शून्य कार्यक्रम का परिचय
शून्य कार्यक्रम की शुरुआत 2023 में NITI आयोग ने रॉकी माउंटेन इंस्टिट्यूट (RMI) और इसके भारतीय शाखा RMI इंडिया के साथ मिलकर की। इसका उद्देश्य अंतिम मील डिलीवरी वाहनों के विद्युतीकरण के जरिए शहरी लॉजिस्टिक्स में प्रदूषण शून्य करना है। यह पहल सार्वजनिक-निजी साझेदारी पर केंद्रित है, जिसमें उपभोक्ता, उद्योग और नियामक संस्थाएं शामिल हैं, ताकि डिलीवरी क्षेत्र में इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) को तेजी से अपनाया जा सके, जो शहरी वाहनों के लगभग 20% प्रदूषण के लिए जिम्मेदार है (CPCB, 2022)। यह कार्यक्रम भारत के जलवायु प्रतिबद्धताओं और शहरी वायु गुणवत्ता लक्ष्यों के अनुरूप है।
UPSC प्रासंगिकता
- GS पेपर 3: पर्यावरण - शहरी वायु प्रदूषण, इलेक्ट्रिक वाहन, जलवायु परिवर्तन से निपटना
- GS पेपर 2: शासन - सार्वजनिक-निजी साझेदारी, नीति लागू करना
- निबंध: सतत शहरी विकास, जलवायु कार्रवाई
शून्य कार्यक्रम के कानूनी और नियामक ढांचे
शून्य कार्यक्रम पर्यावरण संरक्षण और वाहनों के प्रदूषण नियंत्रण के लिए मजबूत कानूनी ढांचे के तहत संचालित होता है। मुख्य कानूनों में पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 (धारा 3 के तहत केंद्र सरकार को कार्रवाई का अधिकार), वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981, और ऊर्जा संरक्षण अधिनियम, 2001 (धारा 14 के तहत वाहनों के मानक) शामिल हैं। मोटर वाहन अधिनियम, 1988 और केंद्रीय मोटर वाहन नियम, 1989 में कड़े उत्सर्जन मानक लागू करने के लिए संशोधन किए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले जैसे एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ (1998) ने वाहनों के प्रदूषण नियंत्रण को सख्ती से लागू करने का आदेश दिया, जिससे शून्य जैसे कार्यक्रमों को न्यायिक बल मिला।
- राष्ट्रीय इलेक्ट्रिक मोबिलिटी मिशन योजना (NEMMP) 2013: भारत में EV अपनाने की नीति की नींव।
- फास्टर एडॉप्शन एंड मैन्युफैक्चरिंग ऑफ हाइब्रिड एंड इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (FAME) योजना: 2024 तक 10,000 करोड़ रुपये आवंटित, EV निर्माण और अपनाने को प्रोत्साहित करने के लिए।
- केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB): वाहनों के प्रदूषण स्तरों की निगरानी और अनुपालन सुनिश्चित करता है।
- राज्य परिवहन विभाग: राज्य स्तर पर उत्सर्जन मानकों के पालन का जिम्मा।
शून्य कार्यक्रम के आर्थिक पहलू
लॉजिस्टिक्स क्षेत्र भारत की GDP में लगभग 14% योगदान देता है और इसका बाजार आकार USD 215 बिलियन है (IBEF, 2023)। डिलीवरी वाहन शहरी वाहनों के प्रदूषण में लगभग 20% योगदान करते हैं (CPCB, 2022)। शून्य कार्यक्रम इस क्षेत्र को लक्ष्य बनाकर प्रदूषण और परिचालन लागत कम करना चाहता है। भारत का EV बाजार 2021 से 2030 के बीच 44% की CAGR से बढ़ने का अनुमान है, जो USD 206 बिलियन तक पहुंच जाएगा (IEA, 2023)। डिलीवरी वाहनों के विद्युतीकरण से प्रति वाहन सालाना 30% तक ईंधन बचत हो सकती है (NITI आयोग, 2023) और वार्षिक 1.2 मिलियन टन कार्बन उत्सर्जन कम किया जा सकता है।
