भारत ने 2028 जलवायु सम्मेलन की मेजबानी से वापसी की घोषणा: एक परिचय
अप्रैल 2024 में भारत ने आधिकारिक तौर पर 2028 में होने वाले संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (COP) की मेजबानी के लिए अपनी दावेदारी वापस ले ली। यह निर्णय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) ने लिया, जिसमें घरेलू विकास प्राथमिकताओं और अंतरराष्ट्रीय जलवायु कूटनीति के बीच संतुलन बनाने के लिए रणनीतिक पुनर्मूल्यांकन की बात कही गई। भारत ने पहले भी वैश्विक जलवायु शासन में सक्रिय भूमिका निभाई है, खासकर पेरिस समझौता 2015 के तहत अपनी प्रतिबद्धताओं और महत्वाकांक्षी नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्यों के माध्यम से। इस वापसी से भारत की बड़ी जलवायु सम्मेलनों की मेजबानी की नीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव झलकता है, जो आर्थिक और पर्यावरणीय चुनौतियों के बीच प्राथमिकताओं के बदलाव को दर्शाता है।
UPSC प्रासंगिकता
- GS पेपर 3: पर्यावरण - अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण समझौते, जलवायु परिवर्तन, और भारत की जलवायु नीतियां
- GS पेपर 2: अंतरराष्ट्रीय संबंध - वैश्विक जलवायु शासन और कूटनीति में भारत की भूमिका
- निबंध: भारत की जलवायु रणनीति में विकास और पर्यावरणीय स्थिरता का संतुलन
भारत की जलवायु कार्रवाई के लिए कानूनी और संवैधानिक ढांचा
भारत की जलवायु नीति एक मजबूत कानूनी और संवैधानिक आधार पर काम करती है। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 की धारा 3 केंद्र सरकार को पर्यावरण संरक्षण और सुधार के लिए कदम उठाने का अधिकार देती है। संविधान के अनुच्छेद 48A के तहत राज्य को पर्यावरण की रक्षा और सुधार के लिए निर्देशात्मक सिद्धांत के रूप में बाध्य किया गया है। राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (NAPCC) 2008 भारत की घरेलू जलवायु रणनीति को परिभाषित करती है, जिसमें सौर ऊर्जा और सतत आवास सहित आठ मिशन शामिल हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, भारत पेरिस समझौता 2015 के तहत UNFCCC के साथ बंधा हुआ है, जिसमें 2030 तक कार्बन तीव्रता में 45% कटौती और 500 GW गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखा गया है।
- पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986: धारा 3 केंद्र सरकार को पर्यावरण सुरक्षा के लिए कार्रवाई का अधिकार देती है।
- अनुच्छेद 48A: पर्यावरण संरक्षण को राज्य की जिम्मेदारी बताने वाला निर्देशात्मक सिद्धांत।
- NAPCC 2008: जलवायु शमन और अनुकूलन के लिए कार्ययोजना।
- पेरिस समझौता 2015: भारत के NDC में 2030 तक 45% कार्बन तीव्रता में कमी और 500 GW गैर-जीवाश्म क्षमता शामिल।
वापसी के पीछे आर्थिक पहलू
COP सम्मेलन की मेजबानी भारी वित्तीय प्रतिबद्धता मांगती है। UNFCCC वित्तीय रिपोर्ट (2018-2022) के अनुसार, मेजबानी की औसत लागत 20 से 50 मिलियन अमेरिकी डॉलर के बीच होती है, जबकि ब्रिटेन ने COP26 के लिए लगभग GBP 20 मिलियन (~USD 27 मिलियन) खर्च किए थे। भारत की जलवायु वित्तीय आवंटन NAPCC के तहत 2030 तक लगभग INR 1.2 लाख करोड़ (~USD 16 बिलियन) है, जो घरेलू शमन प्रयासों के लिए निर्धारित है। इस फैसले में अवसर लागत भी शामिल है, क्योंकि जरूरी बुनियादी ढांचा और सामाजिक क्षेत्र से फंड का विचलन हो सकता है। साथ ही, भारत के नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र ने 2023 में USD 20 बिलियन का निवेश आकर्षित किया (IEA, 2024), और 2024-25 के लिए GDP वृद्धि दर 6.5% अनुमानित है (आर्थिक सर्वेक्षण 2024), जो जलवायु कार्रवाई के साथ आर्थिक विकास को प्राथमिकता देने की जरूरत को दर्शाता है।
- COP मेजबानी की अनुमानित लागत: USD 20-50 मिलियन (UNFCCC रिपोर्ट)।
