परिचय: कलाइ-II जलविद्युत परियोजना और पर्यावरणीय अनदेखी
कलाइ-II जलविद्युत परियोजना का प्रस्ताव अरुणाचल प्रदेश ऊर्जा विभाग द्वारा 2023 में प्रस्तुत किया गया है, जिसका लक्ष्य लगभग 96 मेगावाट विद्युत उत्पादन करना है और अनुमानित निवेश 600 करोड़ रुपये है। यह परियोजना राज्य की व्यापक जलविद्युत विकास रणनीति का हिस्सा है, जो अरुणाचल प्रदेश की 50,000 मेगावाट की अप्रयुक्त क्षमता का उपयोग करने की योजना बनाती है, जिसमें से केवल 5% ही अब तक उपयोग में लाया गया है (मंत्रालय विद्युत, 2023)। लेकिन इस प्रस्ताव में लुप्तप्राय पक्षी आवास, विशेषकर White-winged Duck (Cairina scutulata) का उल्लेख नहीं है, जो वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत अनुसूची I की प्रजाति है। इस चूक से पर्यावरणीय नियमों के पालन पर गंभीर सवाल उठते हैं और जैव विविधता से भरपूर क्षेत्र की पारिस्थितिकी को खतरा होता है।
UPSC से संबंधित
- GS पेपर 3: पर्यावरण और पारिस्थितिकी – पर्यावरणीय प्रभाव आकलन, वन्यजीव संरक्षण, सतत विकास
- GS पेपर 2: राजनीति – पर्यावरण के संवैधानिक प्रावधान (Article 48A), पर्यावरणीय शासन में न्यायपालिका की भूमिका
- निबंध: भारत में विकास और पर्यावरण संरक्षण का संतुलन
जलविद्युत परियोजनाओं में पर्यावरणीय सुरक्षा के लिए कानूनी ढांचा
पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत, पारिस्थितिक संतुलन को प्रभावित करने वाली परियोजनाओं के लिए पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) अनिवार्य है, विशेषकर इसके अनुभाग 3 और 5 में। कलाइ-II परियोजना में लुप्तप्राय पक्षी आवास का उल्लेख न होना इस नियम का उल्लंघन है। वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 (अनुभाग 2 और 38V) अनुसूची I की प्रजातियों जैसे White-winged Duck और उनके आवासों की कड़ी सुरक्षा करता है, जिसके तहत परियोजना योजना में संरक्षण उपाय जरूरी हैं। साथ ही, वन संरक्षण अधिनियम, 1980 (अनुभाग 2) वन भूमि के गैर-वन उपयोग के लिए पूर्व स्वीकृति को नियंत्रित करता है, जो अरुणाचल प्रदेश के घने वन क्षेत्र में लागू होता है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 पर्यावरणीय विवादों का निपटारा करता है और कानूनी अनुपालन सुनिश्चित करता है। संविधान के Article 48A के तहत राज्य का दायित्व है कि वह पर्यावरण की रक्षा और सुधार करे, जो इस परियोजना प्रस्ताव में नजरअंदाज किया गया है। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय, विशेषकर T.N. Godavarman Thirumulpad v. Union of India (1996), ने विकास परियोजनाओं में वन और वन्यजीव आवासों की कड़ी जांच पर जोर दिया है, जिससे व्यापक EIA की आवश्यकता और मजबूत होती है।
कलाइ-II जलविद्युत परियोजना के आर्थिक पहलू
यह परियोजना अरुणाचल प्रदेश की जलविद्युत क्षमता में 96 मेगावाट की वृद्धि करेगी, जो भारत के कुल बिजली उत्पादन में जलविद्युत का लगभग 12% योगदान है (CEA, 2023)। परियोजना के तहत 500 सीधे निर्माण कार्य से जुड़े रोजगार और संचालन के बाद 150 स्थायी पद सृजित होने का अनुमान है (अरुणाचल प्रदेश राज्य सरकार रिपोर्ट, 2023)। हालांकि, लुप्तप्राय प्रजातियों के आवास की अनदेखी से पारिस्थितिकीय नुकसान होगा, जो क्षेत्र में लगभग 50 करोड़ रुपये वार्षिक राजस्व देने वाले इको-टूरिज्म को प्रभावित कर सकता है (अरुणाचल पर्यटन विभाग, 2022)। पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी से मुकदमों और देरी की संभावना बढ़ती है, जिससे परियोजना लागत में 15-20% की वृद्धि और 2-3 वर्षों का विलंब हो सकता है (आर्थिक सर्वेक्षण 2023), जो आर्थिक लाभ को कम कर देगा।
