झारखंड के संरक्षित क्षेत्रों का परिचय
झारखंड में 6 वन्यजीव अभयारण्य और 1 राष्ट्रीय उद्यान हैं, जो लगभग 1,300 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हुए हैं, जो राज्य के कुल क्षेत्रफल का लगभग 4.5% है (झारखंड वन विभाग, 2023)। सबसे पहला राष्ट्रीय उद्यान, बेतला राष्ट्रीय उद्यान 1974 में स्थापित हुआ था और इसका क्षेत्रफल 226 वर्ग किलोमीटर है। वहीं, डलमा वन्यजीव अभयारण्य लगभग 193 वर्ग किलोमीटर में फैला है, जिसमें 200 से अधिक पक्षी प्रजातियां और 20 से ज्यादा स्तनधारी पाए जाते हैं (वन्यजीव संस्थान, भारत, 2023)। ये संरक्षित क्षेत्र झारखंड के विशिष्ट जैव विविधता को बचाए हुए हैं, जिसमें शुष्क पर्णपाती जंगल और स्थानीय प्रजातियां शामिल हैं।
JPSC परीक्षा से संबंधित
- JPSC सामान्य अध्ययन पेपर 1: पर्यावरण और पारिस्थितिकी — झारखंड के संरक्षित क्षेत्र
- पेपर 2: भूगोल — झारखंड के वन आवरण और जैव विविधता के आंकड़े
- पिछले वर्षों के प्रश्न: बेतला राष्ट्रीय उद्यान और डलमा अभयारण्य का पारिस्थितिक महत्व (JPSC 2019, 2021)
झारखंड के संरक्षित क्षेत्रों के लिए कानूनी ढांचा
झारखंड के संरक्षित क्षेत्र मुख्य रूप से वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 (संशोधित 2006) के तहत संचालित होते हैं, जिसमें विशेष रूप से धारा 18 से 38 तक राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव अभयारण्यों के नियम निर्धारित हैं। वन संरक्षण अधिनियम, 1980 (धारा 2 और 3) इन क्षेत्रों में वन भूमि के उपयोग परिवर्तन को नियंत्रित करता है। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 (धारा 3 और 5) केंद्र एवं राज्य सरकारों को पर्यावरण सुरक्षा लागू करने का अधिकार देता है। इसके अतिरिक्त, झारखंड ने झारखंड वन संरक्षण नियम, 2003 भी बनाए हैं। सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले जैसे T.N. Godavarman Thirumulpad बनाम भारत संघ (1996) ने वन संरक्षण को संवैधानिक दायित्व के रूप में मजबूत किया है।
- वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972: संरक्षित क्षेत्रों की परिभाषा, शिकार पर रोक, प्रबंधन योजनाओं का प्रावधान।
- वन संरक्षण अधिनियम, 1980: वन भूमि के उपयोग के लिए केंद्र की मंजूरी आवश्यक, अतिक्रमण सीमित।
- पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986: पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों की घोषणा की अनुमति।
- झारखंड वन संरक्षण नियम, 2003: राज्य स्तर पर वन संरक्षण के लिए संचालनात्मक दिशा-निर्देश।
- सुप्रीम कोर्ट के निर्णय: वन और वन्यजीव संरक्षण को संवैधानिक जिम्मेदारी के रूप में रेखांकित।
झारखंड के संरक्षित क्षेत्रों का पारिस्थितिक और जैव विविधता प्रोफाइल
झारखंड के जंगल राज्य के क्षेत्रफल का लगभग 29.6% हिस्सा घेरते हैं (वन सर्वेक्षण भारत, 2023) और ये मुख्यतः शुष्क पर्णपाती जंगल हैं, जो समृद्ध जैव विविधता का आधार हैं। बेतला राष्ट्रीय उद्यान में बाघ, हाथी और तेंदुए जैसे बड़े जानवर रहते हैं, जबकि डलमा अभयारण्य पक्षियों की विविधता और स्लॉथ भालू, हिरण जैसे स्तनधारियों के लिए जाना जाता है। 2019 से 2023 के बीच राज्य में वन आवरण में 3% की वृद्धि दर्ज की गई है, जो वन पुनरुद्धार के सकारात्मक संकेत हैं।
- बेतला राष्ट्रीय उद्यान: 1973 से प्रोजेक्ट टाइगर के तहत बाघ और हाथी की निगरानी।
- डलमा वन्यजीव अभयारण्य: 200 से अधिक पक्षी प्रजातियां, प्रवासी पक्षियों के लिए महत्वपूर्ण।
- अन्य अभयारण्य: हजारीबाग, पलामू, और लावलांग क्षेत्रीय जैव विविधता गलियारों में योगदान देते हैं।
- वन आवरण: झारखंड का 29.6%, जो राष्ट्रीय औसत 21.7% से ऊपर है (FSI, 2023)।
