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चरम जलवायु घटनाओं का स्थलीय जीव-जंतु आवासों पर अनुमानित प्रभाव

2024 में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, 2085 तक लगभग 36% स्थलीय जीव-जंतु आवास विश्व स्तर पर चरम जलवायु घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति और तीव्रता से प्रभावित होंगे। यह अनुमान IPCC AR6 की रिपोर्ट पर आधारित है, जिसमें औद्योगिक युग से अब तक वैश्विक औसत तापमान में 1.16 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि दर्ज की गई है। भारत में 21.71% वन क्षेत्र (Forest Survey of India, 2023) होने के कारण, पिछले दो दशकों में चरम मौसम की घटनाओं में 20% की वृद्धि (IMD रिपोर्ट, 2023) के चलते गंभीर खतरे हैं। इससे आवासों की कनेक्टिविटी, प्रजातियों के प्रवास मार्ग और भारत की लगभग 70% संकटग्रस्त प्रजातियों की जीवित रहने की संभावना प्रभावित होगी, जो विशिष्ट आवासों पर निर्भर हैं (MoEFCC वन्यजीव जनगणना, 2022)।

UPSC प्रासंगिकता

  • GS पेपर 3: पर्यावरण और पारिस्थितिकी – जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता संरक्षण, आपदा प्रबंधन
  • GS पेपर 1: भूगोल – जलवायु परिवर्तन का जैव विविधता पर प्रभाव
  • निबंध: जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता हानि के बीच अंतर्संबंध

भारत में जैव विविधता संरक्षण के लिए संवैधानिक और कानूनी ढांचे

संविधान के अनुच्छेद 48A के तहत राज्य को पर्यावरण संरक्षण और सुधार का दायित्व दिया गया है, जो जैव विविधता संरक्षण का संवैधानिक आधार है। वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 (संशोधित 2006) में संरक्षित प्रजातियों और आवासों की परिभाषा (धारा 2 और 29) दी गई है, जो आवासीय ह्रास के खिलाफ कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 (धारा 3 और 5) केंद्र सरकार को पर्यावरणीय क्षति रोकने के लिए उपाय लागू करने का अधिकार देता है, जिसमें जलवायु से उत्पन्न आवासीय व्यवधान भी शामिल हैं। जैविक विविधता अधिनियम, 2002 (धारा 18 और 36) जैव विविधता के संरक्षण और सतत उपयोग को नियंत्रित करता है, जिससे स्थानीय और राष्ट्रीय प्रयासों का समन्वय होता है। सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसलों जैसे T.N. Godavarman Thirumulpad v. Union of India (1996) ने वन्यजीव संरक्षण के लिए आवास सुरक्षा को अनिवार्य माना है।

चरम घटनाओं से आवास ह्रास के आर्थिक परिणाम

जलवायु से प्रेरित आवास ह्रास के गहरे आर्थिक प्रभाव हैं। IPBES 2019 की रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक स्तर पर जैव विविधता से जुड़ी आर्थिक हानि प्रति वर्ष 500 बिलियन डॉलर तक पहुंच चुकी है। भारत में पारिस्थितिकी तंत्र की सेवाएं लगभग 33% GDP में योगदान करती हैं (विश्व बैंक, 2021), जो स्वस्थ आवासों के आर्थिक महत्व को दर्शाता है। आवासीय गिरावट लगभग 100 मिलियन वन-निर्भर लोगों की आजीविका को खतरे में डालती है (MoEFCC, 2022)। साथ ही, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान (NIDM) के अनुसार चरम जलवायु घटनाओं के कारण आपदा प्रबंधन और पुनर्वास की लागत में प्रति वर्ष 15% की वृद्धि हो रही है, जिससे सार्वजनिक संसाधनों पर दबाव बढ़ता है।

आवासीय व्यवधान से निपटने में संस्थागत भूमिकाएं

  • MoEFCC: जैव विविधता संरक्षण और जलवायु अनुकूलन नीतियों का निर्माण और क्रियान्वयन करता है।
  • Wildlife Institute of India (WII): वन्यजीव आवासों पर शोध और निगरानी करता है तथा जलवायु प्रभाव का आकलन करता है।
  • Intergovernmental Panel on Climate Change (IPCC): जलवायु परिवर्तन और चरम घटनाओं पर वैज्ञानिक मूल्यांकन प्रदान करता है।
  • National Institute of Disaster Management (NIDM): चरम घटनाओं से संबंधित आपदा जोखिम कम करने की रणनीतियों का समन्वय करता है।
  • National Biodiversity Management Committee (NBMC): स्थानीय जैव विविधता कार्य योजनाओं को लागू करता है, जिसमें जलवायु लचीलापन शामिल है।
  • Central Zoo Authority (CZA): आवास ह्रास के खिलाफ एक्स-सिटू संरक्षण की देखरेख करता है।

