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वित्त वर्ष 2026-27 में उर्वरक सब्सिडी का अनुमान और वित्तीय प्रभाव

वित्त वर्ष 2026-27 (FY27) के लिए उर्वरक सब्सिडी का अनुमान 1.75 लाख करोड़ रुपये है, जो बजट अनुमान (BE) 1.40 लाख करोड़ रुपये से 35,000 करोड़ रुपये अधिक है, जैसा कि इंडियन एक्सप्रेस (2024) में बताया गया है। यह बढ़ोतरी रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के उर्वरक विभाग (DoF) के मूल्य निर्धारण और सब्सिडी लक्षित करने में मौजूद प्रणालीगत कमियों को दर्शाती है। भारत विश्व में उर्वरक का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है, FY23 में पोषक तत्वों की खपत 27.5 मिलियन टन रही (DoF वार्षिक रिपोर्ट 2023)। यह सब्सिडी भारत के GDP का लगभग 0.6% हिस्सा है, जो इसके बड़े वित्तीय प्रभाव को दर्शाता है।

UPSC प्रासंगिकता

  • GS पेपर 3: भारतीय अर्थव्यवस्था - सब्सिडी, कृषि, वित्तीय नीति
  • GS पेपर 2: राज्यव्यवस्था - कृषि और आवश्यक वस्तुओं पर संवैधानिक प्रावधान
  • निबंध: भारत की कृषि नीतियों में किसान कल्याण और वित्तीय विवेक का संतुलन

उर्वरक सब्सिडी को नियंत्रित करने वाला कानूनी और संस्थागत ढांचा

संविधान के अनुच्छेद 246(1) के तहत संसद को कृषि पर कानून बनाने का विशेष अधिकार है। उर्वरक क्षेत्र पर नियंत्रण आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के तहत जारी फर्टिलाइजर कंट्रोल ऑर्डर, 1985 द्वारा किया जाता है, जो मूल्य निर्धारण और वितरण को नियंत्रित करता है। सब्सिडी योजना का संचालन DoF करता है, जबकि फर्टिलाइजर मैनेजमेंट कमेटी (FMC) सब्सिडी भुगतान और मूल्य निर्धारण की निगरानी करती है। फर्टिलाइजर सब्सिडी मैनेजमेंट सिस्टम (FSMS) पारदर्शिता और सब्सिडी ट्रैकिंग के लिए दिशानिर्देश प्रदान करता है। सुप्रीम कोर्ट ने Centre for Public Interest Litigation vs Union of India (2018) में सब्सिडी प्रबंधन में पारदर्शिता और जवाबदेही पर जोर दिया है।

  • अनुच्छेद 246(1): कृषि कानून बनाने में संसद को अधिकार।
  • आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955: फर्टिलाइजर कंट्रोल ऑर्डर का कानूनी आधार।
  • फर्टिलाइजर कंट्रोल ऑर्डर, 1985: उर्वरक के मूल्य और वितरण का नियंत्रण।
  • DoF और FMC: नीति निर्माण और निगरानी।
  • FSMS: सब्सिडी ट्रैकिंग के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म।
  • सुप्रीम कोर्ट के फैसले: सब्सिडी योजनाओं में पारदर्शिता अनिवार्य।

भारत में उर्वरक सब्सिडी के आर्थिक पहलू

उर्वरक सब्सिडी भारत की GDP का लगभग 0.6% हिस्सा है (आर्थिक सर्वे 2023-24)। यूरिया पर लगभग 70% सब्सिडी खर्च होती है क्योंकि इसका मूल्य नियंत्रित है। भारत फॉस्फेटिक और पोटैशिक उर्वरकों की करीब 80% जरूरत आयात करता है, जिससे सब्सिडी खर्च वैश्विक मूल्य में उतार-चढ़ाव के प्रति संवेदनशील होता है (आर्थिक सर्वे 2023-24)। पिछले दशक में सब्सिडी की वार्षिक वृद्धि दर लगभग 8% रही है, जो बढ़ती लागत और खपत को दर्शाती है। वर्तमान मूल्य-आधारित सब्सिडी मॉडल उर्वरक के दामों को विकृत करता है, जिससे यूरिया का अत्यधिक उपयोग और पर्यावरणीय नुकसान होता है।

