2025-26 में भारत के रक्षा निर्यात की स्थिति
वित्तीय वर्ष 2025-26 में भारत के रक्षा निर्यात 38,424 करोड़ रुपये तक पहुंच गए, जो पिछले वर्ष की तुलना में 62.66% की बढ़ोतरी दर्शाता है। यह जानकारी रक्षा मंत्रालय (MoD) की वार्षिक रिपोर्ट 2025-26 में दी गई है। इस वृद्धि में डिफेंस पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्स (DPSUs) की भूमिका अहम रही, जिन्होंने कुल निर्यात का 54.84% हिस्सा देते हुए 151% की वृद्धि दर्ज की। वहीं, निजी क्षेत्र ने 45.16% हिस्सेदारी के साथ 14% की बढ़ोतरी की। इस दौरान भारत ने 80 से अधिक देशों को रक्षा उपकरण निर्यात किए, जो वैश्विक रक्षा बाजार में उसकी बढ़ती उपस्थिति का संकेत है।
यह उछाल भारत की Defence Production Policy 2020 और Defence Procurement Procedure (DPP) 2023 के तहत आत्मनिर्भरता पर जोर देने की रणनीति का परिणाम है, जो स्वदेशी उत्पादन और निर्यात को बढ़ावा देने के लिए बनाए गए हैं। यह वृद्धि मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत अभियान जैसी व्यापक नीतियों के अनुरूप भी है।
UPSC प्रासंगिकता
- GS पेपर 3: रक्षा उत्पादन, रक्षा निर्यात, आर्थिक विकास, विदेशी व्यापार नीति
- GS पेपर 2: संघ सूची - रक्षा (Article 246, Entry 54), Defence of India Act, 1962
- निबंध: भारत का रक्षा निर्माण और इसकी भूमिका रणनीतिक स्वायत्तता व आर्थिक विकास में
रक्षा निर्यात के लिए कानूनी और संवैधानिक ढांचा
रक्षा उत्पादन और निर्यात पर केंद्र सरकार का विशेष अधिकार है, जो संविधान की सातवीं अनुसूची के अनुच्छेद 246 और संघ सूची के Entry 54 के तहत आता है। Defence of India Act, 1962 (Section 3) के तहत शांति और युद्ध दोनों समय केंद्र सरकार को रक्षा उत्पादन और निर्यात नियंत्रित करने का अधिकार प्राप्त है।
रक्षा वस्तुओं के निर्यात पर Arms Act, 1959 और Foreign Trade (Development and Regulation) Act, 1992 के प्रावधान लागू होते हैं। Directorate General of Foreign Trade (DGFT) विदेशी व्यापार नीति के तहत लाइसेंसिंग और अनुपालन की निगरानी करता है। साथ ही Defence Procurement Procedure (DPP) 2023 और Defence Production Policy 2020 स्वदेशीकरण और निर्यात को प्रोत्साहित करने के लिए नीति निर्देश जारी करते हैं।
रक्षा निर्यात वृद्धि के आर्थिक पहलू
रक्षा बजट 2013-14 में ₹2.53 लाख करोड़ से बढ़कर 2025-26 में ₹6.81 लाख करोड़ हो गया है, जो सरकार की रक्षा आधुनिकीकरण और उत्पादन क्षमता बढ़ाने की प्राथमिकता को दर्शाता है (संघ बजट 2025-26)। Defence Production Policy 2020 के अनुसार, भारत 2029 तक ₹3 लाख करोड़ के रक्षा उत्पादन का लक्ष्य रखता है।
- वित्तीय वर्ष 2025-26 में रक्षा निर्यात: 38,424 करोड़ रुपये (पिछले वर्ष की तुलना में 62.66% वृद्धि)
- DPSUs का योगदान: निर्यात का 54.84%, 151% की वृद्धि के साथ
- निजी क्षेत्र का योगदान: निर्यात का 45.16%, 14% की वृद्धि के साथ
- निर्यात गंतव्य: विश्व के 80 से अधिक देश