तुलनात्मक अध्ययन: भारत बनाम कोस्टा रिका – जैव विविधता और जलवायु लचीलापन

पहलूभारतकोस्टा रिका
वन क्षेत्र21.71% भौगोलिक क्षेत्र (FSI 2023)लगभग 52% वन क्षेत्र (CBD रिपोर्ट, 2023)
नीतिगत समन्वयखंडित दृष्टिकोण; जलवायु अनुकूलन और जैव विविधता संरक्षण का सीमित समन्वयराष्ट्रीय जैव विविधता रणनीति और कार्य योजना (2015-2025) में एकीकृत जलवायु लचीलापन
संरक्षित आवास वृद्धिस्थिर या मामूली वृद्धिपिछले दशक में 25% वृद्धि
प्रजाति आबादी रुझानकई आवास-विशिष्ट प्रजातियों में गिरावटपिछले दशक में 15% वृद्धि

भारतीय नीतिगत ढांचे में महत्वपूर्ण कमियां

वर्तमान भारतीय नीतियां जलवायु अनुकूलन और जैव विविधता संरक्षण के बीच समन्वय में असमर्थ हैं, जिससे रणनीतियां खंडित हो जाती हैं। यह कमी चरम घटनाओं के संदर्भ में आवास कनेक्टिविटी और प्रवास मार्गों को बनाए रखने के प्रयासों को कमजोर करती है। समन्वित ढांचे की अनुपस्थिति संरक्षण कार्यों और आपदा जोखिम कम करने की क्षमता को सीमित करती है। साथ ही, अपर्याप्त वित्त पोषण और सीमित समुदाय सहभागिता ऐसे आवासों के अनुकूल प्रबंधन में बाधक हैं जो जलवायु चरम के प्रति संवेदनशील हैं।

आगे का रास्ता: नीतिगत और संस्थागत सुझाव

  • ऐसे एकीकृत जलवायु-जैव विविधता कार्य योजनाएं बनाएं जो आवास कनेक्टिविटी और प्रजाति प्रवास को चरम घटनाओं के तहत स्पष्ट रूप से संबोधित करें।
  • वर्तमान ₹3,000 करोड़ (MoEFCC 2023-24) से अधिक वित्तीय आवंटन बढ़ाएं ताकि अनुकूल संरक्षण और आपदा तैयारी को समर्थन मिल सके।
  • MoEFCC, WII, NIDM और NBMC के बीच संस्थागत समन्वय मजबूत करें ताकि संरक्षण और आपदा जोखिम कम करने के प्रयास एकीकृत हों।
  • वन-निर्भर समुदायों की आजीविका की सुरक्षा के लिए सामुदायिक आधारित संरक्षण मॉडल अपनाएं।
  • कोस्टा रिका जैसे देशों से सीख लेकर जलवायु लचीलापन को जैव विविधता रणनीतियों में मुख्यधारा में लाएं।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. धारा 2 अधिनियम के तहत संरक्षित प्रजातियों और आवासों को परिभाषित करती है।
  2. धारा 29 निर्दिष्ट प्रजातियों के शिकार को प्रतिबंधित करती है और उनके आवासों की सुरक्षा करती है।
  3. अधिनियम में वन्यजीव संरक्षण के लिए जलवायु परिवर्तन अनुकूलन उपायों का स्पष्ट प्रावधान है।
  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2 और 3
  • cकेवल 1 और 3
  • d1, 2 और 3
उत्तर: (a)
धारा 2 में संरक्षित प्रजातियों और आवासों की परिभाषा दी गई है, इसलिए कथन 1 सही है। धारा 29 में शिकार पर प्रतिबंध और आवास सुरक्षा का प्रावधान है, इसलिए कथन 2 भी सही है। कथन 3 गलत है क्योंकि अधिनियम में जलवायु परिवर्तन अनुकूलन के स्पष्ट प्रावधान नहीं हैं।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
चरम जलवायु घटनाओं और जैव विविधता हानि के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. 2085 तक एक तिहाई से अधिक स्थलीय जीव-जंतु आवास चरम घटनाओं से प्रभावित होंगे।
  2. भारत के पर्यावरण कानूनों में वनों की कटाई और जलवायु से उत्पन्न आवासीय व्यवधान को समान रूप से माना जाता है।
  3. भारत की 70% से अधिक संकटग्रस्त प्रजातियां विशिष्ट आवासों पर निर्भर हैं जो चरम घटनाओं के प्रति संवेदनशील हैं।
  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2 और 3
  • cकेवल 1 और 3
  • d1, 2 और 3
उत्तर: (c)
2024 के अध्ययन के अनुसार कथन 1 सही है। कथन 2 गलत है क्योंकि भारतीय कानून वनों की कटाई और जलवायु से उत्पन्न आवासीय व्यवधान में भेद करते हैं। MoEFCC वन्यजीव जनगणना 2022 के अनुसार कथन 3 सही है।

