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परिचय: पूर्वानुमान और संदर्भ

भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने जून 2024 में बताया कि दक्षिण-पश्चिम मानसून की बारिश लंबी अवधि के औसत (LPA) का केवल 89% रहेगी, जो 2013 के बाद पहली बार 'सामान्य से कम' दर्जा है। यह पूर्वानुमान पूरे भारत के भूभाग को कवर करता है, जहां लगभग 70% वार्षिक वर्षा मानसून के दौरान (जून से सितंबर) होती है। पिछली बार 11 साल पहले ही 'सामान्य से कम' मानसून दर्ज हुआ था, जो हाल के वर्षों में सामान्य या सामान्य से अधिक बारिश के रुझान से एक बड़ा बदलाव है (IMD ऐतिहासिक आंकड़े)।

यह पूर्वानुमान भारत की कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था, जल सुरक्षा और आपदा प्रबंधन प्रणालियों के लिए तत्काल प्रभाव रखता है क्योंकि मानसून फसल उत्पादन, जलाशयों की पूर्ति और ग्रामीण आजीविका के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

UPSC प्रासंगिकता

  • GS पेपर 1: भूगोल – मानसून की गतिशीलता, जलवायु परिवर्तन
  • GS पेपर 3: अर्थव्यवस्था – कृषि, जल संसाधन, आपदा प्रबंधन
  • GS पेपर 3: पर्यावरण – जलवायु परिवर्तन, सूखा प्रबंधन
  • निबंध: जलवायु परिवर्तन का भारत की कृषि अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा पर प्रभाव

संवैधानिक और कानूनी ढांचा: मानसून पूर्वानुमान और आपदा प्रबंधन

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 246(3) के तहत मौसम विज्ञान सेवाएं संघ सूची में रखी गई हैं, जिससे केंद्र सरकार को मौसम विज्ञान संस्थानों के संचालन और नियम बनाने का अधिकार मिलता है। भारतीय मौसम विभाग (IMD), जो पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (MoES) के अंतर्गत आता है और जिसे पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय अधिनियम, 2006 के तहत स्थापित किया गया है, मौसम पूर्वानुमान और जलवायु निगरानी का मुख्य संस्थान है।

आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 (धारा 6 और 11) सूखे जैसी प्राकृतिक आपदाओं के लिए सक्रिय तैयारी और प्रतिक्रिया तंत्र सुनिश्चित करता है। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 (धारा 3) जलवायु सहनशीलता और जलवायु परिवर्तन प्रबंधन के लिए कानूनी आधार प्रदान करता है।

  • IMD: मानसून और सूखा पूर्वानुमान जारी करने का अधिकार।
  • NDMA: राष्ट्रीय स्तर पर आपदा तैयारी और प्रतिक्रिया का समन्वय।
  • राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण: स्थानीय स्तर पर सूखा राहत और बचाव कार्य।

सामान्य से कम मानसूनी बारिश का आर्थिक प्रभाव

कृषि भारत की GDP का लगभग 18% हिस्सा है और देश की आधे से अधिक जनसंख्या को रोजगार देती है (अर्थव्यवस्था सर्वेक्षण 2023-24)। मानसून में 10% की कमी आमतौर पर कृषि उत्पादन में 2-3% की गिरावट लाती है, जिससे ग्रामीण संकट और खाद्य सुरक्षा पर असर पड़ता है (IMD और कृषि मंत्रालय के आंकड़े)।

2024 में अनुमानित 11% की कमी खाद्यान्न उत्पादन को 2022-23 के 316.06 मिलियन टन से कम कर सकती है। महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे पहले से जल संकट से जूझ रहे राज्यों में जलाशय स्तर जून 2024 में 35% रह गया है, जो पिछले साल 55% था (सेंट्रल वाटर कमीशन 2023), जिससे सिंचाई की स्थिति और खराब हो रही है।

  • ग्रामीण ऋण चक्र प्रभावित होते हैं क्योंकि सूखा प्रभावित वर्षों में कृषि ऋण के एनपीए 5% बढ़ जाते हैं (RBI रिपोर्ट 2023)।
  • सामान्य से कम मानसून वर्षों में सूखा प्रभावित क्षेत्र औसतन 15% बढ़ जाता है (कृषि मंत्रालय के आंकड़े, 2010-2023)।
  • सरकार ने 2023-24 के बजट में ₹87,223 करोड़ कृषि और सूखा राहत योजनाओं के लिए आवंटित किए हैं।

