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2025-26 में भारत के रक्षा निर्यात में वृद्धि: एक संक्षिप्त परिचय

वित्तीय वर्ष 2025-26 में भारत के रक्षा निर्यात ने रिकॉर्ड 38,424 करोड़ रुपये का आंकड़ा छू लिया, जो 2024-25 के 23,646 करोड़ रुपये से 62.66% की जबरदस्त वृद्धि दर्शाता है। यह जानकारी रक्षा मंत्रालय (MoD) ने दी और इंडियन एक्सप्रेस (2026) में प्रकाशित हुई। इस उछाल के पीछे रणनीतिक नीतिगत सुधार और स्वदेशी उत्पादन क्षमता में सुधार मुख्य कारण हैं। निर्यात में मिसाइलें, नौसेना के जहाज और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली शामिल हैं, जिनके प्रमुख बाजार यूएई, सऊदी अरब और दक्षिण अफ्रीका हैं, जो कुल निर्यात का 60% हिस्सा रखते हैं (DGDE रिपोर्ट 2026)। इस तेजी से भारत एक उभरता वैश्विक रक्षा आपूर्तिकर्ता बन गया है, जिसका विश्व रक्षा निर्यात बाजार में हिस्सा 2020 के 1.2% से बढ़कर 2026 में 2.5% हो गया है (SIPRI 2025)।

UPSC प्रासंगिकता

  • GS पेपर 3: रक्षा उत्पादन और निर्यात, रक्षा खरीद प्रक्रियाएं, आर्थिक विकास
  • GS पेपर 2: रक्षा मंत्रालय की भूमिका, निर्यात नियंत्रण, अंतरराष्ट्रीय संबंध
  • निबंध: मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत का भारत की रणनीतिक स्वायत्तता पर प्रभाव

रक्षा निर्यात के लिए कानूनी और संस्थागत ढांचा

भारत में रक्षा निर्यात कई कानूनी नियमों के तहत नियंत्रित होता है। Defence Production Policy 2020 और Defence Procurement Procedure (DPP) 2023 उत्पादन और निर्यात के दिशानिर्देश तय करते हैं। Arms Act, 1959 (धारा 3 और 7) हथियार व्यापार के लाइसेंसिंग और उल्लंघन पर दंड का प्रावधान करता है। Foreign Trade (Development and Regulation) Act, 1992 के तहत भी निर्यात नियंत्रण होता है। Ministry of Defence के पास Government of India (Allocation of Business) Rules, 1961 के तहत नीति निर्माण और क्रियान्वयन की जिम्मेदारी है। Directorate General of Defence Export Controls (DGDE) निर्यात लाइसेंसिंग और नियंत्रण की प्रमुख एजेंसी है।

  • MoD: नीति निर्माण, निर्यात बढ़ावा और समन्वय
  • DGDE: लाइसेंसिंग, अनुपालन निगरानी और सुविधा प्रदान करना
  • DRDO: स्वदेशी तकनीक विकास
  • HAL और DPSUs: रक्षा उपकरणों का उत्पादन और आपूर्ति

रक्षा निर्यात वृद्धि के आर्थिक पहलू

वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने रक्षा के लिए 6.5 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए, जिसमें 25% राशि पूंजीगत खरीद के लिए निर्धारित है (संघीय बजट 2025-26)। 62.66% की निर्यात वृद्धि का संबंध स्वदेशी उत्पादन में 40% की वृद्धि से है, जो मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत पहलों के बाद हुई है (MoD वार्षिक रिपोर्ट 2025)। भारत का वैश्विक रक्षा निर्यात बाजार में हिस्सा 2020 के 1.2% से बढ़कर 2026 में 2.5% हो गया है, जबकि वैश्विक रक्षा बाजार का मूल्य लगभग 2 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर है (SIPRI 2025)। निर्यात राजस्व का मुख्य स्रोत मिसाइल सिस्टम, नौसेना के जहाज और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध उपकरण हैं, जो पारंपरिक प्लेटफॉर्म से परे विविधता दिखाते हैं।

  • 2025-26 में 38,424 करोड़ रुपये का रक्षा निर्यात (Indian Express, 2026)
  • 2020 से स्वदेशी उत्पादन में 40% की वृद्धि (MoD वार्षिक रिपोर्ट 2025)
  • प्रमुख निर्यात गंतव्य: यूएई, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका (60% निर्यात)
  • वैश्विक रक्षा बाजार का आकार: 2 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर (SIPRI 2025)

