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वित्तीय वर्ष 2023 में भारत ने 125.3 मिलियन टन कच्चा इस्पात का उत्पादन किया, जिससे यह चीन के बाद विश्व का दूसरा सबसे बड़ा इस्पात उत्पादक देश बन गया है (World Steel Association, 2023)। यह उन्नति क्षमता विस्तार, तकनीकी सुधार और इस्पात मंत्रालय के नेतृत्व में लक्षित नीतिगत हस्तक्षेपों का परिणाम है। 2018 में 15% आयात निर्भरता घटकर 2023 में 9% रह गई है, जो घरेलू उत्पादन और आत्मनिर्भरता की दिशा में बढ़ोतरी को दर्शाता है। इस्पात भारत की GDP में लगभग 2% का योगदान देता है और सीधे-परोक्ष रूप से 50 लाख से अधिक लोगों को रोजगार प्रदान करता है (Ministry of Steel Annual Report, 2023)। ये प्रगति राष्ट्रीय इस्पात नीति, 2017 के उद्देश्यों के अनुरूप है, जिसका लक्ष्य भारत को वैश्विक प्रतिस्पर्धी और आत्मनिर्भर इस्पात उत्पादक बनाना है।

UPSC प्रासंगिकता

  • GS पेपर 3: भारतीय अर्थव्यवस्था - औद्योगिक विकास, आधारभूत संरचना और आर्थिक विकास
  • GS पेपर 2: शासन - आर्थिक विकास से संबंधित संवैधानिक प्रावधान (Article 39(b) और (c))
  • निबंध पेपर: भारत की आर्थिक आत्मनिर्भरता में विनिर्माण क्षेत्रों की भूमिका

भारत के इस्पात क्षेत्र का कानूनी और संवैधानिक ढांचा

माइन और मिनरल्स (डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) एक्ट, 1957 (MMDR Act) लौह अयस्क जैसे महत्वपूर्ण कच्चे माल के दोहन को नियंत्रित करता है। Steel Development Fund Rules, 2013 इस्पात मंत्रालय की देखरेख में आधुनिकीकरण और क्षमता विस्तार के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करते हैं। राष्ट्रीय इस्पात नीति, 2017 का उद्देश्य 2030 तक उत्पादन क्षमता 300 मिलियन टन तक बढ़ाना, तकनीकी उन्नति को बढ़ावा देना और आयात निर्भरता कम करना है। संवैधानिक रूप से, Article 39(b) और (c) संसाधनों के समान वितरण और आर्थिक आत्मनिर्भरता को सुनिश्चित करते हैं, जो घरेलू इस्पात क्षेत्र के विकास पर नीति के जोर को स्थापित करते हैं।

  • MMDR Act गैरकानूनी खनन रोककर और कच्चे माल की उपलब्धता सुनिश्चित करके दोहन को नियंत्रित करता है।
  • Steel Development Fund अनुसंधान- विकास, कौशल विकास और आधारभूत संरचना सुधार में निवेश को प्रोत्साहित करता है।
  • राष्ट्रीय इस्पात नीति 2017 उत्पादन, गुणवत्ता सुधार और पर्यावरणीय स्थिरता को प्राथमिकता देती है।
  • Article 39(b) और (c) घरेलू औद्योगिक क्षमता को बढ़ावा देने का संवैधानिक आधार प्रदान करते हैं।

आर्थिक प्रदर्शन और क्षमता विस्तार

वित्तीय वर्ष 2023 में भारत का कच्चा इस्पात उत्पादन 125.3 मिलियन टन तक पहुंच गया, जो 2018-23 के दौरान लगभग 6.5% की CAGR से बढ़ा (World Steel Association, Ministry of Steel)। घरेलू मांग भी आधारभूत संरचना, ऑटोमोबाइल और निर्माण क्षेत्रों के कारण बढ़ी है। आयात निर्भरता 2018 के 15% से घटकर 2023 में 9% हो गई, जो बेहतर कच्चे माल की आपूर्ति और उत्पादन दक्षता को दर्शाता है। 2023-24 में विशेष इस्पात के लिए 1000 करोड़ रुपये की PLI योजना से उच्च मूल्य वाले इस्पात उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा और आयात निर्भरता कम होगी। इस्पात निर्यात में भी 12% की वृद्धि हुई, जो 12 मिलियन टन तक पहुंच गया (DGFT)।

