ग्रेट निकोबार परियोजना का परिचय
ग्रेट निकोबार परियोजना भारत सरकार द्वारा 2023 में शुरू की गई एक प्रमुख आधारभूत संरचना और आर्थिक विकास योजना है, जिसका लक्ष्य अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह के सबसे बड़े द्वीप, ग्रेट निकोबार (लगभग 910 वर्ग किलोमीटर) का रूपांतरण करना है। इस परियोजना के तहत एक अंतरराष्ट्रीय ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, एक ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट, विद्युत उत्पादन सुविधाएं और शहरी बुनियादी ढांचा विकसित किया जाएगा, ताकि समुद्री व्यापार और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को बढ़ावा दिया जा सके। यह परियोजना बंदरगाह, नौवहन और जलमार्ग मंत्रालय (MoPSW) के नेतृत्व में है, जबकि पर्यावरण की निगरानी पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) द्वारा की जाती है। यह पहल भारत की इंडो-पैसिफिक समुद्री लॉजिस्टिक्स उपस्थिति को मजबूत करने के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, साथ ही पर्यावरणीय और आदिवासी अधिकारों के जटिल ढांचे के बीच संतुलन बनाती है।
UPSC प्रासंगिकता
- GS पेपर 3: आधारभूत संरचना विकास, पर्यावरण और पारिस्थितिकी, आर्थिक विकास
- GS पेपर 1: अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह का भूगोल, जनजातीय अधिकार
- निबंध: भारत में विकास और पर्यावरणीय स्थिरता का संतुलन
परियोजना के लिए कानूनी और संवैधानिक ढांचा
ग्रेट निकोबार परियोजना केंद्र सरकार के द्वीप क्षेत्रों पर विशेष अधिकारों के तहत संचालित होती है, जो संविधान के अनुच्छेद 246(3) में निहित है। पर्यावरणीय मंजूरी पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 (धारा 3 और 5) के तहत अनिवार्य है, जिसमें कठोर पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) शामिल हैं। वन भूमि के उपयोग परिवर्तन के लिए वन संरक्षण अधिनियम, 1980 (धारा 2) का पालन करना होता है, जबकि संरक्षित क्षेत्रों पर वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 (धारा 18 और 29) लागू होता है। आदिवासी अधिकारों की सुरक्षा अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वनवासियों के वन अधिकार अधिनियम, 2006 (धारा 3 और 4) के तहत की जाती है, जो शॉम्पेन और निकोबारी जनजातियों को सहमति और पुनर्वास के लिए अधिकार देता है। इसके अलावा, कोस्टल रेगुलेशन जोन (CRZ) अधिसूचना, 2019 संवेदनशील तटीय क्षेत्रों में विकास गतिविधियों को सीमित करती है। सुप्रीम कोर्ट के T.N. Godavarman Thirumulpad vs Union of India (1997) जैसे फैसले पर्यावरणीय निगरानी को और सख्त करते हैं।
- अनुच्छेद 246(3): द्वीप क्षेत्रों सहित केंद्र सरकार को विधायी अधिकार।
- पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986: पर्यावरणीय मंजूरी और प्रभाव आकलन अनिवार्य।
- वन संरक्षण अधिनियम, 1980: वन भूमि उपयोग परिवर्तन के नियम।
- वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972: वन्यजीव अभयारण्यों और आवासों की सुरक्षा।
