साल 2024 में कानून और न्याय मंत्रालय ने घोषणा की कि आगामी परिसीमन के बाद लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में राज्यों की सीटों की संख्या लगभग 50% बढ़ सकती है। यह परिसीमन, जो संविधान के अनुच्छेद 82 (लोकसभा) और अनुच्छेद 170 (राज्य विधानसभाएं) के तहत अनिवार्य है, 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं फिर से तय करेगा ताकि 2002 के बाद हुए जनसांख्यिकीय बदलावों को सही ढंग से प्रतिबिंबित किया जा सके। इस प्रक्रिया के लिए परिसीमन आयोग का गठन परिसीमन अधिनियम, 2002 के तहत किया गया है। सीटों में वृद्धि राजनीतिक प्रतिनिधित्व के स्वरूप को बदल देगी, जिससे शासन व्यवस्था और संसाधन वितरण में भी आवश्यक बदलाव होंगे।
UPSC Relevance
- GS Paper 2: Polity and Governance – परिसीमन पर संवैधानिक प्रावधान, परिसीमन आयोग की भूमिका, संघवाद के प्रभाव
- GS Paper 2: Electoral Reforms – राजनीतिक प्रतिनिधित्व और चुनाव प्रबंधन पर परिसीमन का प्रभाव
- Essay: भारत में संघवाद और केंद्र-राज्य संबंध
परिसीमन का संवैधानिक और कानूनी ढांचा
परिसीमन की प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 82 (लोकसभा के लिए) और अनुच्छेद 170 (राज्य विधानसभाओं के लिए) के तहत अनिवार्य है। परिसीमन अधिनियम, 2002 इन प्रावधानों को लागू करता है और परिसीमन आयोग की स्थापना करता है, जो एक स्वतंत्र संस्था है और निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं तय करने का अधिकार रखती है। आयोग के आदेशों को कानून का दर्जा प्राप्त होता है और इन्हें अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती, जैसा कि कुलदीप नायर बनाम भारत संघ (2006) के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने माना है। 2001 में पारित 84वें संशोधन के तहत सीटों की संख्या बढ़ाने पर रोक 2026 के बाद समाप्त हो जाएगी, जिससे जनसंख्या में बदलाव के अनुसार सीटों की संख्या बढ़ाई जा सकेगी।
- अनुच्छेद 82: प्रत्येक जनगणना के बाद लोकसभा सीटों का पुनः निर्धारण अनिवार्य करता है।
- अनुच्छेद 170: राज्य विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन को आवश्यक बनाता है।
- परिसीमन अधिनियम, 2002: आयोग की स्थापना और अधिकारों का कानूनी आधार।
- कुलदीप नायर बनाम भारत संघ (2006): परिसीमन की संवैधानिक वैधता को सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार किया।
सीटों में वृद्धि के आर्थिक पहलू
सीटों में अनुमानित 50% वृद्धि से भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के प्रशासनिक और चुनावी खर्चों में भारी इजाफा होगा। 2019 के लोकसभा चुनावों में आयोग का खर्च लगभग ₹4,000 करोड़ था, जो सीटों की बढ़ोतरी के साथ बढ़ेगा। इसके अलावा, सांसद लोक क्षेत्र विकास योजना (MPLADS) के तहत प्रति सांसद ₹5 करोड़ वार्षिक आवंटन भी बढ़ेगा, जिससे केंद्र सरकार के बजट पर दबाव पड़ेगा। राज्यों को भी बढ़े हुए विधानसभाओं के कारण वेतन, भत्ते और अवसंरचना खर्चों में वृद्धि का सामना करना पड़ेगा, जो उनके वित्तीय संतुलन को प्रभावित करेगा।
- 2019 में ECI का खर्च: ₹4,000 करोड़ (543 लोकसभा सीटों के लिए)।
- MPLADS आवंटन: प्रति सांसद ₹5 करोड़ प्रति वर्ष (2023 के दिशानिर्देश)।
- MPLADS फंड में लगभग 50% की वृद्धि संभव।
- राज्य बजट पर विधानसभाओं के बढ़े हुए प्रशासनिक खर्चों का प्रभाव।
- क्षेत्रीय विकास और फंड वितरण में बदलाव की संभावना।
परिसीमन में प्रमुख संस्थान और उनकी भूमिका
परिसीमन आयोग नवीनतम जनगणना के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं तय करने वाला सर्वोच्च निकाय है। भारत निर्वाचन आयोग नए निर्वाचन क्षेत्रों के लिए मतदाता सूची तैयार करता है और चुनाव आयोजित करता है। कानून और न्याय मंत्रालय कानूनी ढांचा और प्रशासनिक सहायता प्रदान करता है, जबकि संसदीय स्थायी समिति (कानून और न्याय) परिसीमन से संबंधित विधायी मामलों की समीक्षा करती है।