- रोजगार संभावनाएं: EV निर्माण और सेवा क्षेत्र में 2030 तक 15 लाख नौकरियां पैदा हो सकती हैं (NITI आयोग)।
- सरकारी प्रोत्साहन: FAME योजना सब्सिडी और बुनियादी ढांचे के समर्थन से EV अपनाने को बढ़ावा देती है।
- उद्योग सहभागिता: शून्य कार्यक्रम में कॉर्पोरेट ब्रांडिंग और प्रमाणन शामिल है, जो उद्योग के बदलाव को प्रोत्साहित करता है।
संस्थागत भूमिकाएं और साझेदारियां
NITI आयोग शून्य कार्यक्रम की नीति निर्माण और समन्वय का नेतृत्व करता है। RMI, 1982 से स्वतंत्र गैर-लाभकारी संस्था, ऊर्जा और परिवहन क्षेत्र में कार्बन कम करने की तकनीकी विशेषज्ञता प्रदान करता है, जबकि RMI इंडिया स्थानीय क्रियान्वयन पर ध्यान देता है। भारी उद्योग और सार्वजनिक उद्यम मंत्रालय FAME योजना का संचालन करता है, जो शून्य के उद्देश्य को पूरा करता है। CPCB प्रदूषण स्तरों की निगरानी करता है और राज्य परिवहन विभाग उत्सर्जन नियमों का पालन सुनिश्चित करते हैं। यह बहु-संस्थागत ढांचा समन्वित शासन का उदाहरण है।
तुलनात्मक अध्ययन: भारत का शून्य बनाम चीन की NEV नीति
| पहलू | चीन की NEV नीति (2010 से) | भारत का शून्य कार्यक्रम (2023 से) |
|---|---|---|
| नीति का फोकस | यात्री और वाणिज्यिक वाहनों में व्यापक EV अपनाना | शून्य प्रदूषण अंतिम मील डिलीवरी वाहन |
| सरकारी समर्थन | सब्सिडी, बुनियादी ढांचे में निवेश, कड़े उत्सर्जन मानक | सार्वजनिक-निजी साझेदारी, प्रमाणन, FAME योजना के तहत प्रोत्साहन |
| बाजार प्रभाव | 2023 तक नई कार बिक्री में 50% EV हिस्सा | डिलीवरी फ्लीट पर शुरुआती चरण का अपनाना |
| पर्यावरणीय परिणाम | मुख्य शहरों में शहरी वाहनों के उत्सर्जन में 30% कमी | वार्षिक 1.2 मिलियन टन CO2 उत्सर्जन में कमी अनुमानित |
| इन्फ्रास्ट्रक्चर | शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में मजबूत चार्जिंग नेटवर्क | टीयर-2 और टीयर-3 शहरों में चार्जिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी |
| चुनौतियां | बैटरी सप्लाई चेन, शहरी-ग्रामीण अपनाने का अंतर | राज्य नीतियों में असंगति, सीमित ग्रिड क्षमता |
महत्वपूर्ण कमियां और चुनौतियां
- चार्जिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर: टीयर-2 और टीयर-3 शहरों में अपर्याप्त चार्जिंग सुविधाएं डिलीवरी फ्लीट में बड़े पैमाने पर EV अपनाने में बाधा हैं।
- ग्रिड क्षमता: स्थानीय ग्रिड की सीमित क्षमता EV चार्जिंग के लिए विश्वसनीय बिजली आपूर्ति को प्रभावित करती है।
- नीति असंगति: राज्यों के बीच प्रोत्साहनों और नियमों की एकरूपता न होने से उद्योग की सक्रिय भागीदारी में रुकावट आती है।
- उद्योग की तैयारी: EV डिलीवरी वाहनों के लिए कुशल कर्मी और बिक्री के बाद सेवा नेटवर्क की कमी है।
महत्व और आगे का रास्ता
- समेकित नीति दृष्टिकोण: केंद्र और राज्यों की नीतियों को मिलाकर समान प्रोत्साहन और मानक बनाना जरूरी है।
- इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास: विशेषकर नए शहरी केंद्रों में व्यापक चार्जिंग नेटवर्क का निवेश आवश्यक है।
- क्षमता निर्माण: EV निर्माण और सेवा के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम विकसित करना चाहिए।
