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गृह मंत्रालय का फॉरेंसिक बैकलॉग खत्म करने और ‘नवीन संहिताएं’ पहल पर निर्देश

जुलाई 2023 में गृह मंत्रालय (MHA) ने सभी राज्यों को 1.5 लाख से अधिक फॉरेंसिक बैकलॉग मामलों को 90 दिनों के भीतर खत्म करने का निर्देश दिया, जो राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) 2023 के आंकड़ों पर आधारित है। इसी समय ‘नवीन संहिताएं’ नामक एक तकनीक आधारित परियोजना भी शुरू की गई, जिसका लक्ष्य 2025 तक 80% से अधिक फॉरेंसिक केस फाइलों का डिजिटलीकरण करना है। यह कदम फॉरेंसिक इन्फ्रास्ट्रक्चर को आधुनिक बनाने, रिपोर्ट तैयार होने के समय को वर्तमान 6 से 12 महीने से घटाकर अंतरराष्ट्रीय स्तर के मानकों तक लाने और आपराधिक न्याय प्रणाली को बेहतर बनाने के लिए उठाया गया है।

UPSC से प्रासंगिकता

  • GS पेपर 2: शासन — आपराधिक न्याय सुधार, फॉरेंसिक विज्ञान का आधुनिकीकरण
  • GS पेपर 3: विज्ञान और प्रौद्योगिकी — फॉरेंसिक सेवाओं में डिजिटल बदलाव
  • निबंध: शासन और न्याय व्यवस्था में तकनीक की भूमिका

फॉरेंसिक साक्ष्य पर कानूनी और संवैधानिक ढांचा

यह निर्देश फॉरेंसिक साक्ष्य के संग्रह और स्वीकार्यता से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनी प्रावधानों के अनुरूप है। दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC), 1973 की धारा 53 और 54 के तहत जांच के दौरान चिकित्सा परीक्षण और फॉरेंसिक नमूना संग्रह अनिवार्य हैं। भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 अदालतों में फॉरेंसिक साक्ष्य की स्वीकार्यता और प्रमाणिकता को नियंत्रित करता है। साथ ही, DNA टेक्नोलॉजी (उपयोग और आवेदन) विनियमन बिल, 2019 फॉरेंसिक DNA प्रोफाइलिंग और डेटाबेस के लिए कानूनी ढांचा प्रदान करता है, जो गोपनीयता और नैतिक मानकों को सुनिश्चित करता है।

सुप्रीम कोर्ट ने State of Punjab v. Gurmit Singh (1996) मामले में फॉरेंसिक विश्लेषण की समयबद्धता को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निष्पक्ष न्याय के अधिकार से जोड़ा है। फॉरेंसिक रिपोर्टों में देरी इस संवैधानिक अधिकार को कमजोर करती है, इसलिए गृह मंत्रालय ने तेजी से बैकलॉग खत्म करने और डिजिटलीकरण को प्राथमिकता दी है।

फॉरेंसिक आधुनिकीकरण के आर्थिक पहलू

MHA ने 2023-24 के बजट में फॉरेंसिक इन्फ्रास्ट्रक्चर सुधार के लिए लगभग ₹500 करोड़ आवंटित किए हैं, जिसमें ‘नवीन संहिताएं’ जैसी डिजिटल प्लेटफॉर्म भी शामिल हैं। FICCI रिपोर्ट 2023NITI आयोग 2022)।

‘नवीन संहिताएं’ के तहत डिजिटलीकरण और प्रक्रिया स्वचालन से अगले पांच वर्षों में परिचालन लागत में 20%-30% तक कमी आने की उम्मीद है, जिससे दक्षता बढ़ेगी, मानवीय त्रुटियां कम होंगी और रिपोर्ट तैयार करने की गति तेज होगी।

फॉरेंसिक बैकलॉग खत्म करने और डिजिटलीकरण में संस्थागत भूमिकाएं

  • गृह मंत्रालय (MHA): नीति निर्धारण, वित्त पोषण और फॉरेंसिक आधुनिकीकरण की निगरानी।
  • सेंट्रल फॉरेंसिक साइंस लैबोरेटरी (CFSL): फॉरेंसिक विश्लेषण और बैकलॉग कम करने में मुख्य एजेंसी।
  • राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB): फॉरेंसिक डेटा प्रबंधन और अपराध डेटाबेस से एकीकरण।
  • DNA प्रोफाइलिंग बोर्ड: DNA टेक्नोलॉजी बिल के तहत DNA डेटाबैंक का नियामक प्राधिकरण।
  • राज्य फॉरेंसिक साइंस लैबोरेटरीज (SFSLs): फॉरेंसिक विश्लेषण और ‘नवीन संहिताएं’ के राज्य स्तर पर क्रियान्वयन।
  • NITI आयोग: नीति सलाहकार और फॉरेंसिक इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास व प्रदर्शन की निगरानी।

