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शेरगढ़ अभयारण्य का परिचय

शेरगढ़ अभयारण्य राजस्थान में स्थित एक संरक्षित वन्यजीव क्षेत्र है, जिसका क्षेत्रफल लगभग 430 वर्ग किलोमीटर है (राजस्थान वन विभाग, 2023 के अनुसार)। यह अभयारण्य वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत स्थापित किया गया है और यहाँ 25 से अधिक स्तनधारी प्रजातियाँ जैसे भारतीय भेड़िया और चिंकारा पाई जाती हैं। साथ ही, 150 से अधिक पक्षी प्रजातियाँ यहाँ निवास करती हैं, जिसके कारण इसे बर्डलाइफ इंटरनेशनल ने महत्वपूर्ण पक्षी क्षेत्र (IBA) घोषित किया है। शेरगढ़ अभयारण्य जैव विविधता संरक्षण और सतत विकास के बीच संतुलन का उदाहरण प्रस्तुत करता है, जो भारत के कानूनी तथा संस्थागत ढांचे के अंतर्गत संचालित होता है।

UPSC प्रासंगिकता

  • GS पेपर 3: पर्यावरण और पारिस्थितिकी – वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, वन संरक्षण अधिनियम, मानव-वन्यजीव संघर्ष प्रबंधन
  • GS पेपर 1: भूगोल – राजस्थान के जैव विविधता हॉटस्पॉट और संरक्षित क्षेत्र
  • निबंध: भारत में संरक्षण और आर्थिक विकास के बीच संतुलन

शेरगढ़ अभयारण्य के लिए कानूनी और संवैधानिक ढांचा

यह अभयारण्य वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की धारा 18 और 26A के तहत घोषित एवं प्रबंधित है, जो अभयारण्य की घोषणा और उसके भीतर गतिविधियों पर नियंत्रण के लिए कानूनी आधार प्रदान करती हैं। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 इन प्रावधानों को पर्यावरणीय सुरक्षा के व्यापक दायरे से मजबूत करता है, जबकि वन संरक्षण अधिनियम, 1980 वन भूमि के गैर-वन उपयोग के लिए हस्तांतरण पर रोक लगाता है, जिससे आवास की अखंडता बनी रहती है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 48A के तहत राज्यों को वन और वन्यजीव संरक्षण की जिम्मेदारी सौंपी गई है, जो इस कानूनी ढांचे को और मजबूती देता है। सुप्रीम कोर्ट के T.N. Godavarman Thirumulpad बनाम भारत संघ (1996) मामले में वन संरक्षण पर दिए गए ऐतिहासिक निर्णय ने पूरे देश में अभयारण्यों के प्रबंधन को प्रभावी बनाया है।

  • धारा 18, वन्यजीव संरक्षण अधिनियम: अभयारण्य की घोषणा की प्रक्रिया और गतिविधियों पर प्रतिबंध।
  • धारा 26A, वन्यजीव संरक्षण अधिनियम: अभयारण्य प्रबंधन के लिए मुख्य वन्यजीव संरक्षक के अधिकार।
  • वन संरक्षण अधिनियम, 1980: केंद्रीय अनुमति के बिना वन भूमि के उपयोग में बदलाव पर रोक।
  • अनुच्छेद 48A: राज्यों के लिए वन और वन्यजीव संरक्षण का निर्देशात्मक सिद्धांत।
  • T.N. Godavarman मामला: वन संरक्षण और पर्यावरण शासन के लिए न्यायिक सक्रियता।

संस्थागत भूमिकाएँ और समन्वय

शेरगढ़ अभयारण्य के प्रबंधन में कई संस्थाएँ शामिल हैं जिनकी भूमिकाएँ स्पष्ट हैं। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) नीतियाँ बनाता है और वित्तीय आवंटन करता है, उदाहरण के तौर पर 2023-24 में वन्यजीव अभयारण्यों के लिए 150 करोड़ रुपये का बजट। मुख्य वन्यजीव संरक्षक (CWLW) के पास प्रवर्तन और अभयारण्य के स्थानीय प्रबंधन का अधिकार है। राजस्थान वन विभाग संरक्षण उपायों को लागू करता है और स्थानीय समुदायों के साथ संपर्क बनाए रखता है। वैज्ञानिक अनुसंधान और क्षमता विकास में वन्यजीव संस्थान, भारत (WII) सहयोग करता है। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) बाघ के आवासों की देखरेख करता है जो अभयारण्य क्षेत्र में आते हैं, जिससे प्रजाति-विशेष संरक्षण सुनिश्चित होता है।

