रुपये का अवमूल्यन: संदर्भ और वर्तमान रुझान
अप्रैल 2022 से मई 2023 तक अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये में लगभग 8.5% की गिरावट आई है, जो 2013 के 'फ्रैजाइल फाइव' दौर की याद दिलाती है। उस समय की तरह ही बाहरी और घरेलू दबावों ने मुद्रा पर असर डाला है (RBI मासिक बुलेटिन, मई 2023)। 'फ्रैजाइल फाइव' में भारत सहित पांच उभरती अर्थव्यवस्थाएं शामिल थीं, जिन्हें अमेरिकी फेडरल रिजर्व के टेपरिंग के कारण पूंजी निकासी का सामना करना पड़ा था। हालांकि, 2023 में भारत की स्थिति पहले से बेहतर है क्योंकि विदेशी मुद्रा भंडार अधिक हैं और अर्थव्यवस्था ज्यादा विविधतापूर्ण है।
- रुपये का अवमूल्यन: अप्रैल 2022 से मई 2023 तक 8.5% (RBI)
- चालू खाता घाटा (CAD): Q4 FY2023 में GDP का 2.9% तक बढ़ा (RBI)
- विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) निकासी: 2022 में $10 बिलियन (SEBI)
- विदेशी मुद्रा भंडार घटकर $642 बिलियन (सितंबर 2021) से $580 बिलियन (मई 2023) तक (RBI)
- मुद्रास्फीति FY2023 में औसतन 6.5%, RBI के 4% लक्ष्य से ऊपर (MoSPI)
मुद्रा स्थिरता के लिए कानूनी और संस्थागत ढांचा
भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934, RBI को मौद्रिक नीति संचालित करने और विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करने का अधिकार देता है ताकि रुपये को स्थिर रखा जा सके। अधिनियम की धारा 45ZL मुद्रा डेरिवेटिव्स को नियंत्रित करने के लिए RBI को सक्षम बनाती है, जिससे वह विदेशी मुद्रा बाजार की अस्थिरता को प्रबंधित कर सकता है। विदेशी विनिमय प्रबंधन अधिनियम (FEMA), 1999, विदेशी मुद्रा लेनदेन, पूंजी प्रवाह और बाहरी उधारी को नियंत्रित करता है। संविधान के अनुच्छेद 292 के तहत केंद्र सरकार को बाहरी उधार लेने का अधिकार है, जो विदेशी मुद्रा की स्थिति को अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है। मौद्रिक स्थिरता संविधान में स्पष्ट रूप से नहीं है, लेकिन अनुच्छेद 39 के निर्देशात्मक सिद्धांतों के अनुरूप है, जो आर्थिक कल्याण पर जोर देते हैं।
- RBI अधिनियम, 1934: मौद्रिक नीति और विदेशी मुद्रा हस्तक्षेप के अधिकार
- धारा 45ZL: मुद्रा डेरिवेटिव्स का नियंत्रण
- FEMA, 1999: विदेशी मुद्रा लेनदेन और पूंजी प्रवाह का प्रबंधन
- अनुच्छेद 292: केंद्र सरकार की बाहरी उधारी की अनुमति
- अनुच्छेद 39: आर्थिक स्थिरता के लिए निर्देशात्मक सिद्धांत
रुपये के हालिया अवमूल्यन के आर्थिक कारण
रुपये की कमजोरी बाहरी झटकों और घरेलू आर्थिक असंतुलन के संयोजन का परिणाम है। Q4 FY2023 में चालू खाता घाटा GDP का 2.9% तक बढ़ा है, जो कच्चे तेल सहित महंगे वैश्विक वस्तु दामों के कारण आयात बिल में वृद्धि को दर्शाता है। 2022 में $10 बिलियन की विदेशी पोर्टफोलियो निवेश निकासी वैश्विक मौद्रिक सख्ती और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के चलते निवेशकों की जोखिम से बचने की प्रवृत्ति को दिखाती है। साथ ही, 6.5% की मुद्रास्फीति RBI के लक्ष्य से ऊपर है, जो वास्तविक रिटर्न पर दबाव डालती है और मौद्रिक नीति को जटिल बनाती है। विदेशी मुद्रा भंडार $642 बिलियन से घटकर $580 बिलियन हो गए हैं, जिससे RBI की हस्तक्षेप क्षमता सीमित हुई है, हालांकि ये भंडार उभरते बाजारों की तुलना में अभी भी मजबूत हैं।
- चालू खाता घाटा बढ़ने का कारण कच्चे तेल आयात और वैश्विक वस्तु कीमतें
- FPI निकासी अमेरिकी फेडरल रिजर्व की दर वृद्धि और वैश्विक जोखिम से बचाव के कारण
- मुद्रास्फीति लक्ष्य से ऊपर होने के कारण वास्तविक ब्याज दरों की आकर्षकता कम
- विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट से RBI की हस्तक्षेप क्षमता सीमित, पर मजबूत बनी हुई
- FY2024 के लिए GDP वृद्धि का अनुमान 6.1% तक घटाया गया (IMF)
2013 के 'फ्रैजाइल फाइव' दौर से तुलना
| पहलू | भारत 2013 | भारत 2022-23 | तुर्की 2018 (तुलनात्मक) |
|---|---|---|---|
| रुपया/लीरा अवमूल्यन | अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगभग 20% | लगभग 8.5% | लगभग 40% |
| चालू खाता घाटा (CAD) | GDP का लगभग 4.8% | GDP का 2.9% | GDP का लगभग 5.5% |
| विदेशी मुद्रा भंडार | लगभग $280 बिलियन | लगभग $580 बिलियन | लगभग $80 बिलियन |
| पूंजी प्रवाह | फेड टेपरिंग के कारण बड़ी FPI निकासी | वैश्विक सख्ती के बीच $10 बिलियन FPI निकासी | भारी बाहरी कर्ज, सीमित FPI प्रवाह |
| नीति प्रतिक्रिया | RBI ने ब्याज दरें बढ़ाईं, मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप किया | RBI ने ब्याज दरें बढ़ाईं, सक्रिय हस्तक्षेप जारी | ब्याज दर बढ़ाने में देरी, सीमित हस्तक्षेप |
संरचनात्मक कमजोरियां और नीति के निहितार्थ
2013 के बाद सुधारों के बावजूद भारत विदेशी पोर्टफोलियो निवेश पर निर्भर है, जो स्थिर FDI या निर्यात आय की तुलना में अधिक अस्थिर होता है। निर्यात प्रतिस्पर्धा बढ़ाने और आयात निर्भरता कम करने के लिए संरचनात्मक सुधार सीमित हैं, जिससे चालू खाता बाहरी झटकों के प्रति संवेदनशील बना रहता है। मुद्रास्फीति से निपटने के लिए मौद्रिक सख्ती विकास को धीमा कर सकती है, जबकि विदेशी मुद्रा हस्तक्षेप भंडार को कम करता है। राजकोषीय घाटा, जो चालू खाता घाटे से अलग है, निवेशकों के विश्वास और मुद्रा स्थिरता को प्रभावित करता है।
- अस्थिर FPI प्रवाह रुपये की अस्थिरता बढ़ाते हैं
- सीमित निर्यात विविधीकरण CAD प्रबंधन को बाधित करता है
- मौद्रिक सख्ती विकास और मुद्रास्फीति पर असर डालती है
- राजकोषीय अनुशासन से आर्थिक विश्वास मजबूत होता है
- निर्माण और ऊर्जा क्षेत्रों में संरचनात्मक सुधार की जरूरत
महत्व और आगे का रास्ता
रुपये का अवमूल्यन 2013 के 'फ्रैजाइल फाइव' की कमजोरियों की याद दिलाता है, लेकिन मजबूत संस्थागत ढांचे और अधिक भंडार के साथ। नीति निर्माताओं को मुद्रास्फीति नियंत्रण और विकास के बीच संतुलन बनाना होगा, साथ ही निर्यात प्रतिस्पर्धा बढ़ानी होगी और आयात निर्भरता कम करनी होगी। पूंजी खाते की मजबूती के लिए स्थिर FDI प्रवाह और पोर्टफोलियो प्रवाह पर नियामक निगरानी जरूरी है। RBI के सावधानीपूर्वक हस्तक्षेप और केंद्र की वित्तीय अनुशासन मुद्रा स्थिरता के लिए निर्णायक होंगे।
- लक्षित सुधारों के माध्यम से निर्यात प्रतिस्पर्धा बढ़ाएं
- अस्थिर FPI पर निर्भरता कम करने के लिए स्थिर FDI को बढ़ावा दें
- निवेशक विश्वास के लिए राजकोषीय अनुशासन बनाए रखें
- RBI मौद्रिक और विदेशी मुद्रा हस्तक्षेप जारी रखे
- वैश्विक मौद्रिक नीति में बदलावों पर नजर रखें और अनुकूलन करें
UPSC प्रासंगिकता
- GS पेपर 3: भारतीय अर्थव्यवस्था — मुद्रा उतार-चढ़ाव, भुगतान संतुलन, मौद्रिक नीति
- GS पेपर 3: भारतीय अर्थव्यवस्था — वित्तीय स्थिरता में RBI और SEBI की भूमिका
- निबंध: भारतीय मैक्रोइकॉनॉमी पर बाहरी झटकों का प्रभाव
- RBI को RBI अधिनियम, 1934 के तहत विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप का अधिकार प्राप्त है।
- RBI अधिनियम की धारा 45ZL विदेशी प्रत्यक्ष निवेश प्रवाह को नियंत्रित करती है।
- RBI मुद्रा डेरिवेटिव्स को विनियमित कर विनिमय दर की अस्थिरता को प्रबंधित कर सकता है।
इनमें से कौन-से कथन सही हैं?