पैरामीटरभारत (FY27 अनुमान)चीन (2015 के बाद सुधार)
सब्सिडी मॉडलउर्वरकों पर मूल्य-आधारित सब्सिडीकिसानों को प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण
सब्सिडी व्यय (₹ करोड़)1.75 लाख करोड़ (अनुमानित)सुधार के बाद 25% कमी
सब्सिडी रिसावमूल्य नियंत्रण और मध्यस्थों के कारण अधिकप्रत्यक्ष हस्तांतरण से कम
वित्तीय स्थिरताअधिक खर्च के कारण दबाव मेंसुधार के बाद बेहतर
पर्यावरणीय प्रभावयूरिया का अत्यधिक उपयोग और मिट्टी का क्षरणबेहतर पोषक तत्व प्रबंधन प्रोत्साहन

मुख्य संस्थागत भूमिकाएं और निगरानी तंत्र

DoF उर्वरक सब्सिडी नीति बनाने और लागू करने वाली प्रमुख संस्था है। FMC सब्सिडी भुगतान और मूल्य निर्धारण की निगरानी करता है ताकि रिसाव रोका जा सके। कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल (CAG) सब्सिडी व्यय का ऑडिट करता है जिससे वित्तीय जवाबदेही सुनिश्चित हो। नीति आयोग सब्सिडी सुधार और नीति पर सलाह देता है। फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गनाइजेशन (FAO) वैश्विक उर्वरक खपत और सर्वोत्तम प्रथाओं का तुलनात्मक डेटा उपलब्ध कराता है।

  • DoF: नीति निर्माण और सब्सिडी प्रबंधन।
  • FMC: मूल्य निर्धारण और भुगतान की निगरानी।
  • CAG: वित्तीय ऑडिट।
  • नीति आयोग: सब्सिडी सुधार पर सलाह।
  • FAO: वैश्विक डेटा और मानक।

उर्वरक सब्सिडी तंत्र में प्रणालीगत चुनौतियां

भारत का सब्सिडी ढांचा मुख्यतः मूल्य नियंत्रण पर आधारित है, न कि प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण पर, जिससे कई कमियां उत्पन्न होती हैं। मूल्य विकृति के कारण यूरिया का अत्यधिक उपयोग होता है, जो पोषक तत्व असंतुलन और पर्यावरणीय नुकसान को बढ़ावा देता है। प्रशासनिक अड़चनों और वास्तविक समय निगरानी के अभाव से सब्सिडी रिसाव और वित्तीय अधिशेष जारी रहते हैं। फॉस्फेटिक और पोटैशिक उर्वरकों के लिए आयात निर्भरता वैश्विक मूल्य झटकों के प्रति सब्सिडी व्यय को अस्थिर बनाती है। ये सभी कारक मिलकर वित्तीय बजट पर दबाव डालते हैं और सब्सिडी योजना की स्थिरता को कमजोर करते हैं।

तुलनात्मक दृष्टिकोण: भारत बनाम चीन के उर्वरक सब्सिडी सुधार

चीन ने 2015 में मूल्य-आधारित सब्सिडी की जगह किसानों को प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण शुरू किया, जिससे सब्सिडी रिसाव में 25% की कमी आई और वित्तीय स्थिरता बेहतर हुई (वर्ल्ड बैंक रिपोर्ट, 2022)। इस मॉडल ने उर्वरक के कुशल उपयोग को बढ़ावा दिया, पर्यावरणीय प्रभाव घटाया और सब्सिडी लक्षित करने में सुधार किया। इसके विपरीत, भारत की मूल्य नियंत्रण पर निर्भरता सब्सिडी अधिशेष और संसाधन आवंटन में अक्षमता को बढ़ाती है।

आगे का रास्ता: किसान समर्थन और वित्तीय विवेक का संतुलन

  • रिसाव कम करने और लक्षित वितरण सुधारने के लिए प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) की ओर संक्रमण।
  • यूरिया सब्सिडी में सुधार कर इसके अत्यधिक उपयोग को रोकना और संतुलित उर्वरक उपयोग को प्रोत्साहित करना।
  • वास्तविक समय में सब्सिडी निगरानी और पारदर्शिता के लिए FSMS को मजबूत करना।
  • फॉस्फेटिक और पोटैशिक उर्वरकों के घरेलू उत्पादन को बढ़ाकर आयात निर्भरता कम करना।
  • पर्यावरणीय लागतों को सब्सिडी नीति में शामिल कर सतत उर्वरक उपयोग को प्रोत्साहित करना।
  • CAG द्वारा नियमित ऑडिट और नीति आयोग द्वारा समय-समय पर नीति समीक्षा से वित्तीय अनुशासन सुनिश्चित करना।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
भारत में उर्वरक सब्सिडी तंत्र के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. फर्टिलाइजर कंट्रोल ऑर्डर, 1985 उर्वरक के मूल्य निर्धारण और वितरण को नियंत्रित करता है।
  2. भारत में उर्वरक सब्सिडी का मुख्य माध्यम प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण है।
  3. आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 उर्वरक नियंत्रण के लिए कानूनी आधार प्रदान करता है।

इनमें से कौन-से कथन सही हैं?

