परिचय: संसदीय समितियाँ और वित्तीय निगरानी
भारत में संसदीय स्थायी समितियाँ (PSCs) संविधान के अनुच्छेद 105 और अनुच्छेद 118 के तहत स्थायी रूप से गठित होती हैं। ये पूरे वर्ष सरकार के कामकाज, विशेषकर वित्तीय शासन की बारीकी से जांच करती हैं। प्रमुख वित्तीय समितियों में लोक लेखा समिति (PAC), अनुमान समिति और सार्वजनिक उपक्रम समिति शामिल हैं, जो संविधान और लोक सभा नियमों (नियम 308-312, 310, 310A) के तहत गठित होती हैं। ये समितियाँ सरकार के खर्च की गहन, निरंतर और गैर-पक्षपाती समीक्षा करती हैं, जो संसद की बहसों की समय और विस्तार की सीमाओं को पूरा करती हैं।
UPSC प्रासंगिकता
- GS पेपर 2: संसद और उसकी समितियाँ, शासन में जवाबदेही और पारदर्शिता
- निबंध: संसदीय समितियों की लोकतांत्रिक निगरानी को मजबूत करने में भूमिका
- मेनस: वित्तीय निगरानी तंत्र और उनकी प्रभावशीलता पर प्रश्न
संसदीय समितियों का संवैधानिक और कानूनी ढांचा
संविधान के अनुच्छेद 105(5) और अनुच्छेद 118(3) के तहत लोक लेखा समिति का गठन किया गया है, जो कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल (CAG) की ऑडिट रिपोर्टों की जांच करती है। अनुमान समिति और सार्वजनिक उपक्रम समिति लोक सभा के नियमों (क्रमशः नियम 310 और 310A) के अनुसार गठित होती हैं। विभागीय स्थायी समितियाँ (DRSCs) नियम 308 से 312 के अंतर्गत आती हैं और 24 मंत्रालयों को कवर करती हैं, जिनमें वित्त मंत्रालय की संसदीय स्थायी समिति भी शामिल है, जो वित्त मंत्रालय और संबंधित विभागों की समीक्षा करती है।
- PSCs को मंत्रालयों के अनुदान मांगों, विधेयकों और नीतिगत मुद्दों की जांच का विधिक अधिकार प्राप्त है।
- ये समितियाँ संसद को अपनी रिपोर्ट सौंपती हैं, जो संसद में प्रस्तुत होकर चर्चा का आधार बनती हैं।
- स्थायी समितियों की रिपोर्टें बाध्यकारी नहीं होतीं, लेकिन उनका नैतिक और राजनीतिक महत्व बहुत होता है।
वित्तीय निगरानी का आर्थिक महत्व
संघीय बजट 2023-24 में नीति आयोग और संबंधित योजना संस्थाओं को ₹1.1 लाख करोड़ से अधिक आवंटित किए गए। हालांकि, संसदीय स्थायी समिति वित्त ने FY24 और FY25 में मात्र 36% से कम फंड उपयोग की रिपोर्ट दी, जो वित्तीय प्रबंधन की कमजोरी और योजनाओं के अधूरे क्रियान्वयन को दर्शाता है। इससे विकास परियोजनाओं में देरी का खतरा बढ़ता है, जो भारत की GDP वृद्धि (7% FY23 में) के लिए अहम हैं। PAC हर साल ₹150 लाख करोड़ से अधिक सरकारी खर्च की ऑडिट करता है, जो वित्तीय निगरानी की व्यापकता को दर्शाता है।
- कम फंड उपयोग सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन और निगरानी में अक्षमता की निशानी है।
- परियोजनाओं में देरी बुनियादी ढांचे, रोजगार सृजन और समग्र आर्थिक विकास को प्रभावित करती है।
- अनुमान समिति ₹150 लाख करोड़ से अधिक के बजटीय अनुमानों की समीक्षा कर बचत और दक्षता सुधार की सिफारिशें करती है।
वित्तीय शासन में प्रमुख संसदीय समितियाँ
| समिति | संवैधानिक/कानूनी आधार | मुख्य कार्य | क्षेत्र |
|---|---|---|---|