  • MoEFCC: नीति निर्माण, वित्त आवंटन (₹150 करोड़, 2023-24)।
  • CWLW: अभयारण्य प्रबंधन, वन्यजीव संरक्षण अधिनियम का प्रवर्तन।
  • राजस्थान वन विभाग: क्षेत्रीय कार्यान्वयन, समुदाय सहभागिता।
  • WII: वैज्ञानिक अनुसंधान, निगरानी और प्रशिक्षण।
  • NTCA: अभयारण्य क्षेत्रों में बाघ संरक्षण।

पारिस्थितिक और आर्थिक पहलू

शेरगढ़ अभयारण्य की जैव विविधता में भारतीय भेड़िया और चिंकारा जैसी महत्वपूर्ण प्रजातियाँ शामिल हैं, साथ ही 150 से अधिक पक्षी प्रजातियाँ यहाँ पाई जाती हैं, जो इसकी पारिस्थितिक महत्ता दर्शाती हैं। 2015 से 2022 के बीच वन आवरण में 5% की वृद्धि हुई है (वन सर्वेक्षण भारत, 2023), जो आवास पुनर्स्थापन के सकारात्मक संकेत हैं। हालांकि, 2023 में मानव-वन्यजीव संघर्ष के मामले 10% बढ़कर 45 दर्ज हुए, जो चुनौतियों को दर्शाता है। आर्थिक दृष्टि से, राजस्थान के अभयारण्यों से जुड़ा इको-टूरिज्म लगभग 500 करोड़ रुपये वार्षिक योगदान देता है और यह 12% की दर से बढ़ रहा है (नीति आयोग रिपोर्ट, 2023)। शेरगढ़ में इको-टूरिज्म और इससे जुड़ी गतिविधियों से लगभग 3,000 सीधे रोजगार जुड़े हैं, लेकिन स्थानीय समुदायों के सीमित समावेशन के कारण यह संभावित लाभ पूरी तरह से उपयोग में नहीं आ पा रहा है।

  • जैव विविधता: 25+ स्तनधारी प्रजातियाँ, 150+ पक्षी प्रजातियाँ (WII, BirdLife International)।
  • वन आवरण वृद्धि: +5% (2015–2022, वन सर्वेक्षण भारत)।
  • मानव-वन्यजीव संघर्ष: 2023 में 45 मामले, 2022 की तुलना में 10% वृद्धि।
  • इको-टूरिज्म राजस्व: राजस्थान में ₹500 करोड़ वार्षिक, 12% वृद्धि दर।
  • रोजगार: अभयारण्य से जुड़े 3,000 सीधे रोजगार।

तुलनात्मक अध्ययन: शेरगढ़ अभयारण्य और केन्या का मासाई मारा

पहलू शेरगढ़ अभयारण्य (भारत) मासाई मारा राष्ट्रीय रिजर्व (केन्या)
कानूनी ढांचा वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972; वन संरक्षण अधिनियम, 1980 वन्यजीव संरक्षण और प्रबंधन अधिनियम, 2013
समुदाय सहभागिता सीमित जनजातीय समावेशन; 2020 के बाद 30% वृद्धि, फिर भी अपर्याप्त समेकित समुदाय संरक्षण क्षेत्र; 5 वर्षों में स्थानीय आय में 40% वृद्धि
वन्यजीव आबादी के रुझान स्थिर लेकिन संघर्ष से खतरा; कोई उल्लेखनीय वृद्धि नहीं 5 वर्षों में वन्यजीव आबादी में 20% वृद्धि
आर्थिक प्रभाव राजस्थान में ₹500 करोड़ इको-टूरिज्म राजस्व; अभयारण्य स्तर पर कम उपयोग इको-टूरिज्म और संरक्षण से महत्वपूर्ण स्थानीय आय
संघर्ष प्रबंधन मानव-वन्यजीव संघर्ष जारी; 2023 में 45 मामले समुदाय की भागीदारी से प्रभावी संघर्ष समाधान

