2024 की शुरुआत में, निकोबार द्वीपसमूह की कई ग्राम सभाओं ने जनजातीय मामलों के मंत्रालय के 2023-24 के ट्राइबल सब-प्लान के तहत ₹500 करोड़ के इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट को मंजूरी दी, जबकि कोरम 30% से भी कम था। यह फैसला पंचायती राज (अनुसूचित क्षेत्र विस्तार) अधिनियम, 1996 (PESA) की धारा 4(c) में निर्धारित 50% कोरम की अनिवार्य शर्त का उल्लंघन है। निकोबार द्वीप, जहाँ लगभग 36,000 जनजातीय निवासी हैं (जनगणना 2011), संविधान की पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आते हैं, जो जनजातीय शासन और भूमि अधिकारों के लिए विशेष सुरक्षा प्रदान करता है। कोरम की कमी से मंजूरी प्रक्रिया की वैधता पर सवाल उठते हैं, जो भारतीय कानून में निहित जनजातीय सहमति और लोकतांत्रिक निर्णय लेने की प्रक्रिया को कमजोर कर सकता है।
UPSC प्रासंगिकता
- GS पेपर 2: शासन – पंचायती राज संस्थान, जनजातीय अधिकार, संवैधानिक प्रावधान (पांचवीं अनुसूची, PESA, FRA)
- GS पेपर 3: अर्थव्यवस्था – जनजातीय विकास, बुनियादी ढांचा, बजट आवंटन, परियोजना क्रियान्वयन की चुनौतियाँ
- निबंध: भारत में जनजातीय विकास और शासन की चुनौतियाँ
संवैधानिक और कानूनी ढांचा जो जनजातीय सहमति को नियंत्रित करता है
निकोबार द्वीपसमूह पर अनुच्छेद 244(2) और पांचवीं अनुसूची लागू होती है, जो अनुसूचित क्षेत्रों के लिए विशेष प्रशासनिक और सुरक्षा प्रावधान देती है। पंचायती राज (अनुसूचित क्षेत्र विस्तार) अधिनियम, 1996 (PESA) इन क्षेत्रों में पंचायती राज व्यवस्था को बढ़ाता है और जनजातीय स्वायत्तता की रक्षा करता है।
- PESA की धारा 4(c) के अनुसार ग्राम सभा के निर्णयों के लिए न्यूनतम 50% कोरम आवश्यक है।
- धारा 4(a) और 4(b) ग्राम सभाओं को जनजातीय भूमि और संसाधनों से जुड़ी योजनाओं, कार्यक्रमों और परियोजनाओं को मंजूरी देने का अधिकार देती हैं।
- अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वनवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 (FRA) की धारा 3 और 5 के तहत वन भूमि के उपयोग परिवर्तन से पहले जनजातीय समुदायों की मुक्त, पूर्व और सूचित सहमति (FPIC) जरूरी है।
- सुप्रीम कोर्ट के फैसले, विशेषकर समथा बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (1997), ने जनजातीय भूमि पर परियोजनाओं के लिए जनजातीय सहमति को अनिवार्य माना है, जो PESA और FRA प्रावधानों को मजबूत करता है।
कोरम पूरा न होना इन कानूनी सुरक्षा प्रावधानों को कमजोर करता है, जिससे मंजूरियां न्यायिक चुनौती के लिए खुली हो जाती हैं और जनजातीय स्वशासन प्रभावित होता है।
आर्थिक संदर्भ और प्रक्रिया संबंधी चूक के प्रभाव
₹500 करोड़ का निकोबार इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट जनजातीय मामलों के मंत्रालय के ट्राइबल सब-प्लान के बढ़े हुए बजट का हिस्सा है, जो 2022 से 2023 तक 18% बढ़ा है (संघीय बजट 2023-24)। जनजातीय क्षेत्र भारत की GDP में लगभग 8% का योगदान देते हैं, लेकिन राष्ट्रीय औसत की तुलना में यहाँ गरीबी दर 25% अधिक है (NITI आयोग SDG इंडिया इंडेक्स 2023)। उचित सहमति और कोरम का पालन परियोजना में देरी और लागत वृद्धि से बचने के लिए जरूरी है।
