पृष्ठभूमि और संदर्भ
31 अक्टूबर 2019 को Article 370 के निरस्त होने और Jammu and Kashmir Reorganisation Act, 2019 के लागू होने के बाद लद्दाख को बिना विधानमंडल वाले केंद्र शासित प्रदेश के रूप में स्थापित किया गया। इस पुनर्गठन में जम्मू-कश्मीर को विधानमंडल सहित केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया, जबकि लद्दाख को बिना विधानमंडल के केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया। लद्दाख में बौद्ध बहुल लेह और मुस्लिम बहुल कारगिल जिले शामिल हैं, जहां राज्यhood, संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने, नौकरी आरक्षण और अलग संसदीय क्षेत्र बनाने की मांगों को लेकर प्रदर्शन हो रहे हैं। ये मांगें वर्तमान शासन मॉडल में राजनीतिक प्रतिनिधित्व और जातीय सुरक्षा के अभाव को उजागर करती हैं।
- लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद विधानमंडल नहीं है, जिससे स्थानीय राजनीतिक प्रतिनिधित्व सीमित हो गया है।
- प्रदर्शनकारी जातीय पहचान की सुरक्षा और स्वायत्तता के लिए संवैधानिक सुरक्षा चाहते हैं।
- छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग जनजातीय दर्जा और प्रशासनिक स्वायत्तता सुनिश्चित करने के लिए है।
- नौकरी आरक्षण की मांग स्थानीय रोजगार को प्राथमिकता देने के लिए है।
- लेह और कारगिल के लिए अलग संसदीय सीटें अभी तक नहीं बनी हैं।
UPSC प्रासंगिकता
- GS पेपर 2: भारतीय संविधान—संघवाद, केंद्र शासित प्रदेश, Article 370 निरस्तीकरण, छठी अनुसूची प्रावधान।
- GS पेपर 1: भारतीय समाज—जातीय विविधता, जनजातीय अधिकार, क्षेत्रीय स्वायत्तता।
- निबंध: Article 370 के बाद लद्दाख में संवैधानिक स्वायत्तता और क्षेत्रीय मांगें।
संवैधानिक और कानूनी ढांचा
Article 370 के निरस्त होने के बाद Constitution (Application to Jammu and Kashmir) Order, 2019 के तहत जम्मू-कश्मीर की विशेष स्थिति समाप्त हुई, जिससे संसद को राज्य पुनर्गठित करने का अधिकार मिला। Jammu and Kashmir Reorganisation Act, 2019 के तहत राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांटा गया। लद्दाख को बिना विधानमंडल वाला केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया, जबकि जम्मू-कश्मीर को विधानमंडल सहित। इससे स्थानीय स्वायत्तता पर सवाल उठे हैं।
- Article 244(2) के तहत राष्ट्रपति को अधिकार है कि वे जनजातीय क्षेत्रों में छठी अनुसूची लागू करें, जिससे स्वायत्त जिला परिषदें (ADCs) बनती हैं जिनके पास विधायी, कार्यकारी और न्यायिक शक्तियां होती हैं।
- वर्तमान में छठी अनुसूची केवल असम, मेघालय, मिजोरम और त्रिपुरा के जनजातीय इलाकों पर लागू है।
- छठी अनुसूची के तहत ADCs भूमि, वन, जल, कृषि, सामाजिक रीति-रिवाज और स्थानीय प्रशासन पर कानून बना सकते हैं।
- सुप्रीम कोर्ट के फैसलों और आर. एन. रवि समिति की सिफारिशों ने लद्दाख में छठी अनुसूची लागू करने की जरूरत पर बल दिया है ताकि जनजातीय सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
- लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद (LAHDC) है, लेकिन इसकी शक्तियां छठी अनुसूची के ADCs की तुलना में सीमित हैं।
आर्थिक स्थिति और संसाधन नियंत्रण
2023-24 के Economic Survey के अनुसार, लद्दाख का भारत के GDP में योगदान लगभग 0.03% है। केंद्र सरकार ने 2023-24 के बजट में लद्दाख को ₹1,200 करोड़ आवंटित किए, जिसमें से ₹150 करोड़ Border Area Development Programme (BADP) के लिए हैं। पर्यटन स्थानीय अर्थव्यवस्था का 15-20% हिस्सा है, और 2023 में 3.5 लाख से ज्यादा पर्यटक आए।
- छठी अनुसूची में शामिल होने से लद्दाख को प्राकृतिक संसाधनों पर अधिक नियंत्रण मिलेगा, जिससे स्थानीय राजस्व बढ़ेगा।