- NAPCC के तहत भारत का जलवायु वित्त आवंटन: INR 1.2 लाख करोड़ (~USD 16 बिलियन) तक 2030।
- 2023 में नवीकरणीय ऊर्जा निवेश: USD 20 बिलियन (IEA, 2024)।
- 2024-25 के लिए GDP वृद्धि अनुमान: 6.5% (आर्थिक सर्वेक्षण 2024)।
भारत के जलवायु शासन की संस्थागत संरचना
भारत की जलवायु कार्रवाई कई संस्थाओं के माध्यम से समन्वित होती है। MoEFCC नीतियां बनाता है और अंतरराष्ट्रीय मंचों में भारत का प्रतिनिधित्व करता है। NITI आयोग आर्थिक योजना के साथ जलवायु रणनीतियों के समन्वय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। CPCB घरेलू पर्यावरण मानकों की निगरानी करता है, जबकि IPCC वैज्ञानिक मूल्यांकन प्रदान करता है जो भारत की नीतियों को प्रभावित करता है। वैश्विक स्तर पर, UNFCCC जलवायु वार्ताओं का प्राथमिक मंच है, जिसमें भारत सक्रिय भागीदार रहा है।
- MoEFCC: पर्यावरण और जलवायु नीति के लिए केंद्रीय nodal मंत्रालय।
- NITI आयोग: जलवायु कार्रवाई रणनीति और नीति समेकन का समन्वय।
- CPCB: पर्यावरण मानकों और प्रदूषण नियंत्रण का प्रवर्तन।
- IPCC: भारत की जलवायु प्रतिबद्धताओं को प्रभावित करने वाली वैज्ञानिक सलाहकार संस्था।
- UNFCCC: COP सम्मेलनों के तहत वैश्विक जलवायु शासन का ढांचा।
भारत की जलवायु प्रदर्शन मापदंड और प्रतिबद्धताएं
2022 में भारत की प्रति व्यक्ति CO2 उत्सर्जन 1.9 टन थी (विश्व बैंक), जो वैश्विक औसत 4.7 टन से काफी कम है। मार्च 2024 तक नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता 175 GW पहुंच चुकी है (MNRE वार्षिक रिपोर्ट 2024), जो 2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता के लक्ष्य की ओर बढ़ रही है। भारत के राष्ट्रीय रूप से निर्धारित योगदान (NDC) में 2030 तक कार्बन तीव्रता में 45% कमी शामिल है (UNFCCC, 2021)। हालांकि, NITI आयोग के अनुसार भारत को 2030 तक USD 2.5 ट्रिलियन की जलवायु वित्त आवश्यकता होगी, जो निवेश की विशालता को दर्शाता है।
- प्रति व्यक्ति CO2 उत्सर्जन: भारत 1.9 टन बनाम विश्व औसत 4.7 टन, विश्व बैंक 2022।
- नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता: मार्च 2024 तक 175 GW (MNRE रिपोर्ट)।
- गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता लक्ष्य: 2030 तक 500 GW (COP26 प्रतिबद्धता)।
- NDC लक्ष्य: 2030 तक 45% कार्बन तीव्रता में कमी (UNFCCC, 2021)।
- जलवायु वित्त आवश्यकता: 2030 तक USD 2.5 ट्रिलियन (NITI आयोग, 2023)।
तुलनात्मक विश्लेषण: भारत, ब्रिटेन और चीन की जलवायु सम्मेलन मेजबानी
| पहलू | भारत | ब्रिटेन | चीन |
|---|---|---|---|
| सम्मेलन मेजबानी | COP 2028 के लिए दावेदारी वापस ली | 2021 में COP26 की मेजबानी | 2021 में जैव विविधता पर COP15 की मेजबानी |
| मेजबानी लागत | USD 20-50 मिलियन अनुमानित; लागत के कारण वापसी | GBP 20 मिलियन (~USD 27 मिलियन) | प्रकाशित नहीं; भारी निवेश |
| रणनीतिक उपयोग | घरेलू प्राथमिकताओं पर केंद्रित, सम्मेलन की दृश्यता कम | ग्रीन निवेश और वैश्विक नेतृत्व को बढ़ावा | सम्मेलन का उपयोग भू-राजनीतिक प्रभाव और हरित एजेंडा के लिए किया |
| जलवायु कूटनीति प्रभाव | FDI और तकनीकी हस्तांतरण के अवसर खोए | अंतरराष्ट्रीय जलवायु साझेदारी मजबूत हुई | वैश्विक पर्यावरण शासन में भूमिका बढ़ी |
भारत की जलवायु कूटनीति में मौजूदा कमी
भारत की वापसी इस बात को उजागर करती है कि सम्मेलन मेजबानी को निरंतर अंतरराष्ट्रीय दृश्यता और जलवायु वित्त जुटाने के उपकरण के रूप में पूरी तरह इस्तेमाल नहीं किया जा रहा। बड़ी सम्मेलनों की मेजबानी विदेशी निवेश, तकनीकी हस्तांतरण और क्षमता निर्माण को बढ़ावा दे सकती है, जिसे वर्तमान रणनीति में कम महत्व दिया गया है। सम्मेलन मेजबानी को दीर्घकालिक जलवायु वित्तीय ढांचे और कूटनीतिक प्रयासों के साथ जोड़कर भारत अपनी वैश्विक जलवायु नेतृत्व और घरेलू जलवायु कार्रवाई दोनों मजबूत कर सकता है।
