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परिचय: झारखंड में भूमि क्षरण

झारखंड, जिसका क्षेत्रफल 79,714 वर्ग किलोमीटर है, भूमि क्षरण की गंभीर समस्या से जूझ रहा है, जहाँ लगभग 45% क्षेत्र प्रभावित है (Climate Change पर झारखंड राज्य कार्य योजना, 2022)। यहाँ की उबड़-खाबड़ स्थलाकृति, लेटराइटिक मिट्टी और व्यापक खनन गतिविधियाँ मिलकर भूमि क्षरण की दर को बढ़ा रही हैं, जहाँ गंभीर रूप से प्रभावित क्षेत्रों में प्रति हेक्टेयर सालाना 20-30 टन मिट्टी कटाव होता है (CSWCRTI 2021)। कृषि, जो झारखंड की 70% से अधिक आबादी को रोजगार देती है (Census 2011), राज्य की जीएसडीपी में करीब 22% योगदान देती है (Economic Survey Jharkhand 2023), इसलिए मृदा संरक्षण आर्थिक और पारिस्थितिक स्थिरता के लिए आवश्यक है। वहीं, खनन से होने वाली वार्षिक 10,000 करोड़ रुपये से अधिक की आमदनी के बावजूद, यह गतिविधि विशेषकर सिंहभूम और आसपास के जिलों में भूमि क्षरण को बढ़ावा दे रही है।

JPSC परीक्षा से प्रासंगिकता

  • Paper II: पर्यावरण और पारिस्थितिकी – मृदा संरक्षण और भूमि क्षरण
  • Paper III: कृषि और प्राकृतिक संसाधन – राज्य विशेष संरक्षण योजनाएँ
  • झारखंड के लिए विशिष्ट संस्थागत भूमिकाएँ और नीति ढांचे पर ध्यान

मृदा संरक्षण के लिए कानूनी और संवैधानिक ढांचा

संविधान के Article 48A के तहत राज्य को पर्यावरण संरक्षण, जिसमें मृदा संरक्षण भी शामिल है, की जिम्मेदारी दी गई है। Environment Protection Act, 1986 केंद्र सरकार की तरफ से भूमि उपयोग और प्रदूषण नियंत्रण के लिए एक नियामक व्यवस्था प्रदान करता है। झारखंड के लिए विशेष कानूनों में Jharkhand Land Reforms Act, 1979 भूमि स्वामित्व और उपयोग को नियंत्रित करता है, जबकि Jharkhand Soil and Water Conservation Act, 2011 मृदा संरक्षण और जलाधार प्रबंधन के लिए कानूनी प्रावधान स्थापित करता है।

Forest Conservation Act, 1980 (Section 2) के तहत वन कटाई पर पाबंदी लगाई गई है, जो मृदा अस्थिरता को रोकने के लिए जरूरी है। झारखंड का वन क्षेत्र 29.66% है (Forest Survey of India 2023), जो राष्ट्रीय औसत 33.89% से कम है। National Green Tribunal (NGT) ने खनन से होने वाले भूमि क्षरण को रोकने में अहम भूमिका निभाई है, खासकर 2019 में सिंहभूम में अवैध खनन के खिलाफ दिए आदेश के माध्यम से, जिससे पर्यावरण नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित हुआ।

भूमि क्षरण और संरक्षण के आर्थिक पहलू

झारखंड सरकार पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन विभाग के तहत मृदा और जल संरक्षण के लिए सालाना लगभग 250 करोड़ रुपये (2023-24) आवंटित करती है। कृषि के जीएसडीपी में 22% योगदान के बावजूद, प्रभावित जिलों में भूमि क्षरण के कारण 15-20% तक उत्पादन में कमी आती है (झारखंड राज्य कार्य योजना, 2022)। खनन से होने वाली आय 10,000 करोड़ रुपये से अधिक है, लेकिन इसका बाहरी खर्च मिट्टी कटाव और आवासीय क्षति के रूप में होता है।

MGNREGA जैसी सरकारी योजनाएँ जलाधार विकास को वित्तीय सहायता प्रदान कर मृदा संरक्षण में सहायक हैं, झारखंड ने 2022-23 में इस पर 1,200 करोड़ रुपये खर्च किए। हालांकि, कार्यान्वयन में टुकड़ों में होना और समेकित भूमि उपयोग योजना की कमी आर्थिक लाभ को सीमित करती है।