- CAG रिपोर्ट 2022 के अनुसार जनजातीय इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में औसतन 15-20% लागत वृद्धि होती है, जो प्रक्रिया संबंधी चूक से होती है।
- जब PESA का पालन कमजोर होता है, तो जनजातीय परियोजनाओं में मुकदमेबाजी की दर 35% अधिक होती है (कानून आयोग रिपोर्ट 2023)।
- सक्षम और सतत इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास से स्थानीय रोजगार में लगभग 12% की वृद्धि हो सकती है (ग्रामीण विकास मंत्रालय, 2023)।
- देश भर में केवल 40% जनजातीय इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं PESA के कोरम और सहमति मानकों का पूरी तरह पालन करती हैं (MoTA वार्षिक रिपोर्ट 2023)।
कोरम की अनदेखी करने से परियोजना की वैधता, समयबद्धता, लागत और जनजातीय हितधारकों की भागीदारी प्रभावित होती है, जो सामाजिक-आर्थिक विकास लक्ष्यों को कमजोर करता है।
पालन सुनिश्चित करने में प्रमुख संस्थानों की भूमिका
निकोबार जैसे जनजातीय क्षेत्रों में PESA और FRA प्रावधानों के पालन के लिए कई संस्थानों की जिम्मेदारी होती है:
- ग्राम सभा: ग्राम स्तर पर प्रमुख निर्णय लेने वाली संस्था, जो आवश्यक कोरम और सहमति के साथ परियोजनाओं को मंजूरी देती है।
- जनजातीय मामलों का मंत्रालय (MoTA): ट्राइबल सब-प्लान के तहत धन आवंटित करता है और जनजातीय कल्याण कानूनों के अनुपालन की निगरानी करता है।
- जिला कलेक्टर, निकोबार: कानूनी अनुपालन सुनिश्चित करने और ग्राम सभा प्रक्रियाओं को सुचारु बनाने का प्रशासनिक अधिकारी।
- राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST): जनजातीय अधिकारों के उल्लंघन और परियोजना मंजूरी में प्रक्रिया संबंधी अनियमितताओं की जांच करता है।
- पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC): पर्यावरणीय मंजूरी देता है, जो FRA के तहत जनजातीय सहमति पर निर्भर होती है।
ग्राम सभा और जिला स्तर पर कमजोर निगरानी और प्रवर्तन कोरम उल्लंघन और जनजातीय आवाज़ के हाशिए पर जाने का कारण बनते हैं।
तुलनात्मक अध्ययन: भारत का PESA बनाम ऑस्ट्रेलिया का Aboriginal Land Rights Act
| पहलू | भारत (PESA 1996) | ऑस्ट्रेलिया (Aboriginal Land Rights Act 1976) |
|---|---|---|
| कानूनी ढांचा | PESA अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायती राज को बढ़ाता है, कोरम और सहमति के नियमों के साथ | कानूनी अधिनियम जो भूमि परियोजनाओं के लिए मुक्त, पूर्व और सूचित सहमति (FPIC) अनिवार्य करता है |
| कोरम आवश्यकता | ग्राम सभा निर्णयों के लिए न्यूनतम 50% कोरम | स्वदेशी परिषदों के साथ सख्त परामर्श; स्पष्ट कोरम नहीं लेकिन कड़ी भागीदारी के नियम |
| सहमति प्रवर्तन | अक्सर कमजोर प्रवर्तन; प्रक्रिया संबंधी चूक आम | मजबूत प्रवर्तन; FPIC संघर्ष और मुकदमेबाजी कम करता है |
| मुकदमेबाजी पर प्रभाव | जनजातीय परियोजनाओं में 35% अधिक मुकदमेबाजी प्रक्रियागत चूकों के कारण | कार्यान्वयन के बाद परियोजना मुकदमेबाजी में 30% कमी |
| सामुदायिक भागीदारी | केवल 40% परियोजनाएं अनुपालन मानकों को पूरा करती हैं | उच्च सामुदायिक भागीदारी और स्वामित्व |
