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न्यायमूर्ति नगरत्ना का अस्पृश्यता पर बयान

2024 में भारत के सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति नगरत्ना ने कहा कि "हर महीने तीन दिन के लिए अस्पृश्यता नहीं हो सकती," जो अस्पृश्यता के खिलाफ संवैधानिक सुरक्षा के बार-बार और प्रणालीगत उल्लंघन को दर्शाता है। यह टिप्पणी अनुसूचित जातियों (SC) के खिलाफ अत्याचारों की सुनवाई के दौरान की गई, जो जाति आधारित भेदभाव के निरंतर रहने को रेखांकित करती है, जबकि कानूनी प्रावधान मौजूद हैं। यह Scheduled Castes and Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act, 1989 (POA Act) और Protection of Civil Rights Act, 1955 (PCR Act) जैसे कानूनों के लागू न होने की समस्या पर ध्यान आकर्षित करती है, जो अस्पृश्यता और संबंधित अत्याचारों को अपराध मानते हैं।

UPSC Relevance

  • GS Paper 2: राजनीति और शासन – सामाजिक भेदभाव के खिलाफ संवैधानिक सुरक्षा, न्यायपालिका की भूमिका
  • GS Paper 1: सामाजिक मुद्दे – जाति आधारित भेदभाव और सामाजिक न्याय
  • निबंध: सामाजिक बहिष्कार और भारत में संवैधानिक उपाय

अस्पृश्यता के खिलाफ संवैधानिक और कानूनी ढांचा

Article 17 स्पष्ट रूप से अस्पृश्यता को समाप्त करता है और इसके किसी भी रूप में अभ्यास पर रोक लगाता है। POA Act, 1989 इसमें विस्तार करता है और SC/ST समुदायों के खिलाफ अस्पृश्यता और अत्याचारों के विशिष्ट कृत्यों को परिभाषित करता है, विशेषकर Sections 3 और 4 में, जो सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार, सार्वजनिक स्थानों तक पहुंच से वंचित करना और शारीरिक हिंसा जैसे कृत्यों को अपराध मानते हैं। PCR Act, 1955 भी अस्पृश्यता के अभ्यास को अपराध मानता है, जिसका फोकस सामाजिक बहिष्कार और अधिकारों की अस्वीकृति पर है। सुप्रीम कोर्ट का State of Karnataka v. Appa Balu Ingale (1993) का फैसला POA Act की सख्त व्याख्या को मजबूत करता है और जाति आधारित अत्याचारों के प्रति शून्य सहिष्णुता की बात करता है।

  • Article 17 अस्पृश्यता को खत्म करता है और इसे लागू करना एक मौलिक अधिकार है।
  • POA Act के Sections 3 और 4 अस्पृश्यता को परिभाषित करते हैं और कड़ी सजा का प्रावधान करते हैं।
  • PCR Act के Sections 3 और 4 पहुंच से वंचित करना और सामाजिक बहिष्कार को अपराध मानते हैं।
  • State of Karnataka v. Appa Balu Ingale (1993) POA Act के कड़े पालन और व्याख्या का आदेश देता है।

अस्पृश्यता और जाति भेदभाव का आर्थिक प्रभाव

सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने 2023-24 में अनुसूचित जातियों के कल्याण के लिए लगभग 35,000 करोड़ रुपये आवंटित किए, जो आर्थिक उत्थान के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता दिखाता है। हालांकि, जाति आधारित भेदभाव आर्थिक पिछड़ापन पैदा करता रहता है। Economic Survey 2023 के अनुसार, जाति बहिष्कार के कारण मानव संसाधन के अध:उपयोग से 2-3% GDP का नुकसान होता है। NFHS-5 (2019-21) के आंकड़े बताते हैं कि SC/ST परिवार आम वर्ग की तुलना में औसतन 30% कम कमाते हैं और बेरोजगारी दर में 10% की अधिकता है, जो सामाजिक भेदभाव से जुड़े आर्थिक असमानताओं को दर्शाता है।