  • कच्चा इस्पात उत्पादन: 125.3 मिलियन टन (FY 2023)
  • घरेलू खपत की CAGR: 6.5% (2018-2023)
  • आयात निर्भरता में कमी: 15% से 9% (2018-2023)
  • PLI योजना आवंटन: 1000 करोड़ रुपये विशेष इस्पात के लिए (2023-24)
  • इस्पात निर्यात: 12 मिलियन टन, 12% वृद्धि FY 2023 में
  • रोजगार: 50 लाख से अधिक लोग सीधे और परोक्ष रूप से जुड़े हैं

प्रमुख संस्थान और उनकी भूमिका

इस्पात मंत्रालय नीति निर्धारण, क्षेत्रीय विकास की निगरानी और Steel Development Fund व PLI जैसी योजनाओं का क्रियान्वयन करता है। Steel Authority of India Limited (SAIL) सबसे बड़ा सार्वजनिक क्षेत्र इस्पात उत्पादक है जो क्षमता विस्तार और आधुनिकीकरण पर काम करता है। Rashtriya Ispat Nigam Limited (RINL) विजाग इस्पात संयंत्र चलाता है जो क्षेत्रीय औद्योगिक विकास में योगदान देता है। Indian Bureau of Mines (IBM) खनिज संसाधनों के प्रबंधन और स्थायी खनन को सुनिश्चित करता है। Directorate General of Foreign Trade (DGFT) निर्यात-आयात नीतियों का संचालन करता है, जिससे इस्पात निर्यात को बढ़ावा मिलता है और घरेलू मांग संतुलित होती है।

  • इस्पात मंत्रालय: नीति निर्माण, योजना कार्यान्वयन
  • SAIL: सार्वजनिक क्षेत्र का सबसे बड़ा इस्पात उत्पादक, आधुनिकीकरण पहल
  • RINL: विजाग इस्पात संयंत्र संचालन, क्षेत्रीय विकास
  • IBM: खनिज संसाधन नियंत्रण, स्थायी खनन
  • DGFT: निर्यात-आयात नियंत्रण, व्यापार सुविधा

तुलनात्मक विश्लेषण: भारत बनाम चीन का इस्पात क्षेत्र

मापदंडभारतचीन
कच्चा इस्पात उत्पादन (2023)125.3 मिलियन टन (विश्व में दूसरा सबसे बड़ा)1000+ मिलियन टन (विश्व में सबसे बड़ा)
नीति की दिशाराष्ट्रीय इस्पात नीति 2017, विशेष इस्पात के लिए PLI'मेड इन चाइना 2025' - तकनीकी उन्नयन, पर्यावरणीय स्थिरता
पर्यावरणीय उपायग्रीन स्टील पर उभरता ध्यान, सीमित कार्बन उत्सर्जन डेटाकार्बन उत्सर्जन में 20% कमी (2015-2022) (International Energy Agency)
कच्चे माल की सुरक्षालौह अयस्क और कोकिंग कोयले में चुनौतियां, आयात निर्भरताएकीकृत आपूर्ति श्रृंखला, दीर्घकालीन संसाधन समझौते
निर्यात रुझान12 मिलियन टन, 12% वृद्धि FY 2023 मेंविश्व का सबसे बड़ा निर्यातक, मूल्य वर्धित उत्पादों पर ध्यान