- परिसीमन आयोग: सीमाएं तय करने का स्वतंत्र प्राधिकारी।
- भारत निर्वाचन आयोग: चुनाव प्रबंधन और मतदाता सूची अपडेट।
- कानून और न्याय मंत्रालय: कानूनी और प्रशासनिक समर्थन।
- संसदीय स्थायी समिति: परिसीमन से संबंधित विधायी निगरानी।
डेटा आधारित सीट आवंटन और जनसंख्या असमानताएं
2002 का अंतिम परिसीमन 2001 की जनगणना पर आधारित था। तब से राज्यों में जनसंख्या वृद्धि असमान रही है, जिससे सीटों के आवंटन में बदलाव आएगा। उदाहरण के लिए, 2011 की जनगणना के अनुसार उत्तर प्रदेश की जनसंख्या 20.9 करोड़, बिहार की 13 करोड़ और महाराष्ट्र की 12.5 करोड़ थी। इस असमानता के कारण अधिक जनसंख्या वाले राज्यों को अधिक सीटें मिलेंगी। वर्तमान में लोकसभा की 543 सीटें हैं, जो राज्यों में लगभग 270 सीटों की वृद्धि के साथ बढ़ सकती हैं।
| राज्य | जनसंख्या (2011 जनगणना, करोड़) | वर्तमान लोकसभा सीटें | सीटों में अनुमानित वृद्धि (%) |
|---|---|---|---|
| उत्तर प्रदेश | 20.9 | 80 | ~50% |
| बिहार | 13.0 | 40 | ~50% |
| महाराष्ट्र | 12.5 | 48 | ~50% |
| अन्य राज्य (कुल) | विविध | 375 | ~50% |
तुलनात्मक अध्ययन: भारत बनाम संयुक्त राज्य अमेरिका का परिसीमन
भारत में परिसीमन प्रक्रिया 2026 तक स्थगित है, जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका में हर 10 साल बाद जनगणना के बाद कांग्रेस के निर्वाचन क्षेत्रों का पुन: निर्धारण होता है, जो जनसंख्या के अनुसार सीटों का पुनः आवंटन करता है। अमेरिकी जनगणना ब्यूरो राज्यों के बीच सीटों का पुनर्वितरण करता है, जिससे संघीय संसाधनों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में अधिक गतिशीलता होती है। भारत में यह स्थगन जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों को बढ़ावा देने के लिए था, लेकिन इससे प्रतिनिधित्व में असंतुलन का खतरा बढ़ गया है। अमेरिकी मॉडल अधिक प्रतिक्रियाशील है, परन्तु उसमें भी राजनीतिक हस्तक्षेप की चुनौतियां मौजूद हैं।
| पहलू | भारत | संयुक्त राज्य अमेरिका |
|---|---|---|
| सीट समायोजन की आवृत्ति | कुछ दशकों में एक बार; 2026 तक स्थगित | हर 10 साल में जनगणना के बाद |
| अधिकार प्राधिकारी | परिसीमन आयोग (स्वतंत्र) | राज्य विधानमंडल, जनगणना ब्यूरो |
| सीटों की संख्या में वृद्धि | स्थगित, अब 2026 के बाद 50% वृद्धि का अनुमान | राज्यों के बीच पुनर्वितरण; कुल सीटें 435 स्थिर |
| संघवाद पर प्रभाव | विलंबित समायोजन से असंतुलन का खतरा | गतिशील, पर राजनीतिक हस्तक्षेप का जोखिम |
वर्तमान परिसीमन प्रक्रिया की प्रमुख चुनौतियां
2011 की जनगणना पर आधारित परिसीमन राज्यों के भीतर जनसंख्या बदलाव, खासकर शहरीकरण और ग्रामीण-शहरी प्रवास को पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं करता। इससे तेजी से बढ़ते शहरी निर्वाचन क्षेत्रों का कम प्रतिनिधित्व और घटते ग्रामीण क्षेत्रों का अधिक प्रतिनिधित्व हो सकता है। 2026 तक सीटों की वृद्धि पर लगी रोक ने इस समस्या को और बढ़ा दिया है, जिससे मतदाता प्रतिनिधित्व में असमानता और शासन प्राथमिकताओं में विकृति हो सकती है। इन चुनौतियों से निपटने के लिए अधिक बार डेटा अपडेट और लचीली परिसीमन व्यवस्था की जरूरत है।
- पुराने आंकड़ों के कारण शहरी क्षेत्रों का कम प्रतिनिधित्व।
- ग्रामीण क्षेत्रों का जनसंख्या में गिरावट के बावजूद अधिक सीटें।
- विलंबित परिसीमन से लोकतांत्रिक असंतुलन।
- प्रवास और जनसांख्यिकीय रुझानों को शामिल करने की आवश्यकता।
महत्व और आगे का रास्ता