- डेटा-आधारित निगरानी: प्रदूषण और उपयोग के वास्तविक समय के आंकड़ों से फ्लीट विद्युतीकरण रणनीतियों को बेहतर बनाना।
- उद्योग सहभागिता: प्रमाणन और ब्रांडिंग का विस्तार कर उद्योग को शून्य-उत्सर्जन लॉजिस्टिक्स की ओर प्रोत्साहित करना।
- शून्य एक सरकारी पहल है जो 2023 में शून्य-प्रदूषण डिलीवरी वाहनों को बढ़ावा देने के लिए शुरू की गई।
- यह कार्यक्रम केवल भारी उद्योग मंत्रालय द्वारा लागू किया जाता है, किसी थिंक टैंक की भागीदारी के बिना।
- शून्य में उद्योग प्रयासों को मान्यता देने के लिए कॉर्पोरेट ब्रांडिंग और प्रमाणन शामिल है।
- पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 केंद्र सरकार को पर्यावरण संरक्षण के लिए कदम उठाने का अधिकार देता है।
- मोटर वाहन अधिनियम, 1988 में उत्सर्जन मानकों से संबंधित कोई प्रावधान नहीं है।
- वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981 वाहनों के प्रदूषण नियंत्रण के लिए प्रासंगिक है।
मुख्य प्रश्न
शून्य कार्यक्रम को भारत में शून्य-उत्सर्जन डिलीवरी वाहनों को बढ़ावा देने में सार्वजनिक-निजी साझेदारी के मॉडल के रूप में मूल्यांकन करें। इसके शहरी वायु गुणवत्ता और आर्थिक विकास पर संभावित प्रभाव पर चर्चा करें, और सफल कार्यान्वयन के लिए जिन प्रमुख चुनौतियों का समाधान आवश्यक है, उन्हें पहचानें। (250 शब्द)
शून्य कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य क्या है?
शून्य कार्यक्रम का उद्देश्य अंतिम मील लॉजिस्टिक्स में इलेक्ट्रिक वाहनों को तेजी से अपनाकर शून्य प्रदूषण डिलीवरी वाहनों को बढ़ावा देना है, जिससे शहरी वायु प्रदूषण कम हो और भारत के जलवायु लक्ष्यों का समर्थन हो।
शून्य कार्यक्रम को लागू करने में कौन-कौन सी संस्थाएं शामिल हैं?
NITI आयोग इस कार्यक्रम का नेतृत्व करता है, जो रॉकी माउंटेन इंस्टिट्यूट (RMI) और RMI इंडिया के साथ मिलकर काम करता है। भारी उद्योग मंत्रालय FAME योजना के माध्यम से समर्थन देता है, जबकि CPCB और राज्य परिवहन विभाग नियामक अनुपालन सुनिश्चित करते हैं।
शून्य कार्यक्रम FAME योजना के साथ कैसे मेल खाता है?
जहां FAME योजना व्यापक रूप से EV अपनाने के लिए वित्तीय प्रोत्साहन और सब्सिडी प्रदान करती है, वहीं शून्य खासतौर पर डिलीवरी वाहन क्षेत्र को लक्षित करता है और उद्योग सहभागिता को बढ़ावा देने के लिए कॉर्पोरेट ब्रांडिंग और प्रमाणन शामिल करता है।
शून्य कार्यक्रम के सामने मुख्य चुनौतियां क्या हैं?
मुख्य चुनौतियों में छोटे शहरों में अपर्याप्त चार्जिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर, सीमित ग्रिड क्षमता, राज्यों के बीच नीति असंगति, और EV सेवा व निर्माण के लिए कुशल कर्मी की कमी शामिल हैं।
चीन की NEV नीति से भारत शून्य कार्यक्रम के लिए क्या सीख सकता है?
भारत चीन की समेकित नीति से सीख सकता है, जिसमें सब्सिडी, बुनियादी ढांचे में निवेश, कड़े उत्सर्जन नियम और समान नीति लागू करने के कारण नई कारों की बिक्री में 50% EV हिस्सा और प्रदूषण में उल्लेखनीय कमी आई है।
स्रोत: LearnPro Editorial | सामान्य अध्ययन | प्रकाशित: 16 September 2021 | अंतिम अपडेट: 1 April 2026
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