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न्यायमूर्ति नगरथना का अस्पृश्यता प्रथाओं पर बयान

अप्रैल 2024 में भारत के सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति नगरथना ने बार-बार होने वाली धार्मिक अस्पृश्यता प्रथाओं की कड़ी निंदा की और कहा, "हर महीने तीन दिन की अस्पृश्यता नहीं हो सकती।" यह टिप्पणी संविधान के अनुच्छेद 17 के बावजूद अस्पृश्यता के निरंतर उल्लंघन को दर्शाती है। यह बयान जातिगत भेदभाव की उस सामाजिक हकीकत की ओर इशारा करता है, जहां अनौपचारिक रूप से जाति आधारित बहिष्कार जारी है, जो समानता के संवैधानिक वादे को कमजोर करता है।

UPSC प्रासंगिकता

  • GS पेपर 2: राजनीति और शासन – अस्पृश्यता पर संवैधानिक प्रावधान, अनुसूचित जाति सुरक्षा
  • GS पेपर 1: सामाजिक मुद्दे – जाति भेदभाव और सामाजिक बहिष्कार
  • निबंध: आधुनिक भारत में सामाजिक न्याय और समानता

अस्पृश्यता के खिलाफ संवैधानिक और कानूनी ढांचा

भारत के संविधान के अनुच्छेद 17 में अस्पृश्यता को पूरी तरह खत्म कर दिया गया है और इसके किसी भी रूप में पालन पर रोक लगाई गई है। सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 (PCR अधिनियम) में अस्पृश्यता के पालन को दंडनीय बनाया गया है, खासकर धारा 3 और 4 के तहत। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (POA अधिनियम) अस्पृश्यता और उससे जुड़ी भेदभावपूर्ण कार्रवाइयों को अपराध मानता है, जिसमें धारा 3 और 4 सामाजिक बहिष्कार और अपमान को लक्षित करती हैं।

  • कर्नाटक राज्य बनाम अप्पा बालू इंगले (1993): सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अस्पृश्यता के अभ्यास से मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है और इसे पूरी तरह प्रतिबंधित किया जाना चाहिए।
  • इन प्रावधानों के बावजूद POA अधिनियम के तहत दोषसिद्धि दर 10% से कम है, जो लागू करने में चुनौतियों को दर्शाता है।
  • पुलिस की संवेदनशीलता की कमी और न्यायिक प्रक्रिया में देरी भी कानून के कमजोर क्रियान्वयन का कारण हैं।

अस्पृश्यता और जातिगत बहिष्कार का आर्थिक प्रभाव

जातिगत भेदभाव अनुसूचित जातियों (SCs) के आर्थिक अवसरों को सीमित करता है, जो भारत की जनसंख्या का 16.6% हैं (जनगणना 2011)। सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने 2023-24 में SC कल्याण के लिए लगभग ₹45,000 करोड़ आवंटित किए, जो पिछले वर्ष से 15% अधिक हैं। फिर भी अध्ययन बताते हैं कि सामाजिक बहिष्कार और अस्पृश्यता प्रथाएं SC के स्थानीय बाजारों और रोजगार तक पहुंच को सीमित करती हैं, जिससे गरीबी बनी रहती है।

  • विश्व बैंक का अनुमान है कि जातिगत बहिष्कार भारत की GDP को 4% तक कम करता है, जो आर्थिक नुकसान को दर्शाता है।
  • आर्थिक सर्वेक्षण 2023 के अनुसार, संगठित क्षेत्रों में SC रोजगार 10% से कम है, जो आर्थिक हाशिए को दर्शाता है।
  • NFHS-5 (2019-21) रिपोर्ट के मुताबिक 28% SC परिवार सार्वजनिक सेवाओं तक सामाजिक बहिष्कार का सामना करते हैं, जो आजीविका पर असर डालता है।

अस्पृश्यता और जातिगत अत्याचारों से निपटने वाले संस्थान

अस्पृश्यता से लड़ने में कई संस्थान अहम भूमिका निभाते हैं:

  • भारत का सुप्रीम कोर्ट: संवैधानिक उल्लंघनों का निपटारा करता है और अस्पृश्यता विरोधी कानूनों की व्याख्या करता है।
  • राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC): सुरक्षा उपायों के क्रियान्वयन की निगरानी करता है और अत्याचारों की जांच करता है।
  • सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय: नीतियां बनाता है और SC कल्याण के लिए फंड आवंटित करता है।
  • राज्य अनुसूचित जाति कल्याण विभाग: राज्य स्तर पर अस्पृश्यता विरोधी कदम लागू करता है।
  • राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB): SC के खिलाफ अपराधों का डेटा संग्रह करता है, जिसमें अस्पृश्यता अपराध भी शामिल हैं।

