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परिचय: ग्रेट निकोबार परियोजना की वन अधिकार मंजूरी को कानूनी चुनौती

ग्रेट निकोबार द्वीप विकास परियोजना, जो 2023 में घोषित ₹75,000 करोड़ की एक विशाल अवसंरचना पहल है, इसका उद्देश्य अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह के ग्रेट निकोबार द्वीप पर मेगा पोर्ट, हवाई अड्डा और शहरी अवसंरचना स्थापित करना है। यह परियोजना भारत की समुद्री व्यापार क्षमता को बढ़ाकर सालाना 60 मिलियन TEUs तक संचालन करने की योजना रखती है और 50,000 से अधिक रोजगार सृजित करेगी। 2023 में, कोलकाता उच्च न्यायालय की बेंच ने परियोजना के लिए दी गई वन अधिकार मंजूरी के खिलाफ कई जनहित याचिकाओं (PILs) की सुनवाई करने का फैसला किया, जिसमें वन अधिकार अधिनियम, 2006 और पर्यावरण सुरक्षा नियमों का उल्लंघन होने का आरोप लगाया गया है। ये याचिकाएं आदिवासी निकोबार और शॉम्पेन जनजातियों के विस्थापन के जोखिम और जैव विविधता से भरपूर क्षेत्र में पर्यावरणीय चिंताओं को उजागर करती हैं।

UPSC प्रासंगिकता

  • GS पेपर 2: शासन – वन अधिकार अधिनियम, 2006; जनहित याचिका; पर्यावरणीय शासन
  • GS पेपर 3: अर्थव्यवस्था – अवसंरचना विकास, समुद्री व्यापार, आदिवासी विस्थापन
  • निबंध: विकास बनाम पर्यावरणीय स्थिरता; आदिवासी अधिकार

वन अधिकार और पर्यावरण मंजूरी के लिए कानूनी ढांचा

अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वनवासियों (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 (FRA) व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकारों को मान्यता देता है, खासकर धारा 3 और 5 के तहत, जो वन भूमि और संसाधनों पर अधिकारों की मान्यता का प्रावधान करते हैं। FRA के अनुसार वन भूमि के किसी भी प्रकार के परिवर्तन से पहले स्थानीय वन अधिकार समितियों (FRCs) की सहमति और सलाह लेना अनिवार्य है। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 पर्यावरणीय मंजूरी का प्रबंधन करता है, जिसे पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) द्वारा लागू किया जाता है। भारतीय वन अधिनियम, 1927 वन प्रबंधन को नियंत्रित करता है, लेकिन वनवासियों को अधिकार प्रदान नहीं करता, जिससे FRA के प्रावधानों के साथ अक्सर टकराव होता है।

  • FRA, 2006 की धारा 3: व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकारों की मान्यता।
  • FRA, 2006 की धारा 5: वन अधिकारों की मान्यता और हस्तांतरण की प्रक्रिया।
  • संविधान का अनुच्छेद 48A: पर्यावरण संरक्षण का निर्देशात्मक सिद्धांत।
  • अनुच्छेद 32 और 226 के तहत PIL: पर्यावरण और वन अधिकारों के प्रवर्तन के लिए न्यायिक साधन।
  • समथा बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (1997): सुप्रीम कोर्ट का फैसला, जिसने आदिवासी अधिकारों को वन भूमि पर मान्यता दी और व्यावसायिक शोषण पर प्रतिबंध लगाया।

ग्रेट निकोबार परियोजना के आर्थिक और रणनीतिक पहलू

यह परियोजना भारत को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में एक रणनीतिक समुद्री केंद्र के रूप में स्थापित करने का लक्ष्य रखती है। परियोजना का पोर्ट क्षमता 60 मिलियन TEUs वार्षिक है, जिससे भारत के पूर्वी तट की समुद्री व्यापार क्षमता में 15% की वृद्धि होने की संभावना है। यह क्षेत्रीय आर्थिक विकास में योगदान देते हुए 50,000 से अधिक रोजगार प्रदान करने का अनुमान है। ₹75,000 करोड़ का निवेश पोर्ट अवसंरचना, अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा और शहरी विकास को कवर करता है। हालांकि, इस परियोजना के कारण लगभग 10,000 आदिवासी लोगों के विस्थापन का खतरा है, जो सामाजिक-आर्थिक समानता और सांस्कृतिक अस्तित्व के लिए चुनौती है।