नीतिगत कमियाँ और चुनौतियाँ

मजबूत कानूनी प्रावधानों के बावजूद, शेरगढ़ अभयारण्य स्थानीय जनजातीय समुदायों को निर्णय प्रक्रिया में शामिल करने में असमर्थ है, जिससे संरक्षण प्रयासों और आर्थिक लाभों की प्रभावशीलता सीमित होती है। मानव-वन्यजीव संघर्ष बनी हुई समस्या है, क्योंकि भागीदारीपूर्ण प्रबंधन और संघर्ष निवारण उपाय पर्याप्त नहीं हैं। इको-टूरिज्म की संभावनाएँ कमजोर संस्थागत समन्वय और समुदाय की कमी के कारण पूरी तरह से विकसित नहीं हो पाई हैं। ये कमियाँ अभयारण्य को संरक्षण और सतत आजीविका के बीच संतुलन बनाने में बाधित करती हैं।

  • अभयारण्य शासन में जनजातीय प्रतिनिधित्व का अभाव।
  • कानूनी सुरक्षा के बावजूद मानव-वन्यजीव संघर्ष में वृद्धि।
  • स्थानीय आर्थिक विकास के लिए इको-टूरिज्म का कम उपयोग।
  • MoEFCC, वन विभाग और स्थानीय निकायों के बीच सीमित समन्वय।

आगे का रास्ता: शेरगढ़ अभयारण्य के संरक्षण और विकास को मजबूत बनाना

  • केन्या के सफल मॉडल के आधार पर समुदाय आधारित संरक्षण क्षेत्रों को संस्थागत रूप देना, ताकि स्थानीय सहभागिता और स्वामित्व बढ़े।
  • मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए पूर्व चेतावनी तंत्र, मुआवजा योजना और जागरूकता कार्यक्रम मजबूत करना।
  • विशेष रूप से समुदाय आधारित इको-टूरिज्म अवसंरचना और क्षमता विकास के लिए बजट आवंटन बढ़ाना।
  • WII और NTCA के साथ वैज्ञानिक निगरानी और अनुकूलन प्रबंधन के लिए सहयोग बढ़ाना।
  • राज्य स्तरीय वन और वन्यजीव नीतियों के साथ अभयारण्य प्रबंधन योजनाओं का समन्वय सुनिश्चित करना।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. धारा 18 राज्य सरकार को किसी क्षेत्र को अभयारण्य घोषित करने का अधिकार देती है।
  2. धारा 35 राष्ट्रीय उद्यानों की घोषणा से संबंधित है।
  3. अभयारण्य और राष्ट्रीय उद्यान दोनों की घोषणा के लिए केंद्र सरकार की मंजूरी आवश्यक है।

इनमें से कौन-सा/से कथन सही हैं?

  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2 और 3
  • cकेवल 1 और 3
  • d1, 2 और 3 सभी
उत्तर: (a)
धारा 18 राज्य सरकार को अभयारण्य घोषित करने का अधिकार देती है, यह सही है। धारा 35 राष्ट्रीय उद्यानों की घोषणा से संबंधित है, यह भी सही है। लेकिन अभयारण्य घोषणा के लिए केंद्र सरकार की मंजूरी आवश्यक नहीं होती, जबकि राष्ट्रीय उद्यान के लिए होती है, इसलिए तीसरा कथन गलत है।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
भारत के अभयारण्यों में मानव-वन्यजीव संघर्ष प्रबंधन के संबंध में निम्नलिखित पर विचार करें:
  1. वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत वन्यजीव क्षति के लिए मुआवजा अनिवार्य है।
  2. समुदाय की भागीदारी मानव-वन्यजीव संघर्ष को प्रभावी रूप से कम करती है।
  3. वन संरक्षण अधिनियम, 1980 सीधे मानव-वन्यजीव संघर्ष निवारण को संबोधित करता है।

इनमें से कौन-सा/से कथन सही हैं?

