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परिचय: सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के स्थायी कमीशन के अधिकार की पुष्टि की

साल 2020 में, सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने बाबिता पुनिया एवं अन्य बनाम भारत संघ एवं अन्य के मामले में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। इस फैसले में भारतीय सशस्त्र बलों में महिलाओं को स्थायी कमीशन (PC) देने और उनके कैरियर में समान अवसर सुनिश्चित करने का अधिकार दिया गया। इससे पहले महिलाओं को केवल शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) के तहत नियुक्त किया जाता था, जिसकी अवधि सीमित होती थी और पेंशन का लाभ नहीं मिलता था। सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का हवाला देते हुए राज्य की जिम्मेदारी बताई कि वह सार्वजनिक सेवाओं में लैंगिक भेदभाव के बिना रोजगार के अवसर प्रदान करे, जिसमें सेना भी शामिल है।

UPSC प्रासंगिकता

  • GS पेपर 1: समाज – लैंगिक समानता और संवैधानिक अधिकार
  • GS पेपर 3: सुरक्षा – रक्षा बल, सशस्त्र बलों में लैंगिक समावेशन
  • निबंध: भारत में लैंगिक समानता और संस्थागत सुधार

सशस्त्र बलों में महिलाओं के कमीशन से जुड़ा कानूनी ढांचा

महिलाओं के कमीशन से जुड़े मुख्य कानूनी प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 16 (सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर) हैं, जो लैंगिक भेदभाव को रोकते हैं। आर्मी रूल्स, 1954 (रूल 13) के तहत स्थायी कमीशन दिया जाता है, लेकिन इसे लंबे समय तक लैंगिक भेदभाव के साथ लागू किया गया। रक्षा मंत्रालय (MOD) की अधिसूचनाओं में महिलाओं की भर्ती नीतियां निर्धारित होती हैं, जो अब तक महिलाओं को SSC तक सीमित रखती थीं, जिसमें सेवा अवधि 10-14 वर्ष थी और पेंशन का अधिकार नहीं था।

  • स्थायी कमीशन (PC): सेवानिवृत्ति उम्र तक पूर्ण कैरियर सेवा, पेंशन और सेवा के बाद लाभ के साथ।
  • शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC): 10-14 वर्षों की निश्चित सेवा अवधि, बिना पेंशन के; अधिकांश महिलाएं इसी के तहत भर्ती होती थीं।
  • बाबिता पुनिया फैसले (2020): सभी गैर-लड़ाकू पदों में महिलाओं को PC और कमांड पद देने का आदेश, अस्वीकृति को असंवैधानिक घोषित किया।

कार्यान्वयन की स्थिति और संस्थागत चुनौतियां

न्यायालय के निर्देशों के बावजूद, कार्यान्वयन आंशिक ही रहा है। रक्षा मंत्रालय की आंतरिक समीक्षा (2023) के अनुसार, केवल लगभग 15% पात्र महिलाओं को ही PC दिया गया है। मूल्यांकन मानदंड, प्रशिक्षण कार्यक्रम और पदोन्नति बोर्ड में अभी भी लैंगिक पूर्वाग्रह मौजूद हैं। महिलाओं को कम करियर अवसर और कमांड की कमी के कारण पुरुषों की तुलना में लगभग 30% अधिक सेवा त्याग करनी पड़ती है, जो कोर्ट के आदेशों के विपरीत है।

  • भारतीय सेना में महिला अधिकारियों का हिस्सा लगभग 3.5% है (MOD वार्षिक रिपोर्ट, 2023)।
  • महिलाओं को लड़ाकू इकाइयों के कमांड से ऐतिहासिक रूप से बाहर रखा गया है; सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद इस नीति की समीक्षा हो रही है।
  • SSC महिला अधिकारियों की सेवा त्याग दर पुरुषों की तुलना में अधिक है, जिसका कारण कैरियर की सीमित संभावनाएं हैं।