- वन अधिकार अधिनियम, 2006: अनुसूचित जनजातियों और पारंपरिक वनवासियों के वन अधिकारों की मान्यता।
- CRZ अधिसूचना, 2019: तटीय क्षेत्रों में विकास नियंत्रण।
आर्थिक पहलू और रणनीतिक महत्व
इस परियोजना में अनुमानित निवेश 75,000 करोड़ रुपये से अधिक है (PIB, 2023), जिसका लक्ष्य 2040 तक वार्षिक 16 मिलियन TEUs की क्षमता वाला पोर्ट बनाना है (मंत्रालय, 2023)। वर्तमान में भारत की घरेलू ट्रांसशिपमेंट हिस्सेदारी केवल 2% है (वाणिज्य मंत्रालय, 2023)। इस विकास से भारत की विदेशी ट्रांसशिपमेंट हब जैसे कोलंबो और सिंगापुर पर निर्भरता कम होगी, जिससे ट्रांसशिपमेंट लागत में 20-25% की कमी आएगी (NITI Aayog, 2023) और निर्यात प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। परियोजना से लगभग 50,000 प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार सृजित होने की संभावना है और क्षेत्रीय GDP में 5-7% वार्षिक वृद्धि की उम्मीद है। पर्यावरणीय संरक्षण और पुनर्वास के लिए 10,000 करोड़ रुपये का बजट भी रखा गया है (MoEFCC, 2024), जो सतत विकास की प्रतिबद्धता दर्शाता है।
- निवेश: 75,000 करोड़ रुपये से अधिक, जिसमें 10,000 करोड़ पर्यावरण संरक्षण के लिए।
- पोर्ट क्षमता: 2040 तक 16 मिलियन TEUs, भारत की ट्रांसशिपमेंट क्षमता में बड़ा इजाफा।
- रोजगार: लगभग 50,000 प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष नौकरियां।
- रणनीतिक प्रभाव: भारत की इंडो-पैसिफिक समुद्री लॉजिस्टिक्स और क्षेत्रीय आर्थिक विकास को बढ़ावा।
- लागत कमी: ट्रांसशिपमेंट लागत में 20-25% की कटौती, निर्यात प्रतिस्पर्धा में सुधार।
संस्थागत भूमिकाएं और समन्वय
परियोजना में कई संस्थाएं विकास, पर्यावरण, सामाजिक और सुरक्षा क्षेत्रों में समन्वय करती हैं। बंदरगाह, नौवहन और जलमार्ग मंत्रालय (MoPSW) आधारभूत संरचना और पोर्ट संचालन का नेतृत्व करता है। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) पर्यावरणीय मंजूरी, निगरानी और प्रवर्तन का कार्य संभालता है। राष्ट्रीय समुद्री प्रौद्योगिकी संस्थान (NIOT) समुद्री आधारभूत संरचना और जलवायु सहनशीलता पर तकनीकी सलाह देता है। स्थानीय शासन और जनजातीय कल्याण अंडमान और निकोबार प्रशासन (ANA) के अधीन हैं। समुद्री सुरक्षा और निगरानी भारतीय तटरक्षक बल (ICG) द्वारा की जाती है। राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) जैव विविधता के प्रभावों का आकलन कर संरक्षण की सलाह प्रदान करता है।
- MoPSW: परियोजना कार्यान्वयन, पोर्ट और एयरपोर्ट विकास।
- MoEFCC: पर्यावरणीय मंजूरी, निगरानी और प्रवर्तन।
- NIOT: समुद्री आधारभूत संरचना और जलवायु सहनशीलता पर तकनीकी सलाह।
- ANA: स्थानीय शासन, जनजातीय कल्याण, पुनर्वास समन्वय।
- ICG: समुद्री सुरक्षा और द्वीप के जल क्षेत्रों की निगरानी।
- NBA: जैव विविधता प्रभाव आकलन और संरक्षण सलाह।
पर्यावरणीय और आदिवासी अधिकारों से जुड़ी चुनौतियां