संस्थागत भूमिकाएं और समन्वय की चुनौतियां

IMD मानसून पूर्वानुमान के लिए वैश्विक और क्षेत्रीय जलवायु मॉडल का उपयोग करता है। MoES महासागरीय और वायुमंडलीय संबंधों पर शोध करता है जो मानसून की अस्थिरता को प्रभावित करते हैं। सेंट्रल वाटर कमीशन (CWC) जलाशय और नदी बेसिन के जल स्तर की निगरानी करता है, जो सिंचाई योजना के लिए जरूरी है।

कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय सूखा राहत और फसल बीमा योजनाओं का संचालन करता है, जबकि राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) आपदा तैयारी का समन्वय करता है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि ऋण प्रवाह और वित्तीय स्थिरता की निगरानी करता है।

  • IMD के पूर्वानुमान मजबूत होने के बावजूद स्थानीय कृषि सलाहों के साथ समन्वय कमजोर है, जिससे सूखा प्रबंधन में देरी होती है।
  • राज्य स्तर पर राहत कोषों की तत्काल सक्रियता और संसाधनों का कुशल आवंटन अक्सर नहीं हो पाता।

तुलनात्मक अध्ययन: भारत बनाम ऑस्ट्रेलिया के मौसमी पूर्वानुमान और कृषि सलाह प्रणाली

पैरामीटरभारतऑस्ट्रेलिया
पूर्वानुमान संस्थाभारतीय मौसम विभाग (IMD)ब्यूरो ऑफ मौसम विज्ञान (BoM)
पूर्वानुमान मॉडलवैश्विक और क्षेत्रीय जलवायु मॉडल; ENSO और IOD सूचकांक शामिलENSO, IOD और स्थानीय जलवायु डेटा का उन्नत संयोजन, मशीन लर्निंग मॉडल के साथ
कृषि के साथ समन्वयसीमित स्थानीय सलाह; राज्य स्तर की सूखा नीतियों से कमजोर जुड़ावमौसमी पूर्वानुमान से जुड़े सक्रिय कृषि सलाह; वास्तविक समय में किसान अलर्ट
फसल नुकसान पर प्रभावसूखा संबंधित फसल नुकसान अधिक; प्रतिक्रियात्मक राहत2010-2020 में सूखा संबंधित फसल नुकसान में 20% कमी, समेकित दृष्टिकोण के कारण

महत्व और आगे की राह

  • IMD के पूर्वानुमान की सटीकता बढ़ाने के लिए स्थानीय कृषि-जलवायु डेटा और वास्तविक समय के क्षेत्रीय अवलोकनों को शामिल करें।
  • IMD, कृषि मंत्रालय, NDMA और राज्य सरकारों के बीच समन्वय को संस्थागत रूप दें ताकि सूखा प्रबंधन और संसाधन आवंटन समय पर हो सके।
  • मानसून पूर्वानुमान के आधार पर कृषि सलाह को व्यापक और डिजिटल बनाएं ताकि किसान सक्रिय निर्णय ले सकें।
  • जल संकट वाले राज्यों में जलाशय निगरानी और मांग प्रबंधन के जरिए जल संसाधन प्रबंधन मजबूत करें।
  • ग्रामीण ऋण नीतियों में जलवायु सहनशीलता शामिल करें ताकि सामान्य से कम मानसून वर्षों में वित्तीय संकट कम हो।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
IMD के अनुसार मानसूनी वर्षा वर्गीकरण के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. 'सामान्य से कम' वर्षा का मतलब LPA का 90-96% होता है।
  2. 'कमी' वर्षा LPA के 90% से कम होती है।
  3. IMD मानसूनी पूर्वानुमानों में हाइड्रोलॉजिकल और मेट्रोलॉजिकल सूखे को समान रूप से उपयोग करता है।
  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2 और 3
  • cकेवल 1 और 3
  • d1, 2 और 3 सभी
उत्तर: (a)
कथन 1 सही है: 'सामान्य से कम' वर्षा LPA का 90-96% होती है। कथन 2 भी सही है: 'कमी' वर्षा 90% से कम होती है। कथन 3 गलत है क्योंकि IMD मेट्रोलॉजिकल सूखा (वर्षा की कमी) और हाइड्रोलॉजिकल सूखा (जल संसाधन की कमी) को अलग-अलग मानता है।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
भारत में मौसम विज्ञान सेवाओं से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों पर विचार करें:
  1. अनुच्छेद 246(3) मौसम विज्ञान सेवाओं को संघ सूची में रखता है।
  2. आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 राज्यों को स्वतंत्र रूप से मानसून पूर्वानुमान जारी करने का अधिकार देता है।
  3. पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय अधिनियम, 2006 ने IMD को स्वायत्त संस्था के रूप में स्थापित किया।
  • aकेवल 1
  • bकेवल 1 और 2
  • cकेवल 2 और 3
  • dकेवल 1 और 3
उत्तर: (d)
कथन 1 सही है क्योंकि मौसम विज्ञान सेवाएं संघ सूची में आती हैं। कथन 2 गलत है; राज्यों को स्वतंत्र मानसून पूर्वानुमान जारी करने का अधिकार नहीं है। कथन 3 सही है; पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय अधिनियम, 2006 ने IMD को MoES के अंतर्गत संस्थागत किया।