तुलनात्मक विश्लेषण: भारत बनाम दक्षिण कोरिया की रक्षा निर्यात वृद्धि

भारत के रक्षा निर्यात में 62.66% की वृद्धि दक्षिण कोरिया के 15% की तुलना में काफी अधिक है, जहां निर्यात 2025-26 में 8 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंचा। दक्षिण कोरिया की निरंतर सरकारी सब्सिडी और निर्यात अनुकूल नीतियां उसकी रक्षा उद्योग को लंबे समय से सहारा देती हैं। भारत की तेजी से बढ़ती निर्यात क्षमता सफल पकड़ बनाने का संकेत देती है, लेकिन निर्यात सुगमता और निजी क्षेत्र की भागीदारी में संरचनात्मक कमियां भी उजागर करती है।

परिमाणभारत (2025-26)दक्षिण कोरिया (2025-26)
रक्षा निर्यात मूल्य38,424 करोड़ रुपये (~4.7 बिलियन अमेरिकी डॉलर)8 बिलियन अमेरिकी डॉलर
निर्यात वृद्धि दर62.66%15%
सरकारी समर्थनमेक इन इंडिया, आत्मनिर्भर भारतसब्सिडी, निर्यात प्रोत्साहन
निजी क्षेत्र की भागीदारीसीमित, जटिल लाइसेंसिंगउच्च, सुव्यवस्थित निर्यात प्रक्रिया
प्रमुख निर्यात बाजारमध्य पूर्व, अफ्रीकावैश्विक, जिसमें अमेरिका और यूरोप शामिल हैं

भारत के रक्षा निर्यात पारिस्थितिकी तंत्र में चुनौतियां

तेजी के बावजूद भारत कई बाधाओं का सामना कर रहा है। DGDE के तहत जटिल लाइसेंसिंग प्रक्रिया के कारण निजी क्षेत्र की भागीदारी सीमित है, जो अनुबंधों के अंतिम रूप देने में देरी करती है। दक्षिण कोरिया और इज़राइल जैसे देशों के तुलनात्मक रूप से सरल निर्यात सुविधा ढांचे के मुकाबले भारत का नियामक माहौल बोझिल है। इससे रक्षा निर्यात के विस्तार और विविधीकरण में रुकावट आती है। साथ ही, MSMEs और स्टार्टअप्स को बेहतर समावेश की जरूरत है ताकि वृद्धि की गति बनी रहे।

  • जटिल लाइसेंसिंग प्रक्रियाएं अनुबंधों में देरी करती हैं (DGDE रिपोर्ट्स)
  • निजी क्षेत्र की सीमित भागीदारी नवाचार और विस्तार को रोकती है
  • निर्यात सुविधा के लिए एकीकृत सिंगल-विंडो क्लियरेंस की कमी
  • विदेश मंत्रालय के साथ निर्यात कूटनीति समन्वय को मजबूत करने की आवश्यकता

महत्व और आगे का रास्ता

2025-26 में रक्षा निर्यात में 62.66% की वृद्धि भारत की रक्षा औद्योगिक नींव के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह Defence Production Policy 2020 और DPP 2023 जैसे नीतिगत सुधारों तथा मेक इन इंडिया के प्रभाव को प्रमाणित करता है। इस गति को बनाए रखने के लिए भारत को निर्यात लाइसेंसिंग को सरल बनाना होगा, निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ानी होगी और निर्यात कूटनीति को मजबूत करना होगा। DRDO के माध्यम से अनुसंधान एवं विकास निवेश बढ़ाकर और सार्वजनिक-निजी भागीदारी को प्रोत्साहित करके तकनीकी स्तर को उन्नत किया जा सकता है। निर्यात नियंत्रण को वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं के अनुरूप बनाकर भारत दक्षिण कोरिया और इज़राइल जैसे स्थापित निर्यातकों से प्रतिस्पर्धा कर सकेगा।