फॉरेंसिक बैकलॉग और प्रदर्शन के आंकड़े

परामीटरभारत (2023)वैश्विक मानक (Interpol 2022)
फॉरेंसिक बैकलॉग मामले1.5 लाख से अधिकमामलों का 5% से कम
औसत फॉरेंसिक रिपोर्ट तैयार होने का समय6-12 महीने1-2 महीने
ISO/IEC 17025 मानक वाले SFSLs40%लगभग 100%
‘नवीन संहिताएं’ के तहत डिजिटलीकरण लक्ष्य2025 तक 80% केस फाइलेंपूर्ण डिजिटल केस प्रबंधन
DNA डेटाबैंक प्रोफाइल1.2 लाख (2025 तक 5 लाख का लक्ष्य)व्यापक राष्ट्रीय DNA डेटाबेस

तुलनात्मक अध्ययन: यूके का फॉरेंसिक विज्ञान ढांचा

यूके के फॉरेंसिक साइंस रेगुलेटर ढांचे में सख्त गुणवत्ता मानक, मान्यता और डिजिटल केस प्रबंधन लागू हैं। इससे फॉरेंसिक रिपोर्ट का औसत समय 30 दिनों से भी कम और बैकलॉग 5% से कम हो गया है (UK होम ऑफिस रिपोर्ट 2023)। भारत की ‘नवीन संहिताएं’ इसी मॉडल को अपनाते हुए डिजिटल वर्कफ्लो, गुणवत्ता नियंत्रण और केंद्रीकृत डेटा प्रबंधन के जरिए विश्वसनीयता और गति बढ़ाने का प्रयास है।

पहलूभारत (वर्तमान)यूके (मानक)
बैकलॉग प्रतिशतउच्च (>20%)<5%
रिपोर्ट तैयार होने का समय6-12 महीने<30 दिन
प्रयोगशालाओं का मान्यता स्तर40% SFSLs ISO/IEC 17025लगभग 100%
केस फाइलों का डिजिटलीकरण2025 तक 80% लक्ष्यपूर्ण डिजिटल प्रबंधन

संरचनात्मक चुनौतियां और क्षमता की कमी

राज्य फॉरेंसिक साइंस लैबोरेटरीज की असमान क्षमता और मान्यता की कमी बड़ी बाधा बनी हुई है। कई SFSLs में प्रशिक्षित फॉरेंसिक कर्मी और एकीकृत डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर का अभाव है, जिससे गुणवत्ता में असंगति और देरी होती है। ‘नवीन संहिताएं’ पहल को इन कमियों को दूर करने के लिए डिजिटलीकरण के साथ क्षमता निर्माण, मानकीकरण और नियामक प्रवर्तन भी सुनिश्चित करना होगा।

मानव संसाधन की कमी और बुनियादी ढांचे की कमजोरियों को सुधारे बिना केवल डिजिटलीकरण से फॉरेंसिक देरी और गुणवत्ता संबंधी समस्याएं खत्म नहीं होंगी।

महत्त्व और आगे की राह

  • फॉरेंसिक बैकलॉग का 90 दिनों में निपटारा सुनवाई में देरी को कम करेगा और अनुच्छेद 21 के तहत निष्पक्ष न्याय के अधिकार को मजबूत करेगा।
  • ‘नवीन संहिताएं’ के जरिए डेटा की अखंडता बढ़ेगी, रिपोर्ट तेज़ी से तैयार होंगी और विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय बेहतर होगा।
  • SFSL मान्यता को मानकीकृत करना और फॉरेंसिक कर्मियों के प्रशिक्षण कार्यक्रमों का विस्तार तकनीक के साथ जरूरी है।
  • फॉरेंसिक डेटा का NCRB और DNA डेटाबैंकों से एकीकरण आपराधिक जांच और न्यायिक फैसलों को मजबूत करेगा।
  • MHA और NITI आयोग द्वारा समय-समय पर ऑडिट और प्रदर्शन की निगरानी जवाबदेही और निरंतर सुधार सुनिश्चित करेगी।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
DNA टेक्नोलॉजी (उपयोग और आवेदन) विनियमन बिल, 2019 के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. यह भारत में फॉरेंसिक DNA प्रोफाइलिंग और डेटाबैंकिंग के लिए कानूनी ढांचा प्रदान करता है।
  2. यह बिल DNA प्रोफाइल को अंतरराष्ट्रीय फॉरेंसिक डेटाबेस के साथ साझा करने का प्रावधान करता है।
  3. इस बिल में व्यक्तिगत गोपनीयता की सुरक्षा और DNA डेटा के दुरुपयोग को रोकने के प्रावधान शामिल हैं।
  • aकेवल 1 और 3
  • bकेवल 2
  • cकेवल 1 और 2
  • d1, 2 और 3
उत्तर: (a)
कथन 1 सही है क्योंकि बिल फॉरेंसिक DNA प्रोफाइलिंग और डेटाबैंकिंग को नियंत्रित करता है। कथन 3 भी सही है क्योंकि बिल में गोपनीयता और दुरुपयोग रोकने के उपाय शामिल हैं। कथन 2 गलत है; बिल में DNA प्रोफाइल को अंतरराष्ट्रीय डेटाबेस के साथ साझा करने का प्रावधान नहीं है।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
भारत में फॉरेंसिक बैकलॉग के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. फॉरेंसिक बैकलॉग मुख्य रूप से पुलिस जांच में देरी के कारण होता है।
  2. राज्य फॉरेंसिक साइंस लैबोरेटरीज में केवल लगभग 40% को ISO/IEC 17025 मान्यता प्राप्त है।
  3. फॉरेंसिक केस फाइलों का डिजिटलीकरण परिचालन लागत और रिपोर्ट तैयार होने के समय को कम कर सकता है।
  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2 और 3
  • cकेवल 1 और 3
  • d1, 2 और 3
उत्तर: (b)
कथन 1 गलत है क्योंकि फॉरेंसिक बैकलॉग मुख्य रूप से लैब क्षमता और प्रक्रियागत देरी के कारण होता है, पुलिस जांच की देरी के कारण नहीं। कथन 2 और 3 सही हैं, जैसा कि MHA की रिपोर्ट और ‘नवीन संहिताएं’ पहल से पता चलता है।

