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सरायकेला-खरसावां और छऊ नृत्य का परिचय

सरायकेला-खरसावां जिला, जो झारखंड के दक्षिणी हिस्से में स्थित है, लगभग 10.5 लाख की आबादी (2011 की जनगणना) का घर है, जिसमें अनुसूचित जनजातियों की हिस्सेदारी 35.5% है। यह जिला अपनी विशिष्ट छऊ नृत्य परंपरा के लिए विश्व स्तर पर जाना जाता है, जो जनजातीय सांस्कृतिक पहचान और क्षेत्रीय लोककथाओं का संगम है। सरायकेला शैली की छऊ, जिसे 2010 में यूनेस्को अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सूची में शामिल किया गया, अपने जटिल मुखौटों और जीवंत नृत्य की चाल से अन्य छऊ शैलियों जैसे पुरुलिया और मयूरभंज से अलग पहचानी जाती है।

यह विरासत केवल सांस्कृतिक प्रतीक नहीं है, बल्कि पर्यटन और कारीगरों की आजीविका के माध्यम से सामाजिक-आर्थिक विकास का एक महत्वपूर्ण स्रोत भी है। जिले की लक्षित सांस्कृतिक नीतियां और भारतीय व अंतरराष्ट्रीय कानूनी संरक्षण इस अमूर्त विरासत को आधुनिकता के दबावों के बीच बनाए रखने की आवश्यकता को रेखांकित करती हैं।

UPSC प्रासंगिकता

  • GS पेपर 1: भारत की जनजातीय संस्कृति और विरासत
  • GS पेपर 1 और 3: अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सामाजिक-आर्थिक भूमिका
  • निबंध: जनजातीय क्षेत्रों में सांस्कृतिक संरक्षण और आर्थिक विकास

छऊ नृत्य की कानूनी और संवैधानिक सुरक्षा

सरायकेला-खरसावां के जनजातीय समुदायों के सांस्कृतिक अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 के तहत संरक्षित हैं, जो अल्पसंख्यकों और अनुसूचित जनजातियों की सांस्कृतिक पहचान और शैक्षिक अधिकारों की रक्षा करते हैं। राज्य स्तर पर, प्रस्तावित झारखंड स्वदेशी एवं जनजातीय सांस्कृतिक विरासत संरक्षण अधिनियम, 2023 (ड्राफ्ट) जनजातीय कला रूपों, जिनमें छऊ भी शामिल है, की सुरक्षा को संस्थागत रूप देने का प्रयास करता है।

छऊ नृत्य को भौगोलिक संकेत (GI) दर्जा भी प्राप्त है, जो भौगोलिक संकेतों के वस्तुओं (पंजीकरण और संरक्षण) अधिनियम, 1999 के तहत 2010 में (GI आवेदन संख्या 493) दिया गया, जिससे सरायकेला-खरसावां की यह सांस्कृतिक विरासत कानूनी सुरक्षा पाती है और अनधिकृत व्यावसायिक उपयोग से बचती है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, यूनेस्को अमूर्त सांस्कृतिक विरासत संरक्षण कन्वेंशन, 2003 ने 2010 में छऊ के नामांकन को संभव बनाया, जो वैश्विक मान्यता और संरक्षण संसाधनों तक पहुंच प्रदान करता है।

  • अनुच्छेद 29 और 30: जनजातीय अल्पसंख्यकों के सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकारों की रक्षा।
  • झारखंड का प्रस्तावित स्वदेशी एवं जनजातीय सांस्कृतिक विरासत संरक्षण अधिनियम (2023): राज्य स्तर पर कानूनी सुरक्षा।
  • GI अधिनियम, 1999: 2010 में सरायकेला छऊ मुखौटों का पंजीकरण (GI संख्या 493)।
  • यूनेस्को अमूर्त सांस्कृतिक विरासत कन्वेंशन, 2003: 2010 में छऊ का नामांकन।

आर्थिक प्रभाव और पर्यटन विकास

झारखंड के पर्यटन विभाग ने 2023-24 के बजट में जनजातीय कला, जिसमें छऊ नृत्य भी शामिल है, को बढ़ावा देने के लिए 15 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं (झारखंड आर्थिक सर्वेक्षण 2024)। इस लक्षित वित्त पोषण के कारण 2022-23 में सरायकेला-खरसावां के पर्यटन राजस्व में 12% की वृद्धि हुई, जो मुख्य रूप से छऊ प्रदर्शन वाले सांस्कृतिक त्योहारों की वजह से संभव हुई (झारखंड पर्यटन बोर्ड रिपोर्ट 2023)।

