शेरगढ़ अभयारण्य का परिचय
शेरगढ़ अभयारण्य मध्य प्रदेश में 1984 में स्थापित एक संरक्षित वन्यजीव क्षेत्र है, जो लगभग 431 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है (वन सर्वेक्षण भारत 2022)। यहाँ 150 से अधिक पक्षी प्रजातियाँ और 35 स्तनधारी प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जिनमें भारतीय तेंदुआ भी शामिल है, जो इसे जैव विविधता के लिहाज से महत्वपूर्ण बनाता है (वन्यजीव संस्थान भारत 2023)। यह अभयारण्य प्रमुख बाघ गलियारों के समीप स्थित है, जहाँ 2018 से 2023 के बीच बाघों की संख्या में 12% की वृद्धि हुई है (राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण 2023)। शेरगढ़ संरक्षण और सामाजिक-आर्थिक हकीकतों के बीच संतुलन की मिसाल है, लेकिन वर्तमान संरक्षण ढांचे में आवासीय कनेक्टिविटी और समुदाय की भागीदारी के अभाव स्पष्ट नजर आते हैं।
UPSC से प्रासंगिकता
- GS पेपर 3: जैव विविधता, पर्यावरण संरक्षण और वन्यजीव सुरक्षा
- GS पेपर 1: भूगोल – वन पारिस्थितिकी तंत्र और मानव-वन्यजीव संघर्ष
- GS पेपर 2: भारतीय राजव्यवस्था – पर्यावरण के लिए संवैधानिक प्रावधान और कानूनी ढांचे
- निबंध: भारत में पारिस्थितिक संरक्षण और सामाजिक-आर्थिक विकास का संतुलन
शेरगढ़ अभयारण्य का कानूनी और संवैधानिक ढांचा
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 (WPA) शेरगढ़ अभयारण्य के प्रबंधन का मुख्य कानून है। इसके सेक्शन 18 और 26A अभयारण्य की घोषणा और प्रबंधन के नियम तय करते हैं, जो वन्यजीव आवासों को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाते हैं। वन संरक्षण अधिनियम, 1980 वन भूमि के उपयोग में बदलाव को नियंत्रित करता है और गैर-वन उपयोग के लिए केंद्र सरकार की मंजूरी अनिवार्य करता है। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 पर्यावरणीय प्रभाव आकलन और प्रदूषण नियंत्रण के माध्यम से आवास संरक्षण को मजबूती देता है।
- संविधान का अनुच्छेद 48A राज्य को वन और वन्यजीव संरक्षण का निर्देश देता है, जो एक महत्वपूर्ण सरकारी नीति है।
- सुप्रीम कोर्ट के फैसले जैसे टी.एन. गोदावर्मन थिरुमलपद बनाम भारत संघ (1996) ने वन संरक्षण को वन्यजीव संरक्षण का अभिन्न हिस्सा माना है।
- प्रबंधन का अधिकार राज्य वन विभाग के पास है, जबकि नीति निर्धारण और वित्त पोषण पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) देखता है।
पारिस्थितिक स्थिति और चुनौतियाँ
2017 से 2022 के बीच शेरगढ़ अभयारण्य में वन आवरण में 3.5% की वृद्धि हुई है, जो पुनर्वनीकरण प्रयासों की सफलता दर्शाता है (वन सर्वेक्षण भारत 2022)। हालांकि, संसाधनों की कमी के कारण केवल 40% क्षेत्र में नियमित गश्त हो पाती है, जिससे शिकार और अवैध गतिविधियों का खतरा बढ़ता है (MoEFCC 2023)। आवासीय विखंडन एक गंभीर समस्या है, जो बाघ और तेंदुए जैसे प्रजातियों के लिए जरूरी वन्यजीव गलियारों को प्रभावित करता है।
- पिछले पांच वर्षों में मानव-वन्यजीव संघर्ष के मामले 8% बढ़े हैं, जिससे वार्षिक लगभग ₹2 करोड़ का आर्थिक नुकसान हुआ है (राज्य वन विभाग 2023)।
- वन्यजीव संस्थान भारत की रिपोर्ट में दिखाया गया है कि विखंडित गलियारों से आनुवंशिक विविधता कम होती है और जानवरों की मृत्यु दर बढ़ती है।