  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2 और 3
  • cकेवल 1 और 3
  • d1, 2 और 3 सभी
उत्तर: (a)
मुआवजा वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत दिया जाता है, यह सही है। समुदाय की भागीदारी संघर्ष कम करने में सहायक होती है, यह भी सही है। वन संरक्षण अधिनियम मुख्यतः वन भूमि के उपयोग को नियंत्रित करता है, सीधे संघर्ष निवारण से जुड़ा नहीं है, इसलिए तीसरा कथन गलत है।

मुख्य प्रश्न

शेरगढ़ अभयारण्य को जैव विविधता संरक्षण और सतत विकास के बीच संतुलन बनाए रखने में किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है? स्थानीय समुदायों की भागीदारी और आर्थिक लाभों को बढ़ाने के लिए आप कौन-से नीतिगत उपाय सुझाएंगे, जिससे पारिस्थितिक संतुलन भी बना रहे? (250 शब्द)

झारखंड एवं JPSC प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: पेपर 3 – पर्यावरण और पारिस्थितिकी, वन संरक्षण
  • झारखंड का नजरिया: झारखंड के वन क्षेत्र भी मानव-वन्यजीव संघर्ष और जनजातीय भागीदारी की चुनौतियों से जूझ रहे हैं, इसलिए शेरगढ़ का मामला तुलना के लिए महत्वपूर्ण है।
  • मुख्य बिंदु: कानूनी प्रावधान, स्थानीय समुदाय समावेशन और आर्थिक संबंधों को उजागर करते हुए उत्तर तैयार करें, झारखंड के वन शासन से तुलना करें।
शेरगढ़ अभयारण्य की घोषणा के लिए कौन-कौन से कानूनी प्रावधान लागू होते हैं?

शेरगढ़ अभयारण्य की घोषणा वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की धारा 18 और 26A के तहत की जाती है, जो राज्य सरकार को अभयारण्य घोषित करने और मुख्य वन्यजीव संरक्षक को प्रबंधन का अधिकार देती हैं।

वन संरक्षण अधिनियम, 1980 का शेरगढ़ अभयारण्य पर क्या प्रभाव है?

वन संरक्षण अधिनियम, 1980 वन भूमि के गैर-वन उपयोग के लिए हस्तांतरण को प्रतिबंधित करता है, जिससे शेरगढ़ अभयारण्य के आवास की सुरक्षा और अखंडता बनी रहती है।

शेरगढ़ अभयारण्य में मुख्य प्रजातियाँ कौन-कौन सी पाई जाती हैं?

यहाँ 25 से अधिक स्तनधारी प्रजातियाँ जैसे भारतीय भेड़िया और चिंकारा, तथा 150 से अधिक पक्षी प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जो इसे बर्डलाइफ इंटरनेशनल द्वारा महत्वपूर्ण पक्षी क्षेत्र बनाती हैं।

शेरगढ़ अभयारण्य में मानव-वन्यजीव संघर्ष प्रबंधन की मुख्य चुनौतियाँ क्या हैं?

मुख्य चुनौतियाँ हैं जनजातीय समुदायों की निर्णय प्रक्रिया में अपर्याप्त भागीदारी, 2023 में 45 संघर्ष मामले, और संघर्ष निवारण के लिए सीमित अवसंरचना, जिससे स्थानीय लोगों को नुकसान होता है।

शेरगढ़ अभयारण्य की समुदाय सहभागिता की तुलना केन्या के मासाई मारा से कैसे की जा सकती है?

मासाई मारा के समेकित समुदाय संरक्षण क्षेत्रों ने वन्यजीव आबादी और स्थानीय आय दोनों में वृद्धि की है, जबकि शेरगढ़ में समुदाय की भागीदारी सीमित है, जिससे आर्थिक लाभ और संघर्ष प्रबंधन प्रभावित होते हैं।

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