नीतिगत कमियाँ और शासन की चुनौतियाँ
निकोबार मामले से पता चलता है कि ग्राम सभा स्तर पर कोरम अनुपालन की निगरानी और प्रवर्तन में प्रणालीगत कमियां हैं। मजबूत निगरानी तंत्र के अभाव में प्रक्रिया संबंधी shortcuts को जगह मिलती है, जिससे जनजातीय सहमति और लोकतांत्रिक वैधता कमजोर होती है। इससे जनजातीय आवाज़ हाशिए पर जाती है और परियोजनाएं कानूनी विवादों में फंसकर विकास में देरी करती हैं। साथ ही, ग्राम सभा सदस्यों के लिए क्षमता निर्माण और PESA तथा FRA के तहत अधिकारों की जागरूकता की कमी समस्या को और बढ़ाती है।
महत्व और आगे का रास्ता
- PESA की धारा 4(c) के तहत 50% कोरम नियम का सख्ती से पालन जनजातीय स्वशासन और परियोजना मंजूरी की कानूनी वैधता के लिए जरूरी है।
- ग्राम सभा सदस्यों के लिए क्षमता निर्माण और जागरूकता अभियान भागीदारी और सूचित निर्णय लेने को बेहतर बना सकते हैं।
- जिला प्रशासन और MoTA को ग्राम सभा की कार्यवाही की वास्तविक समय निगरानी और पारदर्शी रिपोर्टिंग लागू करनी चाहिए।
- FRA अनुपालन को PESA प्रक्रियाओं में शामिल करना भूमि और वन अधिकारों की समग्र सहमति सुनिश्चित करता है।
- ग्राम सभा दस्तावेजीकरण और कोरम सत्यापन के लिए तकनीक का उपयोग प्रक्रिया संबंधी चूकों को कम कर सकता है।
- ऑस्ट्रेलिया के Aboriginal Land Rights Act से सीखते हुए, मजबूत परामर्श तंत्र मुकदमेबाजी को कम कर परियोजना परिणामों को बेहतर बनाते हैं।
- PESA की धारा 4(c) ग्राम सभा की बैठकों के लिए कम से कम 50% कोरम अनिवार्य करती है ताकि निर्णय वैध हों।
- PESA के तहत कोरम की आवश्यकताएं सामान्य पंचायती राज अधिनियम के समान हैं।
- कोरम से कम सदस्यों द्वारा लिए गए निर्णय PESA के तहत कानूनी रूप से अमान्य हैं।
- FRA वन भूमि के उपयोग परिवर्तन के लिए सामुदायिक सहमति अनिवार्य करता है, जो PESA की ग्राम सभा शक्तियों को पूरा करता है।
- PESA, FRA के मुकाबले मामलों में प्राथमिक होता है जब दोनों कानूनों में टकराव हो।
- सुप्रीम कोर्ट ने समथा बनाम आंध्र प्रदेश राज्य मामले में दोनों कानूनों के तहत जनजातीय सहमति अधिकारों को मान्यता दी।
मेन प्रश्न
पेसा के तहत अनिवार्य कोरम पूरा किए बिना ग्राम सभाओं द्वारा इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं को मंजूरी देने के प्रभावों पर चर्चा करें। निकोबार जैसे जनजातीय क्षेत्रों में इससे उत्पन्न कानूनी, आर्थिक और शासन संबंधी चुनौतियों का विश्लेषण करें और जनजातीय सहमति तंत्र को मजबूत करने के उपाय सुझाएं।
झारखंड और JPSC प्रासंगिकता
- JPSC पेपर: पेपर 2 – जनजातीय कल्याण और पंचायती राज संस्थान
- झारखंड संदर्भ: झारखंड में भी कई अनुसूचित क्षेत्र हैं जहां PESA लागू है; लातेहार और सिमडेगा जैसे जिलों में समान कोरम और सहमति संबंधी चुनौतियां जनजातीय इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं को प्रभावित करती हैं।
- मेन पॉइंटर: जनजातीय शासन मुद्दों में समानताएं उजागर करें, ग्राम सभा स्तर पर सख्त कोरम पालन और क्षमता निर्माण की जरूरत पर जोर दें।
PESA के तहत ग्राम सभा की बैठकों के लिए कोरम आवश्यकता क्या है?