- नौकरी आरक्षण की मांग इसलिए है क्योंकि UT प्रशासन में 70% स्थानीय रोजगार की प्राथमिकता नहीं है।
- बुनियादी ढांचे का विकास केंद्र के आवंटन पर निर्भर है, जो स्वायत्त योजना को सीमित करता है।
- पर्यटन में 2022 से 2023 तक 25% की वृद्धि ने स्थायी स्थानीय प्रशासन की जरूरत को बढ़ा दिया है।
संस्थागत व्यवस्था और शासन की चुनौतियां
लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद (LAHDC) स्थानीय शासन चलाती है, लेकिन इसके पास विधायी अधिकार नहीं हैं। गृह मंत्रालय (MHA) UT प्रशासन की देखरेख करता है। छठी अनुसूची के ADCs की तरह LAHDC कानून बनाने या न्यायिक शक्तियां नहीं रखती। भारत का Election Commission परिसीमन और संसदीय सीट आवंटन करता है, लेकिन लेह और कारगिल के लिए अलग सीटें नहीं बनाई गई हैं।
- छठी अनुसूची के ADCs के पास विधायी, कार्यकारी और न्यायिक शक्तियां संविधान द्वारा सुनिश्चित हैं।
- LAHDC की सीमित शक्तियां प्रभावी स्वशासन और जातीय प्रतिनिधित्व में बाधा हैं।
- राष्ट्रीय आयोग जनजातीय (NCST) जनजातीय कल्याण के लिए काम करता है, लेकिन लद्दाख का जनजातीय दर्जा छठी अनुसूची में मान्यता प्राप्त नहीं है।
- लद्दाख में विधानमंडल न होने से राजनीतिक प्रतिनिधित्व और नीति स्वायत्तता सीमित होती है।
तुलनात्मक विश्लेषण: छठी अनुसूची ADCs बनाम लद्दाख UT शासन
| पहलू | छठी अनुसूची ADCs (असम, मेघालय, मिजोरम, त्रिपुरा) | लद्दाख UT (2019 के बाद) |
|---|---|---|
| संवैधानिक आधार | Article 244(2), छठी अनुसूची | Jammu and Kashmir Reorganisation Act, 2019; छठी अनुसूची लागू नहीं |
| विधायी शक्तियां | भूमि, वन, जल, सामाजिक रीति-रिवाज पर कानून बना सकते हैं | विधानमंडल नहीं; LAHDC के पास केवल सलाहकारी और प्रशासनिक भूमिका |
| कार्यकारी शक्तियां | जनजातीय क्षेत्रों में स्वायत्त प्रशासन | MHA के तहत UT प्रशासन द्वारा प्रबंधन |
| न्यायिक शक्तियां | परंपरागत कानूनों और विवादों के लिए अपने न्यायालय | न्यायिक स्वायत्तता नहीं; UT न्यायपालिका के अधीन |
| राजनीतिक प्रतिनिधित्व | आरक्षित सीटें और स्थानीय शासन संरचनाएं | लेह और कारगिल के लिए अलग संसदीय सीटें नहीं |
| संसाधन नियंत्रण | स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों और राजस्व पर नियंत्रण | संसाधन नियंत्रण केंद्रीकृत; सीमित स्थानीय राजस्व |
महत्व और आगे का रास्ता
- लद्दाख की छठी अनुसूची में शामिल होने की मांग संविधान द्वारा गारंटीकृत स्वायत्तता और स्वदेशी अधिकारों की सुरक्षा की इच्छा को दर्शाती है।
- राज्यhood की मांग से विधानमंडल स्थापित होगा, जिससे राजनीतिक प्रतिनिधित्व और स्थानीय शासन बेहतर होगा।
- छठी अनुसूची में शामिल होने से लद्दाख को पूर्वोत्तर के जनजातीय क्षेत्रों जैसी विधायी, कार्यकारी और न्यायिक स्वायत्तता मिल सकती है।
- नौकरी आरक्षण और अलग संसदीय क्षेत्र बनाने से जातीय प्रतिनिधित्व और स्थानीय भागीदारी बढ़ेगी।
- केंद्र, लद्दाख UT प्रशासन और स्थानीय हितधारकों के बीच नीति संवाद आवश्यक है ताकि क्षेत्रीय आकांक्षाओं और राष्ट्रीय एकता के बीच संतुलन बनाया जा सके।
- यह निर्दिष्ट जनजातीय क्षेत्रों में विधायी, कार्यकारी और न्यायिक शक्तियों वाली स्वायत्त जिला परिषदों के लिए प्रावधान करती है।
- छठी अनुसूची वर्तमान में जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के जनजातीय क्षेत्रों पर लागू है।
- छठी अनुसूची के तहत ADCs भूमि और वन प्रबंधन पर कानून बना सकते हैं।
- लद्दाख के पास Jammu and Kashmir Reorganisation Act, 2019 के तहत विधानमंडल है।
- लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद (LAHDC) के पास सीमित प्रशासनिक शक्तियां हैं लेकिन विधायी अधिकार नहीं।
- गृह मंत्रालय (MHA) सीधे लद्दाख UT का प्रशासन करता है।
इनमें से कौन-से कथन सही हैं?