जिले में लगभग 5,000 कारीगर और कलाकार सीधे छऊ से जुड़ी गतिविधियों पर निर्भर हैं, जिनमें नर्तक, मुखौटा बनाने वाले, पोशाक डिज़ाइनर और कार्यक्रम आयोजक शामिल हैं (झारखंड जनजातीय कल्याण विभाग, 2023)। छऊ मुखौटों और पोशाकों का स्थानीय हस्तशिल्प बाजार सालाना लगभग 3 करोड़ रुपये का कारोबार करता है, जो इस सांस्कृतिक विरासत की आर्थिक अहमियत को दर्शाता है।

  • 2023-24 में जनजातीय कला को बढ़ावा देने के लिए 15 करोड़ रुपये का आवंटन।
  • छऊ त्योहारों से जुड़े पर्यटन राजस्व में 12% वार्षिक वृद्धि।
  • 5,000 कलाकार और कारीगर छऊ अर्थव्यवस्था पर निर्भर।
  • छऊ संबंधित हस्तशिल्प से 3 करोड़ रुपये वार्षिक आय।

संरक्षण और प्रचार में प्रमुख संस्थान

झारखंड जनजातीय कल्याण विभाग जनजातीय समुदायों के कल्याण और सांस्कृतिक संरक्षण कार्यक्रमों का संचालन करता है, जिसमें छऊ कलाकारों को भी समर्थन मिलता है। झारखंड पर्यटन बोर्ड सांस्कृतिक त्योहारों का आयोजन और प्रचार करता है, जिससे दर्शकों की संख्या बढ़ती है। जिला स्तर पर, सरायकेला-खरसावां जिला सांस्कृतिक कार्यालय स्थानीय कार्यक्रमों और कौशल विकास पहलों का समन्वय करता है।

राष्ट्रीय स्तर पर, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD), नई दिल्ली छऊ के उन्नत प्रशिक्षण और शोध में योगदान देता है, जिससे कौशल हस्तांतरण और नवाचार को बढ़ावा मिलता है। यूनेस्को की मान्यता इस नृत्य रूप के संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय मंच और तकनीकी सहायता उपलब्ध कराती है।

  • झारखंड जनजातीय कल्याण विभाग: सांस्कृतिक संरक्षण और कल्याण।
  • झारखंड पर्यटन बोर्ड: सांस्कृतिक पर्यटन और त्योहारों का प्रचार।
  • सरायकेला-खरसावां जिला सांस्कृतिक कार्यालय: स्थानीय आयोजन और प्रशिक्षण।
  • राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD): उन्नत प्रशिक्षण और शोध।
  • यूनेस्को: अंतरराष्ट्रीय मान्यता और सहायता।

जनसांख्यिकी और सांस्कृतिक प्रोफाइल

जिले की आबादी 10,50,000 (2011 जनगणना) है, जिसमें 35.5% जनजातीय समुदाय हैं, जिनमें मुख्य रूप से हो, मुंडा और संथाल शामिल हैं। यह जनसांख्यिकी क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक एकजुटता की नींव है, जहां छऊ जैसे पारंपरिक कला रूप समुदाय की पहचान और सामाजिक समरसता का हिस्सा हैं।

वार्षिक सरायकेला छऊ महोत्सव में 20,000 से अधिक आगंतुक आते हैं, जो इसे सांस्कृतिक पर्यटन और जनजातीय सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण बनाता है (झारखंड पर्यटन बोर्ड, 2023)। इस नृत्य की मुखौटा वाली शैली सरायकेला की विशिष्टता है और इसे मुखौटा रहित पुरुलिया छऊ से भेद करना आवश्यक है।

  • आबादी: 10,50,000 (2011 जनगणना)।
  • अनुसूचित जनजाति: कुल आबादी का 35.5%
  • वार्षिक सरायकेला छऊ महोत्सव: 20,000+ आगंतुक।
  • मुखौटा वाली शैली से पुरुलिया छऊ से अलग पहचान।

तुलनात्मक अध्ययन: सरायकेला-खरसावां छऊ और बास्क ऑरेस्कू नृत्य (स्पेन)