NCRB 2022 के आंकड़ों के अनुसार, POA अधिनियम के तहत 45,935 मामले दर्ज हुए, जिनमें पिछले पांच वर्षों में 5% वार्षिक वृद्धि देखी गई, जो जातिगत अत्याचारों की निरंतरता को दर्शाता है।

तुलनात्मक दृष्टिकोण: दक्षिण अफ्रीका का भेदभाव विरोधी कानून

दक्षिण अफ्रीका का Promotion of Equality and Prevention of Unfair Discrimination Act (2000) जाति जैसे भेदभाव को स्पष्ट रूप से अपराध घोषित करता है। दस वर्षों में सामाजिक बहिष्कार के मामले 30% घटे, जो व्यापक कानूनी ढांचे और सामाजिक जागरूकता अभियानों का परिणाम है।

पहलूभारतदक्षिण अफ्रीका
कानूनी प्रावधानअनुच्छेद 17, PCR अधिनियम (1955), POA अधिनियम (1989)Promotion of Equality and Prevention of Unfair Discrimination Act (2000)
दोषसिद्धि दरPOA अधिनियम के तहत 10% से कमविशेष न्यायाधिकरणों के कारण उच्च दोषसिद्धि दर
सामाजिक जागरूकतासीमित, समय-समय पर सामाजिक बहिष्कार जारीव्यापक अभियान, सामाजिक बहिष्कार में कमी
सामाजिक बहिष्कार पर प्रभावNCRB मामलों में वृद्धि, 5% वार्षिक वृद्धि10 वर्षों में 30% कमी

कार्यान्वयन में कमियां और सामाजिक हकीकत

संवैधानिक सुरक्षा के बावजूद अस्पृश्यता बनी हुई है क्योंकि लागू करने में कमजोरी, कम दोषसिद्धि दर और जाति आधारित सामाजिक स्वीकृति मौजूद है। अनौपचारिक प्रथाएं जैसे समय-समय पर सामाजिक बहिष्कार बिना रोक-टोक जारी हैं। पुलिस और न्यायपालिका में संवेदनशीलता की कमी है, और पीड़ित सामाजिक व आर्थिक दबाव के कारण शिकायत दर्ज कराने से कतराते हैं।

  • POA अधिनियम के तहत दोषसिद्धि दर (<10%) कम होने से निवारक प्रभाव कमजोर होता है।
  • जातिगत भेदभाव की सामाजिक स्वीकृति अस्पृश्यता की प्रथाओं को सामान्य बनाती है।
  • न्यायमूर्ति नगरथना द्वारा उजागर मासिक अस्पृश्यता धार्मिक बहिष्कार की नियमित प्रथा को दर्शाती है, न कि केवल एकल घटनाओं को।

आगे का रास्ता: कानूनी और सामाजिक कदमों को मजबूत करना

  • पुलिस प्रशिक्षण और न्यायिक संवेदनशीलता बढ़ाकर जातिगत अत्याचारों की जांच और मुकदमेबाजी को बेहतर बनाना।
  • जातिगत भेदभाव और अस्पृश्यता प्रथाओं के खिलाफ जागरूकता अभियानों के लिए फंडिंग बढ़ाना।
  • NCSC और राज्य कल्याण विभागों की निगरानी तंत्र को मजबूत कर समय पर हस्तक्षेप सुनिश्चित करना।
  • लक्षित रोजगार योजनाओं के माध्यम से आर्थिक समावेशन को बढ़ावा देना ताकि सामाजिक बहिष्कार कम हो।
  • जाति व्यवस्था और अस्पृश्यता प्रथाओं को खत्म करने के लिए समुदाय आधारित सामाजिक सुधारों को प्रोत्साहित करना।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 (PCR अधिनियम) के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. PCR अधिनियम अस्पृश्यता के अभ्यास को दंडनीय बनाता है।
  2. अधिनियम के तहत अपराधों की सुनवाई के लिए विशेष न्यायालय स्थापित करने का प्रावधान है।
  3. PCR अधिनियम अनुसूचित जाति और जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के बाद बनाया गया था।

इनमें से कौन सा/से कथन सही हैं?