- वन आवरण में वृद्धि का श्रेय वनीकरण और संरक्षण प्रयासों को जाता है।
झारखंड के संरक्षित क्षेत्रों का आर्थिक पक्ष
झारखंड ने 2023-24 के बजट में वन और वन्यजीव संरक्षण के लिए ₹150 करोड़ का प्रावधान किया है (झारखंड राज्य बजट, 2023-24)। संरक्षित क्षेत्रों में इको-टूरिज्म से लगभग ₹25 करोड़ वार्षिक आय होती है, जो स्थानीय अर्थव्यवस्था को सहारा देती है (झारखंड पर्यटन विभाग, 2022)। वन आधारित आजीविका से 12 लाख से अधिक आदिवासी परिवार जुड़े हैं (जनगणना 2011, वन सर्वेक्षण भारत 2023)। हालांकि, अवैध लकड़ी व्यापार से सालाना ₹50 करोड़ का नुकसान होता है (झारखंड वन विभाग, 2022), जो संरक्षण प्रयासों के लिए बड़ी चुनौती है।
- बजट का उपयोग अवसंरचना, तस्करी रोकथाम और समुदाय सहभागिता पर केंद्रित।
- इको-टूरिज्म रोजगार और राजस्व में योगदान, खासकर बेतला और डलमा के आसपास।
- वन उत्पादों का संग्रह आदिवासी आजीविका के लिए अहम।
- अवैध लकड़ी व्यापार प्रवर्तन में कमी के कारण जारी चुनौती।
झारखंड में संरक्षण के लिए संस्थागत ढांचा
झारखंड वन विभाग संरक्षित क्षेत्रों का मुख्य प्रबंधन करता है, जिसे डेटा और निगरानी के लिए वन सर्वेक्षण भारत (FSI) का सहयोग मिलता है। वन्यजीव संस्थान, भारत (WII) शोध और प्रशिक्षण प्रदान करता है। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) राष्ट्रीय नीतियां और नियम बनाता है। झारखंड राज्य जैव विविधता बोर्ड जैव विविधता अधिनियम, 2002 के तहत संरक्षण कार्य करता है, जबकि केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण (CZA) प्रजनन और चिड़ियाघर प्रबंधन को नियंत्रित करता है।
- झारखंड वन विभाग: क्षेत्रीय प्रबंधन, प्रवर्तन, तस्करी रोकथाम।
- FSI: वन आवरण आंकड़े और जैव विविधता की निगरानी।
- WII: क्षमता विकास और वैज्ञानिक शोध।
- MoEFCC: नीति निर्धारण, वित्त पोषण, कानूनी निगरानी।
- झारखंड राज्य जैव विविधता बोर्ड: स्थानीय संरक्षण और जागरूकता।
- CZA: प्रजनन कार्यक्रमों का नियमन।
झारखंड के संरक्षित क्षेत्रों की चुनौतियां
कानूनी सुरक्षा के बावजूद, झारखंड के संरक्षित क्षेत्रों में प्रवर्तन की कमजोरी, मानवीय दबाव और समुदायों का सीमित समावेशन बड़ी बाधाएं हैं। 2020 से 2023 के बीच मानव-वन्यजीव संघर्ष में 15% की वृद्धि हुई है (झारखंड वन विभाग वार्षिक रिपोर्ट, 2023), जो आवासीय विखंडन और संसाधन प्रतिस्पर्धा को दर्शाता है। लाभ साझा करने और भागीदारी पर काम न होने से स्थानीय समर्थन कमजोर होता है, जिससे सतत प्रबंधन प्रभावित होता है।
- अतिक्रमण और अवैध संसाधन दोहन प्रवर्तन की कमी के कारण जारी।
- वन के आसपास बढ़ते मानव बस्तियों से मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ा।
- समुदाय की कम भागीदारी से नियमों का पालन कमजोर और विवाद बढ़े।
- प्रबंधन के लिए वित्तीय और तकनीकी संसाधनों की कमी।
तुलनात्मक अध्ययन: झारखंड बनाम नेपाल का चितवन राष्ट्रीय उद्यान
| पहलू | झारखंड के संरक्षित क्षेत्र | चितवन राष्ट्रीय उद्यान, नेपाल |
|---|---|---|
| समुदाय की भागीदारी | सीमित समावेशन; लाभ साझा करने के तंत्र कमज़ोर | मजबूत समुदाय आधारित संरक्षण, बफर जोन प्रबंधन |
| जैव विविधता की पुनरुद्धार | धीमी गति; बाघ और हाथी की संख्या स्थिर लेकिन खतरे में | एक दशक में बाघ की संख्या में 40% वृद्धि (नेपाल राष्ट्रीय उद्यान विभाग, 2022) |
| मानव-वन्यजीव संघर्ष | 2020-23 में 15% वृद्धि | समुदाय सहभागिता और मुआवजा योजनाओं से संघर्ष में कमी |
| इको-टूरिज्म राजस्व | ₹25 करोड़ वार्षिक | सतत पर्यटन मॉडल के साथ अधिक आय |
महत्व और आगे का रास्ता
- झारखंड के संरक्षित क्षेत्र महत्वपूर्ण जैव विविधता को बचाते हैं और आदिवासी आजीविका को सहारा देते हैं, जो पारिस्थितिक और सामाजिक-आर्थिक स्थिरता में योगदान देते हैं।