  • 2023-24 में SC कल्याण के लिए INR 35,000 करोड़ का बजट (MoSJE)।
  • जाति भेदभाव से 2-3% GDP का नुकसान (Economic Survey 2023)।
  • SC/ST परिवारों की आमदनी सामान्य वर्ग से 30% कम (NFHS-5)।
  • SC समुदायों में बेरोजगारी राष्ट्रीय औसत से 10% अधिक।

संस्थागत ढांचा और लागू करने की चुनौतियां

अस्पृश्यता से लड़ने वाले मुख्य संस्थान हैं: National Commission for Scheduled Castes (NCSC), जो अत्याचारों की निगरानी करता है और नीतिगत सुझाव देता है; Ministry of Social Justice and Empowerment (MoSJE), जो कल्याण योजनाएं बनाता और लागू करता है; National Human Rights Commission (NHRC), जो मानवाधिकार उल्लंघनों सहित जाति भेदभाव की जांच करता है; और राज्य स्तर पर Scheduled Castes and Scheduled Tribes Protection Cells, जो POA Act के स्थानीय लागू करने के लिए जिम्मेदार हैं। सुप्रीम कोर्ट अस्पृश्यता से जुड़ी संवैधानिक और कानूनी विवादों का निपटारा करता है।

इनके बावजूद लागू करने में कमी बनी हुई है। National Crime Records Bureau (NCRB) 2022 के अनुसार SC/ST के खिलाफ 44,000 अत्याचार के मामले दर्ज हुए, पर सजा दर केवल 25% है। PCR Act के तहत सजा दर पिछले दशक में 10% से भी कम है। 2023 की एक रिपोर्ट में पाया गया कि SC कल्याण के लिए आवंटित धन का केवल 40% राज्यों द्वारा पूरी तरह इस्तेमाल किया गया, जो प्रशासनिक और राजनीतिक अड़चनों को दर्शाता है।

  • NCSC अत्याचारों की निगरानी करता है और नीति सुधार सुझाता है।
  • MoSJE धन आवंटित करता है और कल्याण योजनाएं लागू करता है।
  • NHRC जाति भेदभाव सहित मानवाधिकार उल्लंघनों की जांच करता है।
  • राज्य SC/ST सुरक्षा सेल POA Act को स्थानीय स्तर पर लागू करते हैं।
  • अत्याचार मामलों में सजा दर केवल 25% (NCRB 2022)।
  • PCR Act के तहत पिछले दशक में सजा दर 10% से कम।
  • SC कल्याण के लिए आवंटित धन का केवल 40% उपयोग (2023 रिपोर्ट)।

सामाजिक भेदभाव और शिक्षा पर प्रभाव के आंकड़े

NFHS-5 (2019-21) सर्वेक्षण में 15% SC उत्तरदाताओं ने सार्वजनिक स्थानों पर भेदभाव की शिकायत की, जो सामाजिक बहिष्कार को दर्शाता है। शिक्षा के क्षेत्र में, Centre for Equity Studies की 2022 की एक रिपोर्ट बताती है कि 60% से अधिक SC छात्र माध्यमिक शिक्षा पूरी करने से पहले छोड़ देते हैं, मुख्य कारण भेदभाव और समर्थन की कमी है। ये आंकड़े अस्पृश्यता के कानूनी उल्लंघन से परे इसके सामाजिक प्रभावों को उजागर करते हैं, जो सामाजिक गतिशीलता और मानव पूंजी विकास को प्रभावित करते हैं।