परिसीमन के बाद सीटों में 50% वृद्धि राजनीतिक प्रतिनिधित्व का स्वरूप बदल देगी, जिससे चुनाव प्रबंधन, बजट आवंटन और शासन ढांचे में पुनर्संतुलन करना होगा। निर्वाचन आयोग को बढ़ी हुई चुनावी मांगों के लिए तैयार रहना होगा, जबकि संसद और राज्य विधानसभाओं को वित्तीय प्रभावों का सामना करना होगा। राज्यों के भीतर जनसांख्यिकीय असमानताओं को मध्यावधि डेटा और लचीले परिसीमन से दूर किया जा सकता है। परिसीमन आयोग, निर्वाचन आयोग और विधायी संस्थानों के बीच बेहतर तालमेल सफल क्रियान्वयन के लिए जरूरी होगा।
- अधिक निर्वाचन क्षेत्रों के प्रबंधन के लिए ECI के बजट और संसाधन बढ़ाएं।
- सीटों की वृद्धि के अनुसार MPLADS और अन्य फंड आवंटनों में संशोधन करें।
- भविष्य के परिसीमन में शहरीकरण और प्रवासन के रुझान शामिल करें।
- परिसीमन प्रक्रिया में पारदर्शिता और जन-सहभागिता बढ़ाएं।
- सीमाओं के राजनीतिक दुरुपयोग को रोकने के लिए कानूनी सुरक्षा मजबूत करें।
- परिसीमन आयोग के आदेशों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है।
- लोकसभा सीटों की वृद्धि पर रोक 84वें संशोधन द्वारा लागू की गई थी।
- संविधान के अनुसार प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन किया जाता है।
- MPLADS फंड सीट के आधार पर आवंटित होते हैं।
- 2023 के दिशानिर्देशों के अनुसार प्रति सांसद MPLADS आवंटन ₹5 करोड़ वार्षिक है।
- MPLADS फंड का उपयोग चुनाव प्रचार के लिए किया जा सकता है।
मेन प्रश्न: भारत में परिसीमन के संवैधानिक प्रावधानों और संस्थागत तंत्रों का विश्लेषण करें। परिसीमन के बाद राज्यों की सीटों में प्रस्तावित 50% वृद्धि के राजनीतिक प्रतिनिधित्व और शासन पर प्रभावों पर चर्चा करें।
झारखंड और JPSC प्रासंगिकता
- JPSC पेपर: पेपर 2 – भारतीय राजनीति और शासन: परिसीमन और राज्य राजनीति पर इसका प्रभाव।
- झारखंड दृष्टिकोण: परिसीमन के बाद झारखंड की विधान सभा और लोकसभा सीटों में वृद्धि हो सकती है, जो क्षेत्रीय राजनीतिक समीकरण और संसाधन आवंटन को प्रभावित करेगी।
- मेन पॉइंट: झारखंड के जनसांख्यिकीय बदलाव, सीटों में संभावित वृद्धि और विस्तारित विधानसभाओं से उत्पन्न शासन चुनौतियों को उजागर करते हुए उत्तर तैयार करें।
भारत में परिसीमन का संवैधानिक आधार क्या है?
परिसीमन संविधान के अनुच्छेद 82 (लोकसभा के लिए) और अनुच्छेद 170 (राज्य विधानसभाओं के लिए) के तहत अनिवार्य है, जो प्रत्येक जनगणना के बाद सीटों और सीमाओं के पुनः निर्धारण का प्रावधान करता है।
भारत में परिसीमन कौन करता है?
परिसीमन आयोग, जो परिसीमन अधिनियम, 2002 के तहत गठित होता है, निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं तय करता है। यह एक स्वतंत्र संस्था है और इसके आदेश कानून के समान होते हैं।
सीटों की वृद्धि पर रोक क्यों लगाई गई थी?
84वें संशोधन (2001) ने 2026 तक लोकसभा और राज्य विधानसभा सीटों की संख्या बढ़ाने पर रोक लगाई ताकि जनसंख्या नियंत्रण को बढ़ावा मिले और उन राज्यों को दंडित न किया जाए जिन्होंने जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित किया है।
सीटों की वृद्धि MPLADS फंडिंग को कैसे प्रभावित करेगी?
MPLADS फंड प्रति सांसद ₹5 करोड़ वार्षिक के हिसाब से आवंटित होता है। सीटों में 50% वृद्धि से MPLADS आवंटन भी समानुपातिक रूप से बढ़ेगा, जो केंद्र सरकार के बजट पर असर डालेगा।
वर्तमान परिसीमन प्रक्रिया में क्या चुनौतियां हैं?
2011 की जनगणना पर आधारित परिसीमन राज्यों के भीतर जनसंख्या बदलाव, शहरीकरण और प्रवासन को पूरी तरह नहीं दर्शाता, जिससे तेजी से बढ़ते शहरी क्षेत्रों का कम प्रतिनिधित्व हो सकता है और ग्रामीण क्षेत्रों का अधिक। इससे लोकतांत्रिक असंतुलन हो सकता है।
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