  • परियोजना बजट: ₹75,000 करोड़ (Indian Express, 2023)
  • रोजगार सृजन: 50,000+ नौकरियां (MoEFCC, 2023)
  • पोर्ट क्षमता: 60 मिलियन TEUs वार्षिक (परियोजना DPR, 2023)
  • समुद्री व्यापार में वृद्धि का अनुमान: पूर्वी तट पर 15%
  • विस्थापन जोखिम: 10,000 आदिवासी निकोबार और शॉम्पेन (PIL हलफनामा, कोलकाता HC, 2023)

संस्थागत भूमिकाएं और क्षेत्राधिकार संबंधी चुनौतियां

कोलकाता उच्च न्यायालय की बेंच जनहित याचिकाओं के माध्यम से वन अधिकार मंजूरी पर न्यायिक निगरानी करती है। MoEFCC पर्यावरण और वन मंजूरी प्रदान करता है, लेकिन FRA अनुपालन को पर्याप्त रूप से शामिल न करने की आलोचना झेल रहा है। जनजातीय मामलों का मंत्रालय FRA के क्रियान्वयन की देखरेख करता है, लेकिन पर्यावरण मंजूरी पर उसका कोई प्रवर्तन अधिकार नहीं है। अंडमान और निकोबार प्रशासन स्थानीय शासन और परियोजना क्रियान्वयन का समन्वय करता है। राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) क्षेत्र में जैव विविधता संरक्षण का नियमन करता है, जबकि स्थानीय वन अधिकार समितियां (FRCs) वन अधिकार दावों की मान्यता के लिए जिम्मेदार हैं।

  • कोलकाता उच्च न्यायालय: वन अधिकार और पर्यावरण मंजूरी की न्यायिक समीक्षा
  • MoEFCC: पर्यावरण और वन मंजूरी प्राधिकरण
  • जनजातीय मामलों का मंत्रालय: FRA क्रियान्वयन की निगरानी
  • अंडमान और निकोबार प्रशासन: स्थानीय शासन और परियोजना सुविधा
  • राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण: जैव विविधता का नियमन
  • वन अधिकार समितियां: वन अधिकारों की जमीनी मान्यता

नीतिगत खामियां: वन अधिकार और पर्यावरण मंजूरी का समन्वय

मुख्य नीतिगत कमी FRA, 2006 और पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत पर्यावरण मंजूरी प्रक्रियाओं के बीच समन्वय की कमी में है। वन अधिकारों की मान्यता को अक्सर तेज़ी से परियोजना मंजूरी के दौरान नजरअंदाज किया जाता है, जिससे आदिवासी सहमति और पारिस्थितिक स्थिरता प्रभावित होती है। FRA वन भूमि के परिवर्तन से पहले समुदाय की सहमति और मान्यता को अनिवार्य करता है, लेकिन MoEFCC की मंजूरी प्रक्रियाएं इसे कड़ाई से लागू नहीं करतीं। यह खामी मुकदमों, परियोजना विलंब और सामाजिक असंतोष को जन्म देती है।

  • MoEFCC मंजूरी प्रोटोकॉल में FRA अनुपालन चेकलिस्ट का अभाव
  • पर्यावरण प्रभाव आकलन में FRC सिफारिशों को जोड़ने के स्पष्ट निर्देशों की कमी
  • जनजातीय मामलों के मंत्रालय की पर्यावरण मंजूरी पर सीमित प्रवर्तन शक्ति
  • न्यायिक हस्तक्षेप (जैसे कोलकाता HC की PILs) प्रवर्तन की कमी को पूरा कर रहे हैं

