृथक्करण, न्यायिक सक्रियता, मूल अधिकार
- GS पेपर 1: सामाजिक सुधार और सांस्कृतिक प्रथाएं
- निबंध: भारत में न्यायपालिका और सामाजिक बदलाव
अंधविश्वास प्रथाओं पर संवैधानिक और कानूनी ढांचा
सुप्रीम कोर्ट को अनुच्छेद 142 के तहत पूर्ण न्याय के लिए आवश्यक आदेश जारी करने का अधिकार है, भले ही उस क्षेत्र में स्पष्ट कानून न हो। हालांकि, अंधविश्वास से जुड़ी प्रथाओं का नियंत्रण मुख्यतः आपराधिक कानून जैसे IPC की धारा 295A (धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाले जानबूझकर किए गए कृत्य) और राज्यों के अलग-अलग कानूनों जैसे कर्नाटक प्राणघातक काले जादू और अमानवीय कुप्रथाओं के उन्मूलन अधिनियम, 2017 के अंतर्गत आता है। केंद्र का विधि मंत्रालय (MoLJ) कानून बनाने की जिम्मेदारी संभालता है, लेकिन अंधविश्वास पर कोई एकीकृत केंद्रीय कानून नहीं है, जिससे राज्य स्तर के अलग-अलग कानूनों पर निर्भरता बनी हुई है।
- अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है, जिसे अदालतों ने हानिकारक अंधविश्वास प्रथाओं से सुरक्षा के रूप में भी व्याख्यायित किया है।
- सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66A (जो अब निरस्त हो चुकी है) का इस्तेमाल ऑनलाइन अंधविश्वास प्रचार को रोकने के लिए किया जाता था।
- राज्य स्तर के अंधविश्वास विरोधी कानून परिभाषा, प्रवर्तन और दंड में भिन्नता रखते हैं, जिससे न्यायिक निर्णय असंगत होते हैं।
- सुप्रीम कोर्ट का 2003 का फैसला State of Maharashtra v. Praful B. Desai सामाजिक सुधार में न्यायिक सक्रियता का समर्थन करता है, जो 2024 की पीठ के हस्तक्षेप का आधार बना।
भारत में अंधविश्वास की आर्थिक पहलू
अंधविश्वास से जुड़ी प्रथाएं भारत में एक बड़ी अनौपचारिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा हैं, जिसका वार्षिक मूल्यांकन FICCI 2023 रिपोर्ट के अनुसार ₹15,000 करोड़ है। यह क्षेत्र 8% की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर से बढ़ रहा है, जो स्वास्थ्य सेवा और सामाजिक कल्याण जैसे औपचारिक क्षेत्रों से संसाधन हड़पता है और हानिकारक प्रथाओं को बढ़ावा देता है। सरकार ने AYUSH मंत्रालय के तहत 2023-24 के केंद्रीय बजट में ऐसे प्रथाओं के खिलाफ जागरूकता अभियानों के लिए ₹50 करोड़ आवंटित किए हैं।
- अनौपचारिक अंधविश्वास आधारित सेवाओं में अनुष्ठान, काला जादू और विश्वास आधारित उपचार शामिल हैं।
- सरकारी खर्च इस क्षेत्र की आर्थिक मात्रा के मुकाबले कम है।
- अंधविश्वास से जुड़ी आर्थिक गतिविधियां अक्सर नियंत्रण से बाहर रहती हैं, जिससे नीति निर्माण में बाधाएं आती हैं।
संस्थागत भूमिकाएं और प्रवर्तन की चुनौतियां
सुप्रीम कोर्ट संवैधानिक और मूल अधिकारों के मामलों में अंतिम न्यायाधीश की भूमिका निभाता है, जिसमें सामाजिक प्रथाएं भी शामिल हैं। विधि मंत्रालय संबंधित कानून बनाता है, जबकि AYUSH मंत्रालय पारंपरिक चिकित्सा को बढ़ावा देने और हानिकारक अंधविश्वास के खिलाफ जागरूकता फैलाने का काम करता है। राज्य सरकारें अंधविश्वास विरोधी कानून बनाती और लागू करती हैं, जैसे कर्नाटक का 2017 का अधिनियम। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) अंधविश्वास से जुड़ी कुप्रथाओं जैसे चुड़ैल शिकार की घटनाओं की निगरानी करता है।
- राज्यों में प्रवर्तन में भिन्नता है; कर्नाटक में 2017 से 2023 तक 350 से अधिक दोषसिद्धि हुई है।
