अनुबंध विवरण और रणनीतिक महत्व
जनवरी 2024 में, रक्षा मंत्रालय (MoD) ने भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) के साथ 1,476 करोड़ रुपये के अनुबंध पर हस्ताक्षर किए, जिसके तहत भारतीय सेना को पांच ग्राउंड-बेस्ड मोबाइल इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम्स (GBMES) प्रदान किए जाएंगे। ये सिस्टम इलेक्ट्रॉनिक युद्ध (EW) संचालन के लिए बनाए गए हैं, जो सेना को दुश्मन की संचार और रडार सिग्नल्स को पकड़ने, बाधित करने और जाम करने की क्षमता देते हैं। यह अनुबंध भारत की रक्षा आधुनिकीकरण और आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
GBMES को रणनीतिक सीमा क्षेत्रों में तैनात किया जाएगा, जिससे जमीनी बलों को मोबाइल और लचीला इलेक्ट्रॉनिक युद्ध समर्थन मिलेगा। ये सिस्टम आधुनिक बहु-क्षेत्रीय युद्धक्षेत्रों में इलेक्ट्रॉनिक निगरानी और मुकाबला संचालन के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।
UPSC प्रासंगिकता
- GS पेपर 3: रक्षा - रक्षा खरीद नीति, स्वदेशी निर्माण, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध
- GS पेपर 3: अर्थव्यवस्था - रक्षा बजट, मेक इन इंडिया पहल
- निबंध: भारत में रक्षा आधुनिकीकरण और आत्मनिर्भरता
रक्षा खरीद के कानूनी और संवैधानिक ढांचे
संविधान के अनुच्छेद 246 और संघ सूची के प्रविष्टि 54 के तहत संसद को रक्षा मामलों में विधायिका का पूर्ण अधिकार प्राप्त है। रक्षा खरीद प्रक्रिया Defence Procurement Procedure (DPP) 2020 के तहत संचालित होती है, जो स्वदेशी सामग्री और पारदर्शिता पर विशेष जोर देती है। Defence Production Act, 1950 घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहित करता है और रक्षा उपकरणों के उत्पादन तथा आपूर्ति पर सरकार को नियंत्रण प्रदान करता है।
इलेक्ट्रॉनिक संचार प्रणालियों के उपयोग को Indian Telegraph Act, 1885 (धारा 5) नियंत्रित करता है, जो इलेक्ट्रॉनिक युद्ध संचालन से जुड़ा है। वहीं, Defence of India Act, 1962 आपातकालीन परिस्थितियों में रक्षा तत्परता सुनिश्चित करने के लिए आपातकालीन शक्तियां प्रदान करता है। ये कानून रक्षा मंत्रालय को GBMES जैसे इलेक्ट्रॉनिक युद्ध सिस्टम की खरीद और तैनाती में सक्षम बनाते हैं।
आर्थिक प्रभाव और औद्योगिक महत्व
1,476 करोड़ रुपये का यह अनुबंध वित्तीय वर्ष 2023-24 के 1.75 लाख करोड़ रुपये के रक्षा बजट में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जो इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमताओं को प्राथमिकता देता है। BEL का 2022-23 में 12,000 करोड़ रुपये का कारोबार, जिसमें 80% रक्षा इलेक्ट्रॉनिक्स से आता है, भारत के रक्षा औद्योगिक आधार में इसकी केंद्रीय भूमिका दर्शाता है।
भारतीय इलेक्ट्रॉनिक युद्ध बाजार 2027 तक 12.5% की वार्षिक वृद्धि दर से बढ़ने का अनुमान है (FICCI रिपोर्ट 2023), जो भू-राजनीतिक तनाव और उन्नत युद्ध तकनीकों की जरूरत से प्रेरित है। ऐसे अनुबंधों के माध्यम से आयात प्रतिस्थापन से भारत की विदेशी मुद्रा निकासी कम होगी, जो वित्तीय वर्ष 2022 में रक्षा आयातों में 1.5 लाख करोड़ रुपये थी (SIPRI डेटा)। यह मेक इन इंडिया पहल के तहत 2025 तक 70% स्वदेशी सामग्री के लक्ष्य को भी मजबूत करता है, जैसा कि Defence Acquisition Procedure (DAP) 2020 में निर्धारित है।