- अपर्याप्त निगरानी और सीमित सामुदायिक भागीदारी के कारण शिकार और अवैध संसाधन दोहन जारी है।
सामाजिक-आर्थिक पहलू और संस्थागत भूमिका
MoEFCC ने 2023-24 में शेरगढ़ सहित वन्यजीव अभयारण्यों के लिए ₹150 करोड़ का बजट आवंटित किया है, जिसका उपयोग आधारभूत संरचना, शिकार विरोधी उपायों और सामुदायिक कार्यक्रमों में किया जा रहा है (MoEFCC वार्षिक रिपोर्ट 2023)। इको-टूरिज्म से स्थानीय अर्थव्यवस्था को सालाना लगभग ₹500 करोड़ का लाभ होता है, जो 2,000 से अधिक स्थानीय निवासियों को संरक्षण आधारित रोजगार प्रदान करता है (वन सर्वेक्षण भारत 2022)।
- राज्य वन विभाग भौतिक कार्यों का संचालन करता है, लेकिन उसे मानव संसाधन और वित्तीय कमी का सामना है।
- वन्यजीव संस्थान भारत (WII) वैज्ञानिक अनुसंधान और निगरानी सहायता प्रदान करता है।
- राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) शेरगढ़ से लगे बाघ गलियारों का संरक्षण करता है और समन्वय करता है।
- स्थानीय पंचायतों की निर्णय प्रक्रिया में भूमिका सीमित है, जिससे समुदाय की भागीदारी और लाभ वितरण प्रभावित होता है।
तुलनात्मक अध्ययन: शेरगढ़ अभयारण्य और केन्या का त्सावो राष्ट्रीय उद्यान
| पहलू | शेरगढ़ अभयारण्य (भारत) | त्सावो राष्ट्रीय उद्यान (केन्या) |
|---|---|---|
| क्षेत्रफल | 431 वर्ग किलोमीटर | 22,000 वर्ग किलोमीटर |
| सामुदायिक भागीदारी | सीमित; पंचायतों की भूमिका न्यूनतम | मसाई समुदाय के साथ समेकित संरक्षण मॉडल |
| वन्यजीव जनसंख्या रुझान | 2018-23 में तेंदुआ और बाघ गलियारों में 12% वृद्धि | पांच वर्षों में 25% वृद्धि |
| इको-टूरिज्म राजस्व | ₹500 करोड़ वार्षिक; संभावनाएं अधूरी | पांच वर्षों में 30% वृद्धि, सामुदायिक मॉडल के कारण |
| मानव-वन्यजीव संघर्ष | पिछले पांच वर्षों में 8% की वृद्धि; ₹2 करोड़ वार्षिक हानि | भागीदारी प्रबंधन से काफी कमी |
शेरगढ़ अभयारण्य प्रबंधन में मुख्य कमियाँ
शेरगढ़ अभयारण्य के विखंडित आवासीय गलियारे पारिस्थितिक कनेक्टिविटी को कमजोर करते हैं, जिससे प्रजातियों के जीवित रहने और आनुवंशिक प्रवाह पर असर पड़ता है। स्थानीय समुदायों की शासन में सीमित भागीदारी स्थानीय स्वामित्व को कम करती है और मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ाती है। संसाधनों की कमी के कारण गश्त अधूरी रहती है, जिससे शिकार की घटनाएं बढ़ती हैं। ये कमियाँ त्सावो जैसे अंतरराष्ट्रीय सर्वोत्तम उदाहरणों से मेल नहीं खातीं, जहाँ सामाजिक-आर्थिक प्रोत्साहनों के साथ संरक्षण को जोड़ा गया है।
- विखंडित गलियारे अभयारण्य की वन्यजीव सुरक्षा क्षमता को कम करते हैं।
- स्थानीय समुदायों को निर्णय प्रक्रिया से बाहर रखना संघर्ष निवारण और सतत आजीविका के अवसरों को घटाता है।
- WPA के सेक्शन 18 और 26A के तहत भागीदारी प्रबंधन मॉडल का कम उपयोग होता है।
- संविधान के अनुच्छेद 48A और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत पारिस्थितिक और सामाजिक लक्ष्यों का सख्त पालन जरूरी है।
आगे का रास्ता: संरक्षण, समुदाय और कनेक्टिविटी का समन्वय
- MoEFCC की योजनाओं के तहत भू-दृश्य स्तर पर योजना बनाकर आवासीय कनेक्टिविटी और गलियारों की बहाली बढ़ाएं।
- पंचायतों की भूमिका को औपचारिक बनाकर सामुदायिक भागीदारी और लाभ वितरण को मजबूत करें।
- राज्य वन विभाग के संसाधनों को बढ़ाकर और तकनीक जैसे ड्रोन, कैमरा ट्रैप का उपयोग कर गश्त कवरेज बढ़ाएं।