कच्चे माल की आपूर्ति और लागत अस्थिरता की चुनौतियां

क्षमता वृद्धि के बावजूद भारत के इस्पात क्षेत्र को लौह अयस्क और कोकिंग कोयले की आपूर्ति में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इससे उत्पादन लागत में उतार-चढ़ाव और कभी-कभी आयात निर्भरता बढ़ जाती है, जो आत्मनिर्भरता के लक्ष्य को प्रभावित करती है। चीन के विपरीत, जिसके पास एकीकृत आपूर्ति श्रृंखला और दीर्घकालीन संसाधन समझौते हैं, भारत का स्रोत खंडित है। MMDR Act के तहत खनन अनुमोदन में देरी भी कच्चे माल की उपलब्धता को प्रभावित करती है। ये बाधाएं वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा और मूल्य स्थिरता पर असर डालती हैं।

  • लौह अयस्क और कोकिंग कोयले की आपूर्ति सीमित होने से उत्पादन लागत बढ़ती है।
  • MMDR Act के तहत नियामक देरी खनन गतिविधियों को प्रभावित करती है।
  • एकीकृत आपूर्ति श्रृंखला की कमी आयात निर्भरता बढ़ाती है।
  • लागत अस्थिरता मूल्य निर्धारण और निर्यात प्रतिस्पर्धा को प्रभावित करती है।

महत्व और आगे की राह

भारत का इस्पात क्षेत्र क्षमता विस्तार, नीति समर्थन और निर्यात वृद्धि के माध्यम से आत्मनिर्भरता की दिशा में रणनीतिक रूप से आगे बढ़ रहा है। राष्ट्रीय इस्पात नीति के 2030 के लक्ष्य प्राप्त करने के लिए कच्चे माल की आपूर्ति सुनिश्चित करना, तकनीकी आधुनिकीकरण तेज करना और पर्यावरणीय स्थिरता अपनाना आवश्यक होगा। सार्वजनिक-निजी साझेदारी मजबूत कर और Steel Development Fund के जरिए अनुसंधान व विकास को बढ़ावा देकर नवाचार को प्रोत्साहित किया जा सकता है। वैश्विक डिकार्बोनाइजेशन रुझानों के साथ तालमेल से प्रतिस्पर्धा बेहतर होगी। इन चुनौतियों को दूर करने से भारत की वैश्विक इस्पात बाजार में स्थिति मजबूत होगी और आधारभूत संरचना तथा रक्षा क्षेत्रों को भी मजबूती मिलेगी।

  • नीति सुधार और रणनीतिक साझेदारी के माध्यम से दीर्घकालीन कच्चे माल की आपूर्ति सुनिश्चित करें।
  • ग्रीन स्टील तकनीकों को तेजी से अपनाएं और कार्बन उत्सर्जन घटाएं।
  • Steel Development Fund और PLI योजनाओं के जरिए अनुसंधान व कौशल विकास बढ़ाएं।
  • एकीकृत आपूर्ति श्रृंखला को बढ़ावा देकर लागत अस्थिरता कम करें।
  • निर्यात वृद्धि का लाभ उठाकर वैश्विक बाजार हिस्सेदारी सुधारें।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
भारत के इस्पात क्षेत्र के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. राष्ट्रीय इस्पात नीति 2017 का उद्देश्य 2030 तक कच्चे इस्पात उत्पादन क्षमता को 300 मिलियन टन तक बढ़ाना है।
  2. Steel Development Fund Rules, 2013 का प्रशासन खनन मंत्रालय द्वारा किया जाता है।
  3. भारत में इस्पात की आयात निर्भरता 2018 में 15% से घटकर 2023 में 9% हो गई है।
  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2 और 3
  • cकेवल 1 और 3
  • d1, 2 और 3
उत्तर: (c)
कथन 1 सही है क्योंकि राष्ट्रीय इस्पात नीति 2017 का लक्ष्य 2030 तक 300 मिलियन टन क्षमता है। कथन 2 गलत है क्योंकि Steel Development Fund Rules, 2013 इस्पात मंत्रालय द्वारा संचालित हैं, खनन मंत्रालय द्वारा नहीं। कथन 3 सही है, जैसा कि इस्पात मंत्रालय के आंकड़ों से पता चलता है।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
भारत में इस्पात उत्पादन और खपत के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. वित्तीय वर्ष 2023 में भारत का कच्चा इस्पात उत्पादन 125.3 मिलियन टन था।
  2. 2018-2023 के दौरान घरेलू इस्पात खपत की CAGR 6.5% रही।
  3. वित्तीय वर्ष 2023 में इस्पात निर्यात में 12% की गिरावट आई है।
  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2 और 3
  • cकेवल 1 और 3
  • d1, 2 और 3
उत्तर: (a)
कथन 1 सही है, जैसा World Steel Association के आंकड़े दिखाते हैं। कथन 2 भी सही है, जैसा इस्पात मंत्रालय की रिपोर्ट बताती है। कथन 3 गलत है क्योंकि वित्तीय वर्ष 2023 में इस्पात निर्यात में 12% की वृद्धि हुई है (DGFT)।