तुलनात्मक दृष्टिकोण: भारत और दक्षिण अफ्रीका

जाति भेदभाव के खिलाफ भारत के कानूनी ढांचे की तुलना दक्षिण अफ्रीका की पोस्ट-अपार्थाइड नीतियों से की जा सकती है। दक्षिण अफ्रीका का Promotion of Equality and Prevention of Unfair Discrimination Act (PEPUDA), 2000 कानूनी प्रतिबंधों के साथ सामाजिक सुधारों को जोड़ता है, जिससे दस वर्षों में रिपोर्टेड भेदभाव के मामलों में 35% की कमी आई है। यह दिखाता है कि कड़े कानूनी उपायों के साथ सामाजिक जवाबदेही और जागरूकता अभियानों का संयोजन प्रभावी होता है, जो भारत के लागू करने के तंत्र में अभी कमी है।

पहलूभारतदक्षिण अफ्रीका
मुख्य कानूनPOA Act, 1989; PCR Act, 1955PEPUDA, 2000
सजा दरलगभग 25% (NCRB 2022)सार्वजनिक नहीं; लागू करने में सुधार
रिपोर्टेड भेदभाव में कमीकम; मामले लगातार बने हुए हैं10 वर्षों में 35% कमी
लागू करने के तरीकेविभाजित; कम जागरूकताएकीकृत कानूनी और सामाजिक सुधार

लागू करने में खामियां और चुनौतियां

मजबूत कानूनों के बावजूद, अस्पृश्यता विरोधी प्रावधानों को लागू करने में कई बाधाएं हैं: पुलिस और न्यायपालिका की अपर्याप्त जागरूकता के कारण पीड़ितों को दोषी ठहराना और न्याय में देरी होती है; सामाजिक-राजनीतिक दबाव मामलों की कम रिपोर्टिंग या हेरफेर करते हैं; पीड़ित सहायता तंत्र की कमी रिपोर्टिंग को कम करती है; और खराब धन उपयोग कल्याण प्रभाव को सीमित करता है। ये कमियां दंडहीनता को बढ़ावा देती हैं और अस्पृश्यता के अभ्यास को जारी रखती हैं, जैसा कि न्यायमूर्ति नगरत्ना ने भी बताया।

आगे का रास्ता: लागू करने की मजबूती और सामाजिक जवाबदेही

  • पुलिस, न्यायपालिका और सरकारी अधिकारियों के लिए जाति भेदभाव और कानूनी प्रावधानों पर अनिवार्य जागरूकता और प्रशिक्षण कार्यक्रम।
  • पीड़ित सहायता प्रणालियों में सुधार, जिसमें कानूनी मदद, सुरक्षा और पुनर्वास शामिल हो, ताकि रिपोर्टिंग बढ़े और मामले कम छोड़ें।
  • राज्य और जिला स्तर पर धन उपयोग की बेहतर निगरानी और जवाबदेही तंत्र।
  • सामुदायिक भागीदारी और जागरूकता अभियान, जो सामाजिक मानसिकता बदलें और कलंक कम करें।
  • न्यायिक सक्रियता से POA और PCR Acts का सख्त पालन सुनिश्चित करना, और अत्याचार मामलों के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
Scheduled Castes and Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act, 1989 के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. यह सामाजिक बहिष्कार और सार्वजनिक स्थानों तक पहुंच से वंचित करने को अपराध मानता है।
  2. NCRB 2022 के अनुसार इसकी सजा दर 50% से अधिक है।
  3. सुप्रीम कोर्ट ने State of Karnataka v. Appa Balu Ingale में इस अधिनियम की सख्त व्याख्या पर जोर दिया।
  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2 और 3
  • cकेवल 1 और 3
  • d1, 2 और 3 सभी
उत्तर: (c)
कथन 1 सही है क्योंकि POA Act सामाजिक बहिष्कार और पहुंच वंचित करना अपराध मानता है। कथन 2 गलत है; NCRB 2022 सजा दर लगभग 25% रिपोर्ट करता है। कथन 3 सही है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने उक्त मामले में कड़ी व्याख्या का आदेश दिया।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
भारतीय संविधान के Article 17 के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. यह अस्पृश्यता को खत्म करता है और इसके किसी भी रूप में अभ्यास को रोकता है।
  2. यह धर्म, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव को रोकता है।
  3. यह एक मौलिक अधिकार है जिसे अदालतों द्वारा लागू किया जा सकता है।
  • aकेवल 1 और 3
  • bकेवल 2
  • cकेवल 1 और 2
  • d1, 2 और 3 सभी
उत्तर: (a)
कथन 1 सही है क्योंकि Article 17 अस्पृश्यता को खत्म करता है। कथन 2 गलत है; धर्म, जाति आदि के आधार पर भेदभाव पर रोक Article 15 में है। कथन 3 सही है; Article 17 एक मौलिक अधिकार है जो अदालतों द्वारा लागू किया जा सकता है।

