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परिचय: भारतीय राज्यों में राजस्व घाटा और वित्तीय दबाव

वित्त वर्ष 2022-23 में 12 भारतीय राज्यों ने अपने सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) का 1% से अधिक राजस्व घाटा दर्ज किया, जिसका कुल योग लगभग ₹1.2 लाख करोड़ है (Controller General of Accounts, 2023)। केंद्र सरकार ने इन घाटों को वित्तीय दबाव का कारण बताया है, जिससे राज्यों की आवश्यक सार्वजनिक सेवाओं और पूंजीगत निवेश की क्षमता सीमित हो रही है। इस स्थिति से भारत के संघीय वित्तीय ढांचे में राज्यों की वित्तीय भूमिका को देखते हुए आर्थिक स्थिरता और सतत विकास को खतरा पैदा होता है।

UPSC प्रासंगिकता

  • GS पेपर 3: भारतीय अर्थव्यवस्था — वित्तीय संघवाद, राज्य वित्त, बजट और सार्वजनिक ऋण
  • GS पेपर 2: भारतीय राजनीति — वित्त पर संवैधानिक प्रावधान, वित्त आयोग
  • निबंध: भारत में वित्तीय अनुशासन और सतत विकास

राज्य वित्त पर संवैधानिक और कानूनी ढांचा

भारत का संविधान, अनुच्छेद 282 के तहत केंद्र और राज्यों को सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए अनुदान देने का अधिकार देता है, जिससे वित्तीय हस्तांतरण संभव होता है। अनुच्छेद 293 राज्यों की उधारी को सीमित करता है और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के अलावा अन्य स्रोतों से उधारी के लिए केंद्र की मंजूरी अनिवार्य करता है। फिस्कल रिस्पांसिबिलिटी एंड बजट मैनेजमेंट एक्ट, 2003 (FRBM एक्ट) राजस्व घाटे को खत्म करने और राज्यों के लिए वित्तीय अनुशासन के लक्ष्य निर्धारित करने का निर्देश देता है, जिसमें धारा 2(b) के तहत राजस्व घाटा राजस्व व्यय और राजस्व प्राप्तियों के बीच के अंतर के रूप में परिभाषित है।

14वीं वित्त आयोग (2015-2020) और 15वीं वित्त आयोग (2021-2026) ने राजस्व घाटे को कम करने और ऋण स्तर को स्थायी बनाए रखने के लिए वित्तीय लक्ष्य और अनुदान की शर्तें निर्धारित की हैं। ये संस्थाएं राज्यों की अनुपालना की निगरानी करती हैं और वित्तीय समेकन के रास्ते सुझाती हैं।

लगातार राजस्व घाटे के आर्थिक प्रभाव

राजस्व घाटे वाले राज्यों के पास पूंजीगत व्यय के लिए सीमित वित्तीय गुंजाइश होती है, जो बुनियादी ढांचे और दीर्घकालिक विकास के लिए जरूरी है। इकोनॉमिक सर्वे 2023-24 के अनुसार, घाटा वाले राज्य पूंजीगत व्यय में औसतन 25% कम खर्च करते हैं, जो आर्थिक विकास और सेवा वितरण में बाधा डालता है।

इसके अलावा, राजस्व घाटा राज्यों के ऋण भार को बढ़ाता है। कुछ राज्यों का ऋण-से-GSDP अनुपात 30% से ऊपर है, जो 15वीं वित्त आयोग द्वारा सुझाए 20% की सीमा से अधिक है। इन राज्यों में ऋण सेवा लागत राजस्व प्राप्तियों का 15% तक लेती है, जिससे विकासात्मक खर्च कम होता है और वित्तीय जोखिम बढ़ता है।

वित्त वर्ष 2022-23 में वस्तु एवं सेवा कर (GST) मुआवजा शुल्‍क में ₹1.1 लाख करोड़ की कमी ने राजस्व दबाव और बढ़ा दिया, क्योंकि राज्य इन हस्तांतरणों पर भारी निर्भर थे (वित्त मंत्रालय, 2023)।

राज्य वित्तीय स्वास्थ्य प्रबंधन में संस्थागत भूमिका

  • 15वीं वित्त आयोग (FFC): वित्तीय लक्ष्य निर्धारित करता है, अनुदान की सिफारिश करता है और राज्यों के वित्तीय अनुशासन की निगरानी करता है।
  • Controller General of Accounts (CGA): राज्यों की राजस्व और व्यय की विश्वसनीय जानकारी प्रदान करता है, जिससे वित्तीय आकलन संभव होता है।
  • Reserve Bank of India (RBI): राज्यों की उधारी को नियंत्रित करता है, बाजार और कानूनी उपायों से ऋण स्थिरता सुनिश्चित करता है।
  • वित्त मंत्रालय (MoF): वित्तीय नीति बनाता है, FRBM अनुपालन देखता है और केंद्र-राज्य वित्तीय संबंधों का प्रबंधन करता है।
  • Comptroller and Auditor General of India (CAG): राज्यों के वित्तीय प्रबंधन का लेखा-जोखा करता है, विसंगतियों और अक्षमताओं को उजागर करता है।