- NCRB 2022 के आंकड़े के मुताबिक देशभर में 1,200 से अधिक अंधविश्वास संबंधी मामले दर्ज हैं, जो सामाजिक चुनौतियों को दर्शाते हैं।
- विभिन्न कानून और प्रवर्तन की कमी मूल अधिकारों की समान सुरक्षा में बाधा बनती है।
तुलनात्मक विश्लेषण: भारत और यूनाइटेड किंगडम
| मामला | भारत | यूनाइटेड किंगडम |
|---|---|---|
| कानूनी ढांचा | राज्यों के अलग-अलग कानून; कोई केंद्रीय अंधविश्वास विरोधी कानून नहीं | विचक्राफ्ट एक्ट 1735 निरस्त; फ्रॉड एक्ट 2006 लागू |
| न्यायिक दृष्टिकोण | सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत अधिकार जताया; न्यायिक सक्रियता जारी | धारणा नहीं, धोखाधड़ी पर ध्यान; न्यायिक संयम |
| प्रवर्तन | राज्य स्तर पर भिन्न प्रवर्तन; कर्नाटक में 2017-2023 तक 350 दोषसिद्धियां | पिछले 5 वर्षों में अंधविश्वास से जुड़ी धोखाधड़ी में 40% कमी (UK गृह कार्यालय 2022) |
| नीति फोकस | मूल अधिकार और सामाजिक सुधार के बीच संतुलन; केंद्र-राज्य टकराव | उपभोक्ता संरक्षण और धोखाधड़ी रोकथाम पर जोर |
नीति अंतर: एकीकृत केंद्रीय कानून की कमी
अंधविश्वास पर एक समग्र केंद्रीय कानून के अभाव में राज्यों के बीच परिभाषा, प्रवर्तन मानक और न्यायिक व्याख्या में असंगति बनी रहती है। यह विखंडन सुप्रीम कोर्ट के समान न्याय प्रदान करने के प्रयासों को जटिल बनाता है और समन्वित सामाजिक सुधार में बाधा डालता है। केंद्र की इस संवेदनशील सामाजिक मुद्दे पर कानून बनाने से हिचकिचाहट ने राज्यों को अलग-अलग कदम उठाने पर मजबूर किया है, जिससे कानूनी अस्थिरता और प्रवर्तन की चुनौतियां बढ़ी हैं।
- राज्यों के भिन्न कानून अधिकार क्षेत्र और प्रवर्तन में उलझन पैदा करते हैं।
- न्यायिक सक्रियता विधायी कमी को पूरा करने की कोशिश करती है, लेकिन कार्यपालिका से विरोध का सामना करती है।
- स्पष्ट केंद्रीय नीति की कमी संसाधन आवंटन और राष्ट्रीय जागरूकता अभियानों को सीमित करती है।
महत्व और आगे का रास्ता
- अंधविश्वास से हानिकारक प्रथाओं से मूल अधिकारों की रक्षा में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका को अनुच्छेद 142 के तहत स्वीकार करें, साथ ही विधायी क्षेत्र की इज्जत करें।
- एक समान केंद्रीय कानून बनाएं जो हानिकारक अंधविश्वास प्रथाओं को परिभाषित और दंडित करे, जो मौजूदा राज्य कानूनों के साथ मेल खाता हो।
- केंद्र और राज्यों के बीच प्रवर्तन और जागरूकता के लिए समन्वय बढ़ाएं, AYUSH मंत्रालय की पहुंच का उपयोग करें।
- अंधविश्वास से जुड़ी अपराध और आर्थिक प्रभाव की निगरानी के लिए डेटा-आधारित रणनीतियों को अपनाएं ताकि लक्षित हस्तक्षेप संभव हो।
- न्यायिक संयम को प्रोत्साहित करें ताकि अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण न हो, और स्पष्ट कानूनी ढांचे के तहत कमजोर वर्गों की सुरक्षा सुनिश्चित हो।
- अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट को पूर्ण न्याय के लिए आवश्यक कोई भी आदेश जारी करने का अधिकार देता है, जिसमें सामाजिक प्रथाएं भी शामिल हैं।
- IPC की धारा 295A भारतीय कानून के तहत सभी अंधविश्वासों को अपराध मानती है।
- कर्नाटक प्राणघातक काले जादू और अमानवीय कुप्रथाओं के उन्मूलन अधिनियम, 2017 एक केंद्रीय कानून है जो पूरे देश में लागू होता है।
इनमें से कौन-सा/से कथन सही हैं?
