अपडेट

स्ट्रेट ऑफ़ हॉर्मुज में नौवहन की स्वतंत्रता पर भारत का रुख

2024 की शुरुआत में भारत ने सार्वजनिक रूप से स्ट्रेट ऑफ़ हॉर्मुज के माध्यम से निर्बाध नौवहन की आवश्यकता पर जोर दिया। यह जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है और समुद्री मार्ग के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह मांग अमेरिका द्वारा ईरानी तेल निर्यात पर लगाए गए नौसैनिक नाकेबंदी के बाद आई, जो क्षेत्रीय तनाव को बढ़ा रही है। भारत की यह स्थिति उसकी रणनीतिक प्राथमिकता को दर्शाती है कि वह अपनी ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार को बिना रुकावट के सुनिश्चित करना चाहता है, क्योंकि लगभग 30% कच्चा तेल इसी मार्ग से गुजरता है (Ministry of Petroleum and Natural Gas, 2023)। भारत सरकार ने विदेश मंत्रालय और भारतीय नौसेना के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून, विशेषकर संयुक्त राष्ट्र समुद्र कानून संधि (UNCLOS) 1982 के प्रावधानों का पालन करने पर बल दिया है।

UPSC प्रासंगिकता

  • GS पेपर 2: अंतरराष्ट्रीय संबंध – भारत की समुद्री कूटनीति, खाड़ी क्षेत्र की भू-राजनीति
  • GS पेपर 3: अर्थव्यवस्था – ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापार मार्ग
  • निबंध: बहुध्रुवीय विश्व में भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और ऊर्जा सुरक्षा

नौवहन की स्वतंत्रता से जुड़े कानूनी ढांचे

भारत की इस मांग का कानूनी आधार UNCLOS 1982 की धारा II और III में निहित है, जो क्षेत्रीय समुद्र और अंतरराष्ट्रीय नौवहन के लिए उपयोग किए जाने वाले जलडमरूमध्य को नियंत्रित करते हैं। UNCLOS के तहत, स्ट्रेट ऑफ़ हॉर्मुज को एक अंतरराष्ट्रीय जलडमरूमध्य माना जाता है, जहां तटीय राज्यों के क्षेत्रीय जल से होकर भी बिना पूर्व अनुमति के पारगमन की अनुमति है। भारत के घरेलू कानून, जैसे Indian Maritime Zones Act, 1976 और Merchant Shipping Act, 1958 (2017 में संशोधित), भारतीय अधिकारियों को समुद्री सुरक्षा और जहाजरानी हितों की रक्षा का अधिकार देते हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 253 के तहत संसद को अंतरराष्ट्रीय संधियों जैसे UNCLOS को लागू करने के लिए कानून बनाने का अधिकार प्राप्त है। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के फैसलों ने नौवहन की स्वतंत्रता को एक परंपरागत अंतरराष्ट्रीय कानून के रूप में मान्यता दी है, जो बिना संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मंजूरी के एकतरफा नाकेबंदी को सीमित करता है।

  • UNCLOS धारा II और III: क्षेत्रीय समुद्र सीमाएं और अंतरराष्ट्रीय जलडमरूमध्य के पारगमन अधिकार निर्धारित करता है।
  • Indian Maritime Zones Act, 1976: क्षेत्रीय जल और आसन्न क्षेत्र जैसे समुद्री क्षेत्र निर्धारित करता है।
  • अनुच्छेद 253, भारतीय संविधान: अंतरराष्ट्रीय संधियों को लागू करने हेतु कानून बनाने की अनुमति देता है।
  • Merchant Shipping Act, 1958 (संशोधन 2017): भारतीय जहाजरानी और समुद्री सुरक्षा के लिए नियम बनाता है।

