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हाल ही में सुनाए गए एक फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने यह स्पष्ट किया है कि मौत की सजा सुनाने से पहले अदालतों को राहत देने वाले कारणों की विस्तृत रिपोर्ट लेना अनिवार्य है। यह आदेश अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत संवैधानिक सुरक्षा को और मजबूत करता है और बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य (1980)शत्रुघ्न चौहान बनाम भारत संघ (2014) के न्यायशास्त्र के अनुरूप है। इस फैसले में मानसिक स्वास्थ्य और मनोवैज्ञानिक जांच की व्यापकता पर जोर दिया गया है ताकि फांसी की सजा मनमानी न हो।

UPSC Relevance

  • GS Paper 2: राजनीति और शासन — जीवन के अधिकार और फांसी की सजा में न्यायिक सुरक्षा
  • GS Paper 2: न्यायपालिका — मौत की सजा के मामलों में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका और प्रक्रिया संबंधी सुरक्षा
  • निबंध: आपराधिक न्याय में संवैधानिक नैतिकता और मानवाधिकार

मौत की सजा पर संवैधानिक और कानूनी ढांचा

अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने मनमानी जीवन हनन से बचाने के लिए प्रक्रिया संबंधी सुरक्षा के रूप में व्याख्यायित किया है। भारतीय दंड संहिता (IPC), 1860 की धारा 302 हत्या के लिए मौत की सजा का प्रावधान करती है, लेकिन यह हर मामले में अनिवार्य नहीं है। दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC), 1973 की धारा 354(3) मौत की सजा सुनाते समय कारणों को दर्ज करने का निर्देश देती है।

  • बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य (1980): मौत की सजा को 'अत्यंत दुर्लभ' मामलों तक सीमित किया गया, जिसमें बढ़ाने वाले और राहत देने वाले कारणों के बीच संतुलन की परीक्षा होती है।
  • शत्रुघ्न चौहान बनाम भारत संघ (2014): अदालतों को मानसिक बीमारी, सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि और मनोवैज्ञानिक रिपोर्ट सहित राहत देने वाले कारणों पर विचार करने का आदेश दिया गया।

राहत देने वाले कारणों और रिपोर्टों पर न्यायिक निर्देश

सुप्रीम कोर्ट का ताजा आदेश दोहराता है कि मौत की सजा के संभावित मामलों में अदालतों को सक्रिय रूप से मानसिक और मनोवैज्ञानिक जांच की रिपोर्ट मंगानी चाहिए। इससे आरोपी की मानसिक स्थिति, उम्र और परिस्थितियों जैसे राहत देने वाले कारणों की पूरी जांच सुनिश्चित होती है। ऐसी रिपोर्ट न होने पर 'अत्यंत दुर्लभ' सिद्धांत और अनुच्छेद 21 के तहत संवैधानिक सुरक्षा का उल्लंघन हो सकता है।

  • राज्य फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशालाओं से मानसिक स्वास्थ्य और संज्ञानात्मक क्षमता का अनिवार्य परीक्षण।
  • कानूनी सेवा प्राधिकरण (राष्ट्रीय और राज्य स्तर) मुफ्त कानूनी सहायता उपलब्ध कराकर आरोपी के अधिकारों की रक्षा।
  • CrPC धारा 354(3) के तहत राहत देने वाले कारणों को ध्यान में रखते हुए मौत की सजा के लिए विस्तृत न्यायिक तर्क आवश्यक।

मौत की सजा के मुकदमों के आर्थिक पहलू

प्रत्यक्ष आर्थिक लागतों का व्यवस्थित आंकलन नहीं है, लेकिन लंबित कानूनी प्रक्रिया से भारी वित्तीय बोझ पड़ता है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) 2022 के अनुसार, 500 से अधिक कैदी मौत की सजा की समीक्षा में हैं, जिसके कारण लंबी सुनवाई, अपील और दया याचिका की प्रक्रिया चलती रहती है।

  • मौत की सजा के मुकदमों और अपील की औसत लागत 10 लाख रुपये से अधिक, जिससे राज्य के बजट पर दबाव पड़ता है।
  • कानून और न्याय मंत्रालय ने 2023-24 में न्यायपालिका के संचालन और कानूनी सहायता के लिए लगभग 3000 करोड़ रुपये आवंटित किए।
  • सजा से लेकर फांसी तक औसत अवधि 10 वर्षों से अधिक, जिससे कैद और कानूनी खर्च बढ़ते हैं।

