झारखंड के संरक्षित क्षेत्रों का परिचय
झारखंड में कुल 7 संरक्षित क्षेत्र हैं, जिनमें 1 राष्ट्रीय उद्यान और 6 वन्यजीव अभयारण्य शामिल हैं। ये क्षेत्र लगभग 1,100 वर्ग किलोमीटर में फैले हुए हैं, जो राज्य के भौगोलिक क्षेत्रफल का 4.6% हिस्सा बनाते हैं (Forest Survey of India, 2023)। बेटला नेशनल पार्क, जो 1974 में स्थापित हुआ था, 226 वर्ग किलोमीटर में फैला है और पलामू टाइगर रिजर्व का हिस्सा है, जहाँ 2022 के कैमरा ट्रैप सर्वे में 15 से अधिक बाघ पाए गए (NTCA, 2022)। अन्य अभयारण्य हैं - हजारीबाग (184 वर्ग किलोमीटर), जो हाथी, तेंदुए और 200 से अधिक पक्षी प्रजातियों के लिए जाना जाता है, और दलमा, गौतम बुद्ध, महुआदानर, तथा दलमा वन्यजीव अभयारण्य, जो क्षेत्रीय जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण हैं।
JPSC परीक्षा से प्रासंगिकता
- General Studies Paper 1: पर्यावरण और पारिस्थितिकी – राज्य विशेष जैव विविधता और संरक्षित क्षेत्र
- समसामयिक विषय: झारखंड में वन आवरण के रुझान और वन अधिकार अधिनियम (FRA) के तहत जनजातीय अधिकार
- पिछले वर्षों के प्रश्न: JPSC 2019 और 2021 – वन आवरण आंकड़े, जनजातीय वन अधिकार, संरक्षण नीतियाँ
झारखंड के संरक्षित क्षेत्रों पर कानूनी और संवैधानिक नियंत्रण
झारखंड के संरक्षित क्षेत्र कई कानूनों के दायरे में आते हैं। वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 (संशोधित 2006) राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव अभयारण्यों की स्थापना और प्रबंधन का प्रावधान करता है (धारा 18-38)। वन संरक्षण अधिनियम, 1980 (धारा 2 और 3) वन भूमि के उपयोग में बदलाव को नियंत्रित करता है, जो आवास विखंडन को रोकने के लिए जरूरी है। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 केंद्र सरकार को पर्यावरण सुरक्षा लागू करने का अधिकार देता है (धारा 3 और 4)।
- अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वनवासी (वन अधिकार मान्यता) अधिनियम, 2006 (धारा 3-5) आदिवासी समुदायों के अधिकारों को मान्यता देता है, जो झारखंड के जनजातीय आबादी के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
- झारखंड वन संरक्षण नियम, 2004, केंद्र सरकार के कानूनों के साथ राज्य-विशिष्ट प्रावधान जोड़ते हैं।
- सुप्रीम कोर्ट के फैसले जैसे T.N. Godavarman Thirumulpad v. Union of India (1996) ने कड़े वन संरक्षण दायित्व लगाए हैं, जो झारखंड के वन शासन को प्रभावित करते हैं।
पारिस्थितिक और जैव विविधता का महत्व
झारखंड के संरक्षित क्षेत्र छोटानागपुर पठार पारिस्थितिकी तंत्र के विविध वनस्पति और जीव-जंतुओं को समेटे हुए हैं। बेटला नेशनल पार्क और पलामू टाइगर रिजर्व पूर्वी भारत में बंगाल बाघों के अंतिम ठिकानों में से हैं। हजारीबाग अभयारण्य हाथी, तेंदुए जैसी बड़ी वन्य प्रजातियों का घर है, जबकि दलमा जैसे अभयारण्य स्थानीय पक्षी प्रजातियों और औषधीय पौधों के संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण हैं।
- 2019 से 2023 के बीच झारखंड में वन आवरण 1.5% बढ़ा और अब यह राज्य के क्षेत्रफल का 29.6% है (India State of Forest Report, 2023)।
- संरक्षित क्षेत्रों में मानव-वन्यजीव संघर्ष में सालाना 12% की वृद्धि हुई है, मुख्य रूप से फसल क्षति और पशुधन पर हमले के कारण (झारखंड वन विभाग, 2023)।