तुलनात्मक अध्ययन: भारत और ब्राजील का उपराष्ट्रीय वित्तीय अनुशासन

ब्राजील का Lei de Responsabilidade Fiscal (2000) उपराष्ट्रीय घाटे और ऋण पर कड़े प्रतिबंध लगाता है, साथ ही पारदर्शिता और प्रवर्तन के मजबूत तंत्र रखता है। इस कानून ने ब्राजील के राज्यों के वित्तीय असंतुलन को 2000 के दशक की शुरुआत में GDP के लगभग 5% से घटाकर 2015 तक 2% से नीचे कर दिया (विश्व बैंक, 2018), जो बाध्यकारी वित्तीय नियमों और संस्थागत निगरानी की प्रभावशीलता को दर्शाता है।

पहलूभारतब्राजील
कानूनी ढांचाFRBM एक्ट (2003), अनुच्छेद 282 और 293, वित्त आयोगLei de Responsabilidade Fiscal (2000)
वित्तीय लक्ष्यराजस्व घाटा समाप्ति, ऋण-से-GSDP ≤ 20%घाटा एवं ऋण सीमा कड़ाई से लागू, दंड सहित
प्रवर्तन तंत्रशर्तीय अनुदान, उधारी सीमा, लेकिन दंड कमजोरमजबूत दंड, पारदर्शिता और लेखा-जोखा तंत्र
वित्तीय परिणाम12 राज्यों में >1% राजस्व घाटा, कुछ में ऋण >30%राज्यों का घाटा 5% से घटकर <2% GDP

भारतीय राज्यों के वित्तीय प्रबंधन में प्रमुख कमियां

FRBM के निर्देशों के बावजूद कई राज्यों के पास मजबूत मध्यम अवधि के वित्तीय ढांचे और जोखिम प्रबंधन नहीं हैं। उधारी के फैसले अक्सर आकस्मिक दबावों से चलते हैं, रणनीतिक योजना की कमी रहती है। पारदर्शिता की कमी और सीमित जवाबदेही तंत्र वित्तीय अनुशासन को कमजोर करते हैं, जिससे राजस्व घाटा और ऋण बढ़ता रहता है।

FRBM लक्ष्यों के उल्लंघन पर लागू दंडों का अभाव वित्तीय संयम के लिए प्रोत्साहन कमजोर करता है। इसके अलावा, GST मुआवजा शुल्‍क की कमी ने राज्यों की केंद्रीय हस्तांतरणों पर निर्भरता की कमजोरियों को उजागर किया।

महत्व और आगे का रास्ता

  • राज्यों को मध्यम अवधि के वित्तीय ढांचे को संस्थागत रूप से अपनाना चाहिए, जिसमें राजस्व और व्यय के अनुमान के साथ जोखिम मूल्यांकन शामिल हो।
  • FRBM अनुपालन को मजबूत दंड और स्वतंत्र वित्तीय परिषदों के माध्यम से बढ़ाया जाना चाहिए ताकि जवाबदेही सुनिश्चित हो।
  • राज्य राजस्व स्रोतों का विविधीकरण और कर प्रशासन में सुधार से केंद्रीय हस्तांतरणों और उधारी पर निर्भरता कम होगी।
  • राजस्व कमियों के दौरान पूंजीगत व्यय को कटौती से बचाना चाहिए ताकि विकास और सेवा वितरण जारी रह सके।
  • GST मुआवजा और वित्तीय हस्तांतरणों पर केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है ताकि राज्य वित्त को स्थिर किया जा सके।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
भारतीय राज्यों में राजस्व घाटा और वित्तीय घाटे के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. राजस्व घाटा तब होता है जब राजस्व व्यय राजस्व प्राप्तियों से अधिक हो।
  2. वित्तीय घाटा में राजस्व और पूंजी दोनों घाटे शामिल होते हैं।
  3. संविधान के अनुच्छेद 293 के तहत राज्यों को बिना केंद्र की मंजूरी के असीमित उधारी की अनुमति है।

इनमें से कौन-से कथन सही हैं?