मौत की सजा के मामलों में संस्थागत भूमिकाएं

प्रक्रिया संबंधी सुरक्षा और न्याय सुनिश्चित करने के लिए कई संस्थाएं मिलकर काम करती हैं:

  • सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया: मौत की सजा के न्यायशास्त्र पर बंधनकारी फैसले देने वाली सर्वोच्च न्यायिक संस्था।
  • राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB): मौत की सजा और फांसी के आंकड़े एकत्र और प्रकाशित करता है।
  • कानून और न्याय मंत्रालय: न्याय सुधारों और बजट आवंटन की देखरेख करता है।
  • राज्य फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशालाएं: मानसिक और मनोवैज्ञानिक रिपोर्ट प्रदान करती हैं।
  • राष्ट्रीय और राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण: मृत्युदंड के मामलों में आरोपी को मुफ्त कानूनी सहायता सुनिश्चित करता है।

तुलनात्मक अध्ययन: भारत, नॉर्वे और यूरोप

पहलूभारतनॉर्वेयूरोप (ECHR राज्य)
मौत की सजा की स्थिति'अत्यंत दुर्लभ' मामलों में लागू, बरकरार1979 से समाप्तECHR प्रोटोकॉल नंबर 6 के तहत प्रतिबंधित
न्यायिक सुरक्षासुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार राहत देने वाले कारणों की रिपोर्ट अनिवार्यपुनर्वास पर ध्यान, मौत की सजा नहींमानवाधिकारों पर जोर, कोई फांसी नहीं
फांसी की संख्या (2015-2022)500+ मौत की सजा के बावजूद केवल 4 फांसीकोई फांसी नहींकोई फांसी नहीं
न्यायिक लागतलंबी अपील और दया याचिका के कारण अधिकमौत की सजा न होने के कारण कमअधिकारों के संरक्षण और समाप्ति के कारण कम

राहत देने वाले कारणों की रिपोर्ट के लागू करने में चुनौतियां

सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बावजूद, कुछ असंगतियां बनी हुई हैं, जिनमें शामिल हैं:

  • राज्यों में मानसिक जांच के लिए मानकीकृत प्रोटोकॉल की कमी।
  • योग्य फोरेंसिक विशेषज्ञों की कमी से रिपोर्टों में देरी और गुणवत्ता में भिन्नता।
  • 'अत्यंत दुर्लभ' सिद्धांत और अनुच्छेद 21 की सुरक्षा को कमजोर करने की संभावना।

महत्व और आगे का रास्ता

  • देशभर में फोरेंसिक मानसिक जांच को अनिवार्य और मानकीकृत करना।
  • रिपोर्टों में देरी कम करने के लिए फोरेंसिक ढांचे और प्रशिक्षण में निवेश बढ़ाना।
  • कानूनी सेवा प्राधिकरणों को मजबूत कर आरोपी को सक्षम कानूनी सहायता उपलब्ध कराना।
  • CrPC धारा 354(3) के तहत विस्तृत न्यायिक तर्कों को कड़ाई से लागू करना।
  • आर्थिक बोझ और मानवाधिकारों को ध्यान में रखकर मौत की सजा के उन्मूलन या सीमित करने पर नीति विमर्श।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
भारत में मौत की सजा के न्यायशास्त्र से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. IPC की धारा 302 के तहत सभी हत्या के मामलों में मौत की सजा अनिवार्य है।
  2. सुप्रीम कोर्ट ने बचन सिंह (1980) में मौत की सजा को 'अत्यंत दुर्लभ' मामलों तक सीमित किया।
  3. शत्रुघ्न चौहान (2014) के अनुसार, मौत की सजा सुनाने से पहले मानसिक बीमारी सहित राहत देने वाले कारणों पर विचार करना आवश्यक है।

इनमें से कौन-से कथन सही हैं?