2023 के पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) के अनुसार, आधारभूत संरचना विकास के कारण द्वीप के लगभग 15% वन क्षेत्र का नुकसान हो सकता है (MoEFCC रिपोर्ट, 2023)। शॉम्पेन और निकोबारी जनजातियां, जो द्वीप की लगभग 40% आबादी (लगभग 10,000 लोग) हैं (सेंसेस 2011, मानवशास्त्रीय सर्वेक्षण), विस्थापन और सांस्कृतिक क्षति के जोखिम में हैं। वर्तमान कानूनी ढांचे पर्यावरण संरक्षण और जनजातीय पुनर्वास को अलग-अलग देखते हैं, जिससे सामाजिक संघर्ष और पारिस्थितिक नुकसान का खतरा बढ़ जाता है, जैसा कि अन्य द्वीप विकास परियोजनाओं में देखा गया है। वन अधिकार अधिनियम और CRZ अधिसूचना के अनुपालन की निगरानी जरूरी है ताकि जनजातीय सहमति और तटीय संरक्षण सुनिश्चित किया जा सके।
- 15% वन क्षेत्र की हानि, जैव विविधता और कार्बन संचयन पर प्रभाव।
- आदिवासी आबादी: 10,000 शॉम्पेन और निकोबारी जनजातियां विस्थापन के जोखिम में।
- कानूनी सुरक्षा: जनजातीय सहमति और वन अधिकारों की मान्यता अनिवार्य।
- पर्यावरणीय और जनजातीय पुनर्वास के अलग-अलग ढांचे से संघर्ष की संभावना।
- CRZ और वन्यजीव संरक्षण अधिनियम का पालन तटीय और वन्यजीव संरक्षण के लिए जरूरी।
तुलनात्मक दृष्टिकोण: सिंगापुर का जुरोंग पोर्ट बनाम ग्रेट निकोबार परियोजना
| पहलू | ग्रेट निकोबार परियोजना | जुरोंग पोर्ट, सिंगापुर |
|---|---|---|
| स्थान | ग्रेट निकोबार द्वीप, भारत | जुरोंग द्वीप, सिंगापुर |
| पोर्ट क्षमता (TEUs) | 2040 तक अनुमानित 16 मिलियन TEUs | 2023 में 37 मिलियन TEUs से अधिक वार्षिक क्षमता |
| पर्यावरणीय नियम | EPA 1986, FCA 1980, CRZ 2019, वन अधिकार अधिनियम के तहत | सख्त पर्यावरण मानक और समेकित सततता नीतियां |
| रणनीतिक फोकस | विदेशी ट्रांसशिपमेंट निर्भरता कम करना, इंडो-पैसिफिक उपस्थिति बढ़ाना | वैश्विक ट्रांसशिपमेंट हब, तकनीक और सततता का समन्वय |
| आदिवासी अधिकार | शॉम्पेन और निकोबारी जनजातियों के अधिकार मान्यता प्राप्त, पुनर्वास चुनौतियां | कोई आदिवासी आबादी नहीं, शहरी और औद्योगिक विकास पर केंद्रित |
| रोजगार प्रभाव | लगभग 50,000 नौकरियां | लॉजिस्टिक्स, नौवहन और सहायक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण रोजगार |
आगे का रास्ता: विकास, पारिस्थितिकी और जनजातीय अधिकारों का समन्वय
- पर्यावरण संरक्षण और जनजातीय पुनर्वास के लिए एकीकृत ढांचा विकसित करें ताकि अलग-अलग दृष्टिकोण से बचा जा सके।
- वन अधिकार अधिनियम के तहत आदिवासी समुदायों की स्वतंत्र, पूर्व और सूचित सहमति सुनिश्चित करने के लिए सहभागिता तंत्र मजबूत करें।
- NIOT और NBA से वैज्ञानिक सलाह लेकर वास्तविक समय निगरानी के साथ अनुकूल पर्यावरण प्रबंधन लागू करें।
- MoPSW, MoEFCC, ANA और सुरक्षा एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करें ताकि रणनीतिक और पर्यावरणीय लक्ष्यों में संतुलन बना रहे।
- सिंगापुर के जुरोंग पोर्ट जैसे वैश्विक द्वीप बंदरगाह मॉडलों से सीख लेकर आर्थिक विकास और सततता में संतुलन बनाएं।
- परियोजना संविधान के अनुच्छेद 246(3) के तहत केंद्र सरकार के विशेष अधिकार क्षेत्र में आती है।
- वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत वन भूमि पर आधारभूत संरचना परियोजनाओं के लिए जनजातीय सहमति आवश्यक नहीं है।