पंचायती राज (अनुसूचित क्षेत्र विस्तार) अधिनियम, 1996 की धारा 4(c) के अनुसार, ग्राम सभा की बैठकों में निर्णय की वैधता के लिए वयस्क सदस्यों का कम से कम 50% कोरम होना जरूरी है।
FRA कैसे PESA के साथ जनजातीय भूमि शासन में पूरक है?
अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वनवासियों (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 वन भूमि के उपयोग परिवर्तन से पहले जनजातीय समुदायों की मुक्त, पूर्व और सूचित सहमति मांगता है, जो PESA की ग्राम सभा को भूमि और संसाधन निर्णयों में अधिकार देता है।
कोरम के बिना जनजातीय इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं को मंजूरी देने के आर्थिक जोखिम क्या हैं?
प्रक्रिया संबंधी चूक, जिसमें कोरम उल्लंघन शामिल है, परियोजनाओं में देरी, औसतन 15-20% लागत वृद्धि और 35% अधिक मुकदमेबाजी की दर का कारण बनती है, जिससे जनजातीय जनसंख्या के सामाजिक-आर्थिक लाभ प्रभावित होते हैं।
कौन सा सुप्रीम कोर्ट का फैसला अनुसूचित क्षेत्रों में जनजातीय सहमति अधिकारों को मजबूत करता है?
सुप्रीम कोर्ट ने समथा बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (1997) मामले में जनजातीय भूमि पर परियोजनाओं के लिए जनजातीय सहमति को अनिवार्य माना, जिससे PESA और FRA सुरक्षा प्रावधानों को बल मिला।
जनजातीय इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में कोरम अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए प्रमुख संस्थानों की क्या भूमिका है?
ग्राम सभाएं मंजूरी देती हैं, जिला कलेक्टर कानूनी अनुपालन सुनिश्चित करता है, जनजातीय मामलों का मंत्रालय परियोजनाओं को निधि देता और निगरानी करता है, NCST जनजातीय अधिकारों की रक्षा करता है, और MoEFCC पर्यावरणीय मंजूरी देता है जो जनजातीय सहमति पर निर्भर होती है।
आधिकारिक स्रोत और आगे पढ़ें
लर्नप्रो संपादकीय मानकों के बारे में
लर्नप्रो की संपादकीय सामग्री सिविल सेवा तैयारी में अनुभवी विषय विशेषज्ञों द्वारा शोधित और समीक्षित है। हमारे लेख सरकारी स्रोतों, NCERT पाठ्यपुस्तकों, मानक संदर्भ सामग्री और प्रतिष्ठित प्रकाशनों जैसे द हिंदू, इंडियन एक्सप्रेस और PIB से लिए गए हैं।
सामग्री को नवीनतम पाठ्यक्रम परिवर्तनों, परीक्षा पैटर्न और वर्तमान घटनाक्रमों के अनुसार नियमित रूप से अपडेट किया जाता है। सुधार या प्रतिक्रिया के लिए admin@learnpro.in पर संपर्क करें।