आर्थिक हित: ऊर्जा सुरक्षा और व्यापार निर्भरता

भारत की ऊर्जा सुरक्षा सीधे स्ट्रेट ऑफ़ हॉर्मुज से जुड़ी है, जिसके माध्यम से लगभग 30% कच्चा तेल आता है। भारत अपनी कच्चे तेल की लगभग 85% जरूरत समुद्री मार्ग से आयात करता है, जिसका वार्षिक मूल्य 120 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक है (Economic Survey 2023-24)। वैश्विक स्तर पर, यह जलडमरूमध्य लगभग 20% पेट्रोलियम व्यापार का मार्ग है (EIA, 2023)। यदि अमेरिकी नाकेबंदी या क्षेत्रीय तनाव के कारण इस मार्ग में बाधा आती है, तो समुद्री परिवहन लागत 15-20% तक बढ़ सकती है, जिससे महंगाई और GDP विकास दर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। इसके अलावा, भारत का गلف कोऑपरेशन काउंसिल (GCC) देशों के साथ द्विपक्षीय व्यापार 2022 में 115 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया, जो आर्थिक आपसी निर्भरता को दर्शाता है। भारतीय नौसेना के लिए रक्षा बजट में 1.4 लाख करोड़ रुपये (Defence Budget 2023-24) आवंटित किए गए हैं, जो समुद्री व्यापार मार्गों और ब्लू इकोनॉमी की सुरक्षा पर जोर दर्शाता है।

  • भारत के 85% कच्चे तेल का आयात समुद्री मार्ग से होता है; 30% हॉर्मुज के रास्ते आता है (Ministry of Petroleum and Natural Gas, 2023)।
  • भारत का कच्चा तेल आयात बिल FY 2023-24 में 120+ अरब अमेरिकी डॉलर है (Economic Survey)।
  • स्ट्रेट ऑफ़ हॉर्मुज वैश्विक पेट्रोलियम व्यापार का 20% संभालता है (EIA, 2023)।
  • हॉर्मुज मार्ग में बाधा आने पर समुद्री परिवहन लागत में 15-20% की वृद्धि संभव (World Bank Report, 2023)।
  • भारत-GCC द्विपक्षीय व्यापार: 2022 में 115 अरब अमेरिकी डॉलर (Ministry of Commerce)।
  • भारतीय नौसेना बजट 1.4 लाख करोड़ रुपये, समुद्री सुरक्षा के लिए (Defence Budget 2023-24)।

समुद्री सुरक्षा और कूटनीति में संस्थागत भूमिका

भारतीय नौसेना समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करने और नौवहन की स्वतंत्रता की रक्षा की मुख्य एजेंसी है। विदेश मंत्रालय कूटनीतिक प्रतिक्रिया तैयार करता है और खाड़ी तथा वैश्विक हितधारकों से संवाद करता है। अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) अंतरराष्ट्रीय जहाजरानी के नियम बनाता है, जबकि Petroleum and Natural Gas मंत्रालय ऊर्जा आयात और आपूर्ति सुरक्षा पर नजर रखता है। गلف कोऑपरेशन काउंसिल (GCC) सचिवालय क्षेत्रीय आर्थिक और सुरक्षा सहयोग को बढ़ावा देता है, जिसका भारत द्विपक्षीय संबंधों के जरिए लाभ उठाता है। Energy Information Administration (EIA) ऊर्जा मार्ग के जोखिमों पर रणनीतिक योजना के लिए आवश्यक आंकड़े प्रदान करता है।

  • भारतीय नौसेना: समुद्री सुरक्षा और नौवहन स्वतंत्रता लागू करना।
  • विदेश मंत्रालय: समुद्री और खाड़ी क्षेत्र की कूटनीतिक नीति।
  • IMO: अंतरराष्ट्रीय जहाजरानी और नौवहन नियम।
  • Petroleum and Natural Gas मंत्रालय: ऊर्जा आयात और सुरक्षा।
  • GCC सचिवालय: क्षेत्रीय सहयोग मंच।
  • EIA: वैश्विक ऊर्जा मार्ग डेटा।

