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झारखंड राज्य जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (JSAPCC) का परिचय

झारखंड राज्य जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (JSAPCC) को 2012 में भारत सरकार द्वारा 2008 में शुरू की गई राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (NAPCC) के दिशा-निर्देशों के अनुसार तैयार किया गया। यह योजना झारखंड की सामाजिक-आर्थिक संरचना में पारिस्थितिक संरक्षण, सतत विकास और जलवायु सहनशीलता को समाहित करने के लिए राज्य-विशेष नीति उपकरण है। योजना में राज्य की विशिष्ट कमजोरियों जैसे वनों का क्षरण, खनन से होने वाला प्रदूषण, और जलवायु में बदलाव को ध्यान में रखते हुए वानिकी, कृषि, ऊर्जा और जल संसाधन जैसे क्षेत्रों में लक्षित हस्तक्षेप शामिल हैं।

JPSC परीक्षा से प्रासंगिकता

  • पर्यावरण और पारिस्थितिकी पेपर: राज्य-विशेष जलवायु नीतियाँ और जैव विविधता संरक्षण।
  • भूगोल पेपर: झारखंड का वन क्षेत्र, जलवायु परिवर्तन, और पारिस्थितिक संवेदनशील क्षेत्र।
  • पिछले वर्षों के प्रश्न: वन संरक्षण प्रयास, जलवायु सहनशीलता रणनीतियाँ (JPSC 2021, 2022)।

JSAPCC के कानूनी और संवैधानिक आधार

JSAPCC का संचालन अनुच्छेद 48A के तहत होता है, जो राज्य को पर्यावरण की रक्षा और सुधार का निर्देश देता है। यह योजना पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के अनुरूप है, जो केंद्रीय पर्यावरण शासन के लिए मुख्य कानूनी आधार प्रदान करता है। वन भूमि उपयोग को नियंत्रित करने वाले वन संरक्षण अधिनियम, 1980 (धारा 2 और 3) और जैव विविधता की सुरक्षा के लिए वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 (धारा 2 और 9) भी लागू होते हैं। झारखंड की संस्थागत व्यवस्था में झारखंड राज्य जैव विविधता बोर्ड (2002 के जैव विविधता अधिनियम के तहत) और झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (JSPCB) शामिल हैं, जो वायु और जल प्रदूषण नियंत्रण के नियम लागू करते हैं।

  • MC Mehta बनाम भारत संघ (1987): पर्यावरण न्यायशास्त्र को मजबूत करने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले, जो झारखंड में प्रदूषण नियंत्रण के लिए महत्वपूर्ण हैं।
  • झारखंड राज्य जैव विविधता बोर्ड: जैव विविधता अधिनियम का क्रियान्वयन और संवेदनशील क्षेत्रों की निगरानी।
  • JSPCB: वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981 और जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 का पालन सुनिश्चित करता है।

JSAPCC के आर्थिक पहलू

झारखंड ने 2022-23 के बजट में जलवायु अनुकूलन और शमन के लिए लगभग ₹150 करोड़ आवंटित किए हैं। वन क्षेत्र राज्य की GDP में लगभग 5.5% का योगदान देता है, जो वन संरक्षण की आर्थिक महत्ता दर्शाता है। हालांकि, कोयला खनन और औद्योगिक उत्सर्जन राज्य के कार्बन पदचिह्न का लगभग 60% हिस्सा हैं, जो पर्यावरणीय चुनौतियाँ बढ़ाते हैं। झारखंड नवीकरणीय ऊर्जा विकास एजेंसी (JREDA) के नेतृत्व में नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता 1,200 मेगावाट तक पहुंच चुकी है, जिसकी वार्षिक वृद्धि दर 12% है। जलवायु-सहिष्णु कृषि पहलें सूखा-प्रतिरोधी फसलों और सतत प्रथाओं को बढ़ावा देकर पांच वर्षों में किसानों की आय में 15% वृद्धि का लक्ष्य रखती हैं।