- अवैध गतिविधियों को रोकने के लिए तकनीक और वित्तीय संसाधनों के जरिये प्रवर्तन को मजबूत करना जरूरी है।
- स्थानीय समुदायों को भागीदारी और लाभ साझा करने के माध्यम से जोड़ने से संघर्ष कम होंगे और संरक्षण बेहतर होगा।
- नेपाल जैसे सफल मॉडलों को अपनाकर नीति सुधार की दिशा में काम किया जा सकता है।
- बेहतर आंकड़ा संग्रह और वैज्ञानिक शोध से अनुकूल प्रबंधन रणनीतियां विकसित होंगी।
झारखंड और JPSC से संबंधित
- JPSC पेपर: GS पेपर 1 (पर्यावरण और पारिस्थितिकी), GS पेपर 2 (भूगोल और राज्य अर्थव्यवस्था)
- झारखंड के संदर्भ: बेतला राष्ट्रीय उद्यान, डलमा वन्यजीव अभयारण्य और राज्य के वन आवरण के रुझान पर विस्तृत जानकारी।
- मेन्स के लिए टिप: कानूनी ढांचे, जैव विविधता आंकड़े, आर्थिक प्रभाव और समुदाय सहभागिता की चुनौतियों पर आधारित उत्तर तैयार करें।
- राष्ट्रीय उद्यानों में मुख्य वन्यजीव संरक्षक द्वारा अनुमति के बिना सभी मानव गतिविधियां निषिद्ध हैं।
- वन्यजीव अभयारण्यों में नियंत्रित मानव गतिविधियां जैसे चराई और लघु वन उत्पाद संग्रह की अनुमति होती है।
- राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव अभयारण्यों दोनों के सीमांत बदलाव के लिए केंद्र सरकार की मंजूरी आवश्यक है।
इनमें से कौन-से कथन सही हैं?
- झारखंड का वन आवरण उसके कुल क्षेत्रफल का लगभग 30% है।
- 2019 से 2023 के बीच झारखंड में वन आवरण में 3% की कमी आई है।
- झारखंड का वन आवरण राष्ट्रीय औसत से अधिक है।
इनमें से कौन-से कथन सही हैं?
मेन्स प्रश्न: झारखंड के संरक्षित क्षेत्रों के प्रबंधन में प्रमुख चुनौतियों का विश्लेषण करें और जैव विविधता संरक्षण तथा समुदाय की भागीदारी बढ़ाने के लिए नीतिगत उपाय सुझाएं।
झारखंड के प्रमुख संरक्षित क्षेत्र कौन-कौन से हैं?
झारखंड में 6 वन्यजीव अभयारण्य और 1 राष्ट्रीय उद्यान हैं। प्रमुख में बेतला राष्ट्रीय उद्यान (226 वर्ग किलोमीटर) और डलमा वन्यजीव अभयारण्य (193 वर्ग किलोमीटर) शामिल हैं, जो अपनी समृद्ध जैव विविधता और पारिस्थितिक महत्व के लिए जाने जाते हैं।
झारखंड के संरक्षित क्षेत्रों पर कौन-कौन से कानून लागू होते हैं?
मुख्य कानून हैं: वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 (धारा 18-38), वन संरक्षण अधिनियम, 1980, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986, और झारखंड वन संरक्षण नियम, 2003। सुप्रीम कोर्ट के फैसले जैसे T.N. Godavarman Thirumulpad बनाम भारत संघ भी प्रवर्तन को प्रभावित करते हैं।
झारखंड में वर्तमान वन आवरण प्रतिशत कितना है?
वन सर्वेक्षण भारत 2023 के अनुसार, झारखंड का वन आवरण उसके कुल क्षेत्रफल का 29.6% है, जो राष्ट्रीय औसत 21.7% से अधिक है।
झारखंड में संरक्षण के लिए समुदाय की भागीदारी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कैसी है?
झारखंड में संरक्षण प्रबंधन में समुदाय की भागीदारी सीमित है, जबकि नेपाल के चितवन राष्ट्रीय उद्यान जैसे मॉडल में बफर जोन प्रबंधन और लाभ साझा करने के माध्यम से समुदाय को मजबूत रूप से जोड़ा गया है, जिससे बेहतर संरक्षण परिणाम मिल रहे हैं।
झारखंड के संरक्षित क्षेत्रों से आर्थिक लाभ क्या हैं?
संरक्षित क्षेत्र इको-टूरिज्म से लगभग ₹25 करोड़ वार्षिक आय उत्पन्न करते हैं और वन संसाधनों पर निर्भर 12 लाख से अधिक आदिवासी परिवारों का सहारा हैं। हालांकि, अवैध लकड़ी व्यापार से सालाना ₹50 करोड़ का नुकसान होता है।
सरकारी स्रोत और आगे पढ़ाई के लिए
स्रोत: LearnPro Editorial | सामान्य अध्ययन | प्रकाशित: 12 March 2026 | अंतिम अपडेट: 26 April 2026
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