तुलनात्मक विश्लेषण: ग्रेट निकोबार परियोजना बनाम इंडोनेशिया के नटुना द्वीप विकास

पहलूग्रेट निकोबार परियोजना (भारत)नटुना द्वीप परियोजना (इंडोनेशिया)
परियोजना का उद्देश्यसमुद्री व्यापार और रणनीतिक उपस्थिति बढ़ाने के लिए मेगा पोर्ट, हवाई अड्डा, शहरी अवसंरचनासमुद्री व्यापार और क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा देने के लिए बड़े पैमाने पर अवसंरचना
आदिवासी अधिकारनिकोबार और शॉम्पेन जनजातियों के विस्थापन का खतरा; वन अधिकार मंजूरी को चुनौती देती PILsकानूनी चुनौतियों के बाद पूर्व सूचना सहमति और समुदाय की भागीदारी अनिवार्य की गई
पर्यावरण सुरक्षावन मंजूरी विवादित; 26% भारत के स्थानीय वनस्पति और जीवों के लिए जैव विविधता चिंताकानूनी चुनौतियों के बाद जैव विविधता ऑफसेटिंग और सख्त पर्यावरण नियम लागू किए
आर्थिक परिणामपूर्वी तट समुद्री व्यापार में 15% वृद्धि; 50,000+ रोजगारपोर्ट थ्रूपुट में 20% वृद्धि; बेहतर समुदाय संबंध
नीति प्रतिक्रियाPILs के माध्यम से न्यायिक जांच; FRA-पर्यावरण मंजूरी समन्वय के लिए सुधार की मांगसमुदाय की सहमति और पर्यावरण सुरक्षा के लिए नीतियों में संशोधन

आगे का रास्ता: विकास और वन अधिकारों के बीच संतुलन

  • पर्यावरण मंजूरी प्रक्रियाओं में FRA अनुपालन को अनिवार्य बनाकर आदिवासी सहमति सुनिश्चित करें।
  • MoEFCC और जनजातीय मामलों के मंत्रालय के बीच समन्वय मजबूत करें ताकि निर्णय एकीकृत हों।
  • वन अधिकार समितियों को कानूनी अधिकार देकर मंजूरी निर्णयों में प्रभावी भूमिका दें।
  • आदिवासी विस्थापन और आजीविका पुनर्स्थापन पर केंद्रित मजबूत सामाजिक प्रभाव आकलन लागू करें।
  • ग्रेट निकोबार के स्थानीय जैव विविधता के लिए जैव विविधता ऑफसेटिंग और संरक्षण उपाय अपनाएं।

प्रश्न अभ्यास

📝 प्रारंभिक अभ्यास
वन अधिकार अधिनियम, 2006 के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. यह अधिनियम वन भूमि पर व्यक्तिगत और सामुदायिक अधिकारों को मान्यता देता है।
  2. पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय इस अधिनियम को लागू करने के लिए जिम्मेदार है।
  3. वन भूमि परिवर्तन से पहले वन अधिकार समितियों की पूर्व सहमति आवश्यक है।
  • aकेवल 1 और 3
  • bकेवल 2
  • cकेवल 1 और 2
  • d1, 2 और 3
उत्तर: (a)
कथन 1 सही है क्योंकि FRA व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकारों को मान्यता देता है। कथन 2 गलत है क्योंकि FRA को लागू करने की जिम्मेदारी MoEFCC की नहीं, बल्कि जनजातीय मामलों के मंत्रालय की है। कथन 3 सही है क्योंकि FRA के तहत वन भूमि परिवर्तन से पहले वन अधिकार समितियों की सहमति अनिवार्य है।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
पर्यावरणीय शासन में जनहित याचिका (PIL) के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. PIL संविधान के अनुच्छेद 32 और 226 के तहत दायर की जा सकती हैं।
  2. सुप्रीम कोर्ट के समथा फैसले ने आदिवासी वन भूमि के व्यावसायिक शोषण को प्रतिबंधित किया है।
  3. PIL वन अधिकार अधिनियम, 2006 के प्रावधानों को पार कर सकती हैं।
  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2 और 3
  • cकेवल 1 और 3
  • d1, 2 और 3
उत्तर: (a)
कथन 1 और 2 सही हैं। PIL अनुच्छेद 32 और 226 के तहत दायर की जा सकती हैं। समथा फैसला आदिवासी वन भूमि के व्यावसायिक शोषण पर प्रतिबंध लगाता है। कथन 3 गलत है क्योंकि PIL कानूनी प्रावधानों को पार नहीं कर सकती, बल्कि उनके प्रवर्तन को सुनिश्चित करती है।