  • DGDE लाइसेंसिंग को सिंगल-विंडो क्लियरेंस के साथ सरल बनाएं
  • प्रोत्साहन के जरिए निजी क्षेत्र और MSMEs की भागीदारी बढ़ाएं
  • DRDO और उद्योग के बीच सहयोग बढ़ाकर निर्यात-तैयार तकनीक विकसित करें
  • MoD और MEA के बीच निर्यात कूटनीति समन्वय मजबूत करें
  • वैश्विक अग्रणी देशों के निर्यात नियंत्रण ढांचे से तुलना करें
📝 प्रारंभिक अभ्यास
भारत के रक्षा निर्यात नियंत्रण के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. Defence Procurement Procedure (DPP) 2023 रक्षा निर्यात लाइसेंसिंग को नियंत्रित करता है।
  2. Arms Act, 1959 हथियार व्यापार और निर्यात नियंत्रण को नियंत्रित करता है।
  3. Directorate General of Defence Export Controls (DGDE) निर्यात लाइसेंस जारी करने के लिए जिम्मेदार है।
  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2 और 3
  • cकेवल 1 और 3
  • d1, 2 और 3
उत्तर: (b)
कथन 1 गलत है क्योंकि DPP 2023 खरीद प्रक्रियाओं को नियंत्रित करता है, निर्यात लाइसेंसिंग को नहीं। कथन 2 सही है क्योंकि Arms Act, 1959 हथियार व्यापार और निर्यात को नियंत्रित करता है। कथन 3 सही है क्योंकि DGDE निर्यात लाइसेंसिंग की प्रमुख एजेंसी है।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
2025-26 में भारत के रक्षा निर्यात वृद्धि के बारे में निम्नलिखित पर विचार करें:
  1. भारत के रक्षा निर्यात 2025-26 में 60% से अधिक बढ़े।
  2. दक्षिण कोरिया के रक्षा निर्यात उसी अवधि में 50% से अधिक बढ़े।
  3. भारत का वैश्विक रक्षा निर्यात में हिस्सा 2026 में 2.5% पहुंच गया।
  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2 और 3
  • cकेवल 1 और 3
  • d1, 2 और 3
उत्तर: (c)
कथन 1 सही है क्योंकि निर्यात 62.66% बढ़ा। कथन 2 गलत है; दक्षिण कोरिया की वृद्धि 15% थी, 50% से अधिक नहीं। कथन 3 सही है SIPRI 2025 के अनुसार।

UPSC मेन्स प्रश्न

2025-26 में भारत के रक्षा निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि के पीछे के कारणों का विश्लेषण करें। नीतिगत सुधार और स्वदेशी उत्पादन पहलों ने इस वृद्धि में कैसे योगदान दिया? इस गति को बनाए रखने में कौन-कौन सी चुनौतियां हैं?

भारत के रक्षा निर्यात को कौन-कौन से कानूनी अधिनियम नियंत्रित करते हैं?

भारत के रक्षा निर्यात मुख्य रूप से Defence Production Policy 2020, Defence Procurement Procedure 2023, Arms Act, 1959 (धारा 3 और 7), और Foreign Trade (Development and Regulation) Act, 1992 के तहत नियंत्रित होते हैं। DGDE निर्यात लाइसेंसिंग की देखरेख करता है।

2025-26 में भारत के रक्षा निर्यात का मूल्य और वृद्धि दर क्या थी?

भारत के रक्षा निर्यात 2025-26 में 38,424 करोड़ रुपये तक पहुंच गए, जो 2024-25 के 23,646 करोड़ रुपये से 62.66% की वृद्धि है (Indian Express, 2026)।

भारत के रक्षा निर्यात पारिस्थितिकी तंत्र में कौन-कौन से संस्थान महत्वपूर्ण हैं?

रक्षा मंत्रालय नीति बनाता है; DGDE निर्यात को नियंत्रित करता है; DRDO स्वदेशी तकनीक विकसित करता है; HAL और अन्य DPSUs रक्षा उपकरण बनाते हैं।

भारत की रक्षा निर्यात वृद्धि की तुलना दक्षिण कोरिया से कैसे होती है?

2025-26 में भारत के रक्षा निर्यात में 62.66% की वृद्धि हुई, जबकि दक्षिण कोरिया का 15% बढ़ा और निर्यात 8 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंचा। दक्षिण कोरिया को निरंतर सब्सिडी और सुव्यवस्थित निर्यात नीतियों का लाभ मिलता है।

भारत के रक्षा निर्यात क्षमता को सीमित करने वाली मुख्य चुनौतियां क्या हैं?

चुनौतियों में DGDE के तहत जटिल लाइसेंसिंग प्रक्रियाएं, सीमित निजी क्षेत्र की भागीदारी, और दक्षिण कोरिया व इज़राइल जैसे देशों की तुलना में निर्यात सुविधा का अभाव शामिल हैं।

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