- CAD देश के वस्तु और सेवा निर्यात और आयात के बीच अंतर को मापता है।
- राजकोषीय घाटा सरकार के कुल व्यय और कुल प्राप्तियों (उधार को छोड़कर) के बीच अंतर है।
- दोनों CAD और राजकोषीय घाटा सीधे विदेशी मुद्रा भंडार को प्रभावित करते हैं।
इनमें से कौन-से कथन सही हैं?
मुख्य प्रश्न
“भारतीय रुपये के हालिया अवमूल्यन के कारणों का विश्लेषण करें और वर्तमान स्थिति की तुलना 2013 के ‘फ्रैजाइल फाइव’ संकट से करें। मुद्रा को स्थिर करने के लिए RBI और सरकार के पास उपलब्ध नीति विकल्पों पर चर्चा करें।”
झारखंड और JPSC प्रासंगिकता
- JPSC पेपर: पेपर 3 (अर्थव्यवस्था) — मैक्रोइकॉनॉमिक संकेतक और मौद्रिक नीति
- झारखंड का दृष्टिकोण: राज्य के खनिज निर्यात और ऊर्जा आयात व्यापार संतुलन और मुद्रा उतार-चढ़ाव को प्रभावित करते हैं
- मुख्य बिंदु: रुपये की अस्थिरता को झारखंड के निर्यात-आयात और वित्तीय स्थिति से जोड़कर उत्तर तैयार करें
2013 में 'फ्रैजाइल फाइव' संकट की शुरुआत क्या थी?
यह संकट अमेरिकी फेडरल रिजर्व के क्वांटिटेटिव ईजिंग में कटौती की घोषणा के कारण शुरू हुआ, जिससे भारत समेत उभरते बाजारों से पूंजी निकासी हुई, जो बड़े चालू खाते के घाटे और विदेशी पोर्टफोलियो निवेश पर निर्भर थे।
RBI रुपये को स्थिर करने के लिए कैसे हस्तक्षेप करता है?
RBI विदेशी मुद्रा के स्पॉट और डेरिवेटिव बाजारों में खरीद-बिक्री करता है, नीतिगत ब्याज दरें समायोजित करता है, और RBI अधिनियम, 1934 की धारा 45ZL के तहत मुद्रा डेरिवेटिव्स को नियंत्रित करता है ताकि विनिमय दर की अस्थिरता को प्रबंधित किया जा सके।
चालू खाता घाटा और राजकोषीय घाटा में क्या अंतर है?
चालू खाता घाटा वस्तु, सेवा और आय भुगतान के आयात-निर्यात का अंतर मापता है, जो बाहरी क्षेत्र की स्थिति दर्शाता है। राजकोषीय घाटा सरकार के व्यय और राजस्व (उधार को छोड़कर) के बीच अंतर होता है, जो घरेलू वित्तीय स्थिति को दर्शाता है।
विदेशी पोर्टफोलियो निवेश अस्थिर क्यों माना जाता है?
FPI वैश्विक जोखिम भावना और ब्याज दरों में बदलाव के प्रति संवेदनशील होते हैं, जिससे अचानक पूंजी प्रवाह या निकासी हो सकती है, जबकि FDI अधिक स्थिर और दीर्घकालिक होता है।
आधिकारिक स्रोत और आगे पढ़ाई
लर्नप्रो संपादकीय मानकों के बारे में
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