प्रमुख संस्थान और उनकी भूमिकाएं
- रक्षा मंत्रालय (MoD): नीति निर्माण, खरीद प्राधिकरण, अनुबंध प्रबंधन।
- भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL): इलेक्ट्रॉनिक युद्ध सिस्टम के निर्माण और एकीकरण में विशेषज्ञता रखने वाला सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम।
- रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO): इलेक्ट्रॉनिक युद्ध तकनीकों का अनुसंधान और विकास, तकनीकी सहयोग प्रदान करता है।
- भारतीय सेना: अंतिम उपयोगकर्ता, संचालन तैनाती और फीडबैक के लिए जिम्मेदार।
- रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम (DPSUs): स्वदेशी निर्माण और तकनीकी समाकलन के प्रमुख खिलाड़ी।
तुलनात्मक विश्लेषण: भारत बनाम अमेरिका इलेक्ट्रॉनिक युद्ध आधुनिकीकरण में
| पहलू | भारत | संयुक्त राज्य अमेरिका |
|---|---|---|
| वार्षिक EW निवेश | 1,476 करोड़ रुपये का अनुबंध (एकल अनुबंध); रक्षा बजट 1.75 लाख करोड़ रुपये | प्रति वर्ष 10 अरब डॉलर से अधिक (US Department of Defense Budget 2023) |
| ध्यान केंद्रित क्षेत्र | ग्राउंड-बेस्ड मोबाइल EW सिस्टम; प्रारंभिक स्वदेशी क्षमताएं | वायु, समुद्र, साइबर, अंतरिक्ष सहित बहु-क्षेत्रीय EW सिस्टम का समाकलन |
| स्वदेशीकरण | मेक इन इंडिया पर जोर, 2025 तक 70% स्वदेशी सामग्री का लक्ष्य | प्रगतिशील घरेलू अनुसंधान एवं विकास, निजी क्षेत्र और सैन्य-औद्योगिक सहयोग |
| प्रौद्योगिकी श्रेष्ठता | AI-सक्षम सिग्नल प्रोसेसिंग और साइबर-EW समाकलन का विकास; वर्तमान में सीमित क्षमता | स्थापित AI-सक्षम EW, साइबर-इलेक्ट्रॉनिक युद्ध समाकलन, और रियल-टाइम डेटा फ्यूजन |
महत्वपूर्ण अंतराल और चुनौतियां
भारत की इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमताएं AI-सक्षम सिग्नल प्रोसेसिंग और साइबर-इलेक्ट्रॉनिक युद्ध समाकलन जैसे उन्नत क्षेत्रों में सीमित हैं। अमेरिका और चीन जैसे प्रतिस्पर्धी इन तकनीकों में भारी निवेश कर चुके हैं, जिससे तकनीकी अंतर पैदा हो गया है। साथ ही, निजी क्षेत्र की भागीदारी वैश्विक मानकों की तुलना में कम है, जिससे नवाचार और तेजी से विकास बाधित होता है।
DRDO में निवेश बढ़ाना और निजी उद्योग के सहयोग को प्रोत्साहित करना आवश्यक है ताकि ये अंतराल कम किए जा सकें। स्वदेशी आपूर्ति श्रृंखलाओं और बौद्धिक संपदा उत्पादन को मजबूत करना भी इलेक्ट्रॉनिक युद्ध आधुनिकीकरण के लिए जरूरी होगा।
महत्व और आगे का रास्ता
- यह अनुबंध भारतीय सेना की इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमताओं को रणनीतिक रूप से मजबूत करता है, जिससे युद्धक्षेत्र की स्थिति की बेहतर समझ और इलेक्ट्रॉनिक मुकाबला प्रभावशीलता बढ़ेगी।
- मेक इन इंडिया और DAP 2020 के तहत स्वदेशीकरण की सरकार की प्रतिबद्धता को यह अनुबंध और मजबूती देता है, जिससे आयात और विदेशी तकनीक पर निर्भरता कम होगी।
- AI और साइबर-EW समाकलन में अनुसंधान एवं विकास निवेश बढ़ाना वैश्विक स्तर की प्रगति के साथ तालमेल बनाए रखने के लिए जरूरी है।
- निजी क्षेत्र की भागीदारी और सार्वजनिक-निजी साझेदारी नवाचार और उत्पादन क्षमता को तेज कर सकती है।
- इलेक्ट्रॉनिक युद्ध सिस्टम को अन्य रक्षा प्लेटफॉर्म के साथ लगातार उन्नत और एकीकृत करना बहु-क्षेत्रीय संचालन की क्षमता बढ़ाएगा।
- DPP 2020 सभी नई रक्षा खरीद के लिए 2025 तक न्यूनतम 70% स्वदेशी सामग्री अनिवार्य करता है।
