परिचय: चुनाव आयोग की नियुक्तियों पर संसदीय निष्क्रियता को लेकर न्यायिक आलोचना
सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने मई 2026 में संसद की चुनाव आयोग की नियुक्तियों के लिए पारदर्शी और विधिक प्रक्रिया न बनाने पर तीखी आलोचना की। इस फैसले में कोर्ट ने इस देरी को ‘‘चुने हुए लोगों का तानाशाही’’ बताया, जो लोकतंत्र में एक बड़ा अभाव है और कार्यपालिका के अधिकार विस्तार से चुनाव आयोग की संवैधानिक स्वतंत्रता खतरे में पड़ सकती है। यह टिप्पणी 2022 के अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ के फैसले के बाद आई है, जिसमें कोर्ट ने आयोग की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए कॉलेजियम आधारित नियुक्ति प्रक्रिया की सिफारिश की थी। आर्टिकल 324 के तहत चुनाव आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी और नियुक्ति प्रक्रिया में विधिक व्यवस्था न होने का मुद्दा भारत के चुनावी निष्पक्षता के लिए बेहद अहम है।
UPSC प्रासंगिकता
- GS पेपर 2: भारतीय संविधान—आर्टिकल 324, चुनाव आयोग, न्यायिक समीक्षा
- GS पेपर 2: शासन—संस्थागत स्वतंत्रता, संसदीय कानून
- निबंध: लोकतांत्रिक संस्थान और चुनाव सुधार
आर्टिकल 324 के तहत संवैधानिक ढांचा और नियुक्ति प्रक्रिया
आर्टिकल 324 के तहत चुनाव आयोग की स्थापना हुई है, जिसे संसद, राज्य विधानसभाओं और राष्ट्रपति तथा उपराष्ट्रपति के चुनावों की देखरेख, निर्देशन और नियंत्रण का अधिकार दिया गया है। आयोग शुरू में एक सदस्यीय था, लेकिन 1993 के बाद से इसमें एक मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और दो चुनाव आयुक्त (ECs) शामिल हैं। राष्ट्रपति CEC और ECs को नियुक्त करते हैं, और आर्टिकल 324(2) के अनुसार नियुक्तियां संसद द्वारा बनाए गए कानून के अधीन होती हैं। लेकिन संसद ने अब तक नियुक्ति प्रक्रिया पर कोई विशेष कानून नहीं बनाया है, जिससे यह पूरी तरह कार्यपालिका के विवेक पर छोड़ दी गई है।
- अन्य संवैधानिक पदों (जैसे CAG, UPSC) की तरह नियुक्ति के लिए कोई विधिक प्रक्रिया न होना एक बड़ा अंतर है।
- सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार पारदर्शी और द्विदलीय प्रक्रिया की जरूरत पर जोर दिया है ताकि कार्यपालिका का दुरुपयोग रोका जा सके।
- चुनाव आयोग के कार्यों में मतदाता सूची तैयार करना, चुनाव का समय तय करना और स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करना शामिल है।
न्यायिक निर्णय: अनूप बरनवाल फैसला और मई 2026 के अवलोकन
अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (2022) के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने CEC और ECs की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम प्रणाली की सिफारिश की। इस कॉलेजियम में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और मुख्य न्यायाधीश शामिल होंगे, जिससे द्विदलीय सहमति और न्यायिक निगरानी सुनिश्चित हो सके। कोर्ट ने कहा कि इससे आयोग की स्वतंत्रता और जनता का विश्वास बढ़ेगा।
इन निर्देशों के बावजूद संसद ने इस सिफारिश को कानून में नहीं बदला। मई 2026 में कोर्ट ने इस संसदीय निष्क्रियता को ‘‘चुने हुए लोगों की तानाशाही’’ बताते हुए कड़ी निंदा की और कहा कि इससे सत्ता का केंद्रीकरण और कार्यपालिका का प्रभाव बढ़कर स्वतंत्र चुनाव आयोग खतरे में पड़ सकता है।
- कोर्ट ने सवाल उठाया कि क्या संसद ने अनूप बरनवाल फैसले पर पर्याप्त चर्चा की या उसकी भावना को कानून में शामिल किया।
- यह भी रेखांकित किया कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया बनाए रखने के लिए संवैधानिक संतुलन आवश्यक है।
आर्थिक पहलू: बजट और संस्थागत देरी के अप्रत्यक्ष खर्च