  • ₹150 करोड़: JSAPCC के लिए बजट आवंटन (झारखंड राज्य बजट 2023)।
  • 5.5% GDP योगदान: वन क्षेत्र का (आर्थिक सर्वेक्षण झारखंड 2023)।
  • 60% कार्बन पदचिह्न: कोयला खनन और औद्योगिक उत्सर्जन से (JSPCB रिपोर्ट 2023)।
  • 1,200 मेगावाट नवीकरणीय क्षमता: 2023 तक, 12% वार्षिक वृद्धि (नई और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय)।
  • 15% आय वृद्धि: जलवायु-सहिष्णु कृषि के माध्यम से (झारखंड कृषि विभाग योजना 2023)।

संस्थागत संरचना और समन्वय

JSAPCC के क्रियान्वयन में कई संस्थान शामिल हैं, जिनके स्पष्ट कार्य हैं, लेकिन समन्वय की कमी एक बड़ी बाधा है। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन विभाग, झारखंड नीति निर्माण और क्रियान्वयन का नेतृत्व करता है। झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (JSPCB) प्रदूषण की निगरानी और मानकों का पालन सुनिश्चित करता है। झारखंड राज्य जैव विविधता बोर्ड (JSBB) जैव विविधता संरक्षण पर केंद्रित है, जबकि झारखंड नवीकरणीय ऊर्जा विकास एजेंसी (JREDA) नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं को बढ़ावा देती है। केंद्रीय संस्थान जैसे केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) तकनीकी मार्गदर्शन प्रदान करते हैं और राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान (NIH) राज्य के लिए जलवायु प्रभाव मूल्यांकन करता है।

  • पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन विभाग: नीति नेतृत्व और JSAPCC समन्वय।
  • JSPCB: प्रदूषण निगरानी और प्रवर्तन।
  • JSBB: जैव विविधता प्रबंधन और जैव विविधता अधिनियम का क्रियान्वयन।
  • JREDA: नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा और परियोजना सुविधा।
  • CPCB और NIH: तकनीकी सहायता और जलवायु प्रभाव अनुसंधान।

झारखंड का पारिस्थितिक और जलवायु डेटा

झारखंड का वन क्षेत्र उसके भौगोलिक क्षेत्र का 29.6% है (वन सर्वेक्षण भारत, 2021)। 1980 से 2020 के बीच राज्य का औसत वार्षिक तापमान 0.7°C बढ़ा है (IMD जलवायु डेटा 2022)। पिछले दो दशकों में वर्षा की अस्थिरता में 15% की वृद्धि हुई है (भारतीय मौसम विभाग, 2023), जिससे सूखा और बाढ़ की जोखिम बढ़ी है। दालमा वन्यजीव अभयारण्य और बेतला राष्ट्रीय उद्यान जैसे जैव विविधता संवेदनशील क्षेत्र 150 से अधिक पक्षी और 50 स्तनधारी प्रजातियों के आवास हैं, जो राज्य की पारिस्थितिक समृद्धि को दर्शाते हैं। रांची में सर्दियों के महीनों में वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) औसतन 120 रहता है, जो 'मध्यम' से 'अस्वस्थ' स्तर के बीच है (JSPCB 2023)। JSAPCC का लक्ष्य 2030 तक 2010 के स्तर की तुलना में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 20% की कटौती करना है।

  • 29.6% वन क्षेत्र: FSI 2021 के अनुसार।
  • 0.7°C तापमान वृद्धि: 1980-2020 के बीच (IMD 2022)।
  • 15% वर्षा अस्थिरता वृद्धि: पिछले 20 वर्षों में (IMD 2023)।
  • जैव विविधता संवेदनशील क्षेत्र: दालमा वन्यजीव अभयारण्य, बेतला राष्ट्रीय उद्यान।
  • रांची में AQI 120: सर्दियों का औसत, प्रदूषण की चिंता दर्शाता है (JSPCB 2023)।
  • 20% GHG कटौती लक्ष्य: 2030 तक 2010 की तुलना में (JSAPCC 2022)।