- DPP 2020 ने Defence Acquisition Procedure (DAP) 2016 को प्रतिस्थापित किया।
- DPP 2020 पारदर्शिता और तेज खरीद प्रक्रिया पर जोर देता है।
- EW सिस्टम मुख्यतः दुश्मन के संचार की निगरानी और जामिंग के लिए उपयोग किए जाते हैं।
- EW सिस्टम भारतीय टेलीग्राफ अधिनियम, 1885 के तहत नियंत्रित हैं।
- रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) भारत में EW सिस्टम का एकमात्र निर्माता है।
मुख्य प्रश्न
भारत के रक्षा आधुनिकीकरण और स्वदेशीकरण प्रयासों के संदर्भ में, रक्षा मंत्रालय और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड के बीच ग्राउंड-बेस्ड मोबाइल इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम्स के लिए 1,476 करोड़ रुपये के अनुबंध का महत्व चर्चा करें। (250 शब्द)
झारखंड और JPSC प्रासंगिकता
- JPSC पेपर: पेपर 2 (GS2) - भारतीय राजनीति और शासन; पेपर 3 (GS3) - रक्षा और सुरक्षा
- झारखंड का दृष्टिकोण: झारखंड में कई रक्षा निर्माण इकाइयां और प्रशिक्षण संस्थान हैं; BEL के अनुबंध स्थानीय रोजगार और कौशल विकास को प्रभावित करते हैं।
- मुख्य बिंदु: स्वदेशी रक्षा उत्पादन की भूमिका को क्षेत्रीय औद्योगिक विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा के संदर्भ में प्रस्तुत करें, झारखंड के रक्षा निर्माण योगदान का उल्लेख करें।
ग्राउंड-बेस्ड मोबाइल इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम्स (GBMES) क्या हैं?
GBMES मोबाइल वाहनों पर लगाए गए इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्लेटफॉर्म हैं, जो युद्धक्षेत्र में दुश्मन के इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल्स का पता लगाने, अवरोधन और जामिंग के लिए बनाए गए हैं। ये जमीनी बलों को सामरिक इलेक्ट्रॉनिक सहायता प्रदान करते हैं।
भारत में EW सिस्टम की खरीद और तैनाती को कौन से कानूनी प्रावधान नियंत्रित करते हैं?
मुख्य कानूनी प्रावधानों में अनुच्छेद 246 और संघ सूची की प्रविष्टि 54 (रक्षा कानून), Defence Procurement Procedure (DPP) 2020 (खरीद प्रक्रिया), Defence Production Act 1950 (निर्माण), Indian Telegraph Act 1885 (संचार प्रणाली नियंत्रण), और Defence of India Act 1962 (आपातकालीन शक्तियां) शामिल हैं।
1,476 करोड़ रुपये का अनुबंध मेक इन इंडिया पहल के साथ कैसे मेल खाता है?
BEL के साथ यह अनुबंध सीधे मेक इन इंडिया को समर्थन देता है क्योंकि यह EW सिस्टम के स्वदेशी निर्माण को बढ़ावा देता है और DAP 2020 के तहत 2025 तक 70% स्वदेशी सामग्री के लक्ष्य को पूरा करता है।
भारत इलेक्ट्रॉनिक युद्ध आधुनिकीकरण में किन मुख्य चुनौतियों का सामना कर रहा है?
चुनौतियों में AI-सक्षम सिग्नल प्रोसेसिंग, साइबर-इलेक्ट्रॉनिक युद्ध समाकलन में सीमित क्षमता, कम निजी क्षेत्र की भागीदारी, और उन्नत स्वदेशी तकनीक विकास की आवश्यकता शामिल है ताकि वैश्विक प्रतिस्पर्धा में बने रहा जा सके।
भारत का EW निवेश अमेरिका की तुलना में कैसा है?
अमेरिका हर साल 10 अरब डॉलर से अधिक EW आधुनिकीकरण में निवेश करता है, जो बहु-क्षेत्रीय एकीकृत सिस्टम पर केंद्रित है, जबकि भारत का निवेश प्रारंभिक स्तर पर है, जैसे BEL के साथ 1,476 करोड़ रुपये का अनुबंध, जो स्वदेशी EW क्षमता को बढ़ाने की शुरुआत है।
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