महत्व और आगे का रास्ता
- भारत को वित्तीय सतर्कता और रणनीतिक जलवायु कूटनीति के बीच संतुलन बनाना होगा ताकि वैश्विक प्रभाव खोने से बचा जा सके।
- अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों की मेजबानी की संस्थागत क्षमता बढ़ाने से तकनीक और वित्त में सह-लाभ मिल सकते हैं।
- सम्मेलन मेजबानी को भारत के NDC और आर्थिक विकास लक्ष्यों के साथ जोड़ना नीति कार्यान्वयन में सामंजस्य बढ़ाएगा।
- सार्वजनिक-निजी भागीदारी मेजबानी लागत कम करने और हितधारकों की भागीदारी बढ़ाने में मदद कर सकती है।
- वापसी के बावजूद UNFCCC जैसे मंचों के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय सहयोग मजबूत करना आवश्यक है।
- भारत ने आर्थिक और रणनीतिक कारणों से 2028 में COP28 की मेजबानी की दावेदारी वापस ली।
- पेरिस समझौता भारत को 2030 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन प्राप्त करने का आदेश देता है।
- राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना 2008 में भारत की जलवायु नीति के मार्गदर्शन के लिए शुरू की गई थी।
- COP सम्मेलनों की मेजबानी की लागत आमतौर पर USD 20 मिलियन से 50 मिलियन के बीच होती है।
- भारत की 2030 तक जलवायु वित्त की आवश्यकता USD 2.5 ट्रिलियन अनुमानित है।
- COP सम्मेलनों की मेजबानी UNFCCC के तहत सभी सदस्य देशों के लिए अनिवार्य है।
मेन प्रश्न
भारत की 2028 जलवायु सम्मेलन की मेजबानी से वापसी के अंतरराष्ट्रीय जलवायु कूटनीति और घरेलू जलवायु कार्रवाई पर प्रभावों का गंभीर विश्लेषण करें। (250 शब्द)
झारखंड और JPSC प्रासंगिकता
- JPSC पेपर: पेपर 2 (पर्यावरण और पारिस्थितिकी), पेपर 3 (आर्थिक विकास)
- झारखंड का दृष्टिकोण: झारखंड के समृद्ध खनिज संसाधन और वन क्षेत्र राज्य में सतत विकास और प्रदूषण नियंत्रण के लिए जलवायु नीतियों को महत्वपूर्ण बनाते हैं।
- मेन पॉइंटर: उत्तर तैयार करते समय झारखंड में औद्योगिक विकास और पर्यावरणीय स्थिरता के बीच संतुलन पर जोर दें, साथ ही राष्ट्रीय जलवायु नीति में बदलाव को स्थानीय प्रभाव से जोड़ें।
भारत ने 2028 जलवायु सम्मेलन की मेजबानी की दावेदारी क्यों वापस ली?
भारत ने घरेलू विकास आवश्यकताओं और आर्थिक पहलुओं को प्राथमिकता देते हुए, मेजबानी की उच्च लागत और बुनियादी ढांचा तथा सामाजिक क्षेत्रों से धन के विचलन के अवसर लागत को ध्यान में रखते हुए अपनी दावेदारी वापस ली।
पेरिस समझौते के तहत भारत की प्रमुख जलवायु प्रतिबद्धताएं क्या हैं?
भारत ने 2030 तक 2005 के स्तर की तुलना में कार्बन तीव्रता में 45% कमी और 500 GW गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखा है, जो उसके राष्ट्रीय रूप से निर्धारित योगदान (NDC) का हिस्सा हैं।
भारत की प्रति व्यक्ति CO2 उत्सर्जन वैश्विक स्तर पर कैसी है?
2022 में भारत की प्रति व्यक्ति CO2 उत्सर्जन 1.9 टन थी, जो वैश्विक औसत 4.7 टन से काफी कम है, जो इसके विकासशील अर्थव्यवस्था होने और कम ऐतिहासिक उत्सर्जन को दर्शाता है।
COP सम्मेलनों की मेजबानी की अनुमानित लागत क्या है?
UNFCCC वित्तीय रिपोर्ट के अनुसार, COP सम्मेलनों की मेजबानी की लागत आमतौर पर USD 20 मिलियन से 50 मिलियन के बीच होती है, जो मेजबान देश के बुनियादी ढांचे और आयोजन के पैमाने पर निर्भर करती है।
भारत में जलवायु कार्रवाई और नीति समन्वय के लिए कौन-कौन से संस्थान जिम्मेदार हैं?
पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC), NITI आयोग, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB), और IPCC से वैज्ञानिक इनपुट भारत की जलवायु कार्रवाई और नीति निर्माण का समन्वय करते हैं।
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