तुलनात्मक विश्लेषण: भारत और चीन की भारतीय महासागर क्षेत्र में समुद्री रणनीति

भारत की रणनीति कूटनीतिक संतुलन और अंतरराष्ट्रीय कानून के पालन पर केंद्रित है, जो खाड़ी में सीधे सैन्य दबाव से बचती है। इसके विपरीत, चीन अपनी String of Pearls रणनीति के तहत डीजिबूती में 2017 से चल रहे नौसैनिक अड्डे जैसे ठिकानों के माध्यम से समुद्री मार्गों की सुरक्षा और शक्ति प्रदर्शन करता है। इससे चीन का क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ा है, लेकिन भू-राजनीतिक तनाव भी गहरे हैं। भारत अपने द्विपक्षीय सहयोग और बहुपक्षीय मंचों पर निर्भर है, जबकि खाड़ी में कोई औपचारिक बहुपक्षीय सुरक्षा ढांचा न होने के कारण उसकी तुलना में चीन की सैन्य उपस्थिति अधिक प्रभावशाली है।

पहलूभारतचीन
समुद्री रणनीतिकूटनीतिक संतुलन, कानूनी पालन, द्विपक्षीय संबंधसक्रिय सैन्य उपस्थिति, नौसैनिक अड्डे, String of Pearls
सैन्य अड्डेखाड़ी में स्थायी अड्डे नहीं; आवश्यकतानुसार नौसैनिक तैनाती2017 से डीजिबूती में नौसैनिक अड्डा
भू-राजनीतिक प्रभावक्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखना, तनाव से बचावक्षेत्रीय तनाव और प्रभाव में वृद्धि
सुरक्षा ढांचाद्विपक्षीय संबंधों पर निर्भर, बहुपक्षीय सुरक्षा तंत्र की कमीऔपचारिक गठबंधनों और सैन्य ढांचे का उपयोग

रणनीतिक महत्व और आगे का रास्ता

स्ट्रेट ऑफ़ हॉर्मुज में निर्बाध नौवहन की भारत की मांग उसकी ऊर्जा निर्भरता और व्यापार आवश्यकताओं का सीधा परिणाम है। अपनी क्षमता बढ़ाने के लिए भारत को निम्नलिखित कदम उठाने होंगे:

  • खाड़ी क्षेत्र में बहुपक्षीय समुद्री सुरक्षा तंत्र को मजबूत करना, साथ ही द्विपक्षीय संबंधों को गहरा करना।
  • ब्लू इकोनॉमी और समुद्री क्षेत्र की जागरूकता पर केंद्रित नौसैनिक क्षमताओं को बढ़ाना।
  • IMO और UNCLOS जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के साथ सक्रिय संवाद कर एकतरफा नाकेबंदी के खिलाफ कानूनी मानदंडों को बनाए रखना।
  • ऊर्जा आयात मार्गों और स्रोतों में विविधता लाकर हॉर्मुज पर निर्भरता कम करना।
  • अमेरिका, ईरान और खाड़ी देशों के बीच तनाव कम करने के लिए कूटनीतिक माध्यमों का प्रभावी उपयोग।

अभ्यास प्रश्न

📝 प्रारंभिक अभ्यास
UNCLOS के तहत नौवहन की स्वतंत्रता से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. अंतरराष्ट्रीय जलडमरूमध्य के पारगमन के लिए तटीय राज्यों की पूर्व सहमति आवश्यक है।
  2. UNCLOS का भाग III विशेष रूप से अंतरराष्ट्रीय नौवहन के लिए उपयोग किए जाने वाले जलडमरूमध्य को संबोधित करता है।
  3. नौवहन की स्वतंत्रता में पारगमन के दौरान क्षेत्रीय जल में सैन्य अभ्यास करने का अधिकार शामिल है।
  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2
  • cकेवल 2 और 3
  • d1, 2 और 3
उत्तर: (b)
कथन 1 गलत है क्योंकि UNCLOS के तहत पारगमन के लिए तटीय राज्यों की पूर्व सहमति आवश्यक नहीं है। कथन 2 सही है क्योंकि भाग III अंतरराष्ट्रीय जलडमरूमध्य के पारगमन को संबोधित करता है। कथन 3 गलत है क्योंकि पारगमन के दौरान सैन्य अभ्यास आमतौर पर अनुमति नहीं है।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
स्ट्रेट ऑफ़ हॉर्मुज के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. यह फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है।
  2. लगभग 50% वैश्विक पेट्रोलियम व्यापार इसी मार्ग से गुजरता है।
  3. भारत लगभग 30% कच्चा तेल इसी जलडमरूमध्य के माध्यम से आयात करता है।
  • aकेवल 1 और 3
  • bकेवल 2 और 3
  • cकेवल 1 और 2
  • d1, 2 और 3
उत्तर: (a)
कथन 1 सही है क्योंकि यह जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है। कथन 2 गलत है; लगभग 20% (50% नहीं) वैश्विक पेट्रोलियम व्यापार इसी मार्ग से गुजरता है। कथन 3 सही है क्योंकि भारत लगभग 30% कच्चा तेल इसी मार्ग से आयात करता है।