- केन्या के त्सावो की तरह भागीदारी आधारित इको-टूरिज्म मॉडल अपनाएं, जो संरक्षण और स्थानीय आजीविका को जोड़ता है।
- WPA के सेक्शन 18 और 26A के तहत मौजूदा कानूनी प्रावधानों को सख्ती से लागू कर अभयारण्य के समेकित प्रबंधन को सुनिश्चित करें।
- सेक्शन 18 राज्य सरकार को किसी क्षेत्र को अभयारण्य घोषित करने का अधिकार देता है।
- सेक्शन 26A केंद्र सरकार को सीधे अभयारण्यों का प्रबंधन करने की अनुमति देता है।
- अभयारण्यों में चराई और छोटे वन उत्पादों के संग्रह सहित सभी मानव गतिविधियाँ प्रतिबंधित हैं।
- अनुच्छेद 48A राज्य को वन और वन्यजीव संरक्षण का निर्देश देता है।
- अनुच्छेद 51A(g) नागरिकों पर पर्यावरण संरक्षण का मौलिक कर्तव्य थोपता है।
- अनुच्छेद 21 साफ-सुथरे पर्यावरण का अधिकार स्पष्ट रूप से देता है।
इनमें से कौन-से कथन सही हैं?
मुख्य प्रश्न
शेरगढ़ अभयारण्य को वन्यजीव संरक्षण और सामाजिक-आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाते समय किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है? मौजूदा कानूनी ढांचे के तहत आवासीय कनेक्टिविटी और सामुदायिक भागीदारी सुधारने के लिए क्या उपाय सुझाए जा सकते हैं? (250 शब्द)
झारखंड और JPSC से प्रासंगिकता
- JPSC पेपर: पेपर 3 – पर्यावरण और पारिस्थितिकी; वन और वन्यजीव संरक्षण
- झारखंड की स्थिति: झारखंड में भी शेरगढ़ की तरह विखंडित आवास और आदिवासी समुदाय की भागीदारी में चुनौतियाँ हैं, जो शेरगढ़ के केस को तुलनात्मक अध्ययन के लिए उपयुक्त बनाती हैं।
- मेन पॉइंटर: कानूनी प्रावधान (WPA, वन संरक्षण अधिनियम), जनजातीय समुदायों पर सामाजिक-आर्थिक प्रभाव, और समेकित संरक्षण मॉडल से सीख को झारखंड के अभयारण्यों में लागू करने पर ध्यान दें।
शेरगढ़ को वन्यजीव अभयारण्य घोषित करने का कानूनी आधार क्या है?
शेरगढ़ अभयारण्य को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के सेक्शन 18 के तहत घोषित किया गया है, जो राज्य सरकारों को वन्यजीव संरक्षण के लिए क्षेत्र घोषित करने का अधिकार देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 48A शेरगढ़ अभयारण्य से कैसे जुड़ा है?
अनुच्छेद 48A राज्य को वन और वन्यजीवों की रक्षा और सुधार करने का निर्देश देता है, जो शेरगढ़ में संरक्षण प्रयासों को संवैधानिक समर्थन प्रदान करता है।
शेरगढ़ अभयारण्य में मानव-वन्यजीव संघर्ष के मुख्य कारण क्या हैं?
मुख्य कारणों में आवासीय विखंडन, वन भूमि पर अतिक्रमण, अपर्याप्त गश्त, और संघर्ष समाधान में सीमित सामुदायिक भागीदारी शामिल हैं।
शेरगढ़ अभयारण्य का प्रबंधन केन्या के त्सावो राष्ट्रीय उद्यान से कैसे भिन्न है?
त्सावो में स्थानीय मसाई समुदायों को संरक्षण में शामिल किया जाता है, जिससे वन्यजीव जनसंख्या वृद्धि, इको-टूरिज्म राजस्व में वृद्धि और संघर्ष में कमी आई है, जबकि शेरगढ़ में ये पहल सीमित हैं।
राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) शेरगढ़ अभयारण्य में क्या भूमिका निभाता है?
NTCA शेरगढ़ के आस-पास के बाघ गलियारों का संरक्षण करता है, निगरानी, शिकार रोधी उपायों और आवासीय कनेक्टिविटी बढ़ाने का समन्वय करता है।
आधिकारिक स्रोत और आगे पढ़ाई के लिए
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