मेन प्रश्न

भारत में चरम जलवायु घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति स्थलीय जीव-जंतु आवासों को किस प्रकार खतरे में डालती है? मौजूदा कानूनी और संस्थागत ढांचे इन चुनौतियों से निपटने में कितने सक्षम हैं? जलवायु परिवर्तन के परिदृश्यों में जैव विविधता संरक्षण को बेहतर बनाने के लिए क्या उपाय सुझाए जा सकते हैं? (250 शब्द)

झारखंड और JPSC प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: पेपर 2 (पर्यावरण और पारिस्थितिकी)
  • झारखंड का दृष्टिकोण: झारखंड का समृद्ध वन क्षेत्र (~29.6% FSI 2023 के अनुसार) और जैव विविधता हॉटस्पॉट बाढ़ और सूखे जैसी चरम मौसम की घटनाओं से प्रभावित हैं, जो आदिवासी आजीविकाओं पर असर डालते हैं।
  • मेन पॉइंटर: राज्य की वन पारिस्थितिकी तंत्र पर निर्भरता, जलवायु चरम के कारण आवास विखंडन का खतरा, और राज्य जैव विविधता कार्य योजनाओं में जलवायु अनुकूलन के समावेशन पर जोर दें।
जैव विविधता संरक्षण में अनुच्छेद 48A का क्या महत्व है?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 48A राज्य को पर्यावरण, वन और वन्यजीवों की सुरक्षा और सुधार का निर्देश देता है, जो वन्यजीव संरक्षण अधिनियम और पर्यावरण संरक्षण अधिनियम जैसे कानूनों के लिए संवैधानिक आधार प्रदान करता है।

चरम जलवायु घटनाएं स्थलीय जीव-जंतु आवासों को कैसे प्रभावित करती हैं?

बाढ़, सूखा, और हीटवेव जैसी चरम जलवायु घटनाएं वनस्पति, जल उपलब्धता, और प्रवास मार्गों को प्रभावित कर आवासों को अस्थिर करती हैं, जिससे प्रजातियों के जीवित रहने और पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिरता को खतरा होता है।

वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत आवास संरक्षण के लिए प्रमुख कानूनी प्रावधान क्या हैं?

वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की धारा 2 और 29 संरक्षित प्रजातियों और आवासों की परिभाषा देती हैं और निर्दिष्ट वन्यजीवों के शिकार और आवास विनाश पर रोक लगाती हैं, जिससे आवास संरक्षण के लिए कानूनी ढांचा मिलता है।

जैव विविधता हानि भारत की अर्थव्यवस्था को कैसे प्रभावित करती है?

जैव विविधता हानि पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं को खतरे में डालती है, जो भारत के GDP का लगभग 33% योगदान करती हैं, 100 मिलियन वन-निर्भर लोगों की आजीविका को प्रभावित करती है और आपदा प्रबंधन लागत में प्रति वर्ष 15% की वृद्धि करती है (NIDM 2023)।

जैव विविधता और जलवायु लचीलापन के मामले में भारत को कोस्टा रिका से क्या सीख मिल सकती है?

कोस्टा रिका की राष्ट्रीय जैव विविधता रणनीति और कार्य योजना (2015-2025) के माध्यम से एकीकृत दृष्टिकोण ने पिछले दशक में संरक्षित आवासों में 25% और प्रजाति आबादी में 15% की वृद्धि की है, जो जलवायु लचीलापन को जैव विविधता संरक्षण में सफलतापूर्वक शामिल करने का उदाहरण है।

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