मेन प्रश्न

स्ट्रेट ऑफ़ हॉर्मुज भारत की ऊर्जा सुरक्षा और समुद्री व्यापार के लिए कितनी रणनीतिक महत्व रखता है, इसका विश्लेषण करें। अमेरिका-ईरान तनाव के बीच इस क्षेत्र में नौवहन की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने में भारत को किन कानूनी और कूटनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, इस पर चर्चा करें।

झारखंड और JPSC प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: GS पेपर 2 – अंतरराष्ट्रीय संबंध और GS पेपर 3 – अर्थव्यवस्था
  • झारखंड का नजरिया: झारखंड के औद्योगिक क्षेत्र स्थिर ऊर्जा आपूर्ति पर निर्भर हैं; कच्चे तेल के आयात में बाधा राज्य के विनिर्माण और बिजली उत्पादन लागत को प्रभावित करती है।
  • मेन पॉइंटर: भारत की समुद्री सुरक्षा को ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला से जोड़कर उत्तर तैयार करें, जो झारखंड के औद्योगिक विकास के लिए स्थिर अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों की आवश्यकता को दर्शाता हो।
अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत स्ट्रेट ऑफ़ हॉर्मुज की कानूनी स्थिति क्या है?

स्ट्रेट ऑफ़ हॉर्मुज को UNCLOS 1982 के तहत एक अंतरराष्ट्रीय जलडमरूमध्य माना जाता है, जो सभी जहाजों, सैन्य जहाजों सहित, को बिना तटीय राज्यों की पूर्व अनुमति के निर्बाध पारगमन की अनुमति देता है।

भारत के कितने प्रतिशत कच्चे तेल का आयात स्ट्रेट ऑफ़ हॉर्मुज से होता है?

लगभग 30% भारत के कच्चे तेल का आयात स्ट्रेट ऑफ़ हॉर्मुज के माध्यम से होता है, जो इसकी ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है (Ministry of Petroleum and Natural Gas, 2023)।

नौवहन की स्वतंत्रता से जुड़े UNCLOS के मुख्य प्रावधान क्या हैं?

UNCLOS का भाग II क्षेत्रीय समुद्र और आसन्न क्षेत्र निर्धारित करता है, जबकि भाग III अंतरराष्ट्रीय जलडमरूमध्य के पारगमन को नियंत्रित करता है, जिससे बिना हस्तक्षेप के नौवहन और हवाई मार्ग की स्वतंत्रता सुनिश्चित होती है।

अमेरिकी नाकेबंदी भारत के समुद्री व्यापार को कैसे प्रभावित करती है?

ईरानी तेल निर्यात पर अमेरिकी नाकेबंदी स्ट्रेट ऑफ़ हॉर्मुज के माध्यम से जहाजरानी में बाधा डाल सकती है, जिससे वैश्विक परिवहन लागत 15-20% तक बढ़ सकती है, जो भारत के आयात खर्च और महंगाई दबाव को बढ़ाएगा (World Bank Report, 2023)।

भारत की समुद्री रणनीति भारतीय महासागर क्षेत्र में चीन से कैसे भिन्न है?

भारत कूटनीतिक संतुलन और अंतरराष्ट्रीय कानून के पालन पर जोर देता है, जबकि चीन अपनी सैन्य उपस्थिति को मजबूत करते हुए नौसैनिक अड्डों के माध्यम से क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाता है, जैसे डीजिबूती में उसका अड्डा (CSIS Report, 2023)।

हमारे कोर्स

72+ बैच

हमारे कोर्स
Contact Us