पहलू सरायकेला-खरसावां छऊ (झारखंड) बास्क ऑरेस्कू नृत्य (स्पेन)
सांस्कृतिक पहचान स्थानीय जनजातीय पहचान से जुड़ा मार्शल नृत्य क्षेत्रीय गौरव का प्रतीक पारंपरिक बास्क नृत्य
सरकारी समर्थन राज्य निधि (15 करोड़ रुपये), GI संरक्षण, यूनेस्को सूचीबद्धता क्षेत्रीय सरकार की सांस्कृतिक नीतियां, यूरोपीय संघ के सांस्कृतिक कोष
पर्यटन प्रभाव छऊ त्योहारों से 12% वार्षिक पर्यटन वृद्धि सांस्कृतिक ब्रांडिंग के बाद 10% पर्यटन वृद्धि
कारीगरों की आजीविका लगभग 5,000 कारीगर छऊ अर्थव्यवस्था पर निर्भर स्थानीय कारीगर सांस्कृतिक सहकारिता के माध्यम से समर्थित
चुनौतियां कौशल हस्तांतरण की कमी; कलाकारों की कमी परंपरा और आधुनिकता का संतुलन; युवाओं की भागीदारी

संरक्षण और स्थिरता में प्रमुख चुनौतियां

कानूनी सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय मान्यता के बावजूद, सरायकेला-खरसावां में छऊ की अमूर्त विरासत को बनाए रखने में चुनौतियां हैं। युवा पीढ़ी के लिए व्यवस्थित कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रमों का अभाव पारंपरिक ज्ञान के धीरे-धीरे कम होने का कारण बन रहा है। इसके अलावा, उभरते कलाकारों के लिए स्थायी आजीविका योजनाएं अपर्याप्त हैं, जिससे कलाकारों और कारीगरों की कमी का खतरा है।

ये कमियां छऊ के जीवंत परंपरा के दीर्घकालिक अस्तित्व और वर्तमान में इसके सामाजिक-आर्थिक लाभों को खतरे में डालती हैं। इन्हें दूर करने के लिए सांस्कृतिक शिक्षा, वित्तीय सहायता और बाजार पहुंच को जोड़ने वाली एकीकृत नीतिगत उपायों की जरूरत है।

  • युवा पीढ़ी के लिए व्यवस्थित कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रमों का अभाव।
  • उभरते कलाकारों के लिए अपर्याप्त स्थायी आजीविका योजनाएं।
  • सांस्कृतिक क्षरण और कलाकारों की कमी का खतरा।
  • सांस्कृतिक और आर्थिक नीतिगत हस्तक्षेपों की आवश्यकता।

महत्व और आगे का रास्ता

सरायकेला-खरसावां की छऊ नृत्य विरासत यह दर्शाती है कि जनजातीय सांस्कृतिक धरोहर क्षेत्रीय पहचान और आर्थिक विकास को कैसे बढ़ावा दे सकती है। झारखंड की सांस्कृतिक नीतियों के तहत संस्थागत ढांचे को मजबूत करना, विशेषकर प्रस्तावित स्वदेशी एवं जनजातीय सांस्कृतिक विरासत संरक्षण अधिनियम के माध्यम से, इस विरासत की सुरक्षा के लिए जरूरी है।

नीति का ध्यान औपचारिक प्रशिक्षण केंद्र स्थापित करने, युवाओं की भागीदारी को प्रोत्साहित करने, कारीगरों के लिए बाजार संबंधी अवसर बढ़ाने और पर्यटन के लिए त्योहारों की बुनियादी सुविधाओं को बेहतर बनाने पर होना चाहिए। यूनेस्को और GI दर्जा का लाभ उठाकर अंतरराष्ट्रीय वित्तीय और तकनीकी सहायता आकर्षित की जा सकती है। इस बहुआयामी रणनीति से छऊ नृत्य एक जीवंत और आर्थिक रूप से टिकाऊ परंपरा बनेगा।