- MoEFCC के 2023 के आकलन के अनुसार, केवल 35% संरक्षित क्षेत्रों में सक्रिय प्रबंधन योजनाएं हैं, जो संरक्षण प्रयासों में कमी दर्शाता है।
झारखंड में संरक्षण का आर्थिक पहलू
झारखंड ने 2023-24 के राज्य बजट में वन और वन्यजीव संरक्षण के लिए लगभग ₹150 करोड़ आवंटित किए हैं (झारखंड राज्य बजट, 2023-24)। बेटला नेशनल पार्क में इकोटूरिज्म से सालाना लगभग ₹25 करोड़ की स्थानीय अर्थव्यवस्था को मदद मिलती है (झारखंड पर्यटन विभाग, 2022)। वन आधारित आजीविका 12 लाख से अधिक जनजातीय और ग्रामीण परिवारों का सहारा है (Census 2011; Forest Survey of India, 2023)।
- अवैध लकड़ी व्यापार की अनुमानित वार्षिक मात्रा ₹50 करोड़ है, जो संरक्षण और स्थानीय अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाता है (वन विभाग, झारखंड, 2023)।
- REDD+ (वन कटाई और क्षरण से उत्सर्जन में कमी) पहल 2025 तक कार्बन क्रेडिट बाजारों के माध्यम से ₹30 करोड़ प्रति वर्ष उत्पन्न कर सकती है (MoEFCC रिपोर्ट, 2023)।
झारखंड के संरक्षित क्षेत्रों के प्रबंधन में मुख्य संस्थान
झारखंड वन विभाग वन और वन्यजीव प्रबंधन का मुख्य प्राधिकारी है। झारखंड राज्य जैव विविधता बोर्ड राज्य स्तर पर जैव विविधता अधिनियम, 2002 को लागू करता है। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) नीति और नियमों का मार्गदर्शन देता है। वन्यजीव संस्थान, भारत (WII) वैज्ञानिक अनुसंधान और प्रशिक्षण सहायता प्रदान करता है। झारखंड पर्यटन विभाग इकोटूरिज्म को बढ़ावा देता है, जबकि जनजातीय कल्याण विभाग जनजातीय भागीदारी और अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करता है।
संरक्षित क्षेत्र प्रबंधन में झारखंड और कोस्टा रिका की तुलना
| पहलू | झारखंड | कोस्टा रिका |
|---|---|---|
| वन आवरण (2023) | 29.6% | 53% (2020) |
| समुदाय की भागीदारी | वन अधिकार अधिनियम के तहत जनजातीय अधिकारों का सीमित समावेश | मजबूत समुदाय आधारित संरक्षण मॉडल |
| इकोटूरिज्म राजस्व | ₹25 करोड़ लगभग (बेटला NP) | सालाना US$3 बिलियन |
| पर्यावरण सेवा के लिए भुगतान (PES) | विकासशील, REDD+ से ₹30 करोड़/वर्ष की संभावना | स्थापित PES कार्यक्रम |
| वन आवरण का रुझान (1987-2023) | धीमी वृद्धि (2019 से 1.5%) | दोगुना से अधिक (21% से 53%) |
नीतिगत कमियां और चुनौतियां
झारखंड में सबसे बड़ी नीति कमी जनजातीय वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत अधिकारों का संरक्षण लक्ष्यों के साथ समुचित समावेश न होना है। इससे संघर्ष पैदा होते हैं और स्थानीय पारिस्थितिक ज्ञान प्रबंधन निर्णयों से बाहर रह जाता है। इसके अलावा, केवल कुछ संरक्षित क्षेत्रों में ही सक्रिय प्रबंधन योजनाएं हैं, जिससे जैव विविधता संरक्षण कमजोर पड़ता है। अवैध कटाई, खनन और मानव-वन्यजीव संघर्ष जैसे मानवीय दबाव आवास विखंडन को बढ़ाते हैं।
झारखंड के संरक्षित क्षेत्रों के लिए आगे का रास्ता
- वन अधिकार अधिनियम के क्रियान्वयन को मजबूत करके जनजातीय अधिकारों और संरक्षण लक्ष्यों का समन्वय करें, जिससे सह-प्रबंधन मॉडल संभव हो सकें।
- सभी संरक्षित क्षेत्रों में सक्रिय प्रबंधन योजनाएं विकसित करें, जिनमें वैज्ञानिक निगरानी और समुदाय की भागीदारी शामिल हो।
- वन सीमा के भीतर अवैध लकड़ी कटाई और खनन पर कड़ी कार्रवाई करें।
- स्थानीय समुदायों को लाभ पहुंचाने वाले सतत इकोटूरिज्म को बढ़ावा दें।