चुनाव आयोग का बजट केंद्र सरकार के बजट का छोटा हिस्सा है, लेकिन 2023-24 में यह लगभग ₹1,200 करोड़ था (चुनाव आयोग वार्षिक रिपोर्ट 2023)। यह राशि 2024 के 900 मिलियन से अधिक पंजीकृत मतदाताओं के चुनावी कार्यों में खर्च होती है, जिसमें लॉजिस्टिक्स, तकनीक और कर्मचारियों का खर्च शामिल है।
- नियुक्ति प्रक्रिया में देरी चुनावी निष्पक्षता को कमजोर कर सकती है, जिससे शासन की गुणवत्ता और निवेशकों का भरोसा प्रभावित होता है।
- चुनावी अनिश्चितता या पक्षपात की धारणा से आर्थिक वातावरण अस्थिर हो सकता है, जो अप्रत्यक्ष आर्थिक लागत बढ़ाता है।
- इसलिए चुनाव आयोग की स्वतंत्रता संवैधानिक ही नहीं, आर्थिक स्थिरता और विकास के लिए भी जरूरी है।
संस्थागत भूमिका: चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट, संसद और विधि मंत्रालय
चुनाव आयोग ऑफ इंडिया को संविधान के तहत स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने का दायित्व दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट संवैधानिक व्याख्या के माध्यम से आयोग की स्वतंत्रता की रक्षा करता है। संसद के पास आर्टिकल 324(2) के तहत नियुक्तियों के लिए कानून बनाने का अधिकार है। विधि और न्याय मंत्रालय चुनावी कानूनों के मसौदे तैयार करता है, लेकिन चुनाव आयोग की नियुक्तियों पर अब तक कोई कानून संसद में नहीं पहुंचा पाया है।
- कार्यपालिका की नियुक्ति शक्ति और संसदीय सुरक्षा के बीच संतुलन अभी तक नहीं बना है।
- न्यायपालिका की सक्रिय भूमिका के मुकाबले संसद की निष्क्रियता अलगाव शक्तियों के सिद्धांत पर सवाल उठाती है।
- संस्थागत समन्वय आवश्यक है ताकि चुनाव आयोग की संवैधानिक भूमिका मजबूत बनी रहे।
तुलनात्मक अध्ययन: भारत बनाम यूनाइटेड किंगडम की नियुक्ति प्रक्रिया
| पहलू | भारत | यूनाइटेड किंगडम |
|---|---|---|
| नियुक्ति प्राधिकारी | राष्ट्रपति (कार्यपालिका), कोई विधिक प्रक्रिया नहीं | स्वतंत्र, द्विदलीय संसदीय समिति |
| पारदर्शिता | अस्पष्ट, कार्यपालिका के विवेक पर | पारदर्शी, द्विदलीय सहमति |
| जनता का भरोसा (2023 सर्वे) | लगभग 55% (लोकनिति-CSDS) | लगभग 75% (UK चुनाव आयोग सर्वे) |
| विधिक ढांचा | नियुक्तियों पर कोई विशेष कानून नहीं | संसदीय कानून द्वारा स्थापित |
यूनाइटेड किंगडम का मॉडल दिखाता है कि विधिक, द्विदलीय नियुक्ति प्रक्रिया से सार्वजनिक विश्वास और संस्थागत स्वतंत्रता कैसे बढ़ती है। भारत में विधिक व्यवस्था के अभाव से कार्यपालिका के प्रभाव की संभावना बढ़ जाती है।
महत्वपूर्ण कमी: द्विदलीय नियुक्ति प्रक्रिया का अभाव
पारदर्शी और कॉलेजियम आधारित नियुक्ति प्रक्रिया न बन पाने से चुनाव आयोग कार्यपालिका के दखल के लिए संवेदनशील हो गया है। इससे आयोग की स्वतंत्रता कमजोर होती है और उसकी निष्पक्षता पर असर पड़ता है। जब नियुक्तियों में द्विदलीय सहमति नहीं होती, तो चुनावी निष्पक्षता और जनता का भरोसा खतरे में पड़ जाता है।
आगे का रास्ता: संस्थागत कमजोरियों को दूर करने के ठोस कदम
- संसद को सुप्रीम कोर्ट की सिफारिश के अनुसार कॉलेजियम आधारित नियुक्ति व्यवस्था कानून बनानी चाहिए।
- नियुक्ति प्रक्रिया में विपक्ष और न्यायपालिका के प्रतिनिधियों को शामिल कर द्विदलीय सहमति सुनिश्चित करनी चाहिए।
- आयोग की स्वतंत्रता बनाए रखने और बदलती चुनावी चुनौतियों के अनुरूप समीक्षा तंत्र स्थापित करना चाहिए।
- बजट की स्वतंत्रता बढ़ाकर चुनाव आयोग को कार्यपालिका के वित्तीय नियंत्रण से मुक्त करना चाहिए।
प्रैक्टिस प्रश्न
- आर्टिकल 324 के तहत राष्ट्रपति मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करते हैं।
- अनूप बरनवाल फैसले में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और मुख्य न्यायाधीश के शामिल कॉलेजियम प्रणाली की सिफारिश की गई थी।
- प्रतिनिधित्व कानून, 1951 चुनाव आयोग की नियुक्तियों पर विस्तृत प्रावधान देता है।
इनमें से कौन-से कथन सही हैं?