झारखंड में मृदा संरक्षण के लिए संस्थागत व्यवस्था

  • Jharkhand State Pollution Control Board (JSPCB): खनन और औद्योगिक गतिविधियों से मृदा प्रदूषण की निगरानी करता है।
  • Jharkhand Forest Department: वनीकरण और मृदा स्थिरीकरण कार्यक्रम चलाता है, जो राज्य के वन क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण है।
  • Jharkhand State Soil and Water Conservation Department: जलाधार प्रबंधन, कटाव नियंत्रण और सतत भूमि उपयोग को बढ़ावा देता है।
  • Central Soil and Water Conservation Research and Training Institute (CSWCRTI), देहरादून: झारखंड की कृषि-परिस्थितिकी के अनुकूल तकनीकी और शोध सहायता प्रदान करता है।
  • Jharkhand State Agriculture Management and Extension Training Institute (JAMETI): सतत कृषि प्रथाओं के प्रचार-प्रसार में मदद करता है ताकि मृदा क्षरण कम हो।
  • Mineral Exploration Corporation Limited (MECL): पर्यावरण सुरक्षा के नियमों के साथ खनन करता है, हालांकि प्रवर्तन में कमियाँ बनी हुई हैं।

मृदा क्षरण का आंकड़ों के आधार पर मूल्यांकन

परिमाणझारखंडभारत (राष्ट्रीय औसत)
भूमि क्षरण से प्रभावित क्षेत्र45%29%
मृदा कटाव दर (टन/हेक्टेयर/वर्ष)20-30 (गंभीर प्रभावित क्षेत्र)16-20 (औसत)
वन क्षेत्र (% क्षेत्रफल)29.66%33.89%
औसत वार्षिक वर्षा1200-1400 मिमी (अनियमित)1000-1200 मिमी (समान)
कृषि पर निर्भर जनसंख्या70%54%
जलाधार परियोजनाएँ (क्षेत्रफल)150 परियोजनाएँ (1.2 लाख हेक्टेयर)राज्य अनुसार भिन्न

तुलनात्मक अध्ययन: झारखंड बनाम दक्षिण कोरिया का सैमूल उनडोंग

दक्षिण कोरिया का 1970 के दशक का Saemaul Undong आंदोलन समुदाय, सरकार और वैज्ञानिक मृदा प्रबंधन को जोड़कर दस वर्षों में कटाव को 40% तक कम करने में सफल रहा। झारखंड का संस्थागत ढांचा टुकड़ों में बंटा हुआ है, जो दक्षिण कोरिया के एकीकृत मॉडल से अलग है, जिससे समन्वय और स्थानीय भागीदारी में कमी दिखती है।

  • दक्षिण कोरिया ने ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर दोनों रणनीतियाँ अपनाईं; झारखंड में विभागीय खांचे बने हुए हैं।
  • विज्ञान आधारित मृदा प्रबंधन सैमूल उनडोंग में था; झारखंड में तकनीकी अपनाने में असंगति है।
  • दक्षिण कोरिया में समुदाय की भागीदारी केंद्रित थी; झारखंड में स्थानीय हितधारकों को जुटाने में दिक्कतें हैं।

नीति में कमियाँ और क्रियान्वयन की चुनौतियाँ

झारखंड में मृदा संरक्षण प्रयास कई विभागों के बीच बिखरे हुए हैं, बिना किसी एकीकृत निगरानी तंत्र के, जिससे संसाधनों की दुहराव और अव्यवस्था होती है। वास्तविक समय में मृदा स्वास्थ्य का डेटा सीमित है, जो अनुकूलन प्रबंधन को रोकता है। स्थानीय समुदाय की भागीदारी कम होने से संरक्षण की जिम्मेदारी कमजोर पड़ती है। खनन से होने वाले भूमि क्षरण पर NGT के आदेशों के बावजूद प्रवर्तन असंगत है।