मुख्य प्रश्न

गृह मंत्रालय द्वारा फॉरेंसिक बैकलॉग 90 दिनों में खत्म करने के निर्देश और तकनीक आधारित ‘नवीन संहिताएं’ परियोजना के क्रियान्वयन का भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में सुधार के संदर्भ में महत्त्व पर चर्चा करें। प्रमुख चुनौतियों का मूल्यांकन करें और प्रभावी फॉरेंसिक आधुनिकीकरण सुनिश्चित करने के लिए सुझाव दें।

झारखंड और JPSC से प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: पेपर 2 (शासन और लोक प्रशासन) — आपराधिक न्याय सुधार और फॉरेंसिक विज्ञान का आधुनिकीकरण
  • झारखंड का नजरिया: झारखंड की राज्य फॉरेंसिक साइंस लैब में भी राष्ट्रीय स्तर जैसी क्षमता और बैकलॉग की समस्याएं हैं; ‘नवीन संहिताएं’ के तहत डिजिटलीकरण से स्थानीय फॉरेंसिक रिपोर्टिंग में सुधार संभव है।
  • मुख्य बिंदु: राज्य स्तर पर इन्फ्रास्ट्रक्चर सुधार, फॉरेंसिक कर्मियों का प्रशिक्षण और राष्ट्रीय डेटाबेस से समन्वय को बढ़ावा देना जरूरी है ताकि झारखंड में न्याय प्रणाली की देरी कम हो सके।
‘नवीन संहिताएं’ पहल का मुख्य उद्देश्य क्या है?

‘नवीन संहिताएं’ का लक्ष्य 2025 तक 80% से अधिक फॉरेंसिक केस फाइलों को डिजिटलीकृत कर बैकलॉग कम करना, फॉरेंसिक रिपोर्ट की गति बढ़ाना और भारतीय फॉरेंसिक प्रयोगशालाओं में डेटा प्रबंधन को बेहतर बनाना है।

दंड प्रक्रिया संहिता फॉरेंसिक साक्ष्य संग्रह में कैसे मदद करती है?

CrPC की धारा 53 और 54 जांच के दौरान चिकित्सा परीक्षण और फॉरेंसिक नमूना संग्रह को अनिवार्य बनाती हैं, जो फॉरेंसिक साक्ष्य संग्रह के लिए कानूनी आधार प्रदान करती हैं।

फॉरेंसिक डिजिटलीकरण से आर्थिक लाभ क्या होंगे?

डिजिटलीकरण से कार्यप्रवाह में सुधार, मानवीय त्रुटियों में कमी और रिपोर्ट तैयार होने के समय में कमी के कारण अगले पांच वर्षों में परिचालन लागत में 20%-30% तक की बचत की उम्मीद है, जैसा कि MHA और FICCI रिपोर्ट में बताया गया है।

राज्य फॉरेंसिक साइंस लैबोरेटरीज की मान्यता क्यों जरूरी है?

ISO/IEC 17025 मान्यता फॉरेंसिक विश्लेषण की गुणवत्ता, विश्वसनीयता और मानकीकरण सुनिश्चित करती है, जिससे साक्ष्य की अखंडता बनी रहती है और पुनः जांच के कारण होने वाली देरी कम होती है।

समय पर फॉरेंसिक विश्लेषण से कौन सा संवैधानिक अधिकार जुड़ा है?

सुप्रीम कोर्ट ने State of Punjab v. Gurmit Singh (1996) मामले में समय पर फॉरेंसिक विश्लेषण को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निष्पक्ष न्याय के अधिकार से जोड़ा है।

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