तुलनात्मक विश्लेषण: झारखंड बनाम केरल की जलवायु परिवर्तन कार्य योजनाएं

मापदंड झारखंड JSAPCC केरल राज्य जलवायु परिवर्तन कार्य योजना प्रभाव
वन क्षेत्र में बदलाव 29.6%, स्थिर लेकिन थोड़ी गिरावट के साथ 5 वर्षों में 10% की वृद्धि (2018-2023) केरल की सामुदायिक वन प्रबंधन अधिक प्रभावी
संस्थागत समन्वय विभागों के बीच कमजोर समन्वय बहु-हितधारक समेकित शासन मॉडल केरल की योजना तेज क्रियान्वयन सक्षम करती है
वित्तीय विकेंद्रीकरण स्थानीय स्तर पर सीमित वित्तीय स्वायत्तता जलवायु परियोजनाओं के लिए अधिक वित्तीय विकेंद्रीकरण केरल बेहतर स्थानीय अनुकूलन प्राप्त करता है
सामुदायिक भागीदारी संरक्षण में स्थानीय समुदायों की कम भागीदारी वन और जल प्रबंधन में मजबूत समुदाय सहभागिता केरल का दृष्टिकोण बेहतर पारिस्थितिक परिणाम देता है

JSAPCC के क्रियान्वयन में प्रमुख कमियाँ

JSAPCC का व्यापक ढांचा कमजोर विभागीय समन्वय और सीमित वित्तीय विकेंद्रीकरण के कारण कमजोर पड़ता है। इससे परियोजनाओं में देरी होती है और स्थानीय स्तर पर जलवायु अनुकूलन कम प्रभावी होता है। सामुदायिक भागीदारी की कमी से संरक्षण प्रयासों को नुकसान होता है, खासकर केरल जैसे राज्यों के मुकाबले। इसके अलावा, कोयला खनन और औद्योगिक उत्सर्जन की प्रधानता शमन प्रयासों को जटिल बनाती है, जिसके लिए कड़े नियम लागू करना और वैकल्पिक आजीविका योजनाएं जरूरी हैं।

  • पर्यावरण, वन, कृषि और ऊर्जा विभागों के बीच समन्वय की कमी।
  • जिला और ब्लॉक स्तर पर जलवायु परियोजनाओं के लिए अपर्याप्त वित्तीय स्वायत्तता।
  • आदिवासी और स्थानीय समुदायों को शामिल करने वाले संरक्षण मॉडल की कमी।
  • खनन उत्सर्जन के नियंत्रण में कानूनी प्रावधानों के बावजूद चुनौतियाँ।

JSAPCC का महत्व और आगे का रास्ता

JSAPCC झारखंड की जलवायु सहनशीलता और पारिस्थितिक स्थिरता के लिए एक महत्वपूर्ण ढांचा है। संस्थागत समन्वय को मजबूत करने के लिए एक समर्पित जलवायु शासन सेल की स्थापना क्रियान्वयन को तेज कर सकती है। वित्तीय विकेंद्रीकरण बढ़ाकर स्थानीय निकायों को जलवायु जोखिमों से निपटने का अधिकार देना जरूरी है। केरल की तरह सामुदायिक वन प्रबंधन को अपनाकर वन क्षेत्र और जैव विविधता संरक्षण में सुधार किया जा सकता है। अंत में, खनन और औद्योगिक क्षेत्रों में प्रदूषण नियंत्रण के नियमों का सख्ती से पालन झारखंड के कार्बन पदचिह्न को कम करने के लिए आवश्यक है।

  • राज्य स्तर पर जलवायु समन्वय प्राधिकरण की स्थापना कर विभागीय सहयोग बढ़ाना।
  • जिला स्तर की परियोजनाओं के लिए बजट आवंटन बढ़ाना और निधि सुनिश्चित करना।
  • आदिवासी और वन आश्रित समुदायों की भागीदारी वाले संरक्षण मॉडल को बढ़ावा देना।
  • खनन और औद्योगिक गतिविधियों में प्रदूषण नियंत्रण सख्ती से लागू करना।
  • जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने के लिए नवीकरणीय ऊर्जा विस्तार को बढ़ावा देना।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
झारखंड राज्य जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (JSAPCC) के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. JSAPCC को राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना के मार्गदर्शन में 2012 में तैयार किया गया था।
  2. FSI 2021 के अनुसार झारखंड का वन क्षेत्र लगभग 40% है।
  3. JSAPCC का लक्ष्य 2030 तक 2010 के मुकाबले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 20% कटौती करना है।
  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2 और 3
  • cकेवल 1 और 3
  • d1, 2 और 3 सभी
उत्तर: (c)
कथन 1 सही है क्योंकि JSAPCC को 2012 में NAPCC के दिशा-निर्देशों के तहत बनाया गया। कथन 2 गलत है; झारखंड का वन क्षेत्र 29.6% है, 40% नहीं। कथन 3 सही है क्योंकि JSAPCC 2030 तक 2010 की तुलना में 20% ग्रीनहाउस गैस कटौती का लक्ष्य रखता है।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
झारखंड के जलवायु शासन में संस्थागत भूमिकाओं के बारे में निम्नलिखित पर विचार करें:
  1. झारखंड राज्य जैव विविधता बोर्ड वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981 लागू करता है।
  2. झारखंड नवीकरणीय ऊर्जा विकास एजेंसी राज्य में नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं को बढ़ावा देती है।
  3. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को तकनीकी सहायता और दिशा-निर्देश प्रदान करता है।
  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2 और 3
  • cकेवल 1 और 3
  • d1, 2 और 3 सभी
उत्तर: (b)
कथन 1 गलत है; वायु अधिनियम JSPCB लागू करता है, जैव विविधता बोर्ड नहीं। कथन 2 और 3 सही हैं, जो JREDA और CPCB की भूमिकाओं को दर्शाते हैं।