  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2 और 3
  • cकेवल 1 और 3
  • d1, 2 और 3
उत्तर: (a)
कथन 1 FRBM एक्ट की धारा 2(b) के अनुसार सही है। कथन 2 भी सही है; वित्तीय घाटा में राजस्व घाटा और पूंजीगत घाटा दोनों शामिल होते हैं। कथन 3 गलत है; अनुच्छेद 293 राज्यों की उधारी पर केंद्र की मंजूरी अनिवार्य करता है।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
फिस्कल रिस्पांसिबिलिटी एंड बजट मैनेजमेंट (FRBM) एक्ट के बारे में निम्नलिखित पर विचार करें:
  1. यह राज्यों को मध्यम अवधि में राजस्व घाटा समाप्त करने का निर्देश देता है।
  2. यह एक्ट केवल केंद्र सरकार पर लागू होता है, राज्यों पर नहीं।
  3. 15वीं वित्त आयोग FRBM एक्ट के अनुरूप वित्तीय लक्ष्य निर्धारित करता है।

इनमें से कौन-से कथन सही हैं?

  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2 और 3
  • cकेवल 1 और 3
  • d1, 2 और 3
उत्तर: (c)
कथन 1 सही है; राज्यों ने अपने-अपने FRBM एक्ट अपनाए हैं। कथन 2 गलत है; कई राज्यों ने FRBM एक्ट लागू किया है। कथन 3 सही है; 15वीं वित्त आयोग FRBM लक्ष्यों के अनुरूप वित्तीय लक्ष्य निर्धारित करता है।

मुख्य प्रश्न

यह जांचें कि भारतीय राज्यों में लगातार राजस्व घाटे से वित्तीय दबाव कैसे उत्पन्न होता है और इसे दूर करने के लिए संवैधानिक व संस्थागत उपाय क्या हैं। राज्य स्तर पर वित्तीय अनुशासन सुधारने के लिए सुझाव दें।

झारखंड और JPSC प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: पेपर 2 (भारतीय अर्थव्यवस्था और राजनीति) — राज्य वित्त और वित्तीय संघवाद
  • झारखंड परिप्रेक्ष्य: झारखंड ने हाल के वर्षों में राजस्व घाटा दर्ज किया है, जिससे पूंजीगत व्यय और बुनियादी ढांचे के विकास पर असर पड़ा है।
  • मुख्य बिंदु: झारखंड की वित्तीय चुनौतियों, FRBM अनुपालन स्थिति, और GST मुआवजा शुल्‍क की कमी के बजट पर प्रभाव को उजागर करते हुए उत्तर तैयार करें।
राजस्व घाटा और वित्तीय घाटे में क्या अंतर है?

राजस्व घाटा तब होता है जब राज्य का राजस्व व्यय उसकी राजस्व प्राप्तियों से अधिक हो, यानी नियमित आय से खर्च पूरे नहीं होते। वित्तीय घाटा राजस्व घाटा और पूंजीगत व्यय के बीच के अंतर को दर्शाता है, जो कुल उधारी की आवश्यकता को बताता है।

भारत में राज्यों की उधारी को कौन से संविधानिक प्रावधान नियंत्रित करते हैं?

अनुच्छेद 293 राज्यों को केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित सीमा से अधिक उधारी करने से रोकता है। RBI के अलावा अन्य स्रोतों से उधारी के लिए केंद्र की मंजूरी आवश्यक होती है, जिससे उपराष्ट्रीय ऋण पर केंद्रीय नियंत्रण सुनिश्चित होता है।

वित्त आयोग राज्य वित्तीय अनुशासन को कैसे प्रभावित करते हैं?

वित्त आयोग राज्यों के लिए वित्तीय लक्ष्य, अनुदान और उधारी सीमाएं निर्धारित करते हैं, और केंद्रीय हस्तांतरणों को वित्तीय अनुशासन के पालन से जोड़ते हैं, जिससे राज्यों में वित्तीय अनुशासन को प्रोत्साहन मिलता है।

GST मुआवजा शुल्‍क की कमी का राज्यों के वित्त पर क्या प्रभाव पड़ा?

वित्त वर्ष 2022-23 में ₹1.1 लाख करोड़ की कमी ने राज्यों की अपेक्षित आय को कम किया, जिससे कई राज्यों को उधारी बढ़ानी पड़ी और पूंजीगत व्यय में कटौती करनी पड़ी, जिससे वित्तीय दबाव और बढ़ा।

ब्राजील के वित्तीय जिम्मेदारी कानून से भारत क्या सीख सकता है?

ब्राजील के कड़े वित्तीय नियम, दंड और पारदर्शिता तंत्र ने उपराष्ट्रीय घाटे को काफी घटाया है। भारत भी राज्यों के वित्तीय अनुशासन को मजबूत करने के लिए प्रवर्तन और संस्थागत निगरानी को सशक्त बना सकता है।

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