  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2 और 3
  • cकेवल 1 और 3
  • d1, 2 और 3
उत्तर: (a)
कथन 1 सही है क्योंकि PCR अधिनियम स्पष्ट रूप से अस्पृश्यता को दंडनीय बनाता है। कथन 2 भी सही है क्योंकि अधिनियम में विशेष न्यायालय बनाने का प्रावधान है। कथन 3 गलत है क्योंकि PCR अधिनियम 1955 में बना था, जो POA अधिनियम 1989 से पहले है।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता को खत्म करता है और इसके किसी भी रूप में पालन पर रोक लगाता है।
  2. अनुच्छेद 17 केवल अनुसूचित जातियों पर लागू होता है, अनुसूचित जनजातियों पर नहीं।
  3. अनुच्छेद 17 संविधान के तहत एक मौलिक अधिकार है।

इनमें से कौन सा/से कथन सही हैं?

  • aकेवल 1
  • bकेवल 1 और 3
  • cकेवल 2 और 3
  • d1, 2 और 3
उत्तर: (a)
कथन 1 सही है क्योंकि अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता को खत्म करता है। कथन 2 गलत है क्योंकि अनुच्छेद 17 किसी भी रूप में अस्पृश्यता पर रोक लगाता है, न केवल अनुसूचित जातियों के लिए। कथन 3 भी गलत है; अनुच्छेद 17 मौलिक अधिकार है लेकिन यह Part III के तहत आता है।

मेन्स प्रश्न

भारत में अस्पृश्यता के खिलाफ संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों के क्रियान्वयन में आने वाली चुनौतियों पर चर्चा करें और इन्हें दूर करने के लिए उपाय सुझाएं। (250 शब्द)

झारखंड एवं JPSC प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: पेपर 2 – शासन और सामाजिक न्याय
  • झारखंड का संदर्भ: झारखंड में अनुसूचित जाति की बड़ी आबादी सामाजिक बहिष्कार का सामना करती है; POA अधिनियम के तहत मामले नियमित रूप से दर्ज होते हैं।
  • मेन्स पॉइंटर: राज्य स्तर पर क्रियान्वयन की कमियां, झारखंड SC कल्याण विभाग की भूमिका, और स्थानीय सामाजिक सुधार प्रयासों को उजागर करें।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 17 क्या कहता है?

अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता को पूरी तरह खत्म करता है और इसके किसी भी रूप में पालन पर रोक लगाता है। यह संविधान के Part III के तहत एक मौलिक अधिकार है, जो सुनिश्चित करता है कि किसी भी व्यक्ति को अस्पृश्यता का सामना न करना पड़े।

PCR अधिनियम और POA अधिनियम में क्या अंतर है?

PCR अधिनियम, 1955 अस्पृश्यता के अभ्यास को दंडनीय बनाता है और नागरिक अधिकारों की रक्षा पर केंद्रित है। POA अधिनियम, 1989 अधिक व्यापक है, जो अनुसूचित जातियों और जनजातियों के खिलाफ अत्याचारों और भेदभाव को अपराध मानता है, कड़ी सजा और विशेष न्यायालयों का प्रावधान करता है।

भारत में अस्पृश्यता विरोधी कानूनों का क्रियान्वयन कमजोर क्यों है?

क्रियान्वयन कमजोर होने के कारणों में कम दोषसिद्धि दर (<10%), पुलिस की संवेदनशीलता की कमी, जातिगत पदानुक्रम की सामाजिक स्वीकृति, और पीड़ितों का सामाजिक बहिष्कार के डर से शिकायत दर्ज कराने में हिचक शामिल हैं।

राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC) की क्या भूमिका है?

NCSC अनुसूचित जातियों के लिए संवैधानिक सुरक्षा उपायों के क्रियान्वयन की निगरानी करता है, अत्याचारों की जांच करता है, नीति सुझाव देता है और अस्पृश्यता व भेदभाव से अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करता है।

जातिगत बहिष्कार भारत की अर्थव्यवस्था को कैसे प्रभावित करता है?

जातिगत बहिष्कार SC के बाजार और रोजगार तक पहुंच को सीमित करता है, जिससे उत्पादकता और GDP में लगभग 4% की कमी आती है (विश्व बैंक के अनुसार)। यह गरीबी और आर्थिक हाशिए को बढ़ावा देता है।

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