मुख्य प्रश्न

Scheduled Castes and Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act, 1989 के लागू करने में आ रही चुनौतियों का आलोचनात्मक विश्लेषण करें और भारत में अस्पृश्यता के खिलाफ इसके प्रभावी कार्यान्वयन के लिए सुझाव दें।

झारखंड और JPSC प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: पेपर 2 – शासन और सामाजिक न्याय
  • झारखंड संदर्भ: झारखंड में SC/ST की बड़ी आबादी है जो जाति आधारित भेदभाव का सामना करती है; स्थानीय अत्याचार मामले राष्ट्रीय प्रवृत्तियों के समान लागू करने की चुनौतियां दर्शाते हैं।
  • मुख्य बिंदु: राज्य स्तर पर लागू करने की खामियां, राज्य SC/ST सुरक्षा सेल की भूमिका, धन उपयोग और पीड़ित सहायता में सुधार की जरूरत पर चर्चा।
भारतीय संविधान में Article 17 का क्या महत्व है?

Article 17 अस्पृश्यता को खत्म करता है और इसके किसी भी रूप में अभ्यास को रोकता है, जो इसे अदालतों द्वारा लागू किया जाने वाला मौलिक अधिकार बनाता है। यह POA Act और PCR Act जैसे कानूनों का संवैधानिक आधार है।

Scheduled Castes and Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act, 1989 के प्रमुख प्रावधान क्या हैं?

POA Act अस्पृश्यता और SC/ST के खिलाफ अत्याचारों के विशिष्ट कृत्यों को अपराध मानता है, जिसमें सामाजिक बहिष्कार, सार्वजनिक स्थानों तक पहुंच से वंचित करना, शारीरिक हिंसा और आर्थिक शोषण शामिल हैं, खासकर Sections 3 और 4 के तहत।

अत्याचारों की अधिकता के बावजूद POA Act के तहत सजा दर कम क्यों है?

कम सजा दर (लगभग 25%) का कारण पुलिस और न्यायपालिका की अपर्याप्त जागरूकता, सामाजिक-राजनीतिक दबाव, पीड़ितों का डर और प्रक्रियात्मक देरी है, जिससे कानून का ठीक से पालन नहीं हो पाता।

जाति आधारित भेदभाव भारत की अर्थव्यवस्था को कैसे प्रभावित करता है?

जाति भेदभाव मानव संसाधन के अध:उपयोग का कारण बनता है, जिससे अनुमानित 2-3% GDP का नुकसान होता है (Economic Survey 2023), और SC/ST समुदायों में उच्च बेरोजगारी और कम आय होती है।

भारत दक्षिण अफ्रीका के भेदभाव विरोधी दृष्टिकोण से क्या सीख सकता है?

दक्षिण अफ्रीका के PEPUDA (2000) के तहत एकीकृत कानूनी और सामाजिक सुधारों ने भेदभाव के मामलों में 35% कमी लाई है, जो दिखाता है कि सख्त कानूनों के साथ सामाजिक जवाबदेही और जागरूकता अभियानों का संयोजन प्रभावी होता है।

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