मुख्य प्रश्न

झारखंड राज्य जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (JSAPCC) को उसके जलवायु सहनशीलता लक्ष्यों को प्राप्त करने में आने वाली संस्थागत और वित्तीय चुनौतियों का मूल्यांकन करें। प्रभावशीलता बढ़ाने के लिए सुझाव दें।

झारखंड और JPSC से प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: पेपर 2 (पर्यावरण और पारिस्थितिकी), पेपर 3 (भूगोल और अर्थव्यवस्था)
  • झारखंड दृष्टिकोण: राज्य-विशेष जलवायु कमजोरियां, वानिकी डेटा, खनन प्रदूषण, और नवीकरणीय ऊर्जा पहलें।
  • मुख्य बिंदु: JSAPCC का कानूनी ढांचा, संस्थागत भूमिकाएँ, आर्थिक आंकड़े, और केरल जैसे राज्यों के साथ तुलनात्मक विश्लेषण।
झारखंड की राज्य जलवायु परिवर्तन कार्य योजना का कानूनी आधार क्या है?

JSAPCC राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (NAPCC) के मार्गदर्शन में तैयार की गई है और इसका संचालन संविधान के अनुच्छेद 48A के तहत होता है। यह केंद्रीय कानूनों जैसे पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986, वन संरक्षण अधिनियम, 1980, और वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के अनुरूप है।

JSAPCC के तहत झारखंड के प्रमुख जैव विविधता संवेदनशील क्षेत्र कौन से हैं?

दालमा वन्यजीव अभयारण्य और बेतला राष्ट्रीय उद्यान झारखंड के मुख्य जैव विविधता संवेदनशील क्षेत्र हैं, जहाँ 150 से अधिक पक्षी और 50 स्तनधारी प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जिन्हें JSAPCC के तहत संरक्षण प्राथमिकता दी गई है।

झारखंड के कार्बन पदचिह्न के मुख्य स्रोत क्या हैं?

कोयला खनन और औद्योगिक उत्सर्जन झारखंड के कार्बन पदचिह्न का लगभग 60% हिस्सा हैं, जो JSAPCC के तहत जलवायु शमन के लिए बड़ी चुनौती हैं।

जलवायु कार्रवाई के परिणामों के संदर्भ में झारखंड का वन क्षेत्र केरल के मुकाबले कैसा है?

झारखंड का वन क्षेत्र 29.6% है और अपेक्षाकृत स्थिर है, जबकि केरल ने सामुदायिक वन प्रबंधन के माध्यम से पिछले पांच वर्षों में अपने वन क्षेत्र में 10% की वृद्धि की है, जो झारखंड में भागीदारी आधारित संरक्षण की जरूरत को दर्शाता है।

JSAPCC के क्रियान्वयन में कौन-कौन सी संस्थागत चुनौतियाँ हैं?

JSAPCC को कमजोर विभागीय समन्वय, सीमित वित्तीय विकेंद्रीकरण, और अपर्याप्त सामुदायिक भागीदारी जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जो स्थानीय स्तर पर जलवायु अनुकूलन परियोजनाओं को धीमा कर देती हैं।

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