मुख्य प्रश्न
Article 370 के निरस्तीकरण के बाद लद्दाख में राजनीतिक स्वायत्तता और शासन की चुनौतियों के संदर्भ में राज्यhood और छठी अनुसूची में शामिल करने की मांगों की समीक्षा करें। संबंधित संवैधानिक प्रावधानों पर चर्चा करें और स्थानीय आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए सुझाव दें।
झारखंड और JPSC प्रासंगिकता
- JPSC पेपर: पेपर 2 (राजनीति और शासन) – केंद्र शासित प्रदेश और जनजातीय स्वायत्तता
- झारखंड का दृष्टिकोण: झारखंड में कई छठी अनुसूची क्षेत्र हैं; लद्दाख की मांगों को समझना जनजातीय शासन और स्वायत्तता मॉडल का तुलनात्मक अध्ययन प्रदान करता है।
- मुख्य बिंदु: उत्तर तैयार करते समय संवैधानिक प्रावधानों को उजागर करें और पूर्वोत्तर भारत व झारखंड के छठी अनुसूची मॉडल के साथ लद्दाख की अनूठी स्थिति की तुलना करें।
Article 370 का लद्दाख के संदर्भ में क्या महत्व है?
Article 370 ने जम्मू-कश्मीर सहित लद्दाख को विशेष स्वायत्त दर्जा दिया था। 2019 में इसका निरस्तीकरण राज्य के पुनर्गठन और लद्दाख को बिना विधानमंडल वाला केंद्र शासित प्रदेश बनाने का कारण बना, जिससे स्वायत्तता बढ़ाने की मांगें उठीं।
छठी अनुसूची के स्वायत्त जिला परिषदों के पास क्या शक्तियां होती हैं?
छठी अनुसूची के ADCs के पास भूमि, वन, जल, कृषि, सामाजिक रीति-रिवाज और स्थानीय शासन पर विधायी, कार्यकारी और न्यायिक शक्तियां होती हैं, जो उन्हें व्यापक स्वायत्तता प्रदान करती हैं।
लद्दाख के लोग छठी अनुसूची में शामिल होने की मांग क्यों करते हैं?
इसमें शामिल होने से लद्दाख को जनजातीय अधिकारों के लिए संवैधानिक सुरक्षा, विधायी और न्यायिक स्वायत्तता, प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण और जातीय पहचान की सुरक्षा मिलेगी, जो वर्तमान UT शासन में सीमित है।
लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद की भूमिका क्या है?
LAHDC स्थानीय शासन का प्रबंधन करती है लेकिन इसके पास विधायी और न्यायिक अधिकार नहीं हैं, जो छठी अनुसूची के ADCs के विपरीत है।
लद्दाख की आर्थिक स्थिति उसके स्वायत्तता की मांग को कैसे प्रभावित करती है?
कम GDP योगदान और केंद्र पर निर्भरता के कारण लद्दाख स्थानीय संसाधनों और राजस्व पर नियंत्रण, स्थानीय रोजगार को बढ़ावा देने और पर्यटन के सतत विकास के लिए स्वायत्तता चाहता है।
अधिकारिक स्रोत एवं आगे पढ़ाई
स्रोत: LearnPro Editorial | सामान्य अध्ययन | प्रकाशित: 18 March 2026 | अंतिम अपडेट: 8 April 2026
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