इस निर्यात वृद्धि के पीछे बेहतर उत्पादन क्षमता, Defence Research and Development Organisation (DRDO) जैसी संस्थाओं की उन्नत अनुसंधान एवं विकास गतिविधियां, और Defence Innovation Organisation (DIO) द्वारा निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाना शामिल है।
रक्षा निर्यात विस्तार में संस्थागत भूमिकाएँ
- DPSUs: HAL, BEL, BDL जैसे सरकारी उपक्रम भारत के रक्षा निर्माण और निर्यात की रीढ़ हैं।
- DRDO: स्वदेशी तकनीक विकास में अग्रणी, जो निर्यात योग्य उत्पाद बनाने के लिए आवश्यक है।
- Defence Innovation Organisation (DIO): नवाचार चुनौतियों और फंडिंग के जरिए निजी क्षेत्र और स्टार्टअप्स को प्रोत्साहित करता है।
- रक्षा मंत्रालय (MoD): नीति निर्माण, निर्यात नियंत्रण और अंतरराष्ट्रीय रक्षा सहयोग का संचालन।
- Directorate General of Foreign Trade (DGFT): रक्षा निर्यात के लिए लाइसेंसिंग और नियमों का पालन सुनिश्चित करता है।
- Defence Export Promotion Council (DEPC): व्यापार मेलों, खरीदार-बिक्रेता बैठकों और बाजार जानकारी के जरिए निर्यात को बढ़ावा देता है।
तुलनात्मक अध्ययन: भारत बनाम दक्षिण कोरिया का रक्षा निर्यात ढांचा
| पहलू | भारत | दक्षिण कोरिया |
|---|---|---|
| रक्षा निर्यात (2025-26/2023) | ₹38,424 करोड़ (~$5.1 बिलियन) | $7.8 बिलियन (2023) |
| वृद्धि के कारक | DPSUs और निजी क्षेत्र का सहयोग, DPP 2023, मेक इन इंडिया | Defence Acquisition Program Administration (DAPA) के माध्यम से एकीकृत सरकारी-निजी नीतियां |
| तकनीकी आधार | DRDO के जरिए बढ़ती स्वदेशी R&D, लेकिन उच्च तकनीक उत्पाद सीमित | मजबूत अनुसंधान प्रोत्साहन के साथ उन्नत स्वदेशी प्लेटफॉर्म |
| नियामक माहौल | जटिल निर्यात लाइसेंसिंग, कई एजेंसियां शामिल | सरल और निर्यात-अनुकूल नीतियां |
| निर्यात बाजार | 80+ देश, विकासशील और मित्र देशों पर ध्यान | मध्य पूर्व, एशिया और यूरोप सहित वैश्विक बाजार |
भारत के रक्षा निर्यात ढांचे की चुनौतियां
- तकनीकी हस्तांतरण में अड़चनें: उन्नत विदेशी तकनीक तक सीमित पहुंच से उच्च तकनीक उत्पाद विकास बाधित।
- उत्पाद पोर्टफोलियो: मध्य स्तरीय उत्पादों पर निर्भरता; वैश्विक प्रतिस्पर्धा वाले उन्नत हथियार प्रणालियों की कमी।
- नियामक जटिलता: कई मंजूरियां और लंबी निर्यात लाइसेंसिंग प्रक्रिया बाजार में प्रवेश में देरी करती है।
- निजी क्षेत्र की बाधाएं: MSMEs और स्टार्टअप्स को पूंजी और प्रमाणन की चुनौतियां।
- वैश्विक प्रतिस्पर्धा: दक्षिण कोरिया और इज़राइल जैसे देशों के साथ मुकाबला, जहां निर्यात प्रक्रियाएं सरल और नवाचार मजबूत हैं।
महत्व और आगे का रास्ता
- 62.66% की निर्यात वृद्धि से वैश्विक स्तर पर भारत की स्वीकार्यता और उत्पादन क्षमता में सुधार दिखता है।
- DRDO, DPSUs और निजी उद्योग के बीच R&D सहयोग को मजबूत करना उन्नत स्वदेशी उत्पादों के विकास के लिए जरूरी है।
- निर्यात लाइसेंसिंग को सरल बनाकर और प्रक्रियाओं में तेजी लाकर प्रतिस्पर्धा बढ़ाई जा सकती है।