  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2 और 3
  • cकेवल 1 और 3
  • d1, 2 और 3 सभी
उत्तर: (b)
कथन 1 गलत है क्योंकि IPC धारा 302 के तहत मौत की सजा वैकल्पिक है, अनिवार्य नहीं। कथन 2 और 3 सही हैं क्योंकि बचन सिंह ने मौत की सजा को 'अत्यंत दुर्लभ' मामलों तक सीमित किया और शत्रुघ्न चौहान ने राहत देने वाले कारणों पर विचार करने का आदेश दिया।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
भारत में मौत की सजा के मामलों के आर्थिक प्रभाव के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. लंबित अपील और दया याचिकाओं के कारण राज्य व्यय में भारी वृद्धि होती है।
  2. NCRB 2022 के अनुसार 500 से अधिक कैदी मौत की सजा की समीक्षा में हैं।
  3. मौत की सजा के मुकदमों और अपील की औसत लागत 1 लाख रुपये से कम है।

इनमें से कौन-से कथन सही हैं?

  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2 और 3
  • cकेवल 1 और 3
  • d1, 2 और 3 सभी
उत्तर: (a)
कथन 1 और 2 सही हैं क्योंकि लंबी कानूनी प्रक्रिया से व्यय बढ़ता है और NCRB 2022 के अनुसार 500 से अधिक कैदी समीक्षा में हैं। कथन 3 गलत है क्योंकि औसत लागत 10 लाख रुपये से अधिक है।

मुख्य प्रश्न

मौत की सजा के मामलों में राहत देने वाले कारणों पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर चर्चा करें। ये निर्देश अनुच्छेद 21 के तहत संवैधानिक सुरक्षा के साथ कैसे मेल खाते हैं और भारत के आपराधिक न्याय प्रणाली पर उनका क्या प्रभाव पड़ता है?

झारखंड और JPSC Relevance

  • JPSC पेपर: पेपर 2 (राजनीति और शासन) — न्यायिक सुरक्षा और संवैधानिक अधिकार
  • झारखंड का कोण: झारखंड की अदालतों में मौत की सजा के मामलों में सुप्रीम कोर्ट के राहत रिपोर्ट आदेशों का पालन आवश्यक; यहां फोरेंसिक ढांचे को मजबूत करने की जरूरत।
  • मुख्य बिंदु: झारखंड में राज्य फोरेंसिक प्रयोगशालाओं और कानूनी सहायता की भूमिका पर जोर; सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के स्थानीय क्रियान्वयन में चुनौतियों पर चर्चा।
मौत की सजा के मामलों में 'अत्यंत दुर्लभ' सिद्धांत क्या है?

'अत्यंत दुर्लभ' सिद्धांत सुप्रीम कोर्ट ने बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य (1980) में स्थापित किया, जिसके अनुसार मौत की सजा केवल उन मामलों में दी जाए जहां अपराध अत्यंत घिनौना हो और अन्य सजा अपर्याप्त हो।

मौत की सजा के मामलों में जीवन के अधिकार की सुरक्षा कौन सा संवैधानिक अनुच्छेद करता है?

अनुच्छेद 21 भारत के संविधान का वह प्रावधान है जो जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है, जिसमें मौत की सजा के मामलों में भी प्रक्रिया संबंधी सुरक्षा शामिल है।

मौत की सजा में फोरेंसिक रिपोर्ट की क्या भूमिका है?

फोरेंसिक मानसिक और मनोवैज्ञानिक रिपोर्ट आरोपी की मानसिक स्थिति और राहत देने वाले कारणों का आकलन करती हैं, जिससे अदालत सुनिश्चित कर सके कि मौत की सजा मनमानी न हो।

2015 से 2022 के बीच भारत में कितनी फांसी हुई?

NCRB 2022 के आंकड़ों के अनुसार, 2015 से 2022 के बीच भारत में केवल 4 फांसी हुई, जबकि 500 से अधिक मौत की सजा लंबित है।

मौत की सजा के मामलों से जुड़ी आर्थिक लागत क्या हैं?

मौत की सजा के मामले लंबी सुनवाई, अपील और दया याचिका की प्रक्रिया के कारण महंगे होते हैं, जिनकी औसत लागत 10 लाख रुपये से अधिक होती है, जो राज्य के न्यायिक बजट पर भारी बोझ डालती है।

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