- कोस्टल रेगुलेशन जोन अधिसूचना, 2019, ग्रेट निकोबार द्वीप के तटीय क्षेत्रों में विकास गतिविधियों को नियंत्रित करती है।
- भारत वर्तमान में अपने ट्रांसशिपमेंट माल का 80% से अधिक घरेलू स्तर पर संभालता है।
- ग्रेट निकोबार परियोजना का लक्ष्य 2040 तक भारत की ट्रांसशिपमेंट क्षमता में 50 मिलियन TEUs की वृद्धि करना है।
- विदेशी ट्रांसशिपमेंट हब पर निर्भरता कम करने से निर्यात प्रतिस्पर्धा में कमी आएगी।
मेन प्रश्न
भारत के रणनीतिक आर्थिक हितों और पर्यावरणीय प्रबंधन के संदर्भ में ग्रेट निकोबार परियोजना की समालोचनात्मक समीक्षा करें। आदिवासी अधिकारों और पारिस्थितिक स्थिरता से जुड़ी चुनौतियों पर चर्चा करें और इन चुनौतियों से निपटने के उपाय सुझाएं। (250 शब्द)
झारखंड और JPSC प्रासंगिकता
- JPSC पेपर: पेपर 3 (पर्यावरण और पारिस्थितिकी), पेपर 4 (आर्थिक विकास)
- झारखंड दृष्टिकोण: झारखंड में जनजातीय पुनर्वास और वन अधिकारों के अनुभव ग्रेट निकोबार के जनजातीय कल्याण के लिए मार्गदर्शक हो सकते हैं।
- मेन प्वाइंटर: संवैधानिक जनजातीय सुरक्षा, पर्यावरण कानून अनुपालन और समेकित विकास मॉडल पर आधारित उत्तर तैयार करें।
ग्रेट निकोबार परियोजना का मुख्य उद्देश्य क्या है?
इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य ग्रेट निकोबार द्वीप पर विश्व स्तरीय अंतरराष्ट्रीय ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट और सहायक आधारभूत संरचना विकसित करना है, जिससे भारत की इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में समुद्री व्यापार क्षमता और रणनीतिक उपस्थिति बढ़े।
ग्रेट निकोबार परियोजना से मुख्य रूप से कौन-सी आदिवासी समुदाय प्रभावित हैं?
शॉम्पेन और निकोबारी जनजातियां, जो द्वीप की लगभग 40% आबादी (लगभग 10,000 लोग) हैं, इस परियोजना से मुख्य रूप से प्रभावित होती हैं।
ग्रेट निकोबार परियोजना में जनजातीय अधिकारों की सुरक्षा के लिए कौन से कानूनी प्रावधान लागू होते हैं?
अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वनवासियों के वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत जनजातीय अधिकारों की मान्यता और वन भूमि उपयोग परिवर्तन के लिए स्वतंत्र, पूर्व और सूचित सहमति अनिवार्य है।
परियोजना भारत की विदेशी ट्रांसशिपमेंट निर्भरता को कैसे कम करेगी?
2040 तक 16 मिलियन TEUs की क्षमता वाला पोर्ट विकसित करके, यह परियोजना भारत के ट्रांसशिपमेंट माल का बड़ा हिस्सा विदेशी पोर्ट जैसे कोलंबो और सिंगापुर के बजाय घरेलू स्तर पर संभालेगी, जिससे लागत कम होगी और निर्यात प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी।
ग्रेट निकोबार परियोजना को किन पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना करना पड़ता है?
परियोजना के कारण द्वीप के लगभग 15% वन क्षेत्र का नुकसान, जैव विविधता और तटीय पारिस्थितिकी पर खतरा, और पर्यावरण संरक्षण कानूनों जैसे पर्यावरण संरक्षण अधिनियम और वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता प्रमुख चुनौतियां हैं।
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