मेन प्रश्न

राष्ट्रीय इस्पात नीति 2017 और Production Linked Incentive (PLI) योजना की भूमिका का विश्लेषण करें कि किस प्रकार ये भारत के इस्पात क्षेत्र को आत्मनिर्भरता की ओर ले जा रही हैं। साथ ही, क्षेत्र में मौजूद चुनौतियों पर चर्चा करें और उन्हें दूर करने के उपाय सुझाएं। (250 शब्द)

झारखंड और JPSC प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: पेपर 2 - अर्थव्यवस्था और औद्योगिक विकास
  • झारखंड का महत्व: झारखंड लौह अयस्क का प्रमुख उत्पादक राज्य है, जो भारत के इस्पात उत्पादन के लिए कच्चे माल की आपूर्ति में अहम भूमिका निभाता है। राज्य की खनिज संपदा MMDR Act के तहत नियंत्रित है, जो इस्पात क्षेत्र की वृद्धि को प्रभावित करती है।
  • मेन पॉइंटर: झारखंड की भूमिका, खनन नियमों में चुनौतियां और इस्पात उत्पादन से जुड़ी स्थानीय औद्योगिक विकास की संभावनाओं पर चर्चा करें।
राष्ट्रीय इस्पात नीति 2017 के तहत कच्चे इस्पात उत्पादन की लक्ष्य क्षमता क्या है?

राष्ट्रीय इस्पात नीति 2017 का लक्ष्य 2030 तक भारत की कच्चे इस्पात उत्पादन क्षमता को 300 मिलियन टन तक बढ़ाना है, जिससे घरेलू मांग पूरी हो सके और आयात निर्भरता कम हो।

Steel Development Fund Rules, 2013 का प्रशासन कौन करता है?

Steel Development Fund Rules, 2013 का प्रशासन इस्पात मंत्रालय द्वारा किया जाता है, जो आधुनिकीकरण, अनुसंधान- विकास और कौशल विकास के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करता है।

2018 से 2023 के बीच भारत की इस्पात आयात निर्भरता में क्या बदलाव आया है?

2018 में भारत की इस्पात आयात निर्भरता 15% थी, जो 2023 तक घटकर 9% हो गई है, घरेलू उत्पादन बढ़ने और नीतिगत समर्थन के कारण।

MMDR Act का भारत के इस्पात क्षेत्र में क्या महत्व है?

माइन और मिनरल्स (डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) एक्ट, 1957 लौह अयस्क जैसे खनिजों के दोहन को नियंत्रित करता है, जिससे इस्पात उत्पादन के लिए कच्चे माल की स्थायी आपूर्ति सुनिश्चित होती है।

विशेष इस्पात के लिए PLI योजना का महत्व क्या है?

विशेष इस्पात के लिए Production Linked Incentive (PLI) योजना, जिसमें 2023-24 में 1000 करोड़ रुपये आवंटित हैं, उच्च मूल्य वाले इस्पात उत्पादों के उत्पादन को प्रोत्साहित करती है, आयात निर्भरता कम करती है और वैश्विक प्रतिस्पर्धा बढ़ाती है।

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