| लोक लेखा समिति (PAC) | अनुच्छेद 105(5), अनुच्छेद 118(3) | सरकारी खर्च पर CAG की ऑडिट रिपोर्टों की जांच | सभी सरकारी विभाग और खर्च |
| अनुमान समिति | नियम 310, लोक सभा नियम | बजट अनुमानों की समीक्षा और बचत के सुझाव | संघीय बजट के अनुमान और व्यय योजनाएं |
| सार्वजनिक उपक्रम समिति | नियम 310A, लोक सभा नियम | सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों का प्रदर्शन जांचना | सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम |
| विभागीय स्थायी समितियाँ (DRSCs) | नियम 308-312, लोक सभा नियम | मंत्रालयों की अनुदान मांग, विधेयक और नीतियों की समीक्षा | 24 मंत्रालय, जिनमें वित्त, योजना आदि शामिल हैं |
तुलनात्मक अध्ययन: भारत बनाम यूके लोक लेखा समितियाँ
यूके की लोक लेखा समिति, जो हाउस ऑफ कॉमन्स के तहत है, अधिक सशक्त प्रवर्तन शक्तियों वाली है, जिसमें अधिकारियों को तलब करना और सबूत मांगना शामिल है। इसे दोनों प्रमुख पार्टियों का समर्थन प्राप्त है और मीडिया की सक्रिय भागीदारी भी होती है, जिससे सार्वजनिक जवाबदेही बढ़ती है और भारत की तुलना में 15% अधिक धन वसूली होती है (UK नेशनल ऑडिट ऑफिस रिपोर्ट, 2023)। इसके विपरीत, भारतीय PSCs को अक्सर रिपोर्ट में देरी, बाध्यकारी शक्तियों की कमी, और सीमित सार्वजनिक प्रचार का सामना करना पड़ता है।
| विशेषता | भारत | संयुक्त राज्य |
|---|---|---|
| संवैधानिक आधार | अनुच्छेद 105, 118; लोक सभा नियम | हाउस ऑफ कॉमन्स स्टैंडिंग ऑर्डर |
| प्रवर्तन शक्तियाँ | परामर्शात्मक; बाध्यकारी नहीं | अधिकारियों को तलब कर सकता है; बाध्यकारी सिफारिशें |
| सार्वजनिक सहभागिता | सीमित मीडिया कवरेज; रिपोर्टें कम प्रचारित | उच्च मीडिया सहभागिता; सार्वजनिक सुनवाई |
| दुरुपयोग धन वसूली | कम दर; सीमित फॉलो-अप | 15% अधिक वसूली दर |
| पक्षपात | अक्सर पक्षपाती देरी | द्विदलीय सहमति |
भारत में संसदीय समितियों की प्रभावशीलता में बाधाएं
- रिपोर्ट प्रस्तुत करने में देरी: समितियाँ अक्सर समय सीमा से बाहर रिपोर्ट देती हैं, जिससे निगरानी की ताजगी कम हो जाती है।
- प्रवर्तन शक्तियों का अभाव: सिफारिशें केवल सलाहकार होती हैं; कार्यपालिका को कानूनी बाध्यता नहीं होती।
- सीमित सार्वजनिक प्रचार: रिपोर्टों का व्यापक प्रसार या चर्चा नहीं होती, जिससे जनता का दबाव कमजोर पड़ता है।
- राजनीतिक पक्षपात: राजनीतिक झुकाव से समितियों की निष्पक्ष जांच प्रभावित होती है।
- संसाधन सीमितता: शोध सहायता और विशेषज्ञ इनपुट की कमी गहन विश्लेषण में बाधा डालती है।
महत्व और आगे का रास्ता
- समितियों की सिफारिशों को कार्यपालिका की जवाबदेही से जोड़कर प्रवर्तन तंत्र मजबूत किया जा सकता है, जिससे वित्तीय शासन सुधरेगा।
- रिपोर्टों का व्यापक प्रचार और मीडिया सहभागिता बढ़ाकर पारदर्शिता और सार्वजनिक निगरानी को बढ़ावा मिलेगा।
- विशेषज्ञ सहायता और समय पर डेटा उपलब्धता से समितियों की क्षमता बढ़ाई जा सकती है।
- द्विदलीय सहयोग को संस्थागत रूप देकर राजनीतिक देरी और पक्षपात को कम किया जा सकता है।