मेन प्रश्न

2024 में भारत में 'सामान्य से कम' मानसूनी बारिश के पूर्वानुमान से उत्पन्न आर्थिक और संस्थागत चुनौतियों का विश्लेषण करें। इस संदर्भ में सूखा तैयारी और कृषि सहनशीलता सुधार के उपाय सुझाएं।

झारखंड और JPSC प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: पेपर 1 (भूगोल और पर्यावरण), पेपर 3 (कृषि और आपदा प्रबंधन)
  • झारखंड संदर्भ: झारखंड की कृषि अर्थव्यवस्था मानसून बारिश पर निर्भर है; सामान्य से कम बारिश जल संकट बढ़ाती है और धान व मक्का की पैदावार प्रभावित करती है।
  • मेन पॉइंटर: राज्य विशेष जल संसाधन प्रबंधन, IMD सलाहों का स्थानीय कृषि प्रथाओं के साथ समन्वय, और आपदा राहत तंत्र पर चर्चा करें।
IMD के अनुसार 'सामान्य से कम' मानसूनी बारिश क्या होती है?

IMD के अनुसार, 'सामान्य से कम' मानसूनी बारिश लंबी अवधि के औसत (LPA) का 90-96% होती है।

भारत में मौसम विज्ञान सेवाओं को कौन सा संवैधानिक प्रावधान नियंत्रित करता है?

अनुच्छेद 246(3) के तहत मौसम विज्ञान सेवाएं संघ सूची में आती हैं, जिससे केंद्र सरकार को इनसे संबंधित कानून बनाने और संस्थान संचालित करने का अधिकार मिलता है।

सामान्य से कम मानसूनी बारिश का कृषि उत्पादन पर क्या असर होता है?

मानसून में 10% की कमी सिंचाई की कमी और फसलों पर तनाव के कारण 2-3% कृषि उत्पादन में गिरावट लाती है, जिससे खाद्यान्न उत्पादन और ग्रामीण आय प्रभावित होती है।

सूखा तैयारी में आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 की क्या भूमिका है?

आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 की धारा 6 और 11 के तहत राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर आपदा प्रबंधन प्राधिकरण स्थापित किए गए हैं, जो सूखा जैसी जलवायु आपदाओं के लिए तैयारी, रोकथाम और प्रतिक्रिया के लिए जिम्मेदार हैं।

ऑस्ट्रेलिया के ब्यूरो ऑफ मौसम विज्ञान और भारत के IMD में मानसूनी पूर्वानुमान में क्या अंतर है?

ऑस्ट्रेलिया का ब्यूरो ऑफ मौसम विज्ञान उन्नत मौसमी पूर्वानुमान मॉडल और ENSO, IOD सूचकांकों का संयोजन करता है और कृषि सलाह से सीधे जोड़ता है, जिससे 2010-2020 में सूखा संबंधित फसल नुकसान में 20% कमी आई है, जबकि भारत में यह प्रणाली पूरी तरह विकसित नहीं हुई है।

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