  • कौशल प्रशिक्षण और हस्तांतरण कार्यक्रमों को संस्थागत बनाना।
  • स्थायी आजीविका और बाजार पहुंच योजनाओं का विस्तार।
  • यूनेस्को और GI दर्जा का उपयोग वित्त और तकनीकी सहायता के लिए।
  • सांस्कृतिक पर्यटन अवसंरचना और प्रचार को मजबूत करना।
  • सांस्कृतिक संरक्षण को सामाजिक-आर्थिक विकास नीतियों के साथ जोड़ना।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
सरायकेला-खरसावां छऊ नृत्य के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. सरायकेला छऊ जटिल मुखौटों के उपयोग से पहचाना जाता है।
  2. पुरुलिया छऊ शैली भी मुखौटों का व्यापक उपयोग करती है।
  3. छऊ नृत्य को 2010 में यूनेस्को अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल किया गया।
  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2 और 3
  • cकेवल 1 और 3
  • d1, 2 और 3 सभी
उत्तर: (c)
कथन 1 सही है क्योंकि सरायकेला छऊ जटिल मुखौटों के लिए जाना जाता है। कथन 2 गलत है क्योंकि पुरुलिया छऊ बिना मुखौटे के होता है। कथन 3 सही है; छऊ को 2010 में यूनेस्को द्वारा सूचीबद्ध किया गया।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
सरायकेला-खरसावां छऊ के कानूनी संरक्षण के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. भौगोलिक संकेत अधिनियम छऊ की अनूठी सांस्कृतिक वस्तुओं की सुरक्षा करता है।
  2. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 30 जनजातीय समुदायों के सांस्कृतिक अधिकारों की रक्षा करता है।
  3. झारखंड स्वदेशी एवं जनजातीय सांस्कृतिक विरासत संरक्षण अधिनियम, 2020 में केंद्र सरकार द्वारा लागू किया गया कानून है।
  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2 और 3
  • cकेवल 1 और 3
  • d1, 2 और 3 सभी
उत्तर: (a)
कथन 1 सही है; GI अधिनियम छऊ मुखौटों की सुरक्षा करता है। कथन 2 सही है; अनुच्छेद 30 जनजातीय सांस्कृतिक अधिकारों की रक्षा करता है। कथन 3 गलत है; झारखंड अधिनियम 2023 का प्रस्तावित मसौदा है, 2020 में लागू केंद्रीय कानून नहीं।

मुख्य प्रश्न

सरायकेला-खरसावां जिले की छऊ नृत्य विरासत जनजातीय पहचान और सामाजिक-आर्थिक विकास को बढ़ावा देने में किस प्रकार भूमिका निभाती है? इसके संरक्षण में आने वाली चुनौतियों का मूल्यांकन करें और झारखंड में इस अमूर्त सांस्कृतिक विरासत को बनाए रखने के लिए नीति सुझाव दें।

झारखंड और JPSC प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: पेपर 1 – जनजातीय संस्कृति और विरासत; पेपर 3 – आर्थिक विकास और पर्यटन
  • झारखंड दृष्टिकोण: सरायकेला-खरसावां की जनजातीय आबादी (35.5%) और छऊ नृत्य केंद्रित सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था
  • मुख्य बिंदु: संवैधानिक संरक्षण, राज्य-विशिष्ट सांस्कृतिक नीतियां, पर्यटन और कारीगरों के आर्थिक आंकड़े, कौशल हस्तांतरण में अंतराल
सरायकेला छऊ को अन्य छऊ शैलियों से क्या अलग करता है?

सरायकेला छऊ जटिल मुखौटों और मार्शल नृत्य चालों के कारण अलग पहचाना जाता है, जबकि पुरुलिया छऊ बिना मुखौटे के होता है। यह सरायकेला-खरसावां की जनजातीय सांस्कृतिक कथाओं को दर्शाता है।

छऊ नृत्य कब यूनेस्को अमूर्त सांस्कृतिक विरासत में शामिल हुआ?

छऊ नृत्य को 2010 में यूनेस्को अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल किया गया, जिससे इसके संरक्षण की जरूरत को मान्यता मिली।

सरायकेला छऊ मुखौटों के GI पंजीकरण का क्या महत्व है?

GI पंजीकरण (2010) सरायकेला छऊ मुखौटों को एक अनूठी सांस्कृतिक वस्तु के रूप में कानूनी सुरक्षा देता है, अनाधिकृत व्यावसायिक उपयोग को रोकता है और कारीगरों की आजीविका को समर्थन करता है।

झारखंड सरकार छऊ नृत्य का कैसे समर्थन करती है?

झारखंड सरकार 2023-24 में पर्यटन विभाग के माध्यम से 15 करोड़ रुपये जनजातीय कला, जिसमें छऊ शामिल है, के प्रचार के लिए आवंटित करती है, त्योहारों का आयोजन करती है और जनजातीय सांस्कृतिक विरासत संरक्षण के लिए कानून प्रस्तावित करती है।

सरायकेला-खरसावां में छऊ नृत्य के संरक्षण में मुख्य चुनौतियां क्या हैं?

मुख्य चुनौतियों में युवा पीढ़ी के लिए व्यवस्थित कौशल प्रशिक्षण की कमी, कलाकारों के लिए पर्याप्त स्थायी आजीविका योजनाओं का अभाव और आधुनिकता के कारण सांस्कृतिक क्षरण का खतरा शामिल है।

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