मुख्य प्रश्न

ग्रेट निकोबार परियोजना के संदर्भ में विकास की आवश्यकताओं और वन अधिकार संरक्षण के बीच टकराव पर चर्चा करें। आर्थिक विकास को पर्यावरणीय और आदिवासी अधिकारों के साथ संतुलित करने के लिए भारत के कानूनी और संस्थागत ढांचे को कैसे मजबूत किया जा सकता है?

झारखंड और JPSC प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: पेपर 2 – शासन और पर्यावरण कानून
  • झारखंड का संदर्भ: झारखंड में FRA के तहत कई आदिवासी आबादी और वन क्षेत्र हैं; ग्रेट निकोबार से मिले सबक आदिवासी क्षेत्रों में वन अधिकार और पर्यावरण शासन के समन्वय की जरूरत बताते हैं।
  • मुख्य बिंदु: झारखंड में FRA के क्रियान्वयन की चुनौतियां, न्यायिक हस्तक्षेप, और विकास व आदिवासी अधिकारों के बीच संतुलन पर उत्तर तैयार करें।
वन अधिकार समितियों (FRCs) की वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत क्या भूमिका है?

FRCs स्थानीय संस्थाएं हैं जो FRA की धारा 3 और 5 के तहत व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकारों की जांच और मान्यता की सिफारिश करती हैं। ये आदिवासियों की वन शासन में भागीदारी सुनिश्चित करती हैं।

पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 का वन भूमि परिवर्तन से क्या संबंध है?

यह अधिनियम MoEFCC को वन भूमि परिवर्तन वाले प्रोजेक्ट्स के लिए पर्यावरणीय मंजूरी देने का अधिकार देता है, जिसमें पर्यावरणीय प्रभाव आकलन और जैव विविधता संरक्षण के नियम शामिल हैं।

ग्रेट निकोबार परियोजना के खिलाफ PILs में मुख्य चिंताएं क्या हैं?

PILs वन अधिकार मंजूरी में आदिवासी सहमति की कमी, 10,000 आदिवासियों के विस्थापन का खतरा, और स्थानीय जैव विविधता को खतरा होने के आरोप लगाती हैं, साथ ही FRA और पर्यावरण कानूनों के उल्लंघन का दावा करती हैं।

समथा बनाम आंध्र प्रदेश (1997) फैसले का महत्व क्या था?

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि आदिवासी भूमि का व्यावसायिक शोषण नहीं किया जा सकता, जिससे आदिवासियों के वन भूमि अधिकार मजबूत हुए और अनुसूचित क्षेत्रों में गैर-आदिवासी व्यावसायिक गतिविधियों पर रोक लगी।

ग्रेट निकोबार परियोजना और इंडोनेशिया के नटुना द्वीप विकास की तुलना कैसे की जा सकती है?

दोनों परियोजनाओं का उद्देश्य समुद्री व्यापार को बढ़ावा देना है, लेकिन दोनों को आदिवासी अधिकारों और पर्यावरण मंजूरी को लेकर कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। इंडोनेशिया ने समुदाय की पूर्व सूचना सहमति और जैव विविधता संरक्षण को अनिवार्य कर नीति संशोधन किए, जिससे 20% पोर्ट थ्रूपुट वृद्धि और बेहतर समुदाय संबंध हासिल हुए।

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