आगे का रास्ता: मृदा संरक्षण के बेहतर परिणाम

  • रिमोट सेंसिंग और GIS तकनीक से लैस एकीकृत मृदा और भूमि उपयोग निगरानी प्रणाली स्थापित करें।
  • राज्य स्तर पर Soil Conservation Authority बनाकर विभागीय समन्वय मजबूत करें।
  • स्थानीय समुदाय की भागीदारी बढ़ाने के लिए क्षमता निर्माण और सतत भूमि प्रबंधन को प्रोत्साहित करें।
  • खनन नियमों का सख्ती से पालन कराएं और क्षतिग्रस्त खनन स्थलों की पुनर्स्थापना सुनिश्चित करें।
  • वन क्षेत्र को वर्तमान 29.66% से बढ़ाने के लिए कृषि वानिकी और वनीकरण को बढ़ावा दें।
  • वैज्ञानिक डिजाइन और सहभागी शासन के साथ जलाधार विकास परियोजनाओं का विस्तार करें।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
झारखंड में मृदा संरक्षण के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. झारखंड Soil and Water Conservation Act, 2011 राज्य के लिए विशेष कानूनी ढांचा प्रदान करता है।
  2. झारखंड का वन क्षेत्र राष्ट्रीय औसत से अधिक है।
  3. National Green Tribunal ने झारखंड में अवैध खनन के खिलाफ आदेश जारी किए हैं।
  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2 और 3
  • cकेवल 1 और 3
  • d1, 2 और 3
उत्तर: (c)
कथन 1 सही है क्योंकि झारखंड ने 2011 में Soil and Water Conservation Act बनाया। कथन 2 गलत है; झारखंड का वन क्षेत्र (29.66%) राष्ट्रीय औसत (33.89%) से कम है। कथन 3 सही है; NGT ने सिंहभूम सहित अन्य क्षेत्रों में अवैध खनन के खिलाफ आदेश जारी किए हैं।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
झारखंड में भूमि क्षरण के संबंध में निम्नलिखित पर विचार करें:
  1. झारखंड के लगभग 45% भौगोलिक क्षेत्र में भूमि क्षरण हुआ है।
  2. खनन गतिविधियों का झारखंड में मृदा कटाव पर नगण्य प्रभाव है।
  3. राज्य में जलाधार विकास परियोजनाएँ एक लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में लागू हैं।
  • aकेवल 1 और 3
  • bकेवल 2
  • cकेवल 1 और 2
  • d1, 2 और 3
उत्तर: (a)
कथन 1 सही है क्योंकि झारखंड के 45% क्षेत्र में भूमि क्षरण है। कथन 2 गलत है; खनन मृदा कटाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कथन 3 सही है; जलाधार परियोजनाएँ 1.2 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में लागू हैं।

मेन्स प्रश्न

झारखंड में भूमि क्षरण के मुख्य कारणों पर चर्चा करें और वर्तमान मृदा संरक्षण नीतियों व संस्थागत व्यवस्थाओं की प्रभावशीलता का मूल्यांकन करें। राज्य में मृदा स्वास्थ्य और सतत भूमि प्रबंधन सुधारने के लिए सुझाव दें। (250 शब्द)

झारखंड और JPSC से प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: Paper II (पर्यावरण और पारिस्थितिकी), Paper III (कृषि और प्राकृतिक संसाधन)
  • झारखंड कोण: भूमि क्षरण, खनन प्रभाव और मृदा संरक्षण कानूनों पर राज्य विशेष डेटा
  • मेन्स पॉइंटर: भूमि क्षरण के कारणों को झारखंड की स्थलाकृति और खनन से जोड़ना; संस्थागत विखंडन और NGT के आदेशों को उजागर करना; जलाधार परियोजनाओं और सामुदायिक भागीदारी पर जोर
झारखंड में भूमि क्षरण की सीमा क्या है?

झारखंड के लगभग 45% भौगोलिक क्षेत्र में भूमि क्षरण हुआ है, जिसमें गंभीर प्रभावित क्षेत्रों में मृदा कटाव की दर प्रति हेक्टेयर सालाना 20-30 टन तक पहुंचती है (झारखंड राज्य कार्य योजना, 2022; CSWCRTI 2021)।

झारखंड में मृदा संरक्षण के लिए कौन-कौन से कानूनी प्रावधान लागू हैं?

मुख्य कानूनों में संविधान का Article 48A, Environment Protection Act, 1986, Jharkhand Land Reforms Act, 1979, Forest Conservation Act, 1980 और Jharkhand Soil and Water Conservation Act, 2011 शामिल हैं, जो राज्य के लिए विशेष कानूनी ढांचा प्रदान करते हैं।

खनन का झारखंड में मृदा क्षरण पर क्या प्रभाव है?

खनन से वनों की कटाई, मृदा कटाव और प्रदूषण होता है, जिससे भूमि अस्थिर हो जाती है। सिंहभूम जैसे क्षेत्रों में अवैध खनन के कारण भूमि क्षरण गंभीर रूप से बढ़ा है, जबकि खनन से राज्य को 10,000 करोड़ रुपये से अधिक की आय होती है (NGT आदेश 2019)।

झारखंड में जलाधार परियोजनाओं की भूमिका क्या है?

जलाधार विकास परियोजनाएँ, जैसे NWDPRA के तहत, 1.2 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में लागू हैं और ये मृदा कटाव को कम करने, जल संरक्षण बढ़ाने और कृषि उत्पादन सुधारने के लिए भूमि और जल प्रबंधन को एकीकृत करती हैं।

झारखंड में मृदा संरक्षण में संस्थागत समन्वय क्यों चुनौती है?

अनेक विभाग बिना एकीकृत निगरानी तंत्र के काम करते हैं, जिससे संसाधनों का दोहराव और असंगति होती है। वास्तविक समय में मृदा स्वास्थ्य डेटा की कमी और कम समुदाय भागीदारी अनुकूलन प्रबंधन को कमजोर करती हैं।

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