- कोर्ट ने संसद की कानून न बनाने की स्थिति को ‘‘चुने हुए लोगों की तानाशाही’’ कहा।
- कोर्ट ने कहा कि कार्यपालिका को चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में कोई रोक-टोक नहीं है।
- कोर्ट ने संसद में अनूप बरनवाल फैसले पर चर्चा की कमी पर सवाल उठाया।
इनमें से कौन-से कथन सही हैं?
मेन्स प्रश्न
भारत के चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया के लिए विधिक व्यवस्था न होने से उत्पन्न संवैधानिक और संस्थागत चुनौतियों पर चर्चा करें। इन चुनौतियों से निपटने में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका का मूल्यांकन करें और आयोग की स्वतंत्रता मजबूत करने के लिए सुधार सुझाएं। (250 शब्द)
झारखंड एवं JPSC की प्रासंगिकता
- JPSC पेपर: पेपर 2 – भारतीय राजनीति और शासन
- झारखंड का दृष्टिकोण: झारखंड में चुनावी प्रक्रिया चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर निर्भर है; स्थानीय राजनीतिक स्थितियां पारदर्शी नियुक्ति की जरूरत को बढ़ाती हैं।
- मेन्स पॉइंटर: आयोग की स्वतंत्रता का राज्य चुनावों पर प्रभाव, न्यायिक हस्तक्षेप और विधायी सुधारों की आवश्यकता पर उत्तर तैयार करें।
चुनाव आयोग के संबंध में भारतीय संविधान का आर्टिकल 324 क्या प्रावधान करता है?
आर्टिकल 324 चुनाव आयोग की स्थापना करता है और इसे संसद, राज्य विधानसभाओं, तथा राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति के चुनावों की देखरेख, निर्देशन और नियंत्रण का अधिकार देता है। यह राष्ट्रपति को मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति का अधिकार देता है, जो संसद द्वारा बनाए गए कानून के अधीन होती है।
अनूप बरनवाल फैसले (2022) में चुनाव आयोग की नियुक्ति के संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने क्या सिफारिश की थी?
सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और मुख्य न्यायाधीश का कॉलेजियम बनाने की सिफारिश की, जिससे पारदर्शिता और द्विदलीय सहमति सुनिश्चित हो सके।
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की नियुक्तियों पर संसद की निष्क्रियता को ‘‘चुने हुए लोगों की तानाशाही’’ क्यों कहा?
कोर्ट ने यह शब्द संसद की लंबी निष्क्रियता और न्यायिक सिफारिशों के बावजूद कानून न बनाने की स्थिति की आलोचना के लिए इस्तेमाल किया, जिससे सत्ता का केंद्रीकरण और कार्यपालिका का स्वतंत्र संवैधानिक संस्था पर प्रभाव बढ़ने का खतरा पैदा होता है।
भारत की तुलना में यूके का चुनाव आयोग नियुक्ति प्रक्रिया कैसे अलग है?
यूके में चुनाव आयोग के सदस्यों की नियुक्ति एक स्वतंत्र, द्विदलीय संसदीय समिति द्वारा की जाती है, जो पारदर्शिता और द्विदलीय सहमति सुनिश्चित करती है, जबकि भारत में राष्ट्रपति द्वारा बिना किसी विधिक पारदर्शी प्रक्रिया के नियुक्ति होती है।
चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया सुधार में देरी के आर्थिक प्रभाव क्या हैं?
इस देरी से चुनावी निष्पक्षता कमजोर होती है, जिससे शासन की गुणवत्ता और निवेशकों का भरोसा गिरता है, जो अप्रत्यक्ष आर्थिक लागत बढ़ाता है और आर्थिक विकास के लिए जरूरी नीति स्थिरता को प्रभावित करता है।
आधिकारिक स्रोत एवं आगे पढ़ाई
लर्नप्रो संपादकीय मानकों के बारे में
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