- वन संरक्षण के लिए REDD+ और कार्बन बाजारों से स्थायी वित्तीय संसाधन जुटाएं।
- बेटला नेशनल पार्क पलामू टाइगर रिजर्व का हिस्सा है।
- यह 1980 के बाद स्थापित हुआ था।
- यह पार्क 200 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में फैला है।
- वन संरक्षण अधिनियम, 1980 वन भूमि के उपयोग परिवर्तन को नियंत्रित करता है।
- वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 वन्यजीव अभयारण्यों को शामिल नहीं करता।
- अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वनवासियों का अधिकार अधिनियम, 2006 आदिवासी समुदायों के वन अधिकारों को मान्यता देता है।
मुख्य प्रश्न
झारखंड के संरक्षित क्षेत्रों के प्रबंधन में आने वाली चुनौतियों पर चर्चा करें और जनजातीय अधिकारों की रक्षा करते हुए जैव विविधता संरक्षण को बेहतर बनाने के लिए नीति सुझाव दें। (250 शब्द)
झारखंड और JPSC से प्रासंगिकता
- JPSC पेपर: GS पेपर 1 – पर्यावरण और पारिस्थितिकी; GS पेपर 3 – आर्थिक विकास और जनजातीय कल्याण
- झारखंड का दृष्टिकोण: संरक्षित क्षेत्रों, वन आवरण रुझान, FRA के तहत जनजातीय अधिकार और स्थानीय संरक्षण चुनौतियों के राज्य-विशिष्ट आंकड़े
- मुख्य बिंदु: जनजातीय अधिकारों और संरक्षण के समन्वय पर जोर, संरक्षित क्षेत्रों के आंकड़े, बजट आवंटन और मानव-वन्यजीव संघर्ष के रुझान
झारखंड में कुल कितने संरक्षित क्षेत्र हैं और उनका कुल क्षेत्रफल कितना है?
झारखंड में 7 संरक्षित क्षेत्र हैं: 1 राष्ट्रीय उद्यान (बेटला) और 6 वन्यजीव अभयारण्य, जो लगभग 1,100 वर्ग किलोमीटर या राज्य के भौगोलिक क्षेत्रफल का 4.6% हिस्सा हैं (Forest Survey of India, 2023)।
झारखंड के संरक्षित क्षेत्रों की स्थापना और प्रबंधन के लिए कौन-कौन से कानूनी प्रावधान लागू होते हैं?
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 (धारा 18-38) संरक्षित क्षेत्रों को नियंत्रित करता है; वन संरक्षण अधिनियम, 1980 वन भूमि के उपयोग परिवर्तन को नियंत्रित करता है; और वन अधिकार अधिनियम, 2006 जनजातीय अधिकारों को मान्यता देता है, ये सभी झारखंड में लागू हैं।
झारखंड के संरक्षित क्षेत्रों का मुख्य आर्थिक योगदान क्या है?
बेटला नेशनल पार्क में इकोटूरिज्म से सालाना लगभग ₹25 करोड़ की आय होती है; वन आधारित आजीविका 12 लाख से अधिक परिवारों का सहारा है, और REDD+ पहल 2025 तक ₹30 करोड़ प्रति वर्ष उत्पन्न कर सकती है (झारखंड पर्यटन विभाग, 2022; MoEFCC रिपोर्ट, 2023)।
झारखंड में संरक्षण को प्रभावित करने वाली प्रमुख नीति कमी क्या है?
वन अधिकार अधिनियम के तहत जनजातीय वन अधिकारों का संरक्षण लक्ष्यों के साथ समुचित समावेश न होना, जिससे संघर्ष होते हैं और पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान प्रबंधन से बाहर रह जाता है, जो प्रभावी जैव विविधता प्रबंधन में बाधा है।
झारखंड का वन आवरण रुझान कोस्टा रिका से कैसे तुलना करता है?
झारखंड में 2019-2023 के बीच वन आवरण 1.5% बढ़कर 29.6% हो गया है, जबकि कोस्टा रिका ने 1987 से 2020 तक 21% से बढ़ाकर 53% कर लिया है, जो समुदाय आधारित संरक्षण और PES कार्यक्रमों के कारण संभव हुआ (India State of Forest Report, 2023; World Bank, 2021)।
आधिकारिक स्रोत एवं आगे पढ़ने के लिए
स्रोत: LearnPro Editorial | सामान्य अध्ययन | प्रकाशित: 12 March 2026 | अंतिम अपडेट: 8 April 2026
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