महिलाओं को स्थायी कमीशन देने के आर्थिक पहलू

महिलाओं को PC देने से मानव संसाधन में 10-15% तक वृद्धि होती है, जिससे संचालन क्षमता बढ़ती है (MOD डेटा, 2023)। हालांकि, सेवा अवधि बढ़ने के कारण पेंशन व्यय में ₹200-300 करोड़ सालाना की वृद्धि हो सकती है (रक्षा बजट 2024-25 विश्लेषण)। बेहतर लैंगिक विविधता से संचालन दक्षता में सुधार और सेवा त्याग की लागत में कमी होती है, जो लंबे समय में अतिरिक्त खर्च को संतुलित कर सकती है।

  • मानव संसाधन वृद्धि से बल की तत्परता और लचीलापन बढ़ता है।
  • पेंशन लागत में वृद्धि अल्पकालिक वित्तीय चुनौती है, लेकिन कम सेवा त्याग से भर्ती और प्रशिक्षण लागत घटती है।
  • विविधता निर्णय लेने और इकाई के सामंजस्य को बेहतर बनाती है, जिससे रक्षा व्यय की प्रभावशीलता बढ़ती है।

तुलनात्मक अध्ययन: भारत बनाम यूनाइटेड किंगडम में महिलाओं की भूमिका

पहलू भारत यूनाइटेड किंगडम
स्थायी कमीशन और लड़ाकू भूमिका की शुरुआत 2020 (गैर-लड़ाकू पदों में PC अनिवार्य; लड़ाकू पद अभी प्रतिबंधित) 2016 (सभी सेवाओं में महिलाओं को PC और लड़ाकू भूमिका मिली)
महिला अधिकारियों का कुल प्रतिशत (2023) 3.5% 11%
कमांड अवसर सीमित; विस्तार के लिए न्यायिक समीक्षा चल रही है सभी इकाइयों में पूर्ण कमांड अधिकार
सेवा त्याग दर (महिला अधिकारी) पुरुषों से लगभग 30% अधिक, सीमित कैरियर के कारण पुरुषों के बराबर, समान कैरियर मार्ग के कारण
संचालन प्रभावशीलता पर प्रभाव सकारात्मक लेकिन संरचनात्मक बाधाओं से सीमित इकाई सामंजस्य और प्रभावशीलता में सुधार दर्ज

प्रमुख संस्थान और उनकी भूमिका

  • सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया: संवैधानिक समानता और लैंगिक अधिकारों को लागू करने वाली न्यायिक संस्था।
  • रक्षा मंत्रालय (MOD): महिलाओं की भर्ती और कैरियर विकास के लिए नीतियां बनाना और उनका क्रियान्वयन।
  • सशस्त्र बल मुख्यालय: संचालन कमांड और कर्मियों का प्रबंधन, महिलाओं के समावेशन के लिए जिम्मेदार।
  • महिलाएं रक्षा सेवा समिति: लैंगिक समावेशन सुधारों के लिए सलाहकार संस्था।

महत्त्व और आगे का रास्ता

  • सुप्रीम कोर्ट का फैसला सैन्य कैरियर में लैंगिक समानता के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी मील का पत्थर है।
  • पूर्ण क्रियान्वयन के लिए मूल्यांकन, प्रशिक्षण और पदोन्नति प्रक्रियाओं में संस्थागत सुधार जरूरी हैं ताकि लैंगिक पूर्वाग्रह खत्म हो सके।
  • महिलाओं को स्थायी कमीशन देने से बल की ताकत और संचालन विविधता बढ़ेगी, जिससे भारत वैश्विक स्तर पर बेहतर समता स्थापित करेगा।
  • नीति में महिलाओं के लिए कमांड पदों को सुनिश्चित करना आवश्यक है, जिससे सेवा त्याग कम होगा और मनोबल बढ़ेगा।
  • सतत समावेशन के लिए समय-समय पर निगरानी और लैंगिक संवेदनशीलता प्रशिक्षण जरूरी है।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
भारतीय सशस्त्र बलों में महिलाओं के लिए स्थायी कमीशन (PC) और शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. SSC की अवधि 10-14 वर्ष तक सीमित होती है और इसमें पेंशन लाभ नहीं मिलता।
  2. PC सेवा की पूरी अवधि तक होता है, जिसमें पेंशन और सेवा के बाद लाभ शामिल हैं।
  3. सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के लिए लड़ाकू पदों में भी PC अनिवार्य किया है।
  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2 और 3
  • cकेवल 1 और 3
  • d1, 2 और 3 सभी
उत्तर: (a)
कथन 3 गलत है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने केवल गैर-लड़ाकू पदों में महिलाओं को PC और कमांड पद देने का आदेश दिया है; लड़ाकू पद अभी प्रतिबंधित हैं।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के संदर्भ में महिलाओं के सशस्त्र बलों में शामिल होने पर निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता और समान सुरक्षा का अधिकार देता है।
  2. अनुच्छेद 16 केवल धर्म के आधार पर सार्वजनिक रोजगार में भेदभाव को रोकता है।
  3. सुप्रीम कोर्ट ने इन अनुच्छेदों का उपयोग महिलाओं के स्थायी कमीशन के अधिकार को मान्यता देने के लिए किया है।
  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2 और 3
  • cकेवल 1 और 3
  • d1, 2 और 3 सभी
उत्तर: (c)
कथन 2 गलत है क्योंकि अनुच्छेद 16 धर्म, जाति, लिंग, वंश, जन्मस्थान आदि के आधार पर भेदभाव को रोकता है, केवल धर्म तक सीमित नहीं है।