- फंड उपयोग की वास्तविक समय निगरानी के लिए तकनीक का उपयोग समितियों को समय पर हस्तक्षेप में मदद करेगा।
- विभागीय स्थायी समितियाँ संविधान के अनुच्छेद 105 के तहत गठित होती हैं।
- लोक लेखा समिति कंट्रोलर और ऑडिटर जनरल की ऑडिट रिपोर्टों की जांच करती है।
- अनुमान समिति की सिफारिशें कार्यपालिका पर बाध्यकारी होती हैं।
- PAC राज्य सभा के नियमों के तहत गठित होती है।
- PAC संसद द्वारा स्वीकृत अनुदान के उपयोग की जांच करती है।
- PAC की रिपोर्टें सरकार पर बाध्यकारी होती हैं।
मेनस प्रश्न
भारत में वित्तीय शासन को बेहतर बनाने में संसदीय स्थायी समितियों की भूमिका का मूल्यांकन करें। उनके सामने आने वाली चुनौतियों पर चर्चा करें और उनकी प्रभावशीलता बढ़ाने के उपाय सुझाएं। (250 शब्द)
झारखंड एवं JPSC प्रासंगिकता
- JPSC पेपर: पेपर 2 – भारतीय राजनीति और शासन
- झारखंड परिप्रेक्ष्य: संसदीय समितियों की प्रभावी वित्तीय निगरानी झारखंड के राज्य विकास योजनाओं के लिए फंड उपयोग में सुधार ला सकती है, जहां बजट क्रियान्वयन में चुनौतियाँ हैं।
- मेनस संकेत: PSCs की भूमिका को योजना और व्यय में जवाबदेही सुनिश्चित करने में उजागर करें, जो झारखंड के विकासात्मक और वित्तीय प्रबंधन जरूरतों से जुड़ी हो।
लोक लेखा समिति का संवैधानिक आधार क्या है?
लोक लेखा समिति संविधान के अनुच्छेद 105(5) और अनुच्छेद 118(3) के तहत गठित होती है। यह सरकारी खर्च से संबंधित कंट्रोलर और ऑडिटर जनरल की ऑडिट रिपोर्टों की जांच करती है।
विभागीय स्थायी समितियाँ वित्तीय समितियों से कैसे भिन्न हैं?
विभागीय स्थायी समितियाँ मंत्रालयों की अनुदान मांग, विधेयक और नीतियों की समीक्षा करती हैं, जबकि वित्तीय समितियाँ (PAC, अनुमान समिति, सार्वजनिक उपक्रम समिति) क्रमशः ऑडिट रिपोर्ट, बजट अनुमान और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों पर केंद्रित होती हैं।
नीति आयोग द्वारा फंड उपयोग का वित्तीय शासन में क्या महत्व है?
FY24 और FY25 में 36% से कम फंड उपयोग, जैसा PSC-फाइनेंस ने बताया, योजनाओं के क्रियान्वयन में अक्षमता दर्शाता है, जिससे विकास परियोजनाओं में देरी और समग्र आर्थिक विकास प्रभावित होता है।
भारत में संसदीय समितियों के सामने मुख्य चुनौतियां क्या हैं?
चुनौतियों में रिपोर्ट में देरी, बाध्यकारी प्रवर्तन शक्तियों का अभाव, सीमित सार्वजनिक प्रचार, राजनीतिक पक्षपात और संसाधन सीमितता शामिल हैं, जो गहन जांच को प्रभावित करती हैं।
यूके की लोक लेखा समिति भारत की PAC से कैसे अलग है?
यूके की PAC के पास अधिक सशक्त प्रवर्तन शक्तियाँ, द्विदलीय सहमति और व्यापक मीडिया सहभागिता है, जिससे दुरुपयोग धन की वसूली अधिक होती है, जबकि भारत की PAC के पास सलाहकार शक्तियाँ और सीमित सार्वजनिक दृश्यता है।
आधिकारिक स्रोत और आगे पढ़ाई के लिए
स्रोत: LearnPro Editorial | सामान्य अध्ययन | प्रकाशित: 18 March 2026 | अंतिम अपडेट: 8 April 2026
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