  • aकेवल 1 और 3
  • bकेवल 2
  • cकेवल 1 और 2
  • d1, 2 और 3
उत्तर: (a)
कथन 1 सही है क्योंकि फर्टिलाइजर कंट्रोल ऑर्डर, 1985 उर्वरक के मूल्य और वितरण को नियंत्रित करता है। कथन 2 गलत है क्योंकि भारत में मुख्य रूप से मूल्य-आधारित सब्सिडी लागू है, प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण नहीं। कथन 3 सही है क्योंकि आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 फर्टिलाइजर कंट्रोल ऑर्डर का कानूनी आधार है।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
भारत के उर्वरक सब्सिडी व्यय के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. यूरिया कुल उर्वरक सब्सिडी व्यय का लगभग 70% हिस्सा है।
  2. भारत अपने फॉस्फेटिक और पोटैशिक उर्वरक की करीब 50% आवश्यकता आयात करता है।
  3. उर्वरक सब्सिडी भारत की GDP का लगभग 0.6% है।

इनमें से कौन-से कथन सही हैं?

  • aकेवल 1 और 3
  • bकेवल 2 और 3
  • cकेवल 1 और 2
  • d1, 2 और 3
उत्तर: (a)
कथन 1 सही है क्योंकि यूरिया सब्सिडी व्यय का लगभग 70% हिस्सा है। कथन 2 गलत है क्योंकि फॉस्फेटिक और पोटैशिक उर्वरक की आयात निर्भरता लगभग 80% है, 50% नहीं। कथन 3 सही है क्योंकि उर्वरक सब्सिडी GDP का लगभग 0.6% है।

मुख्य प्रश्न

वित्त वर्ष 2026-27 में उर्वरक सब्सिडी के बजट अनुमान से अधिक होने के कारणों का समालोचनात्मक विश्लेषण करें और किसानों का समर्थन करते हुए वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक सुधारों पर चर्चा करें। (250 शब्द)

झारखंड और JPSC प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: पेपर 2 (अर्थव्यवस्था और कृषि) - सब्सिडी नीतियां और कृषि इनपुट प्रबंधन
  • झारखंड का दृष्टिकोण: झारखंड की कृषि अर्थव्यवस्था heavily सब्सिडी वाले उर्वरकों पर निर्भर है; सब्सिडी अधिशेष से ग्रामीण विकास के लिए राज्य बजट प्रभावित होता है।
  • मुख्य बिंदु: झारखंड में प्रभावी सब्सिडी लक्षित करने की आवश्यकता ताकि वित्तीय दबाव कम हो और सतत कृषि को बढ़ावा मिले।
भारत में उर्वरक मूल्य नियंत्रण का कानूनी आधार क्या है?

फर्टिलाइजर कंट्रोल ऑर्डर, 1985, जो आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के तहत जारी किया गया है, भारत में उर्वरक के मूल्य निर्धारण और वितरण को नियंत्रित करने का कानूनी आधार है।

भारत में यूरिया सब्सिडी अधिक क्यों है?

यूरिया को लगभग 70% सब्सिडी मिलती है क्योंकि इसका मूल्य नियंत्रित है और इसका व्यापक उपयोग होता है, जो बाजार कीमतों को विकृत करता है और अत्यधिक उपयोग को बढ़ावा देता है।

आयात निर्भरता उर्वरक सब्सिडी व्यय को कैसे प्रभावित करती है?

भारत फॉस्फेटिक और पोटैशिक उर्वरकों का लगभग 80% आयात करता है, जिससे सब्सिडी व्यय वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव के प्रति संवेदनशील हो जाता है और वित्तीय भार बढ़ता है।

चीन ने उर्वरक सब्सिडी प्रबंधन में क्या सुधार किए हैं?

चीन ने 2015 में मूल्य-आधारित सब्सिडी की जगह किसानों को प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण शुरू किया, जिससे सब्सिडी रिसाव में 25% कमी आई और वित्तीय स्थिरता बेहतर हुई।

फर्टिलाइजर सब्सिडी मैनेजमेंट सिस्टम (FSMS) की भूमिका क्या है?

FSMS एक डिजिटल प्लेटफॉर्म है जो उर्वरक सब्सिडी के भुगतान को वास्तविक समय में ट्रैक करता है, जिससे पारदर्शिता बढ़ती है और रिसाव कम होता है।

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