मेन प्रश्न

भारतीय सशस्त्र बलों में महिलाओं को स्थायी कमीशन देने के सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का महत्व क्या है? इन आदेशों को लागू करने में कौन-कौन सी संस्थागत चुनौतियां हैं, और लैंगिक समानता सुनिश्चित करने के लिए उन्हें कैसे दूर किया जा सकता है? (250 शब्द)

झारखंड और JPSC प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: पेपर 1 (समाज और सामाजिक न्याय), पेपर 3 (रक्षा और सुरक्षा)
  • झारखंड का दृष्टिकोण: झारखंड से भारतीय सशस्त्र बलों में काफी संख्या में जवान आते हैं; लैंगिक समावेशन नीतियां राज्य की महिलाओं की भर्ती और सेवा पर असर डालती हैं।
  • मेन पॉइंटर: संवैधानिक अधिकार, सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और महिलाओं के कैरियर विकास के सामाजिक-आर्थिक प्रभाव को झारखंड के संदर्भ में उजागर करें।
महिला अधिकारियों के लिए शॉर्ट सर्विस कमीशन और स्थायी कमीशन में क्या अंतर है?

शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) में सेवा अवधि 10-14 वर्ष तक सीमित होती है और पेंशन लाभ नहीं मिलता, जबकि स्थायी कमीशन (PC) सेवा की पूरी अवधि तक होता है, जिसमें पेंशन और सेवा के बाद लाभ शामिल होते हैं (आर्मी रूल्स, 1954)।

कौन सा सुप्रीम कोर्ट का मामला महिलाओं को स्थायी कमीशन देने का आदेश देता है?

बाबिता पुनिया एवं अन्य बनाम भारत संघ एवं अन्य (2020) मामले में महिलाओं को सभी गैर-लड़ाकू पदों में स्थायी कमीशन और कमांड पद देने का आदेश दिया गया।

महिलाओं के स्थायी कमीशन के अधिकार के समर्थन में कौन से संवैधानिक प्रावधान हैं?

संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 कानून के समक्ष समानता और सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर सुनिश्चित करते हैं, जो सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का आधार हैं।

महिलाओं को स्थायी कमीशन देने में मुख्य चुनौतियां क्या हैं?

मूल्यांकन, प्रशिक्षण और पदोन्नति प्रक्रियाओं में पूर्वाग्रह, लड़ाकू कमांड पदों से बहिष्कार, और सीमित कैरियर अवसरों के कारण उच्च सेवा त्याग दर प्रमुख चुनौतियां हैं।

भारतीय सशस्त्र बलों का लैंगिक समावेशन यूनाइटेड किंगडम से कैसे तुलना करता है?

यूनाइटेड किंगडम ने 2016 से महिलाओं को पूर्ण स्थायी कमीशन और लड़ाकू भूमिका दी है, जहां महिला अधिकारियों का प्रतिशत 11% है और संचालन क्षमता बेहतर है। भारत में PC मुख्यतः गैर-लड़ाकू पदों तक सीमित है और महिला अधिकारी केवल 3.5% हैं।

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