- परंपरागत साझेदारों से आगे बढ़कर रणनीतिक रक्षा कूटनीति के जरिए निर्यात बाजारों का विस्तार आवश्यक है।
- MSMEs और स्टार्टअप्स को वित्तीय प्रोत्साहन और तकनीकी समर्थन देकर औद्योगिक आधार को व्यापक बनाना होगा।
- रक्षा निर्यात नीतियों को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाकर तकनीकी हस्तांतरण और संयुक्त उद्यमों को सुगम बनाना होगा।
- रक्षा निर्यात Foreign Trade (Development and Regulation) Act, 1992 के अंतर्गत नियंत्रित होते हैं।
- रक्षा भारतीय संविधान के तहत समवर्ती विषय है।
- Defence Procurement Procedure 2023 स्वदेशी रक्षा उत्पादन और निर्यात को बढ़ावा देता है।
- FY 2025-26 में DPSUs ने भारत के रक्षा निर्यात में आधे से अधिक योगदान दिया।
- FY 2025-26 में DPSUs ने निजी क्षेत्र की तुलना में अधिक निर्यात वृद्धि दर्ज की।
- DPSUs निजी कंपनियां हैं जो रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत काम करती हैं।
मेन प्रश्न
“2025-26 में भारत के रक्षा निर्यात में हुई उल्लेखनीय वृद्धि के कारणों का विश्लेषण करें और इस वृद्धि को बनाए रखने के लिए किन चुनौतियों का समाधान आवश्यक है, उस पर चर्चा करें।”
भारत के रक्षा निर्यात को नियंत्रित करने वाले कानूनी प्रावधान क्या हैं?
भारत के रक्षा निर्यात मुख्य रूप से Defence of India Act, 1962, Arms Act, 1959, और Foreign Trade (Development and Regulation) Act, 1992 के तहत नियंत्रित होते हैं। DGFT निर्यात लाइसेंसिंग का प्रबंधन करता है, जबकि Defence Procurement Procedure 2023 स्वदेशी उत्पादन और निर्यात के लिए नीति निर्देश प्रदान करता है।
DPSUs का भारत के रक्षा निर्यात में क्या योगदान है?
DPSUs सरकारी स्वामित्व वाली संस्थाएं हैं जो रक्षा उपकरणों का निर्माण और निर्यात करती हैं। FY 2025-26 में इनका योगदान 54.84% था और निर्यात में 151% की वृद्धि हुई, जिससे ये निर्यात विस्तार में सबसे बड़े योगदानकर्ता बने।
भारत का रक्षा बजट हाल के वर्षों में कैसे बढ़ा है?
भारत का रक्षा बजट 2013-14 में ₹2.53 लाख करोड़ से बढ़कर 2025-26 में ₹6.81 लाख करोड़ हो गया है, जो आधुनिकीकरण, स्वदेशी निर्माण और निर्यात को बढ़ावा देने की सरकार की प्राथमिकता को दर्शाता है।
भारत के रक्षा क्षेत्र में नवाचार को कौन-कौन सी संस्थाएं बढ़ावा देती हैं?
Defence Research and Development Organisation (DRDO) स्वदेशी R&D का नेतृत्व करता है, जबकि Defence Innovation Organisation (DIO) नवाचार चुनौतियों और फंडिंग के जरिए निजी क्षेत्र और स्टार्टअप्स की भागीदारी को प्रोत्साहित करता है।
भारत को अपने रक्षा निर्यात बढ़ाने में किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है?
भारत को तकनीकी हस्तांतरण की बाधाएं, उच्च तकनीक उत्पादों की कमी, जटिल नियामक प्रक्रियाएं, और दक्षिण कोरिया व इज़राइल जैसे देशों से कड़ी प्रतिस्पर्धा जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
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