संस्थागत भूमिकाएँ और जिम्मेदारियाँ
- पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC): पर्यावरणीय मंजूरी देता है और EIA की निगरानी करता है।
- केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA): विद्युत परियोजनाओं का तकनीकी और आर्थिक मूल्यांकन करता है।
- अरुणाचल प्रदेश राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (APSPCB): स्थानीय पर्यावरण अनुपालन की निगरानी करता है।
- वन्यजीव संस्थान ऑफ इंडिया (WII): लुप्तप्राय प्रजातियों और आवासों पर वैज्ञानिक डेटा प्रदान करता है।
- राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT): पर्यावरणीय विवादों का निपटारा करता है और कानूनी अनुपालन लागू करता है।
- अरुणाचल प्रदेश ऊर्जा विभाग: परियोजना कार्यान्वयन और स्थानीय प्रशासन के लिए जिम्मेदार है।
तुलनात्मक अध्ययन: भूटान का जलविद्युत मॉडल बनाम अरुणाचल प्रदेश
| पहलू | अरुणाचल प्रदेश (कलाइ-II परियोजना) | भूटान जलविद्युत मॉडल |
|---|---|---|
| पर्यावरणीय आकलन | लुप्तप्राय पक्षी आवास का उल्लेख नहीं; अधूरा EIA प्रकटीकरण | पर्यावरण आकलन अधिनियम, 2000 के तहत व्यापक जैव विविधता आकलन अनिवार्य |
| समुदाय की भागीदारी | सीमित सार्वजनिक परामर्श दर्ज | परियोजना योजना में व्यापक समुदाय परामर्श शामिल |
| आर्थिक योगदान | जलविद्युत क्षमता का केवल 5% उपयोग; भारत की बिजली में 12% योगदान | जलविद्युत GDP का 40% से अधिक योगदान देता है |
| वन आवरण और जैव विविधता | संभावित आवास नुकसान, लुप्तप्राय प्रजातियों को खतरा | 70% से अधिक वन आवरण; लुप्तप्राय प्रजातियों की स्थिर जनसंख्या |
महत्वपूर्ण कमी: कलाइ-II परियोजना में पर्यावरण सुरक्षा
कलाइ-II प्रस्ताव में लुप्तप्राय पक्षी आवास का उल्लेख न होना यह दर्शाता है कि अनिवार्य EIA प्रकटीकरण और जैव विविधता संरक्षण को जलविद्युत योजना में शामिल करने में प्रणालीगत विफलता है। यह ऊर्जा उत्पादन लक्ष्य को पारिस्थितिक स्थिरता से ऊपर रखने का परिणाम है, जो अरुणाचल प्रदेश की समृद्ध जैव विविधता को अपरिवर्तनीय नुकसान पहुंचा सकता है। यह अनदेखी कानूनी दायित्वों का उल्लंघन है और दीर्घकालिक सतत विकास लक्ष्यों को कमजोर करती है।
आगे का रास्ता: पर्यावरणीय और विकासात्मक लक्ष्यों का समन्वय
- अनुसूची I प्रजातियों सहित विस्तृत जैव विविधता आकलन के साथ व्यापक और पारदर्शी EIA अनिवार्य करें।
- MoEFCC, WII, APSPCB और स्थानीय प्रशासन के बीच समन्वय और निगरानी को मजबूत करें।
- परियोजना डिजाइन में समुदाय परामर्श और पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान को शामिल करें, ताकि सामाजिक और पर्यावरणीय स्वीकार्यता सुनिश्चित हो।
- भूटान के जलविद्युत मॉडल से सर्वोत्तम प्रथाओं को अपनाएं, जो आर्थिक विकास के साथ जैव विविधता संरक्षण पर जोर देता है।
- NGT की न्यायिक निगरानी का उपयोग करें ताकि अनुपालन सुनिश्चित हो और विवादों का शीघ्र निपटारा हो, जिससे लागत वृद्धि से बचा जा सके।
- पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 पारिस्थितिक संतुलन को प्रभावित करने वाली परियोजनाओं के लिए पर्यावरणीय प्रभाव आकलन अनिवार्य करता है।
- वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 अनुसूची I प्रजाति के आवास के 10 किमी के दायरे में किसी भी विकास गतिविधि को प्रतिबंधित करता है।
- वन संरक्षण अधिनियम, 1980 गैर-वन उपयोग के लिए वन भूमि के विचलन के लिए पूर्व स्वीकृति आवश्यक करता है।
- NGT के पास भारत में सभी पर्यावरणीय विवादों पर विशेष अधिकार क्षेत्र है।
- NGT जुर्माना लगा सकता है और क्षतिग्रस्त पर्यावरण की बहाली का आदेश दे सकता है।
- NGT के निर्णय केवल भारत के सर्वोच्च न्यायालय में अपील किए जा सकते हैं।
मुख्य प्रश्न
अरुणाचल प्रदेश की कलाइ-II जैसी जलविद्युत परियोजनाओं में लुप्तप्राय प्रजाति के आवास की अनदेखी से उत्पन्न पर्यावरणीय और कानूनी चुनौतियों पर चर्चा करें। भारत अपने नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्यों को जैव विविधता संरक्षण के साथ कैसे संतुलित कर सकता है? (250 शब्द)
झारखंड और JPSC से संबंधित
- JPSC पेपर: पेपर 2 (पर्यावरण और पारिस्थितिकी)
- झारखंड का दृष्टिकोण: झारखंड भी अपनी समृद्ध जैव विविधता और आदिवासी आबादी के कारण जलविद्युत विकास और वन-जीव संरक्षण के बीच संतुलन बनाने में चुनौतियों का सामना करता है।
- मुख्य बिंदु: अनिवार्य EIA, WPA और FCA के तहत कानूनी सुरक्षा, और लुप्तप्राय प्रजातियों की रक्षा के लिए संस्थागत समन्वय की आवश्यकता पर आधारित उत्तर तैयार करें।
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत अनुसूची I प्रजातियों का क्या महत्व है?
अनुसूची I प्रजातियों को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत सर्वोच्च सुरक्षा दी जाती है, जिसमें शिकार और आवास विनाश पर सख्त प्रतिबंध होते हैं। अरुणाचल प्रदेश में पाए जाने वाले White-winged Duck भी अनुसूची I प्रजाति हैं, जिनके संरक्षण के लिए विकास परियोजनाओं में कड़े उपाय जरूरी हैं।
जलविद्युत परियोजनाओं में पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 की भूमिका क्या है?
पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभाव की जांच के लिए EIA को अनिवार्य करता है, जिससे संभावित पर्यावरणीय नुकसान की पहचान और उसे कम किया जा सके।
राष्ट्रीय हरित अधिकरण पर्यावरण शासन में कैसे योगदान देता है?
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) पर्यावरणीय विवादों का निपटारा करता है, पर्यावरणीय कानूनों के अनुपालन को सुनिश्चित करता है, जुर्माना लगा सकता है और क्षतिग्रस्त पारिस्थितिकी की बहाली का आदेश दे सकता है, जिससे पर्यावरण न्याय को तेजी मिलती है।
अरुणाचल प्रदेश की जलविद्युत क्षमता का अधिकतर हिस्सा क्यों अनुपयोगी है?
अंदाजित 50,000 मेगावाट क्षमता के बावजूद, केवल 5% से कम उपयोग में लाने के पीछे कठिन भौगोलिक स्थिति, पारिस्थितिक संवेदनशीलता, कानूनी अड़चनें और व्यापक पर्यावरण मंजूरी की आवश्यकता जैसे कारण हैं।
भारत भूटान के जलविद्युत विकास मॉडल से क्या सीख सकता है?
भूटान व्यापक जैव विविधता आकलन और समुदाय परामर्श को अनिवार्य करता है, 70% से अधिक वन आवरण बनाए रखता है और जलविद्युत GDP का 40% योगदान देता है, जो पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास के बीच संतुलन स्थापित करता है।
आधिकारिक स्रोत और आगे पढ़ाई के लिए
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