- भारत में अंधविश्वास आधारित अनौपचारिक अर्थव्यवस्था का वार्षिक मूल्यांकन ₹15,000 करोड़ है।
- केंद्र सरकार ने बजट 2023-24 में AYUSH मंत्रालय के लिए अंधविश्वास विरोधी अभियानों के लिए ₹500 करोड़ आवंटित किए।
- राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो ने 2022 में 1,200 से अधिक अंधविश्वास संबंधित मामले दर्ज किए।
इनमें से कौन-सा/से कथन सही हैं?
मुख्य प्रश्न
सुप्रीम कोर्ट के अनुच्छेद 142 के तहत अधिकार क्षेत्र के दावे और केंद्र की असहमति के संदर्भ में भारत में अंधविश्वास प्रथाओं के नियमन में संवैधानिक और विधायी चुनौतियों पर चर्चा करें। इन चुनौतियों को मूल अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करने के लिए कैसे हल किया जा सकता है?
झारखंड और JPSC प्रासंगिकता
- JPSC पेपर: पेपर 2 (राजनीति और शासन) – न्यायिक सक्रियता और विधायी क्षेत्राधिकार
- झारखंड परिप्रेक्ष्य: आदिवासी जिलों में चुड़ैल शिकार और अंधविश्वास से जुड़ी हिंसा की घटनाएं स्थानीय प्रवर्तन चुनौतियों को दर्शाती हैं।
- मुख्य बिंदु: संवैधानिक प्रावधानों को राज्य स्तर की वास्तविकताओं से जोड़कर उत्तर तैयार करें, जिसमें समान कानूनों और न्यायिक-कार्यकारी समन्वय की आवश्यकता पर जोर हो।
अंधविश्वास प्रथाओं के संबंध में अनुच्छेद 142 का दायरा क्या है?
अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट को पूर्ण न्याय के लिए आवश्यक कोई भी आदेश देने का अधिकार देता है, जिसमें हानिकारक अंधविश्वास प्रथाओं जैसे सामाजिक मामलों में हस्तक्षेप भी शामिल है, जब विधायी उपाय अपर्याप्त हों।
क्या IPC की धारा 295A अंधविश्वास को अपराध मानती है?
नहीं, धारा 295A धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर आहत करने वाले कृत्यों को अपराध मानती है, न कि अंधविश्वास को।
भारत में अंधविश्वास पर एकीकृत केंद्रीय कानून क्यों नहीं है?
केंद्र ने सामाजिक और धार्मिक संवेदनशीलता के कारण अंधविश्वास पर कानून बनाने से बचा है, जिससे राज्य अलग-अलग कानून बनाते रहे हैं और इससे विखंडन पैदा हुआ है।
भारत में अंधविश्वास का आर्थिक प्रभाव क्या है?
अंधविश्वास से जुड़ी अनौपचारिक अर्थव्यवस्था का वार्षिक मूल्यांकन ₹15,000 करोड़ है, जो 8% की दर से बढ़ रही है और औपचारिक क्षेत्रों जैसे स्वास्थ्य सेवा से संसाधन हड़पती है।
यूनाइटेड किंगडम अंधविश्वास नियंत्रण में भारत से कैसे अलग है?
यूके ने Witchcraft Act 1735 को निरस्त कर Fraud Act 2006 लागू किया, जो विश्वासों के बजाय धोखाधड़ी पर फोकस करता है, जिससे अंधविश्वास से जुड़ी धोखाधड़ी के मामले कम हुए हैं।
आधिकारिक स्रोत और आगे पढ़ाई
लर्नप्रो संपादकीय मानकों के बारे में
लर्नप्रो की संपादकीय सामग्री सिविल सेवा तैयारी में अनुभवी विषय विशेषज्ञों द्वारा शोधित और समीक्षित है। हमारे लेख सरकारी स्रोतों, NCERT पाठ्यपुस्तकों, मानक संदर्भ सामग्री और प्रतिष्ठित प्रकाशनों जैसे द हिंदू, इंडियन एक्सप्रेस और PIB से लिए गए हैं।
सामग्री को नवीनतम पाठ्यक्रम परिवर्तनों, परीक्षा पैटर्न और वर्तमान घटनाक्रमों के अनुसार नियमित रूप से अपडेट किया जाता है। सुधार या प्रतिक्रिया के लिए admin@learnpro.in पर संपर्क करें।
